झुद्क तथा अकाशक
घनदयाम्रदास जाढान+,
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १०९४ प्रथम संस्करण ३२९५०
मूल्य ॥>) दश आना
पत्ता-
गीताग्रेस, गोरखपुर
आहरिः
विषय-सूची
ज्क्न्त+-
व्यय
२-भथम पघरसंग-राम-रहस्य
२-छद्धितीय घर्ं॑ग-ज्ञानदीपक
३-तलातीय प्संग-शीभमक्ति-चिन्तामणि
४-चहत्ु॒र्थ प्रंग-सस प्रश्न
७६-पञ्थम पघरतंंग-परिशिए्ट बन
चित्र-सू्ची
१---लछोमछा ऋषि और काकश्ुशुण्डि
२४---चिहुवनमोहन राम
व्पतोेत-+च्कु-नक-च्े 5
वक्तन्य
श्रीरामचरितमानस भक्तिशासत्रका एक बड़ा ग्रन्थ है; मनोहर
पद्यमयी रचना होनेसे वह अतीव श्रतिमधुर और चित्ताकर्षक हों गया
है | साबरमन्त्रजालके स्वयिता भगवान् भूतभावनकी अनुकम्पासे
उसकी एक-एक चोपाईमें मन्त्रकी शक्ति भर गयी है | इसका छोकोत्तर
प्रचार ही उसके लोकोत्तर गुणोंका परिचायक है | के
श्रोताके हृदयज्ञम करानेके लिये निरुपणीय विषयकों विस्तार और
संक्षेप, दोनों भौतिसे निरूपण करनेकी परिषा्ी है, यथा--
कहे नाथ हरि चरित अनूपा | व्यास समास खमति अनुरूपा॥
जिस चरित्रकों बिस्तारके साथ सात काण्डोंमें वर्णन किया, वही:
चरित्र संक्षेपमे भुशुण्डिजीके मुखते पांच दोहीमें कहला दिया गया, जिस
भत्तिशास्रके साज्ञोपाजड़ निरूपणमें ४५०२ चोपाइयाँ लिखनी पढ़ी,
उसी मक्तिशाक्ञक्रा भुशुण्डिजीके मुखसे १०५ चौपाइयोंमें निरूपण
कराया गया, यथा--
सतपंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरें।
दारुन अबिदा पंच जनित बिकार श्रीरधुबर हरें ॥
इस शतपश्च चौपाई ग्रन्थ स्पष्ट करनेके लिये भ्रीपृज्यपाद
गोखामीजीने भक्तिका शानके साथ तुलनात्मक विचार किया है, वा
(६)
याँ कहिये कि रामचरितमानसमें वर्णित समस्त विषयोका सारतम- मंशा
अन्तक़ी १०५ चौपाइयोंसें कह दिया है । श्रीरामचरितमानसमें चौपाइयो
ही पुरइन हैं, और छन्द, सोरठा और दोहा तो उन पुरईनोके कमल हैं;
यथा-- |
पुरइन सघन चारु चोपाई | जुगुत्ति मं मनि सीप सोहाई ॥
.छंद -सोरठा सुंदर दोहा। सो बहु भाँति कमछ कुछ सोहा ॥
अतः कहना नहीं होगा कि पुरइनके साथ कमलॉंका भी ग्रहण
हो जायगा, चौपाइयोॉंके साथ तत्सम्बन्धी छन्द, सोरठा और दोहोंकों
अहण*" करना न्यायसंगत है।
सनातन प्रथा है कि अध्यायके अन्तका आधा छोक भी
. पूरा ही मानकर परिगणित होता है; इसी भाँति चौपाइयोॉकी गणनामें
भी जहाँ आधी ही चौपाई पड़ गयी है, वहाँ उसे पूरी ही गिननी चाहिये।
जिस दोहेमें सात अर्धालियाँ हैं, उन्हें चार चौपाइयाँ शिनना समुचित है।
इस प्रकार: गणना करनेसे पता चछता है कि श्रीरामचरितमानस उत्तर-
” काण्डके ११४ दोहासे 'शतपश्च चौपाई? अन्थका प्रारम्भ हुआ है, और
सोलह दोहोंमें पूर्ण हुआ है। यही रामचरितमानसयज्ञकी पूर्णाहुति है।
. . इसकी फलशुति पूर्ण अन्थकी फलभ्रुतिके साथ ही कही गयी है | यथा--
5 रघुबंस भरूघन चरित जे नर नारि सुनहिं जे गावहाँं।
कलिमल मनोमक घोद्द विज्ु क्नम रामधाम सिधावहीं ॥
सतपंच चौपाई मनोहर जामनि जो नर उर धहें ।
मर दारुन अविद्या पंच जनित बिकार भ्रीरघुबर हैं ॥
कुछ महात्माओंका मत है कि 'शतपग्च चौपाई? का अर भच्छे
पद्च? हैं | सो सभी चौपाइयाँ पश्च हैं, उनमें शाज्ाथंका निर्णय
निःसन्देह चौपाइयाँ पश्च कही जा सकती हैं, पर सभी चौपाइयों पंघेल
से परिण्हीत नहीं दो सकतीं | कोई-कोई '“अह्लानां वामतों जद
इस न्यायसे शतपश्चका ५१०० अर्थ करते हैं, और किसी-न-किसी कक
| (७)
से गिनती भी मिला देते हैं । कोई ७)८५८०३५ अथे करते हैं और प्रत्येक
अर्धालीकों चौपाई मानकर उत्तरकाण्डके ६३वें दोहेसे ६८वें दोहेतक शतपश्थ
, चौपाई ग्रन्थ मानते हैं | किसीनें ध्याननिरूपक्. चौपाइयोंकों खींच- '
खॉचकर १०५की संख्या पूरी की | किसीका यह मत है कि ध्यानया तो
पॉच चोपाईमें कहा गया है या सातमें या बारहमें, अतः पाँच सात चीपाई *
अर्थ करना ठीक है । पर शतपश्न चोपाइयाँ दूसरे स्थानमें और फलश्र॒ति
दूसरे स्थानमें होना अनुचित है । ; ॒
सम्पूर्ण अन्थमें शत शब्द सदा सौके अर्थम प्रयुक्त हुआ है, यथा--
नहिं निस्तार कल्प सत कोरी । साग खाद सत्त वर्ष गँवाए।
और दों संख्याएँ सदा योगके अर्थमें ही प्रयुक्त हुई हैं, बथा--
बीते कप सात अरूु वाीँसा | चरप चारि दस वास, बन।
भ्रुवन चारि दस मूघर भारीं। बोते मनहु कल्प सत एका ॥
सो यहाँ १०५का अर्थ करना ही युक्तिसंगत है, उन्हें हढ़नेके
लिये दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है, फलझुतिने उन्हें अपने, साथ बाँध
रक्खा है |
शतपथ्व चौंपाई ग्न्थमें पाँच प्रकरण हैं--( १) रामरहस्प, (२)
शानदीपक, (३ ) भक्तिचिन्तामणि; (४) सप्त प्रश्ष और (५) परिशिष्ट |
इनमेंसे शानदीपककी टीका लिखे कई वर्ष हुए, वह “कल्याण'के
रामायणाडूसे लेकर दो-तीन अक्लेमिं प्रकाशित हुई । वह दीका लोगौको पसंद
आयी; और पीयूषकारने भी उसे स्थान देकर सम्मानित किया | इससे
उत्साहित होकर मेरा विचार “मक्तिमणि? प्रसंगपर सी ऊसी ठंगकी टीका
लिखनेका हुआ; पर उसका समय नहीं आया था; इसलिये चाहनेपर मी
न लिख सका; और इस सालके माधमें रुप्ण होनेपर भी अन्तर्यामीकी
प्रेरणासे लिख पाया ) ेल्
पीछेसे यह विचार मनमें आया कि शेष तीन असज्ञ छिखकर
शतपश्च चौपाई अन्थ ही क्यों न पूरा कर दिया जाय, और मेरे मित्र
(८)
शरीमान् हनुमानप्रसाद पोद्दास्जीने अपनी सहज ऊदारतासे प्रेरित होकर
उसके प्रकाशनका भार अपने ऊपर लिया; सो इस नवरात्रमें शेष तीन
प्रकरण भी पूरे हुए. । 55
श्रीअन्थकारले लिखा है कि अर्थ पराग है, माव मकरन्द है, और
भाषा उनके काव्यकमलका गन्ध है, यथा--
अरथ जनूप सुभाव सुसापा | सोद्ट पराग मकरंद सत्रास्ा ॥
सो तीनोंकें ग्राहक्त अलग-अछग मिलते हैं, अतः सर्वोपरि
गोस्वामीजीकी भाषा ही रक्खी गयी है, उसके नीचे शब्दा्थ और उसके
बाद भाव कथित है। भावोकों देखकर एक मित्रने कद्दा कि क्या अन्थ-
निर्माणके समय अन्थकारने इन भावोंकों सोचा होगा! सैंने निवेदन
किया कि शब्दविन्यासके दंगसे तो ऐसा ही मालूम होता है, और यदि
न भी सोचा हो, तो जब उससे भाव निकल रहे हैं, तो हम क्यों न
छाम उठावे १ भालीके आश्ञात्ीत मकरन्द यदि पुष्पसे प्रकट हों तो
मधुकर उससे छाम उठानेमें आगा-पीछा क्यों करें ?
कुछ लोग अद्देतमतके मार्योकी देखकर घबराते हैं, परन्तु इसमें
घबरानेकी कोई बात नहीं है। सभी पण्डितोंपर विदित है कि चेदमें
अद्देतवादिनी श्रुतियाँ भी हैं; द्वेतवादिनी श्रुतियाँ मी हैं, निर्मुण-
निरूपक श्रुतियाँ भी हैं, सशुणनिरूपक श्रुतियाँ भी हैं। अद्वेतवादी
ह्वेतवादिनी भ्रुतियोंकों अद्वैतर्मे लगाते हैं, और द्वैतववादी अद्वैतवादिनी
श्रतियाँकों भ्द्देतमें लगाते हैं, और जहाँ वे लगानेमें असमर्थ होते हैं
उनका पक्ष गिर जाता है; पर यह बात सभी जानते हैं कि अमुक-अमुक
श्रतियाँ अद्वैतवादिनी हैं, और अमुक-अमुक हतवादिनी हैं। पण्डितके
हार जानेसे न तो अद्धैतवाद अप्रमाण होगा; न द्वैतवाद अप्रमाण होगा |
माठ्वत् हितैधिणी भ्रुतिमगवतीने अधिकारमेदसे दोनोंकों कहा है, जिसे
जो पसंद हो उसका बेद अधिकारी है। भ्रीरामायण , ब्ह्मयश बेदका
(९ )
अवतार है; इसमें भी दोनों मर्तोंका प्रतिपादन करनेवाली चौपाइयाँ हैं
और जिस अधिकारीके लिये जो चाहिये उसे स्पष्ट करके दिखलाया है ।
एक ही बातकों सब किसीका एक दृष्टिसे देखना असम्भव ही नहीं,
अनुचित भी है | भंगवान् याज्षवल्क्यने कहा-कि--
सिदसम को रघुपत्ति ऋ्रतघारी | बिनु अधघ तजी सत्ती अध नाराए
और पाव॑तीजीने कह्य कि-- 2 पटक
मैं जो कीन्द रघुपति ऊअपमाना । पुनि पति चचन झूपा करि जाना है
सो फल मोद्टि विधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सो कीनहा ॥
याज्षवलक्यजी सतीकों निष्पाप मानते हैं, और* सतीजी खबं
अपनेकों अपराधिनी मानती हैं । यही न्याय है, यही उचित है कि सती
अपनेकों अपराधिनी मानें, और याज्ञवल्क्यजी उन्हें निष्पाप मानें |
अतः साम्प्रदायिक झगड़ेकों ब्ीचमें खड़ा करके किसी अंशको- पूर्व और
क्रिसीको उत्तरपक्ष माननेसे जो रसभज्ग होता है, उससे ग्न्थकी रक्षा
करनी उचित है। ऐसा अर्थ होना चाहिये जिसमें अ्न्थका.सवारस्य
बना रहे । के
पं० रघुवीर ज्रिपाठिखलः
विज्ञयानन्द॒जिपठी
भदैनी-काशी
प्रसड़-परिचय
मेरुशिख़रपर वट्की छायामें महर्षि छोमश बैठे हुए हैँ | एक
विरक्त ब्राह्मण-कहींसे आकर उनके शरण हुआ । महधिने देखा कि यह
ब्राह्मण परम अधिकारी है, अतः इसे परम शिक्षा देनी चाहिये। अतः वह
उसे ब्रह्मशानका उपदेश देने छगे । ब्रह्मशानमें महावाक्यक्रा उपदेश देना
पड़ता है | उसका अनुवाद गोंखामीजीने “सो तें तोहि तादि नहिं भेदा?
कहकर किया है। “सो! का अर्थ ईश्वर और 'हतें? का अर्थ जीव है और
धतोहि ताहि नहिं भेदा? का अर्थ अमेद है | इस प्रकारका अमेद उपदेश
करनेमें ईश्वर और जीवके विरुद्धांशका परित्याग करना पड़ता है | ईश्वर-
मेंसे सर्वृशत्वादि गुण, और जीवसेंसे अल्पशत्वादि गुण प्रथक कर दिया
जाता है । इसीको सो ( तत्पद ) और तेँ ( त्वंपद ) का शोघन# कहा
जाता है ।.ऐसे शोधनमें गु्णोका बाघ हो जानेसे 'निर्मुण बह्म और कूटख
# तत्पदका वाच्याथ है वह? अर्थात् ईश्वर और त्वंपदका वाच्यार्थ है
“तुम! अ्थोत्त् जीव । ईश्वर सर्वज्ञादि ग्रुणोंस्ते युक्त है, और जीव अल्पशादि शुण-
वाला है । दोनोंको एक करनेके लिये दोनोंमेंसे सवंज्ञ, अव्पशादि गुणोंको निकाल
देते हैं, इसी निकाल देनेको तत्यद और त्वंपदका शोपन कहते हैं। ऐसा करनेसे
ईश्वस्से निय्युण जह्म दो जाता है, और जीव क्ूटस्थ हो जाता है सो तत्पदका
. लष्ष्याथे हुआ निर्युण जह्य और त्वंपदका लक्ष्या्ें हुआ कूटस्थ |
+ इस दारीरके साक्षी चेतनकों कूट्स्थ कहते हैं । प्रकरण समझनेके लिये
इनंमें दोका जानना अनिवायं है ।
(११)
अथात् दोनों ओर झुद्ध चेतन शेष रह जाता है, जो कि एक हुई है। यही -
ब्रह्मज्ञानके उपदेशका क्रम है । सहर्षिजी भी यही उपदेश दे रहे थे ।
ब्राह्मणफो निशुणका उपदेश न रुचा। उसने वार-वार सग्ुणो-
पासनाके उपदेशके लिये प्रार्थना की । पर अन्तर्यामीकी प्रेरणा कुछ और
थी । महर्षिजी निर्शुणनिरूपणमें ही जोर लगाते गये; और ब्राह्मण सशुण-
पर ही डटा रह गया । धीरे-धीरे बात वढ़ गयीं। महर्षिजीने शाप दे
दिया । ब्राह्मण सद्यश काग हो गया | पर बाह्मणकों न भव हुआ, न
दीनता आयी । सादर मुनिजीकों प्रणाम करके उड़ चला | यद्दी काग-
जी हमारे रामचरितसरके उत्तरघाटके वक्ता भुझुण्डि हैं | पीछेसे महर्षिने
इन्हें घुछाकर सगुणोपासना बतलायी और अनेक बर दिये |
गदयड़जीकों मेघनादके हाथसे श्रीरामचन्द्रको बंधा छेखकर शक्का
हुईं कि त्रह्म रामको खल्प राक्षसने केसे बॉघा ? इसीके समाधानके लिये
गरुड़जी झुझण्डिजीके पास आये और भुशुण्डिजीने इन्हें. रामकथा
' खुनायी । पूछनेपर उन्होंने अपनी रामकहानी भी कही । उसीका उपसंहार
करते हुए. कहते हैं---
दो०-भगतिपच्छ हठ करि रहेउँ,दीन्ह महारिषि साप।
मुनि दुररूम बर पायेडँ, देखहु मजन गताप॥
आर्थ-सें भक्तिपक्षपर हट किये रहा ( और ) महर्पिने शाप
दे दिया (सो ) सुनिदुरुभ चर पाया, भजनका पधताप देखो ।
सगतिपच्छ-भाव यह कि ज्ञानमें निर्शुण मतका प्राधान्य है, और
भक्तिपक्षमें समुणका ग्राघान्य है | तत्पदका शोधन और मनिर्मुणनिरूपण
दो बात नहीं है, और सणुणनिरूपण तथा भक्तिपक्ष एक ही बात है,
क्योंकि सगुणके साथ जीवकी एकता# हो नहीं सकती, यथा---“सायावस
परिच्छिन्न जड जीव कि ईस समान ।*
कक 3 बट किक कलह 8 कक >लटट िकई परलयन जय रलकल "की कक कक कि मन म कह
# अल्पज्ष और स्ंज्ञर्मे एकता नहीं दो सकती |
सीजन
( १२ )
हु करि रहेडें-भाव यह कि ज्ञानोपदेश परम शिक्षा है; इससे
बढ़कर कुछ है नहीं, सो उसीका उपदेश मुझसे महर्थिजी करते थे; और
मैं उनकी उक्तिके विरुद्ध वैठा-बैठा सोचा करता था; मैंने मन छगाकर
उनका उपदेश न सुना, प्रत्युत उनसे वाद-विवाद बढ़ाया) उचित उत्तर
पानेपर भी हठ किया, यथा---
तब में निर्युन मत करि दूरो | सगुन निरूषों करि हड भूरी ४
नह मद्दारिषि साप-भाव यह कि हठ करनेका जो फल होता है
सो हुआ; आये थे कल्याणके लिये मिल गया श्ञाप | सो भी महर्षिका
शाप | सद्यः कार्यर्म परिणत हों गया; यथा-- हे
किये जन्यथा होहद नहि बिप्र साप जति घोर॥
मुनि दुर्ठभ घर पायेडें-परन्त उस शापसे मेरा बड़ा काम
हुआ | मुनिजीने यदि शाप न दिया होता तो उन्हें अनुताप न होता;
और न वे ऐसा बर देते जो मुनिकोगॉकों भी दुर्लम है ।
भाव यह कि ( १ ) अविरछ भक्ति ( २) कामरूप ( ३ ) इच्छामरण
(४) जहाँ बसें वहाँ एक योजनपय॑न्त अविद्याका न व्यापना; ये सब
वरदान मुनिदन्दोंकों भी सुलभ नहीं हैं ।
देखडु भजन प्रताप-भाव यह कि इसमें न तो ऋषिजीकी करनी
है, न मेरी महिमा है; न शापका गुण है । यह भजनका प्रताप है कि
महर्षिजी शाप देने चले और बर दे डाल्य । अत्यक्ष प्रमाण सब प्रमाणोंसे
ज्येष्ठ है । यहाँ भुझुण्डिजी प्रत्यक्ष प्रमाण दे रहे हैं कि देख छो, मजन-
का प्रताप है कि नहीं ! मुनिकी मतिकों भगवानले फेर दिया, और उनसे
वर दिल्वाया | स्वयं आकाशवाणीद्वारा उसका अनुमोदन किया। यथा---
एचमस्तु तव बच मुनि ज्ञानी । यह सस भगत करम सन बानी ॥
का्क्ष्---2्फ्फियण
# 'नहिं कछु दुलेम श्ञान समाना 7 “न हि शानेन सद्॒श पविच्रमिद्द वियते?
गीतासु | ऋते श्ानाज्न सुक्ति: ।
अभसुवनमोंहन राम
तर
ज़ि
2०)
थीगणेशाय नमः | श्रीजानकीवल्लभो विजयते
शत्लाघ्छाला चतिचा एड
न
प्रथम असंग
रामरहस्य
>--#>+ई:८६-५
जे असि भगति जानि परिहरहीं ।
केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीं ॥
अर्थ-जों छोग ऐसी (प्रभावशाल्िनी ) भक्तिकों जान-
चूझकर छोड़ देते हैं, केवछ ज्ञानके लिये श्रम करते हैं ।
असि भगति-शापकों भी मुनिदुम वरमें परिणत करनेवाली,
सब सुखोंकी खानि, शञान-वेराग्यकी जननी भक्ति है । जबतक भगवद्धक्ति
श्
शतपश्च चौपाई न
न हो, रामके चरणॉंमें प्रेम न हों; तवतक कोई कल्याण नहीं हो
सकता; और प्रेम हो जानेपर कोई कल्याण रुक भी नहीं सकता, बिना
परार्थनाके सब कल्याण अपने-आप उपस्थित होंते हैं और अकल्याण भी
कल्याणरूपमें परिणत होते हैं ।
जानि परिदरदीं-सव कल्याणका त्याग और भक्तिका त्याग
एक वस्तु है। कोई भी प्रशावान् जान-वूझ्कर कल्याणका परित्याग
नहीं कर सकता । जान-बूझकर जिसने कल्याणका परित्याग किया;
उसका दोष बिना जाने परित्याग करनेवालेसे कहीं बढ़कर है| बिना
जाने कल्याणका त्याग करनेवाला, जानते ही उसका ग्रहण कर लेगा;
ओऔर जान-बूझकर त्याग करनेवालेके पुनः अहणकी सम्भावना भी नहीं
है, अतः जान-बूझकर भक्तिके परित्याग करनेवालेका कभी भी कल्याण
नहीं हो सकता ।
केवल ज्ञान-शुष्क ज्ञान, निरुपास्तिज्ञान | भाव यह कि बिना
उपासना (भक्ति ) के ऋतम्भरा ग्ज्ञा ही नहीं होती । सत्य अर्थका
प्रकाश करती है इसीलिये इस बुद्धिका नाम ऋतम्भरा है, पहिले
उपासनासे ईश्वरमें चित्त एकाग्र होता है, तब उस समय केवल ईइवर-
शब्द, ईश्वर-अर्थ और ईश्वरश्ञानमात्र चित्तमें रह जाता है । फिर घीरे-
घीरे ध्यान करनेवाला और ध्यान मी बेपता हो जाता है, केवल ईश्वर-
अ्ंमात्र शेष रहता है तब सच्चा ज्ञान इश्वरका होता है | इस अवस्था-
चाली बुद्धिको अहतम्मरा कहते हँ सो बिना प्रेमके इश्वर्मे चित्त एकापग्र॥ ही
नहीं हो सकेगा, और बिना एकाग्न हुए ऋतम्भरा प्रज्ञा न होगी और
_. # चित्तका पकाम होना हो समाषि है। उसके दो भेद है (१३)
सवितक और (२ ) निवितके । यदि गौमें समाधि की जाय, त्तो पहिले गौमें चित्त
स्थिर होकर केवल यौ-शब्द, गौ-अर्थ और गौ-क्षानमात्रका भान रह जायगा ।
यद्द सवितकों समाधि दै । फिर धीरे-धीरे च्याता और ध्यानका भी भान जाता
रहेया, केवल गौ-अर्थमात्र रद्द जायगा । यही नि्वित्के समाधि है।
चले रामरहस्य
बिना ऋतम्मरा प्रशाके ईश्वरका सच्चा ज्ञान हो नहीं सकता, इसीलिये
कहते हैँ कि केवल शान श्रम है )
संगुण ब्रह्ममें चारों प्रकारकी समाधि होती है--सवितर्क, निर्वित॒र्क,
सविचार और निर्विचार । भगवानका स्थूछ रूप विराद है, अतः उसमें
सवितर्क और निर्वितर्क समाधि होती है, और हिरण्ययर्म तथा ईश्वर
सूक्ष्मरूप है, क्योंक्रि सक्ष्मताका पर्यवसान अलिह्न (प्रकृति ) तक है;
अतः द्रिण्यगर्म और ईश्वर्में सविचार और निर्विचार समाधि होती है।
निर्विचारमें निर्वितर्ककी भाँति अर्थमात्रका निर्भास रद जाता है।
सवितर्कका स्थूछ विषय है, और सविचारका सूक्ष्म | यही दोनेमि भेद
है| निर्विचार समाधिके निर्मल पवाइसे दी अध्यात्मप्रसाद होता है;
व्दों ऋतम्भरा प्रशा होती है; उसीसे ईश्वरका साक्षात्कार हों सकता है |
भक्तिसे ये सब बातें अपने-आप होती हैं । प्रेममें दी यह सामथथ्य है कि
बह प्रेमीकों प्रेमास्पदके सन्निकट बिना जाने भी लिये चला जाता है।
देतु श्रम करहीं-बिना भक्तिके शान चाहनेवालें परिश्रममात्र
करते हैं, सिद्धि उनके भाग्यमें नहीं। वे कितना बड़ा परिश्रम करते
हैं, सो शानदीपप्रकरणमें देखियेगा, और तिसपर भी यिम्नत्राहुलयसे
उनका परिश्रम व्यर्थ जाता है) इसीलिये फल-प्राप्ति न कहकर “अ्रम
करहीं? लिखा है |
ते जड कामधेनु गृह त्यागी |
खोजत आकु फिरहिं पय छागी ॥१॥
अर्थ-वें जड़ (मूझ्खे > घरमें कामघेल्लकों छोड़कर दूधके
लिये मदार सोजते फिसते हैं ।
से ज़ड-वे कलिमल्ग्मसित विमृूढ़ हैं; उन्हें समझ नहीं है,
यथा--'किमि समुझों मैं जीव जड कलिमल्ग्रसित विमूढ़ ।*
संसारसे न तो ममता हटी और न भगवानमें प्रेम हुआ, तब केवछ
शतपश्च चौंपाई छ
शतपन्च चापार
ब्रढ्मविचारसे ज्ञान कैसे होगा ! यथा--'बादि बविरति विन बद्य विचारू।?
उन्हें तो ब्रक्षविचारका अधिकार ही नहीं | उनका ब्रह्मविचार अनधिकार
चेष्टा है, कभी फलसिद्धि नहीं हो सकती | अतः ऐसी चेष्टा करने-
वालेको जड़ कहां ।
कामघेज्ठु झुह त्यागी-पहिले भक्तिके लिये “जानि परिहरदी'
कह आये हैं।अतण््व जो भक्तिकों जानता है। उसके भक्ति घरमें
है। उसे चाहिये कि उसीकी सेवा करे; और छाम उठावे। उसे कहीं
कुछ हँढ़ना नहीं है। इतनेपर भी जिसने भक्तिकी उपेक्षा की; उसने
मानों घरमें स्थित कामथैनुका त्याग किया । कामघेनु यथेप्सित
अम्ृतमय दूध जभी चाहे तभी देती है; और उसके अतिरिक्त भी
जितनी कामनाएँ हों उन्हें पूर्ण करती है; इसी भाँति मक्ति भी
कामचेनु है। मनचाहा परम कल्याणकर शान तो देती ही है, और जो
कुछ मनोंवाज्छित है, उसे पूर्ण करती है। उस भक्तिद्वारा वास्तव ज्ञान
न चाहकर निरुपास्ति ज्ञानककी ओर जो दौड़ता है, उसीके लिये कहा
जाता है कि इसने घरमें बसी हुई कामचघेनुका परित्याग किया |
पैये छागी-यहाँ पयकी उपमा वास्तव श्ञानसे है। जिस भाँति
अमृतमय दूध कासघेनुसे सिलता है; उसी भाँति बासततव ज्ञान भक्तिसे ही
मिलता है। यहाँ वास्तव श्ञानसे अभिप्राय श्रीराम ( ज्रह्म ) के शानसे है।
बैसे तो घिघयका ज्ञान; देवताओंका ज्ञान, सब ज्ञान ही है, पर ऐसे
ज्ञानकी वास्तव नहीं कह सकते ।
,.. खोजत आक् फिरहिं-भाव यह कि कामचेनु घरमें है, उसे तो
छोड़ दिया; और दूघके लिये मदार (अक) दूँढ़ता फिरता है।
मदारके पोंके तोड़नेसे दो-चार बूँद इबेत रसं टपकता है, जिसे मदारका
दूध कहते हैं । उसका रंग दूध-सा दी होता है, पर खाद और गुणमें
दूधसे एकदस विपरीत होता है। उससे नेत्रकों बड़ी हानि पहुँचती है।
इसी भाँति निरुपास्तिशान भी रूपरंगर्म सोपास्तिज्ञान-सा ही होता है,
प् शामरहस्य
परन्छु किसी पक्रारकी समापत्ति# न होनेसे ऋतम्भरा प्रज्ञा ही नहीं होती ।
अतः उसमें सोपास्तिज्ञानका कोई ग्रुण नहीं होता, भत्युत उसमें बड़ा
भारी दोष आ जाता है | तत्पदवाच्य परमेश्वरकी ओर मन न जनिसे;
बह तत्पदके शोधनमें भी सर्वथा असमर्थ है और संसारमें ममता रहनेसे
त्वंपदवाच्य जीवका मी शोघन नहीं कर पाता । अतः रुक्ष्यार्थकी उसे
प्राप्ति ही नहीं हुईं, ऐक्च वह किसका करेगा £ वाच्याथ। का ऐक्य हों
नहीं सकता, अतः मुखसे “बत्मास्मि) उच्चारण करते रहनेपर भी, और
सारी शोघनप्रक्रिया कण्ठस्थ की हुई होनेपर मी उसे कल्पशतमें भी
शान न होगा | उसकी दृष्टि ही नष्ट हो गयों। अतः निरुपास्तिशान
मदारकी दूधकी भोति हानिकर है। निरुपास्ति ज्ञानवालेके लिये अन्त-
मुख होना बड़ा कठिन है, अतः उसके प्रयक्षकों 'घरसे बाहर खोजते
फिरना? कहा ।
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई ।
जे सुख चाहहिं आन उपाई॥
अर्थ-हे खगेश ! खुनो, जो छोग हरिभक्ति छोड़कर दुखरे
उपायसे खुख चाहते हैं ।
खुद खगेस-भाव यह कि आपकी अपने आश्रित पक्षियोंपर इतनी
प्रीति है कि टिट्विभ[ के अण्डेके लिये समुद्रपर घावा कर दिया। आप
# समाधि |
"| तल पदका वाच्याथ सगुण कष्म और रूध्ष्यार्थ नि्युण जद्या है । इसी
भाँति 'त्वं? पदका वाच्यार्थ जीव और लक्ष्याथं कूटस्थ है । जिस माँति महाकाश
और घयकाझमम मेद नहीं है, उसी भाँति निययुण अह्म और कूट्खमें भी भेद
नहीं दे
4 महामारतमें कथा है कि समुद्रने टिट्टिमका अण्डा बद्य दिया । उसपर
ऋद्ध दोकर समुद्र चुखानेके लिये वद्द समुद्रका जल उलीचने लगा । देखा-देखी
0
शतपश्च चौपाई दि
समझ सकते हैं कि खामी अपने आश्ितोंकी कौन-सी सहायता
नहीं करता १
हरिभिगति विहाई-शान चाहनेवालके लिये भी ( पहिले कह
आये हैं कि ) भक्ति ही उपाय है, यथा--
रघुपति भगति बारि छालित चित, बिलु प्रयास ही सूझे ।
सुकसिदास यह चिद बिछास जग बुझत-बुझत बुझे ॥
अब कहते हैं कि सुखप्राप्तिका भी यही एकमात्र उपाय है; इसके
परित्यागसे फिर सुख नहीं; यथा---
सुझ्ु मन सूद सिखावन मेरो ।
हरिपद्विसुख लक्को नकाहु सुख सठ यह समुझ सबेरो ॥॥
बिछुरे ससि रबि सन नयननितें पाचत दुख बहुतेरो |
अमत अमित निसिद्विस गगन महँ तहें रिएु राहु बढ़ेरो॥
छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति श्रुति संदेह निबेरो।
तुलसिदास सब जास छाँड़ि करि होहु रामकर चेरो ॥
( विनयपत्निका )
जे खुख चाहहि-सुख तो सभी चाहते हैं, पर सबको सुख
चाहनेवाला नहीं कह सकते । जो जान-बूझकर भी दुखदायक
वस्तुकों गछेमें बांधे फिरता है, उससे छूटनेका प्रथज्ञ नहीं करता;
उसे सुख चाहनेवाला केसे कहें ? यथा---
जद॒पि विपय सेंग सहे दुसह दुख बिपतिजार अरुक्षान्यों।
तद॒षि न तजत सूढ़ समताबस जानतहू नहिं जान्यौ ॥
( विनयपत्रिका )
जो सचमुच विपत्तिजालसे छूटकर सुख चाहता है वही वस्ठुत
सुख चाहनेवाला है |
बहुत-ते पक्षी इस काममें रूग गये | समाचार पाकर गरुड़ आये, भौर सभीत
होकर समुद्रने अण्डा लौटा दिया।
० रशामरहस्य
आन उपाई-छुखके उपायमें ही दिनरात जीवमाच छगे हैं, पर
सुख मिलता तो नहीं । हाथ आकर भी उँगलियेंके बीचसे निकल जाता
है। क्योंकि भजन छोड़कर किसी साधनमें सुख नहीं, बथा--
नाहिंन आवत्त आन भरोसो ।
यहि कल्िकाऊ सकऊ साधन ततरु है श्रम-फलनि फरो सो ॥
त्प तीरथ उपवास दान भखत जेहि जो रुचे करो सो ।
पायेहि पे जासिवों करम-फल भरि-भरि बेद परोसो ॥
आगम-बविधि जप जाग करत नर सरत न काज खरो सो ।
खुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन रोग वियोग भरो स्रो॥
कास क्रोध मद लोभ मोह मिलि ज्ञान बिराग हरो सो ।
द्िगरत सन संन्यास छेतत जरू नावत्त आम यथरो स्रो ॥
बहु मत मुनि बहु पंथ घुराननि जहाँ-तहाँ झगरों सो ।
गुरु कह्यो रास भज्नन नोको सोद्टि ऊगत राज डगरो सो ॥
तुझसी त्रिचु परतीति प्रोति फिरि-फिरि पचि मरे सरो सो ।
राम नाम-न्योध्दित भवसागर, चाहे तरन तरो सो ॥
( विनयपत्निका )
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी ।
पैरि पार चाहहि जड करनी ॥ २॥
अर्थ-वे दाठ हैं, बिना नावके अपनी जड करणीसे तैरकर
बड़े भारी समुद्गको पार किया चाहते हैं । ेल्
ते खठ-भक्तिका परित्याग करके सुखके लिये अन्य साघनोंका
भरोसा करना अपनी आत्माकों धोखा देना है । अतः ऐसा करनेवार्छको
छठ कहा; यथा---
कपट सार सूची सहस, वॉधि वचन परवास |
करि हुराव चह चासुरी सो सठ तुझसीदास ता
दतपशञ्च चौपाई ८
महालिशु-सब प्रकारके शोकोंका देनेवाल। देहाभिमानका
, महासमुद्र है; न इसका थाह है न वारापार है | रागादि जल-जन्तुओसे
भरा हुआ है, संकल्पक्ती वड़ी-बड़ी लहरें दिनरात इसमें उठा करती
हैं, यथा--
कुनप७-असिसान सारयर स्यंकर घोर विपुरू अवगाह दुस्तर अपारस ।
नक्र रागादिसंकुल सनोरथ सकरछ संग संकष्प वीची विकारम ॥
( विनयपत्रिका )
बिना इस समुद्रके पार किये सुख मिल नहीं सकता, अतः सुखा र्थी-
को इसे पार करना ही होगा ।
विज्ठु तरनी-नदीके पार जानेके लिये नौकाकी आवश्यकता
पड़ती है, फिर समुद्रके पार जाना तो विना नौकाके हो ही नहीं
सकता, इसी भाँति बिना भक्तिके देहामिमानसागरके पार कोई जा
नहीं सकता । अतः भक्ति दुःखसागरके पार जानेका एकमात्र साधन है ।
जड करनी-माव यह कि विचारविहीन करणीकों जडकरणी
० धो
कहते हैं, यथा--
गगन समीर अनल जल घरनी । इनके नाथ सहज जड करनी ॥
अतणएब जडकरणीसे पार जानेकी प्रक्रिया ही नहीं हो सकती | समुद्रमें
अति जुद्धिमान् भी दिल््मूढ हो जाते हैं; यह पता ही नहीं चलता कि
हम कहॉपर हैं, और किस ओर जा रहे हैं। खगोंछ और भूगोलछके
परिशाता ही अनेक साधनसम्पन्न होकर महासागर्में अपना पथ निश्चित
करते हुए. जहाज़ चछाते रहते हैं, जडकरणी होनेसे किसी माँति बेड़ा
पार नहीं होता | अथवा यदि जडकरणी शब्द महासिन्धुका विशेषण
मान लिया जावे तो यह अर्थ करना पड़ेगा कि यदि समुद्र चेतनकरणी
होता तो अनुनय-विनयसे मी किसी प्रकार प्राण-रक्षाकी आशा की
# देहामिभाव
९ रामरदस्य
जा सकती थी; पर समुद्र तों जडकरणी है, उससे किसी प्रकारकी
सद्दयताकी आशा नहीं की जा सकतो ।
दैरि पार चाहत-सुजवलूसे तिरा चाइता है | पहिले तो इतनी
सामरथ्य मनुष्य-शरीरकों हो ही नहीं सकती कि भ्रुजबलसे महा
समुद्र तिर सके; दुसरे पर्वतोषम तरंगोंके थपेड़ोंसे विकल होकर उसका
आगे बढ़ना असम्भव हो जायगा । यदि कुछ साइसविशेष किया तो
जल्जन्तुओंका शिकार हो जायगा । अतः तैरकर मद्दासमुद्र पार करना
नितान्त असम्भव है | इसी माँति देहाहंकार ( दुःख ) सागरके पार
जानेमें केवछ बाहुबछ अकिश्वित्तर है। भगवानके आश्रय होना ही
नौकारोहण है, अपने बरूपर भरोसा करके प्रयक्ष करना तैरकर पार
जाना है | कैसा भी तैराक हो, पुरुषार्थी हो, संकब्पतरंगोंके थपेड़ोंसे
विकलछ हो जावेगा; इनसे भी यदि बचा तो रागद्वेषघादिका शिकार बन
जायगा | तैरकर पार जानेंकी इच्छा ही उसकी मूर्खताकी थ्योतक है।
अतः भक्तिका आश्रय करना ही एकमात्र उपाय है । हट
सुनि भुसुंडिके बचन भवानी।
बोले गरुड हरखि म्दुबानी ॥
शर्थ-हे भवानी ! भ्ुशुण्डिके चचन खुनकर गरुड़ दर्षित
द्वीकर खदुवानी बोले ।
भवानी--शझ्ूर भगवान् सविधि गरुड़ और भ्ुझण्डिजीका
संवाद कद रहे हैं, क्योंकि भवानीका प्रश्न ही यही था कि
“ऋददहु कवन विधि भा संबादा ।? सो यदाँपर दोनों भक्तोंमें शान-मक्ति-
चिघयक्त प्रश्न उठ रहा है; तथा रामरहस्थका भी वर्णन आरम्भ होनेचाछला
है, मवानीके दों प्रश्नोंक्रा उत्तर इसी प्रसंगर्मे होगा, यथा--
(१) भगति ज्ञान विज्ञान बिरागा | छुनि सब बरनठ सद्दित बिभागमा ॥
(२) औरौ रास रदृस्थ जनेका | कहृहु नाथ अति 'बिमछ विबेका ॥
इातपश्च चोपाई १०
अतः भोत्ताकी सावधान करनेके लिये सम्बोधन करते है |
सुनि झुझुंडिके बचन-यद कहकर गददजीके चतुर्थ प्रभके
जत्तरकी समाप्ति दिखलायी-प्रक्ष यह था कि-+-
नाथ तवाश्रम आये, मोर सौह अ्रम भाग।
कारन कचन सो नाथ सब, कट्टहु सहित अनुराग ॥
उत्तर हुआ कि भजनक्रे प्रतापसे छोमदा महपिके दापका चरदान-
रूपमें परिवर्तन द्वी इस बातका कारण हुआ कि सुघुण्डिके आशभ्वरमके
सन्निकट आनेपर गरुड़जीका शोक-मोह जाता रहा ।
बोले गरुड़-यदि पुनः शक्ल न करते तो संचाद यहीं समाप्त
हो जाता। पर अक्त प्रभ्का उत्तर पूरा होते न द्वोंते ही दूसरी
शझछ्छा उठ खड़ी हुई, अतः गरड़जी बोछे। उत्तरके अन्त भजन-
प्रतापपर भुशुण्डिजीने बहुत जोर दिया | सो वह शद्ठा और भी पुष्ट
हो गयी |
हरखि स्तदुबानी-भाव यद्द कि भुशुण्डिजी और गरुड़जी दोनों
वक्ता और श्रोता भगवद्धक्त ई । भक्तिके उत्कर्षफी कथा कदने और
सुननेमें दोनोंकों हर्ष है। बक्ताकों हर्ष, यथा-
ग़रुढ बचन सुनि हरपेड कागा | घोलकेठ त्चन सहित अनुरागा ॥
श्रोताकों हपे, यथा-
सुनि भुसुंडिके वचन भवानी | बोले गरुढ हरखि झूदुबानी ॥
गरुड़जी न हैं, अतः मदु बोलनेका उनका खमाव है | संतका
लक्षण है कि 'कह सत्य प्रिय बचन बिचारी? । पहले भी कद आये हैं
कि कह मदु वचन खगेसः |
तब भसाद प्रश्चु मम उर साहीं ।
संसय सोक मसोह भ्रम नाहीं॥ ३॥
श्श् रामरहस्य
अर्थ-हे प्रभो ! तुम्हारी रपासे मेरे हद्यमें संशय, शोक,
मोह और भ्रम नहीं है ।
प्रभु-गरुढ़जीने भुश्युण्डिजीको गुरु माना है, यथा-
गुरु विचु भवनिधि तरै कि कोई । जो बिरंचि-शंकर सम होई ॥
इसीलिये प्रभ्ु करके सम्ब्रोधन करते हैं, अथवा शोक-मोह-विना-
शनमें समर्थ देखकर प्रभु सम्ब्रोधन करते हैं ।
तच प्रसाद-भाव यह कि आपका प्रसाद ( प्रसन्नता )अमोघ है ।
संशय; शोक, मोह, भ्रमका नाश बड़े-बड़े साधनोंसे भी होना कठिन
है, सो वह आपके प्रसादमात्रसे हो गया ।
मम उर माहीं-मेरे हृदयमें शोक-मोहादिने ऐसा डेरा जमा
लिया था कि नारद, ब्रह्मा और शब्डरके साक्षात्कारसे नहीं गया, और
आपके आश्रमके निकट जआनेसे ही चलछा गया | इसीलिये कहा है कि--
विधि हरिददर कबि कोविद बानी । कहत साधु सहिसा सकुचानी ॥
संसय शोक सोह स्रम-उभ्यकोटि-अवरूम्बी ज्ञानकों संशय
कहते हैं, यथा--
सी जवतार सुनेडें जग माही । देखेडें सो प्रताप कछु नाहीं ॥
इ्टके नाशसे जो दुःख होता है, उसे शोंक कहते हैं, थथा---
बंधन काटि गयडउ उरगादा। उपजा हृदय प्रचंड बिपादा ॥
अज्ञानकों मोह कहते हैं, यथा---
भयड मोहबस तुम्दरह नाई ॥
विपरीत ज्ञानकों भ्रम कहते हैं, यथा---
प्रगट न ज्ञान हृदय अम छावा ॥
नाहीं-भाव यह कि अविद्या मेरे हृदयसे हट ही नहीं गयी;
इतपशथ्च चौपाई श्र
बढिकि मेरे लिये नष्ठ हों गयी। अब आपके आशभमसे योजनभर दूर
निकल जानेपर भी पुनः उसके पत्यागमनका भय नहीं दे ।
सुनेठ पुनीत रामगुनग्रामा ।
तुम्हरी कृपा लह्ेड बिश्रामा ॥
अर्थ-रामके पुनीत गुण-आरमॉको तुम्दारी कृपासे खुना
और चिशआरम पाया ।
छुनेड-भाव यह कि त॒म्दारी कृपासे सुना | जिस भोंति गरुडजीने
उत्कण्ठावश रामकथा झुनानेके लिये बारंबार प्राथना की थी, यथा---
अब प्रश्न कधा सुनावहु मोदी | वार-चार विनवों प्रभु तोहीं ॥
उसी भाँति बार-बार कृतशता प्रकाशित करते हे, यथा--
झुनेठ3ः सकल रघुपति चरित।
झुनेठ पुनीत रामगुन झआसा।
श्रीरामचरित देखनेसे मोह ओर सुननेसे शान्ति होती है। उमा
और गरुड़को चरित्र देखकर ही मोह हुआ था; और कथा सुनकर ही
उस मोहकी निद्ृत्ति हुई | भरीरधुनाथ-चरित्र कहकर भोताका संकोच
मिटानेके लिये भुश्ण्डिजीने अपने मोहका भी वर्णन किया। तत्पश्चात्
जलमाकी भाँति गरुडजीने मी भुशुण्डिजीके विषयमें प्रश्न किये | भुशुण्डि-
जीने स्वयं अपना चरित वर्णन किया । भक्तोंके चरित्रम भगवानके शुण-
आमका ही वर्णन रहता है; सो 'सुनेउ” कहकर उन शक्काओका समाघान
होना दिखलाया | अथवा उत्तर आरम्म करते समय भ्ुशुण्डिजीने कहा
था कि “तात सुनहु सादर सन छाई” अतः उऊत्तरसमाप्तिपर भुझुण्डिजी
कहते हैं कि 'सुनेउऊ” अथौत् मन छगाकर सुना |
पुनीत रामगुनआञमा-यहाँ 'शुणप्राम! कहकर बहुवचनका
प्रयोग किया । गुणम्ाम शुर्णोके समूहको कहते हैं । स्ठ॒तिमें गुणसमूह-
श्३् रामरहस्य
का कीर्तन होता है। रामचरितमें उल्लेखयोग्य गुणप्रामोका संकीर्तन
छब्बीस स्थानोमें है, और उब्बीस विशेषण# छब्बीसों श॒ुणग्रार्मोर्म क्रमशः
भलीभौंति छाग॒ होते हैं, यथा अक्षस्त॒तिके साथ 'जगमझ्जलछ गुनग्राम रामके'
ऋददना मलीमौँति बैठ जाता है | जगमंगलके लिये ही बह्नस्त॒ति हुई थी
और उसका परिणाम भी जगन्मज्ञलमय द्वी हुआ, इसी भाँति भगवान:
के श्रीमुखसे उपदेश पाकर पुरवासो कऋृताथे हुए। तब उन लोगोने
स्तुति की | यह पचीसवीं लति है । इसका सम्बन्ध पचीसर्वे विशेषण
पावन गंगतरंय सालसे? है | पावन होना ही छततार्थ होना है| विस्तार-
भवसे सब नहीं लिखा। पावनमें ही सब विशद्येषणोंका अन्तभोव हो
जाता है ।
ठुम्हरी कृपा-वहाँ देहछीदीपकन्यायसे प्रयुक्त हुआ है|
सुनेर्टे पुनीत रामगुनपासा | तुन्दरी कृपा छहेडें बिश्रामा॥
भाव यह कि तीनों बात तुम्दारी कृपासे ही हुई--( १) संशय-
शॉकादिका जाना (२) रामगुणग्रामम्वण और ( ३ ) बिश्रामप्राप्ति ।
छट्देडे विश्रामा-भाव यद्द कि संशयवालेको चिश्राम नहीं मिलता,
डसकी दद्ा सर्प-दंशित मनुप्यकी माति हो जाती है । जिस भाँति सौंप
काठे हुएको लहर आती है, उसी भाँति संशयीको डुःखद क्ुतर्ककी
लहरें उठती ई, संशवीको न इस लोकमें सुख हे न परलोकमे | यथा---
संसय सर्प उ्रसेंड मोद्धि ताता | दुखद लहर कुतक चहु आबाता ॥
तच सरूप गारुडि रछुनायक । मोद्दि जियाएुड जनसुखदायक ॥
पहले तो “उपजा द्वदय प्रचंड बिषादा! और अब हृ्षित होंकर
मृदु वाणी बोलते हैं । अतः कहते हैं कि 'लहैठ विश्ञामा !?
# वालकाण्डके ३७ वें दोदेमें रामगुणघामके छब्बीसों विशेषण वर्णित
हैं जागमंगल गुनग्राम रामके? इत्यादि ।
इआतपश्च चौपाई १४
एक बात प्रभु पूछों तोही।
कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥ ४ ॥
जर्थ-हे प्रभो! एक वात तुमसे पूछता हैँ, सो दे रृपानिधे !
मुझे समझाकर कहो ।
एक वात-भाव यह कि पहले चार बातें पूछी थी--( १ ) कारन
कवन देह यह पाई (२) रामचरित सर सुन्दर स्वामी पायेहु कह्दों
(३) महाप्रल्यहु नास तब नाहीं तुमद्वि न व्वापत काल अति करार
कारन कवन और (४) तब आश्रम आये डे मोर मोह भ्रम भाग; सो
कारन कबन । इन चार्रोका उत्तर हो गया। अन्तमें फिर एक शक्का
उठो) वही पूछते हैं ।
परभ्च पूछों तोही-माव यह कि आप गुर है । आपसे बात छिपामिसे
निर्मेल विवेक नहीं हो सक्रेगा, यथा--
संत कहहिं अस नीति प्रभु, शुत्ति पुरान सुनि गाव ।
होह न बिसछ विराग उर, गुरुसन किये दुराव॥
कृपानिधि-सम्बोधनका भाव यह क्रि गुरु कृपानिधि दोते है।
समुद्रमें नयी-नयी तरज्लें उठा करती हैं, अतः बार-बार समाधान करनेपर
भी शिष्यके हृदयमें सन्देह उठनेसे शुरु कृपा करके समाधान करनेमें
उद्दिम्र नहीं होते, यथथा--
बिगरी सुधार कृपानिधिक्ली कृपा नई।
मोहि चुझाड कहौ-सुझे जो शझ्ला उठनेवाली थी, उसका भी
समाधान आपने संक्षेपरूपमें जे दरिभगति जानि परिहरहीं”
इत्यादि दो चौपाइयोंमें किया, परन्तु मेरी अश्नान्तिकरे लिये समझाकर
कहिये | अन्य पक्षी छोग बहुत दिनसे कथा सुनते हैं, अतः उन्हें सब
श्ष ; रामरहस्य
विषय अश्नान्त हैं, वे संक्षेप समझ सकते हैं । मैं ही नया सुननेवाला
हूँ, अतः मुझे समझाकर कहनेकी आवश्यकता है |
कहहिं संत मुनि बेद पुराना ।
नहिं कछु दुरलुभ ज्ञान समाना ॥।
अर्थ-खंत, मुनि, चेद और पुराण कहते हैं कि शानके
समान कोई वस्तु छुलऊेम नहीं है|
खंत मुनि कहहद्धि-वेद-पुराणमेंसे उपयुक्त सार अद्ण करके सर्व-
हितके लिये प्रचार करनेवाले ही साधु-संत हैं| यथा--
बेद पुरान उदधि घन साथू ।
और रागद्वेषरहित, तपस्वी, मनुष्यसमाजसे प्रथक् वनमें रहने-
वाले मुनि हैं, यथा--
सुनहु भरत हम झूठ न कह्दहटीं । उदासीन तापस त्रन रहहीं ॥
अतः संत और मुनिके आत्त होनेमें सन्देह नहीं है, और
आर्तेका वाक्य प्रमाणरूपसे शहीत होता है; सो वे छोग कहते हैं ।
वेद् घुरान-भाव यह है कि वेद खतः प्रमाण हैं, और पुराण भी
वेदाथके उपबूहण ( पुष्ट ) करनेसे पद्चमम वेद कहलाते हैं, ये मी परतः-
अमाण हैं । इन दोनोंके वाक्य आतवाक्य हैं | पुराण और वेदोंमें ही
अज्ञातार्थ ज्ञापकत्वक है। सो ये भी ऐसा ही कहते हैं, अर्थात्त् इस वातमें
सबकी एकवाक्यता है कि 'नहिं कछु दुरूमस शान समाना !? यहाँ
# नहीं जानी हुई वातका जनाना शाखका काम है। जिन बाततोंको
मनुष्य अपनी बुद्धिसे जानता है या जान सकता द उन बातोंके कइनेमें
शास्षकी उपयोगिता नहीं है | शासतत्रका कार्यकारित्व तो इसीमें है कि मानव-
बुद्धिके अगोचर जिषयका वर्णन करे ।
शतपश्च चौपाई रद
चेदकी चार संख्या और पुराणकी अठारह संख्या होनेसे, 'पुराणा”
बहुवचनका प्रयोग किया । *
शान समान नहिं-प्रुरुषार्थचतुष्टयमेंस अक्षय मोक्षके साघन
होनेके कारण ज्ञान ही सर्वोत्कृष्ट है, शान-सा पवित्र कुछ भी नहीं है।
ज्ञान नित्य है। ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, अतः अज्ञानके अपसरणकों
ही ज्ञान होना कहते हैं। ज्ञान बिना मुक्ति नहीं होती, यथा-
पान मोच्छप्रद बेंद् बखाना।
इसलिये कहद्दा कि शानके समान कुछ भी नहीं |
कछु दुरछभ-भाव यह कि इस जगत्में दुलूम वस्त॒का ही मूल्य
है। जो वस्तु जितनी अधिक दुर्लभ है उतना ही अधिक उसका मूल्य
है, और मूल्यवान् पदार्थका ही जगत्में आदर है, उपयोगितापरदी
आदर निर्मर नहीं है। अल्पोपयोगी मणि-माणिकका अत्यन्तोपयोगी
अन्न-जलसे कहीं अधिक आदर है। यथा--
मनिमानिक भहँगे किये सहँगे तन जर नाज्ष ।
तुलसी एुतो जानिये राम गरीबनेवाज ॥
( दोष्ठावली )
अतः सबसे अधिक मूल्य मोक्षका है, क्योंकि वह अति दुलंभ है,
थथा---
जति छुरूभ कैचल्य परमपद्।
ज्ञानसे कैवल्यपद द्वोता है, हुलूमका साधन सुरूम नहीं हो सकता
अतः कहा कि ज्ञान-सा कुछ दुलम नहीं ।
सोइ मुनि तुमसन कहेउ गोसाई ।
नहिं आदरेड मगतिकी नाई ॥ ५॥
अर्थ-हे गोखाई ! चही सुनिने तुमसे कहा, स्रो ( तुमने
उसका ) भक्ति-खा आदर नहों किया ।
श्छ रामरहस्थ
गोंखाई-हब्द प्रभुके अर्थमें व्यवद्वत दिखायी पड़ता है; यथा---
सो गोसाहँ जेद्धि विधिगति छेकी । सके को टारि टेक जो टेकी ह#
स्वासि,गोसाइद्दि सरिस गोसाईँ ॥ राखा मोर दुलार ग्रोसाएईँ ॥
-त्यादि
सोद मुनि तुमसन कहेंउ*भाव यह कि शानप्रदानर्म तीन बातें
आवश्यक हैं-(१) ज्ञान (२) गुर ओर (३) अधिकारी । जहाँ तीनों
उत्तम एकत्रित हो जायें वहाँ अनादरके लिये कोई कारण नहीं है। 'सोइ
से यहाँ वही अनुपम दुलेभ ज्ञान अमिप्रेत है; मुनिसे यहाँ उपदेश गुरु
महषि छोमझसे तात्पय है; 'तुमसन' से परम अधिकारी स्वयं भरुश्ण्डिजी
कहे गये हैं | यहाँ तीनों बातें उत्तम-से-उत्तम वन गयीं, ब्रद्मज्ञानसे
बढ़कर कोई शिक्षा नहीं, यथा--“मूहु परम सिख देखे न मानसि ।?
रामचरितमानसर्म महर्पिषद छोमशकों ही दिया गया है, यथा--दीन्ह
महाक्रपि श्ञाप” सो इनसे बढ़कर गुर कौन होगा ! मनुष्योंमें मोक्षका
अधिकारी ब्राक्षण है, इसीलिये उसके दारीरकों चरम ( अन्तिम )
कहा गया है, यथा--चरम देह ह्विजकर मैं पाई !! तिसपर भी
अुझ्ुण्डिजीका छृदय सब वासनाओसे रहित था, यथा--“मनते सकछ
बासना भागी ।? इसीलिये मुनिजीने इन्हें परम अधिकारी माना, यथथा---
“मोहिं परम अधिकारी जानी |? यहॉपर अनादरके छिये स्थान नहीं था,
तीनेंमेंसे यदि किसीमें त्रटि होती तो अनादरका ग्रवेश हो सकता था |
नहिं आद्रेड-भाव यह कि उपदेशके समय दूसरी बात मनमें
सोचना ही उपदेशका अनादर है; और हृठ करके उपदेष्टाकी वात
काटकर दूसरा पक्ष खड़ा करनेसे बढ़कर और क्या अनादर होगा
सो ये सब बातें भुशण्डिजीसे हुईं, यथा--
यद्दि विधि विविधि जुझुति सन गुनेऊँ। सुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ ॥
सब में निरयुन मत करि दूरी। सशुन निरूपों करि हठ भूरी व
इसीलिये गरुड़जी कहते हैं कि आपने आदर नहीं किया |
ः्
इातपञ् चौपाई श्८
डतपञ्च चापाई
भगतिकी नाई-भाव यह कि जब राममन्त्र दिया; और वालकरूप
शासका ध्यान बतछाया तब खूब मन छंगाकर सुना, यथा--झुंदर सुखद
मोहि अति भावा ।* इससे सक्तिका आदर करना सूचित हुआ |
ज्ञानहि सगतिहि अंतरु केता ।
सकल कहहु भ्रञ्च॒छ्ुपानिकेता ॥
सर्थ-हे प्रभु कृपानिकेत! शान और भक्तिमें कितना
अन्तर दे सो खब कहिये।
शानहि' भगतिहि-माव यह कि जाननेको शान और परम प्रेमको
मक्ति कहते हैं | यहाँ जो शेय है चही परम प्रेमास्पद है। उसी आननद-
सिन्धु सुखराशि रामको जाननेकों ही ज्ञान कहते हैं; आनन्दानुभूति
और प्रेम कोई दो प्रथक् वस्तु नहीं माल्म पड़ती | जहों आनन्द है वहीं
प्रेम है, जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है | यदि कोई प्रेम करता है तो उसे
आनन्द अवदय मिलता है, न मिला होता तो वह प्रेम न करता, और
जिसे आनन्दानुमव हुआ वह प्रेम न करे ऐसा हो नहीं सकता; यदि
कोई प्रेम नहीं करता तो यही समझमें आता है कि उसे आनन्दानुभव
छुआ ही नहीं; सो देखनेमें तो शान और भक्तिमें पूरा-पूरा सामानाधिकरण्य
मालूम होता है |
अंतर केता-अन्तरके तारतम्यसे ही आदरका तारतम्य होता
है। मेरी तों यह समझमें नहीं आता कि किसका अधिक आदर करें
और किसका कम); क्योंकि अन्तर कुछ मालूम नहीं पड़ता ।
सकछ कहहु-आपके वर्तावसे साधन और सिद्धि दोनोंमें अन्तर
मालूम पड़ता है। साधनमें अन्तर है इसलिये आपने मुनिके उपदेशको
आदरपूरवक अ्रवण नहीं किया। सिद्धिमें भी अन्तर है, तभी आपने
नि्ुण मतको दूर करके सशुणका निरूपण किया। अतः साधन था
सिद्धि जहाँ-जहाँ अन्तर हो सो सब कहिये !
५९ शामरहस्य
प्रशु कूपानिकेता-भ्ुश्वण्डिजीकों समर्थ समझते हैं कि वह सब
शह्ठाओँका समाधान कर सकते हैं। क्योंकि भ्रुशण्डिजीकी स्तुति स्वयं
शबड्भरजीने गरुडजीसे की थी, यथा--“जाकी अस्तुति सादर निज मुख
कीन्ह महेंस ।? इसलिये प्रभु सम्बोधन दिया | विनिमयमें कुछ न चाह-
कर अभूल्य उपदेश देनेका कष्ट सिवा कृपानिकेतके और कोई स्वीकार
नहीं कर सकता, इसीलिये कृपाका घर ( कृपानिकेत ) कहा ।
सुनि उरगारि बचन सुख माना ।
सादर बोलेड काग सुजाना ॥ ६ ॥
अथे-उरगारि ( गरुड़ ) का वचन खुनकर झुख माना
( तव ) आदरके सद्दित खुजान कागजी बोले ।
उरमारि वचन-गरुड़जी सॉपोके शत्रु हैं, खूब खोज-खोजकर
प्रइन पूछते हैं, अथवा अब मोह-अ्रमादि सपाके पीछे पढ़े हैं, निःशेष
करके ही छोड़ेंगे ।
खुनि खुख माना-भाव यह कि ममके समझनेवाले श्रोताकों पाकर
वक्ता उुखी होता है | गरुडजीके वचन सुननेसे यह मालूम हुआ कि
वह उनके उपदेशको यथायत्त् घारण कर रहे हैं । जहाँ कहीं तनिक-सी
मी बात बेंठनेमें रुकती है, ठुरन्त मइन कर ब्रैठते हैं | हमारे अविनयपर
अदन हो रहा है; यह समझकर रुष्ट न हुए प्रत्युत परहितैकजत
मुझुण्डिजीने संशयोच्छेदनका थुनः अवसर पाकर सुख माना । इससे
भुझ्चण्डिजीकी कृपानिकेतता कही ।
सादर वोलेड-भाव यह कि उत्तम वक्ता पाकर भोतागण ही नहीं
कृतार्थ होते; गुणी भीता पाकर वक्ता भी कृताथ होते हैं, उपयुक्त प्रश्न
सुनकर आदर करते हैँ | यहाँ गरुड़जीकी तीज जिज्नासा देखकर, तथा
अपने प्रति पूर्ण आस्था देखकर आदरसहित बोले | अथवा गरुड़जीके
मनको. रामग्रेमसे सरस देखा, कि ये भक्तिका सविस्तर वर्णन सझुननेके
पसौपाई हा
चतपञ्ञ चौपाई प्र
लिये ज्ञान-भक्तिको आमने-सामने रखकर बदन कर रदे दूँ; अतः सादर
बोले, यथा---
शाम सुप्रेम सरस भन जासू। साधु सभा बद जआादर तासू ॥
यहाँ गरड़जीका आदर पश्षिराद होनेके नाते नहीं हो रहा है;
बल्कि रघुनाथकका प्रियदास होनेके नाते हो रहा है, यथा-“रघुनायकके
मम प्रिय दासा! ।
काग खुजाना-भाव यद्द कि काग महामन्दमति दोते हैँ, कठोर-
वबादी होते हैं, यथा--'मद्दामन्दमति कारन कागा? सो भुशुण्डिजी सुजान
काग हैं, मधुर भाषी हैं, यथा--“मधुर बचन बोलेठ त्तव काया! |
सुजान साधु होते हैं, सुशील होते हैं, कृपा द्ोते हैं, सबकी सुनते ई।
सबका सम्मान करते हूँ, क्योंकि सुवाणी; भक्तिमति और गतिकी उन्हें
पहचान रहती है, यथा--
साधु सुजान सुसील नृपाला ]॥ 8००७०७००००० ७+०००७०७ ६०००७ ०क१७७०७०७ ७ ||
सुनि सनसानद्धि सबह्धि खुबानी। भनिति भगति मति गति पहिचानी ॥
अतः गरुड़जीकी वाणी भणित्ति; भक्ति, मति और गति पहिचान-
कर उनका आदर किया । इससे कागजीकी प्रभ्ुता कही ।
भगतिहिं ज्ञानहिं नहिं कछु भेदा ।
उसय हरहि भव संभव खेदा ॥
अर्थ-भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है, दोनों
संखारसे पेंदा हुए दुश्खॉकोी हरण करते हैं ।
भगतिहिं ज्ञानहि-भाव यह कि यथार्थ ज्ञान और संवादी अ्रमकों
ही क्रमशः जशञान और भक्ति कहा जाता है। मणिमें सणि-बुद्धि होना
यथार्थ ज्ञान है और मणिकी प्रभामें मणि-ज्ञानसे प्रइत्त होना संवादी भ्रम
है; इसी भाँति ब्रह्मका अपरांक्ष ज्ञान होना तत्वज्ञान है; और उसकी
उपासना संबादी भ्रम है |
श्र रामरहस्प
नहिं कछु भेदा-भाव यह है कि तत्वश्ञान और संवादी अम्में
कोई भेद नहीं है । मणि-अ्रमामें मणि-चुद्धि होना यद्यपि श्रम है तथापि
डसकी प्राप्तिके लिये दौड़ते हुए पुरुषको मणि-प्रासि होती है। अतः
मणि-आसिरूपी फलके समान होंनेसे अभेद कहा | प्रशन यह था कि
'ज्ञानहिं भगतिहिं अन्तर केता! । अब प्रदनकर्तानें जिस बावकों मनमें
रखकर प्रइन॒ किया था उसीकी युष्टि करते हुए कहते हैं कि “भगतिहिं
शानहिं नहिं कछु भेदा! ।
भव संभव खेदा-संसाररूपी वनमें दुःख-ही-दहुःख भरा है । इसीसे
'सखेदा? कहकर बहुवचनका प्रयोग किया । अन्थकारने विनय-पत्रिकार्मे
संसारकों वन मानकर उसके दुःखोंका बड़ा सुन्दर चित्र खींचा है; यथा--
संसारकांतार, अतिधोर, गंभीर, धन, गद्दन तरु कर्म-संकुछ, झ्ुरारी ।
घासना चछि खर-कंटकाकुछ विजुुल, निविड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥
विविध चितधृत्ति-खगनिकर इयेनो रूक, काक बक घध्न आसिप जहारी ।
अखिल खल,निपुन छल छिद्र निरखत सदा जीवजन पथिक मनखेदकारी ॥
क्रोध करि मत्त, ख़यराज कंदप, सद-दर्प श्रक-भालु अति उम्रकर्मा ।
सहिय भत्सर ऋूर, छोमभ सूकररूप, फेर छछ, दंभ भार्जारधर्मो ॥
कपट मकंट घिकट, ज्याप्न पाखण्ड मुख, दुखद मगमात, उत्पातकर्ता ।
हृदय अवलोकि यह सोक सरनागतं, पाहि मां पाहि, भो विश्वभर्ता ॥
प्रबल अह कार दुर्घेट महीधर, महामोह गिरियुह्दा निविडान्धकारमस, ।
चित्त वेताल भन्॒जाद मन, प्रेतगन रोग, भोगौध घृश्चिक-विकारमस ॥
विपय-सुख-छालसा दंस-मसकादि,खल झिछिरूपादि सब सर्प,स्वासी।
ततन्न आक्षिप्त तव विपम साया नाथ अंध मैं मंद व्यालादगासी ॥
घोर, अवगाह भव जापगा पापजलपूर दुष्पेंद्ष्य दुस्तर अपारा |
सकर पडवर्गं गोनक्र चक्राकुला छूछ सुभ असुभ दुख तोन धारा ॥
सकक संघट पोच सोचवस सवंदा दास तुझसी बिपम गहनअस्तम् ।
न्राहि रघुवंशभूपण कृपाकर कठिन काछ बिकराल-कलिन्नास-ब्रस्तम् ॥
उभय हरहिं-भाव यह कि भक्ति और शान दोनोंहीसे उपयुक्त
]
इशतपश्च चौपाई श्र
दुशखौकी निद्गत्ति होती है।दोनोंका एक फल है कि जीव संसारके
दुः्खोंसे छूट जाता है। अब दहला यह होती है कि फिर आपने विशेष
आदर क्यों किया ! अतः कहते हैं---
नाथ मुनीस कहहिं कछ अंतर ।
सावधान सोउ सुलु बिहंगबर ॥ण।
अर्थ-हे नाथ ! मुनीश छोग कुछ भेद (अन्तर ) बतछाते
हैं, उसे सी दे विहंगवर | खुलो (
नाथ-मभाव यह कि पक्षिराद होनेसे गरडजीको “नाथ कहकर
सम्बोधन किया; अथवा आदस्से नाथ कहा ।
मुनोस कद्दहिं-भाव यह कि भ्ुश्ण्डिजी बढ़े सुशील हैं, यथा--
८तहूँ रह कागभुशण्डि सुशीलछा? ऐसे गहन विघयर्म अपने मतकों प्रमाण
नहीं मानते; अतः मुनीशोका मत कहते हूँ । ममन करनेवालॉको मुनि
कहते हैं, अति विचारशीलकों मुनीश कहते हैं । मनीश आतत हैँ, इनका
वचन प्रमाण है।
कछु अंतर-भाव यह कि मननशीलॉको कुछ अन्तर दिखलायी
पड़ा है। वह अन्तर सूक्ष्म है; अतः सबको नहीं माढूम पड़ता । उसी
अन्तरकों मुझशुण्डिजीने भी प्रमाण मानकर, भक्तिके प्रति अधिक आदर
दिखलाया ।
बिहंगवर-भाव यह कि आप विहंगमार्गी शानियोंमें श्रेष्ठ हैं, इसके
समझनेके अधिकारी हैं अथवा श्रोताओंमें प्रमुख हैं, यथा--“आदें उनें
अनेक विहंगा” यहाँ पक्षीमावमें कथा होती रही, इसलिये श्रोताओंमें
सिवा पक्षियाँके और कोई नहीं था, यथा--
कहछु एड्विते पुनि मैं नद्टि राखा। ससुझे खग खगहीकर भाखा ॥
सावधान सोड झुछु-माव यह कि उस अन्तरकों मी सावधान
होकर सुननेके लिये आदेश देते हैं | साम्य तो सुन चुके अब अन्तर भी
३ | “. ” शामरहस्य
सुनो | तनिक भी अनवघानता होनेसे समझमें नहीं आवेगा | भक्ति और
ज्ञानका विषय ही ऐसा गूढ है कि श्रेताको सावघान करना ही पड़ता
है। मगवान् भ्रीरामचन्द्रने खयं इसी माँति लक्ष्मणजीको सावधान किया ।
यथा--सुनहु तात मतिमन चितकछाई |?
ज्ञान बिराग जोग बिज्ञाना |
ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥
ज्ञान-भाव यह कि ज्ञान दो प्रकारका होता है--( १ ) परोक्षश्ञान
और (२) अपरोक्षज्ञान | ब्रक्षकों सबर्मे समान देखना ही परोक्षज्ञान
है, यथा---
ज्ञान समान जहाँ एकौ नाहीं । देखदटिं मह्म समान सब साहीं ॥
विराग-नैराग्य भी दो प्रकारका होता है---(१) वशीकार और(२)
परवैराग्य । देखे हुए. विधय और खर्गादिक्रे सुने हुए मोगोंसे तृष्णारहित
डोनेकों व््चीकारवैराग्य कहते हैं, यथा---
एट्टि लनकर फछ विपय न साईं। खगहु सर्प अंत दुखदाईं॥
पुरुषके साक्षात्कारसे गुणोंमें तृष्णारहित होना परवैराग्य है, यथा---
कट्टिज तात सो परम विरागी। तून सम सिद्धि तीन गशुन त्यागी ॥
जोग-चित्तवृत्तिके निरोधको योग कहते हैं, यथा--
सन थिर करि तब शंभ्ु सुजाना । ऊुगे करन रघुनायक ध्याना ॥
यह बिना अभ्यास-चैराग्यके नहीं होता और न बिना योंगकी
सहायतासे ज्ञान हों सकता है। यथा--धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना ।?
विज्ञाना-जहाँ ज्ञानके साथ विज्ञानका पाठ है, वहाँ ज्ञानसे परोक्ष-
ज्ञान और विज्ञानसे अपरोक्षजश्ञान लिया जायगा, यथा--दुर्लम ब्रह्मलीन
विज्ञानी! और जहाँ केवल ज्ञान ही पठित है वहाँ प्रसज्ञानुकूल दोनों अर्थ
डिया जायगा |
दतपश्च चौपाई य
झुनहु हरिजाना-भाव यह कि हरिके यान होनेसे आप बड़े पुरुषार्थी
हैं । जिसमें कोई पुरुषार्थ ही नहीं वह पुरुष कैसा £ पुरुषार्थ चार माने
गये हैं--घर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इनमेंसे घम और अर्थ साधनरूप
हैं, अतः फलरूप काम और मोक्ष दो ही पुरुषार्थ हैं। इन दोनोंमें मी
नित्य होनेसे मोक्ष परम पुरुषार्थ है | पुरुषार्थके लिये स्वात्मावरूम्बन परम
आवश्यक है; यह आप अच्छी तरहसे जानते हैं ।
प्. सब पुरुष-भाव यह कि चेतन पुरुष और जड़ प्रकृतिके
योगसे ही यह सृष्टि ( जगत् ) है, अथौत् चेतन और जड़की भक्न्थि
अथवा अभिमान ही जगत्का मूल है । इस ग्रन्थिके बिना छूटे जगत्से
निस्तार नहीं, अतः शान विराग योग विश्ञान ये सब इस ग्रन्थिकों तोड़कर
मोक्ष देनेवाले हैं | अतः बड़े स्वात्मावरूम्बी पुरुषार्थी हैं, पुरुषपदवाच्यके
योग्य हैं। यथा--
अर्म ते बिरति ज्ञोग ते ज्ञाना | क्वान सोच्छप्रदु जेद बखाना ॥
थे मायाके प्रतिदन्द्दी हैं। अतः इनकी चेतनमें ही गिनती है )
पुरुष प्रताप प्रबकू सब साँती।
अबला* अबल सहज जड जाती ॥ < ॥
अर्थ-पुरुषका प्रताप सब भाँति प्रबछ होता है, और जड
जाति अबला ( री ) है; खभावसे दी निरबंऊ है।
पुरुष ध्रताप-भाव यह कि प्रताप पुरुषके हिस्सेकी वस्त है!
खाबरूम्बी पुरुषार्थीका ही प्रताप होता है, और प्रतापसे दुष्कर कार्य
सुकर हो जाता है; यथा--“श्रीरघुवीरप्रतापते सिनन््धु तरे पाषान! सो
# शानविश्ञानमें इमशभ्रु ( दाढ़ी-मूछ ) आदि कोई पुरुषके चिह्न नहीं है,
और न माया-भत्तिमे कुच-केशादि कोई स्रीके चिह हैं, अतः चेतन जाति और
जडजातिके विभागसे पुरुष-सख्रीका विभाग माना ।
रु शामरहस्य
ज्ञान विराग योग विज्ञानका भी प्रताप है | उन्हें कुछ करना नहीं
पड़ता । उनके रहनेसे ही मोह भाग जाता है। यथा--
झुनु सुनि मोह होहमन ताके । क्वान विराम हृदय नहिं जाके ॥
प्रवछ सब भाँती-भाव यह कि चित् जडकी ग्रन्थितक छोड़नेमें
समर्थ है, बथा--
गॉठि विन्नु ग्रुलकों कठिन जड चैतनकी,
छोरयो अनायास साधु सोधक अपानको॥
( गीतावली )
जडजाति अवला-जिस भाँति चेतनकों पुरुष कह्दते हैँ उसी
भौति जड जातिकों अब्रछा (स्त्री ) कहते है | जड़ प्रकृति या माया
है | जिस भाँति ज्ञान वैराग्य आदि प्रन्थिकि छोडनेवाले हैं, उसी
भाँति मोहादि श्रन्थिकों दृढ़ करनेवाले हैं| अतः इनकी भी गिनती
जड जातिमें है, यथा---
काम क्रोध सदर छोम सब प्रवक्त मोहदकी धारि।
लिन भहँ अति दारुन हुखद मायारूपी नारि॥
सहज निर्बंलता द्योतन करनेके लिये ही बहुत-से पर्यायेक्रे रहते
हुए भी “अबला” पद दिया।
सहज अवरछ-भाव यहद्द कि प्रकृति या मायाकों बल नहीं है,
यथा---
सुन्ठ रावन ब्रह्मांड निकाया । पाष्ठ जासु चकछ विरचति साया ॥
एक रचह जग ग़ुन बस जाके । प्रश्मु पेरित नहिं निजबल ताके ॥
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य हृव मोह सहाया ॥
अतः इसमें स्वावलम्बन नहीं | यह इंचिरूपी ज्ञानसे नष्ट हो जाती
है। इसीलिये इसे सहज निर्वल कहा )
झातपश्च चौपाई श्र
दो ०-पुरुष त्याग सक नारिहि जो बिरक्त मतिधीर ।
नतु कामी बिषयाबस बिम्ठुख जो पद रघुबीर ॥
अर्थ-जो विरक्त मतिधीर पुरुष हैं, वे स््रीको त्याग
खकते हैं। कामी, विषयोंके चशीभूत और रघुवीरके चरणोंके
विस्खुख ऐसा नहीं कर सकते ।
जो पुरुष बिरक्त मतिधीर-यहदाँ 'मतिधीर! शब्दका स्थितप्रशसे
अमभिप्राय है । अथोत् ज्ञान-योग-विज्ञानसे युक्त विरक्त पुरष | भाव यह
कि पुरुष और नारीमें भोक्तु-भोग्य-सम्बन्ध है । अतः परस्परमें आकर्षण
है, एक दूसरेकों छोड़ नहीं सकते; पर ज्ञान-विराग-योग-विज्ञानमें चित्-
जडभ्रन्थि छोड़नेकी सामथ्य है। अतः एतद्गुणविशिष्ट पुरुष चित्-
जडकों प्थक्-प्रथक् देखता है, अहंकारकी अन्थि उसके लिये खुली हुई-
सी है; अस्मिता तनु-अवस्थाकों आ्रास हो गयी है अतः उसे भोक्तु-मोग्य-
इृष्टि ही नहीं रहती ।
त्याग सक नारिहिं-भाव यह कि जिसमें मोक्तुभोग्यमावना नहीं
है, जिसकी अस्मिता तनु भावको प्राप्त हुई है, जो स्थितप्रश है; वही
स्त्रीका परित्याग कर सकता है, मोग्यक्रे आकर्षणसे बचनेकी सामर्थ्य॑
रखता है। ज्लीके समान कोई भी विषय बन्धनकारक नहीं है, ज्ीके
त्यागसे और सब विधय त्यक्तके ही समान हैं, उनके त्यागर्में कोई
आयास नहीं है, इसील्यि कहते हैं कि वह नारीको त्याग कर सकता
है; दूसरे विषयोकी गणना ही क्या है ?
तु कामी विषयावस-जो कामी विघयोंके वशमें है, उसमें जडता
है, दुर्वछता है, चह ज्लीमय है, वह मोग्यके आकर्षणसे नहीं बच सकता;
उससे ज्री नहीं छूट सकती | यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि
नपननज--_+-_-_++-_---- हे देना आवश्यक छ
#% दग्ध हुए वीजका न उगना तनुत्व कहलाता है। विरोधी भावोंसे
उपमदित छुए बलेश तनुत्वको प्राप्त होते हैं ।
म््छ रामरहस्थ
वस्तुतः ली और पुरुष, जड और चेतन हैं | ज्ञान विराग योग विशान
( चेतन ) के घर्म हैं; इसीसे इन्हें पुरुष कहा; और काम-क्रोध-मोहादि
जडके घर्म हैं, इसीसे इन्हें र्ली कहा । पुरुषधर्म खावलूम्बी है; वलवान्
है, वह भोक्तुमोग्यमावका नाशक है, और स््रीधम निबंल है, परमुखा-
पेक्षी है, वद भोक्तुमोग्यमावका सदा शिकार बना रहेगा |
विछुख जो पद रघुदीर-माव यह कि शान विराग योग विज्ञानसे
युक्त होनेपर भी जो उपासना ( भक्ति ) का विरोधी है वह भी स्त्रीका
त्थाय नहीं कर सकता । क्योंकि बिना भक्तिके अभ्यन्तरका मरू जा नहीं
सकता, और अभ्यन्तरके मलके रह जानेसे समयपर भोक्त॒भोग्यभावके
उदय होनेकी पूरी सम्मावना रहती है। भक्ति बनी रहनेसे बराबर
आसश्यन्तरिक मल घुलता ही रहता है; और दृकशक्ति निर्मल बनी रहती
है, यथा--
रघुपति भगति वारिछाछित चित बिल्लु प्रयास ही रूझ ।
अतः चेतन-जडके पएथक दर्शन होते रहनेसे भोकतृमभावका उदय
नहीं होता ।
सो०-सोउ मुनि ज्ञाननिधान
मगनयनी बिधुमुख निरखि ।
बिबस होहि,।. हरिजान
लारि बिस्वमाया प्रगट ॥
अर्थ-चें ज्ञान-निधान मुनि भी झुगनयनी चन्द्रवदनीकों
देखकर हे गरुड़जी ! विवश हो जाते हैं। क्री प्रगट विश्वमाया है ।
सोड मुनि ज्ञाननिधान-भाव यह कि विरक्त मतिधीर ही स्थित-
प्रश्न है, मुनि है; उसे ज्ञाननिधान इसलिये कहा कि उसमें ज्ञान विरास
झछातपश्च चौपाई न
योग विशान सब कुछ है, उसके छेशोंका तनूकरण हो खुका है, अब उसे
भोक्तृमोग्यभाव नहीं है; संक्षेपतः बह अपने मनकी मार चुका हे
सगनयनी विछुस्ुख निरखि-भाव यद्द कि सुन्दस्तामें ऐसी
अपूर्च अमृत-सज्लीवनीशाक्ति है कि वह मरे हुए, मनकों भी जगा देंती है;
अर्थात् तनक़ृत छेश भी उदारावसाकों प्राप्त दो जाता है; यथा--
जागेड मनोभव झुयेठ मन वन सुभगता न परे कही)
सीतल सुगंध सुमंद मारुत भदन जनल सखा सट्दी ॥
विकसे सरनि चहु कंज संजुर पुंञण ग्रुजत मधछुकरा ।
कलइईंस सुक पिक सरस रच करि गान नाचह्टिं अपसरा ॥
३
विवल होटहििं-भाव यह कि विशेष करके वश्य हो जाते दे, जो
ही नाच बह नचाती है; वही नाच नाचते हैं । यथा--
चारि विवस नर सकल शोसाएँ ) नाले नट मरकटकी नाहं ॥
इरिजान-भाव यह कि दरिजान सम्धोंधन करके जिस बातको
उठाया था; उसीको हरिजान सम्बोधन करके ही समाप्त करते हैं, यथा--
एु सब पुरुष सुनहु हरिजाना। और 'विवस होहिं हरिजान ।?
विखमाया-भाव यह कि संसारमें जितनी माया है उनका यांदि
विभाग किया जावे तो उत्पक्ति, मछय और नाशमें सबका अन्तभांव हो
जाता है | भाया उसीको कहते हैं, जो झुठ होकर सत्य-सी भासे ।
नारि प्रगट-सों सब साया ह्नीमें प्रकट है, और जगत्में
गुप्तख्पसे है । जगत्की सष्टि किसीने देखी नहीं, नाश कोई देख
नहीं सकता; जो शक्ति पालन कर रही है, उसका दर्शन दुर्लूम है;
बहुत बड़े-बड़े विचारशीलेको उसका कुछ आभासमात्र मिलता है | स््रीमें
ये सब बातें प्रकट हैं, यहींसे सब मायाका दर्शन होता है । जिस भाँति
स्रीसे जीवोंकी उत्पत्ति, पालन और नाश होता है, उसी भाँति मायासे
संसारकी उत्पत्ति, पाछलन और नाझ होता है | भेद इतना ही है कि स्रीका
38 रामरहस्य
सम्बन्ध व्यष्टिसे है और मायाक्रा समष्टिसे । अधिचारतसे ही स्त्री रमणीया है;
विचारसे घणित वस्तु, रक्त, मांस, मजा, स्नायु, अस्थि; चर्मादिका पिण्ड
है और दिखायी इतनी सुन्दर पड़ती है, इसी मौति माया भी दुश्खरूपा
खनेमें बी]
है, और देखनेमें ऐसी आकर्षक है कि संसार इसीमें फंसकर मर रहा है।
इहॉ न पच्छपात कछु राखों ।
बेद पुरान संत मत भाखों॥
जरय॑-यहाँपर में कुछ पक्षपात नहीं करता, चेंद्+ पुराण
और खसन्तका मत कह रहा हूँ ।
हृदहाँ न राखों-भाव यह कि वहाँ रक््खा था। सन्निकष्ट अथमे
“इहाँ? का थयोग है, अर्थात् इस प्रसंगमें । महर्षि छोमशके प्रसंगमें मैंने पूरा
पक्षपात किया था,यथा-पुनि-पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा।? “भक्तिपच्छ हठि
कर रहेडें।? इससे यह न समझ लेना कि ये मक्तिके पक्षपाती हैं, जेंसे वहाँ
पक्षपात किया था वैसे ही यहाँ भी पक्षपात करते होंगे | वहाँ तो ऋषिजीसे
उत्तर-प्रत्युत्तर छिड़ गया था; उत्तर-प्रत्युत्तरमं पक्षपात न करनेसे पक्ष
गिर जाता है, अतः पक्षपात करना पड़ता है, यहाँ तो वह्द बात नहीं है;
प्रसन्नतापूवंक सच्ची जिज्ञासासे प्रश्न हो रहा है, और आदरपूर्वक
उत्तर दिया जा रहद्दा है, अतः पक्षपात अनुचित है ।
पच्छपात कछु-भाव यह कि महर्षि छोमशके सामने बहुत कुछ
पक्षपात किया था; यहाँ कुछ भी नहीं | पक्षपातके समय दूसरेकी बातकों
सादर नहीं सुना जाता; सुननेंके समय दी उस कथनके विरुद्ध युक्ति सोची
जाती है। वथा---
एृट्टि विधि अमित जुगुति मन गुनेऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ ॥
बैद पुरान संत मत-माव यद्द कि वेद ख़तः प्रमाण हैं, पुराण
ओऔर संतमत परतश्प्रमाण हँ अतः पुराण तथा संतके वचन यदि वेदा-
विरुद्ध हों तभी भ्राह्म हैं; और वेद-पुराणके वचन भी यदि शिष्टयह्दीत
दातपशञ्ल चौपाई 5234
नहीं हैं तो वे भी अग्राह्म हैं; जिस माँति मेघसे न अहण किया हुआ
समुद्रजल अग्राह्य हो जाता है | अतः वे ही वचन अश्नान्तरूपसे आह्य हो
सकते हैं, जो वेद, पुराण और संतसम्मत हों ।
भसाखाँ-भाव यद्द कि मैं अपने मनकी कोई बात ही यहाँ नहीं कद्द
रहा हूँ । जो बातें वेदपुराणसंतसम्मत निश्चित हैं, उन्हें ही कहता
हूँ, अतः उनके प्रमाण होनेमें सन्देह नहीं ।
मोह न नारि नारिके रूपा।
पन्नगारि यह नीति अनूपा ॥ ६॥
बर्थ-ख्रीके रूपपर स्री मोहित नहीं होती, हे पत्नगारि !
यह अल्ञपम नीति है ।
नारि भारिके रूपा-भाव यह कि स्ली-पुरुषम ही परस्पर मोक्त-
भोग्य-माव है; अतः पुंशक्ति और ज्लीशक्तिमें आकर्षण है, सन्दरतासे
चह आकर्षणशक्ति बहुत बढ़ जाती है, अतः स््रीके रूपपर पुरुष मोद्दित
होते हैं, यथा--
देखि रूप भ्रुनि विरति बिसारी । बढ़ीं बार ऊंगि रहे निह्ारी ॥
और पुरुषके रूपपर ज्री मोहित होती है, यथा--
आता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखहिं नारी |
स्रीकों स्लीके रूपपर मोहित होनेका कोई कारण नहीं है, न उनमें
भोक्तुभोग्यमाव है और न आकर्षण है ।
कस मोह न-भाव यह कि कारण बिना काये नहीं होता । मोहित
होनेके लिये रूपवानके प्रति मोग्यबुद्धि मी होनी चाहिये । अतः उस
बुद्धिके न होनेसे नहीं मोहती )
पन्चगारि-से भाव यह कि आप अुक्तमोग हैं, आपकी माता
रे रामरहस्य
विनता#कों कद्गने कितना दुःख दिया | विनताका रूप कद्ग॒के द्ेषका
कारण हुआ, रागका नहीं | यथा---
प्कदू बिनतद्दि दीन्द्र धुख, चुमद्धि कौसिका देव ।!
और तभीसे आपकी सर्पंसे शच्रुता हुई |
यद्द नोति अनूपा-भाव यह कि हमारे यहाँ नीतिका बड़ा आदर
है | नीति जाननेके लिये ही धर्मशात्र, अर्थथात्र और कामझासत्रका
अध्ययन होता है | अवस्थाविशेषमें जहाँ धर्मार्थ, काममें विरोध पड़ता
है, वहाँ उनका तारतम्य समझकर नीति निर्धारण करना ही विद्याका
फल है; अतः अवध्यापरिवर्तनसे नीति-नीतिसे परिवर्तन हुआ करता
है | ऐसी कोई नीति नहीं है जो सब अवस्थाओंमें छागू हो। केवल 'मोह
न नारि नारिके रूपा? यही नीति ऐसी है कि माया-भक्तिसे लेकर
लछोकिक नारि नारितक समानरूपेण उपयोगी है। इतना ही नहीं,
आकर्षण और विप्रकर्पणका सिद्धान्व इस नीतिपर कायम है | इस
नीतिमें बाघ नहीं है | इसीलिये अनूप कहा । अब यह शंका उठती
है कि--
रंगमूमसि जब सिय पशु धारी | देखि रूप मोहे नर नारी ॥
“यह कैसे हुआ, सीता भी नारी हैं उन्हें देखनेसे नारियाँ केसे
मोहित हुईं ।? उत्तरके लिये दूर नहीं जाना है । राम और सीता यदि
नर-नारी रहें तो रामायण ही व्यर्थ है । रामायण तो राम-सीताके यथार्थ
खरूपका बोध करानेके लिये है| कहना नहीं होगा कि भोक्तभोग्य-
भाव अविद्याकी सीमाके भीतरकी बात है; सो अविद्यासे ही सब नर-
# कह्ूू सर्पोकी माता, विनता गरुड़की माता दोनों भगवान् कश्यपकी
ख््ियाँ थीं, सापल्यभावसे प्रेरित होकर कटने सर्पोको चर्यके धोड़ोंकी पूँछमें
लिपटनेकी आक्षा देकर विनताकों काछी पूँछ दिखला दी, और प्रतिशानुसार
विनता उनकी दासी वनी, समाचार पाकर गरुड़ने उन्हें दासित्वसे विनिमुक्त
किया, और स्पोके शात्रु हुए ।
इतपज्च चौपाई डर
नारी भोहित हैं; सत्र विधवरुखके पीछे पड़े हुए हैं, अविया जड़ होनेसे
भोग्या है, और जीवमान ( नर और नारी ) भोक्तवर्ग है; चेतन होनेसे
उनमें मोक्तत्व है; जब जीवमात्रके अवियासे मोहित होंनेगें शंका नहीं
तथ सर्वश्रेयस्क्री मोक्षदात्री महांविया सीताके रूपपर जिसके द्वारा
अहम रामको क्षोम होता है; मोहित होना कौन जाश्रय है ! यथा--
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । परम पुनीत सौर मन छोमा ॥
नीतिकी यति धर्मार्थ, कामतक है; श्रीराम-जानकीकी बात नीतिसे
परे है; नीतिके पराधीन नहीं है
माया भगति सुनो तुम दोऊ |
नारि बर्ग जाने सब कोऊ॥
अर्थ-तुम खुनो, माया और भक्ति नारिवर्ग हैं यद वात
खथ कोई जानता है।
खुनो तुम-यहाँपर कोई नाम न लेकर तुम कहते हैं--भाव यह
कि जीवमान्र त्वम् ( तुम ) पदवाच्य है, गरुद़जी बहुत बढ़े हैं, पर हूँ
जीव, अविद्याके भोक्ता हैं | जीचके लिये यह प्रसंग बढ़ा उपयोगी है;
अतः वार-बार छुननेके लिये सावधान करते हूँ ।
माया भगति दोऊ-भाव यह कि माया और भक्ति दोनों ही
अ्रमरूप हैं | अतस्मिन् तद्वुद्धि दोनोंमे है। भेद इतना ही है कि एक
विसंबादी भ्रम है और दूसरी संवादी श्रम है। उदाहरणसे दोनोंका
चर्णन इस अकार हो सकता है कि रात्रिके समय घरके मीतर जलते हुए.
दीपका प्रकाश दारके किसी छोटे छिद्रद्धारा बाहर आ पड़ा उसे देखकर
किसीको मणिका श्रम हुआ; अतः उसके लिये प्रयत्न करनेवाछेकों
सणिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । ऐसे श्रमकों विसंवादी श्रम कहते हैं ।
सम्पूर्ण जगत् इसी भ्रममें पड़ा हुआ है। दिनरात सुखके लिये मर रहा
है, सुख कहीं मिलता नहीं, यही माया है, विसंबादी श्रम है। और
हे३ “ शामरहस्य
समिकी प्रमा देखकर उसे मणि मान प्रथल्ञ करनेवालेकी मणिकी प्रासि
होती है | प्रभाकों मणि माननेवाला भी भ्रममें ही है, पर उसका भ्रम
संवादी है। तत्पदका त्रिना शोधन किये मिश्र ब्रह्मकी उपासना करनेवाले-
को परभानन्दकी गसि होगी |
नारि बर्ग-भाव यद्द कि अ्रमरूपा होनेसे दोनों जड हैं; दोनों
अ्बला हैं, पराक्षित हैं | पुरुष ( चेतन ) प्रकाशमय है, यथा---
पुरुष प्रसिद्ध प्रकासमय, प्रगट परावर नाथ ॥
और जड अन्घकाररूप है, इसलिये अविद्याकों रात्रि कहा, यथा---
प्रथम अविद्या निसा (नसानी )॥
--इसमें भी स््री अँधियारी रात्रि है; यथा--
'नारि निबिड रजनी अधियारी
इसी भाँति भक्तिकों भी रात्रि ही कहा है, पर यह परम प्रकाशरूपा
शारदीय पौर्णमासीकी राजि है। इसमें रानभिके दुःख-दोध कुछ भी नहीं
होते, प्रत्युत शीतल होनेसे दिनकी अपेक्षा भी कहीं अधिक सुखदायिनी
है ।इस रानिमें मगवज्ञामका परम प्रकाश है; यथा--
राका रजनी भरात्ति तन, राम नाम सोह सोम ।
अपर नाम उड्ुगन सरिस, चसउ भगत उर व्योम॥
जाने सब कोऊ-भाव यह कि सब छोग माया और भक्तिके
लिये ख्लीलिद्धका दी प्रयोग करते हैं । संस्कृतमें यद्यपि वाच्य और
वाचकके छिज्लमें भेद होता है; पर वहाँ पुंशक्ति और ख्रोशक्ति अथवा
प्रसवशक्ति और संस्त्यानशक्तिकों क्रमशः पुलिड्ध और स्रीलिद्वका कारण
माना है । और ये शक्तियाँ सब वस्तुओं में पायी जाती हैं, अतः जिस
लिड्गकी विवक्षासे व्यवहार प्रचलित है वही लिद्धा उस वस्तुका माना
गया है| अतएव संस्कृतमें भी माया और मक्तिका जीलिज्ञमें ही प्रयोग
है, इसलिये कहा कि सत्र कोई जानता है |
झ्
शतपश्च चौपाई च्छः
पुनि रधुबीरहिं भगति पियारी |
साया खल्लु नतेंकी बिचारी ॥१०॥
अर्थ-तिखपर रघुबीरकों भक्ति पियारी है और माया
चेचारी तो नाचनेयाली है ।
पुनि-भाव यह कि ज्ञान विराग योग विज्ञान पुरुष हैं; यदि ये
सुन्दर हुए तो साया इनपर मोहित हो जाती है, इनमें विकार उत्तन्न
करनेकी चेश् करती है, और यदि सुन्दर न हुए. तो परलोकसाधनमें
समर्थ न होंगे । भक्तिके ज्री होनेके कारण उसकी सुन्दरतापर माया मुग्घ
नहीं होती, भक्तिमें विकार उत्पन्न करनेकी चेष्टा ही नहीं करती, अतः
भक्तिमें मायाके पीछे पड़नेका कोई कारण नहीं है । अब दूसरा कारण
देते हैं।
रघुवीरहिं-रघुवीर# शब्दसे समुण बरह्मका अहण किया; क्योंकि
निर्शेण ब्रह्ममें प्यार, कृपा, कोपादि बन नहीं सकते | वह न किसीपर
अनुभ्रह कर सकता है और न कोप ही कर सकता है। सग्ुण ब्रह्ममं ही
निखिल कत्याणगुणोंकी पराकाष्ठा है ।
भगति पियारी-भाव यह्द कि राम ब्रह्मपर भक्ति सती ख्रीकी भाँति
अनुरक्ता है; अतः उन्हें प्यारी है। यथा--
ऐसी हरि करत दासपर औरीति।
चिज प्रभुता विसारि जनके घस होत सदा यह रीति ॥
जिन बाँधे सुर झसुर नाग चर प्रवक्त करमकी डोरी।
सोइ अविछिज्न अह्म जसुसति हि बॉँध्यों सकत न छोरो ॥
# ओरघुवीरकी यह वानि।
भीचहू सो करत नेद सुप्रीति मन अनुमानि ॥
परम अधम निषाद पामर कौन ताकी कानि।
लियो स्रो उर लाइ झुत ज्यों, प्रेमको पदिचानि ॥
ह्र्५ रशामरहस्य
जाकी साया वस विरंचि सिर, नाचत पार न पायो।
करतल तार बजाइ ग्वाल-जुबतिन्द्र सोइ नाच नचायो ॥
विश्वंभर श्रीपत्ति त्रिभुवनपति बेदु ब्रिदित यह लीख।
बलि सो कछु न चलो प्रझ्ुता वरु द्वे दिज सौंगी भीख ॥
जाको नाम लिये छूटत भव जनम मरन दुख भार |
अंबरीप द्वित छागि कृपानिणि स्लो जनमे दुस बार॥
जोग विराग ध्यान जप तप करि जेट्टि खोजत झ्ुनि ग्यानी
चानर भारछु चपल पसु पामर नाथ तहाँ रति सानी॥
लोकपाल जम कार पचन रवि ससि सब आरस्याकारी ।
चुकूेसिदास प्रद्भु उससेनके द्वार चेंत्र कर धारी ॥
.( बिनयपत्रिका )
माया विचारी-भाव यह कि रघुवीरकी प्वारी होनेसे भक्तिकी
बड़ी भारी प्रभुता हो गयी, स्वयं प्रभु उसके वद्यमें हो गये हैँ, सब
साधनोंकों छोड़ उसीपर रीक्षे हुए हैं, यथा--रीक्षत राम सनेट्ट
निसोते ।! मायाका कोई चारा नहीं चलता; इसीलिये विचारी कहा ।
खलु नर्तकी-भाव यह कि मायाकी कोई प्रतिष्ठा नहीं। जहाँ-जहाँ
बन््धनके कारणरूपसे माया कद्दी गयी है वहाँ मायाका अर्थ अविद्या है ।
यहाँ भी वही बात है इसीलिये कद्दते हें कि भाया तो नतंकीमाच है, वह
अनेक भाव बतलाकर परपुरुर्षोको ठगा करती है । उसकी स्थिति ही पर-
युरुषेक्रि ठगमेपर अवरूम्बित है ।
भगतिहिं. साहुकूल. रघुराया ।
ताते तेहि. डरपति अति माया ॥
अर्थ-रघुराज भक्तिके सालुकूछ हैं, इससे उनसे माया वहुत
डरती दे।
रघुराया-भाव यह कि प्रीत्तिकी रीति जाननेवाले हैं, थथा---
शतपसथ्च चौपाई च्नद
जानत भीतिरीति रघुराई ।
प्रेम कनौद़ों रामसो प्रस्ु त्रिथ्ुवन तिहुँ कार न भाई ॥
तेरो रिनी हों क्यो कपिसों ऐसी मानिहे को सेवकाई |
( विनयपत्रिका )
इतना बड़ा अभु होकर भी प्रेमका इतना कृतश्ञ होनेवालछा रघुराईकों
छोड़कर और कौन है !
भगतिदिं सान्लुकूछ-मक्ति भ्रीरुनाथजीकी प्यारी है,
अतणएव वे भक्तिपर सानुकूल हैं । रानियॉमेंसे जिसपर सम्रादकी
सानुकूलता होती है, उसीकी दोहाईं होती है; उसीसे सब डरते हैं।
राजाकी प्रियाका अनहित कौन कर सकता है! उसकी सुदृष्टि-कुदएसि
रंक राव और राव रंक बनते हैं | यथा---
अनहित तोर प्रिया केद्दि की नद्दा। केहि छुष्ट सिर केद्टि जम चह छीन्हा ॥
कहु केद्धि रंकहधिं करें नरेस् | कहु केद्धि नृपद्धिं निकारों देसू ॥
फिर खयं रघुराया जिसके सानुकूल हैं | उसकी महिमा और प्रभुता-
का वर्णन तो कौन कर सकता है !
ताते सध्या-भाव यह कि माया बेचारी नर्तकी ठहरी, उनके
इश्ारेपर नाचनेवाली ! उसकी क्या सामथ्यं जो उनकी प्रियाका अनिष्ठा-
चरण कर सके ।
रघुबंसिन्हकर सहज सुभाऊ | मन कुपंथ पग घरहिं न काऊ ॥
अतः नर्तेकीकों कमी मी उनकी प्रिया होनेकी आशा भी नहीं,
सदा चेरी बनकर रहना ठहरा, यथा--चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ।
डरपति अति-भाव यह कि वह रघुराईसे अति समीत रहती है;
हाथ जोड़े दूर खड़ी रहती है, अतः उनकी पद्ाभिषिक्ता प्रिया राज-
महिधषीसे भी बहुत ह्वी डरती है। उसे जितना डर रामसे नहीं उतना भय
३७ रामरहस्य
भक्तिसे है; क्योंकि राम तो समीके अधिष्ठान हैं, अतएवं अविरोधी हैं।
पर भक्तिका खभाव मायासे विरुद्ध है। माया जीवमाचकी भोग्या तथा
बन्धनकारिणी है, और भक्ति सबकी माता तथा बन्धन काटनेवाली है |
यथा--
देखी साया खब विधि गाढ़ी । खजति सभीत्त जोरे कर ठाढ़ो ॥
देखा जीव नचाने जाही । देखी भगति जो छोरे ताही ॥
इसलिये भक्तिसे माया डरती हुईं दूर खड़ी रहती है | जिसका
चित्त परमेश्वरमें छगा हुआ है, उसे मायाकी ओर निरीक्षण करनेका
अवकाश ही नहीं है | यथा--
मन तहँ जहँ रघुबर-वेदेही । बिछु मन तन हुख सुखसुधि केददी ॥
रामभगति निरुपम निरुपाधी ।
बसे जामु उर सदा अबाघी॥ शश ॥
अर्थ-निरुपाधि, निरुपम रामभक्ति जिसके हृदयमें खदा
अवाधितरूपसे वसती हे ।
रामसगति-मनुष्योके शेयके लिये चार योग कहे गये हैं--(१)
कर्मयोग, ( २) अशज्ञयोग, ( ३ ) ज्ञानयोंग ओर ( ४ » भक्तियोंग ।
इनमेंसे कर्मयोंग और ज्ञानका निर्वाह भक्तिकी सहायतासे ही हो सकता
है। नहीं तो मायाह्वारा विज्नाचरणसे फलसिद्धि असम्मव हो जाती है ।
निरुपम-भाव यह कि भक्तिकी उपमा इन तीनोंमेंसे किसीसे
नहीं दी जा सकतो, क्योंकि कर्ममोंग और अष्टाह्ृयोंगसे तो इसकी
उपमा हों ही नहीं सकती, यथा--जोग न जप तप मख उपवासा |
रह गया ज्ञान; सो उससे भी “संसारसे उत्पन्न छुःखहरण? रूप फलमें
ही समानता है, वस्ठसाम्य नहीं है ! क्योंकि इसके ( १ ) खरूप (२)
साधन ( ३ ) फछ (४ ) अधिकारीमें विलक्षणता है। ( १ ) चित्तके
शठपशञ्च चौंपाई रेट
द्रवीभूत होनेपर मनका रामाकार होना; यही सविकब्पक च्त्ति भक्ति
है, और कठोर चित्त जब अद्वितीय आत्मामान्रकों विषय करता है, तब
उस निर्विकब्पक इत्तिको शान कहते हैं; ( २) रामगुणग्रामसे भरी
रामकथाका अवण मक्तिका साधन है, और 'सो तें तोहि ताहि नहिं
भेदा ( तत््वमसि ) आदि महावाक्य श्ञानका साधन है; ( ३ ) राम-
प्रेमका प्रकर्ष भक्तिका फल है और भज्ञानकी निद्वत्ति शञानका फल हैं;
तथा ( ४ ) भक्तिमें प्राणीमात्र॒का अधिकार है ओर शानमें साघनचत॒ष्टय-
सम्पन्न संन््यासीका ही अधिकार है | अतः भक्तिकी उपमा किसीसे नहीं
दे सकते |
निरुपाधी-फलरूपा भक्तिमें कामना ही उपाधि है। किसी
कामनाकी सिद्धिके लिये प्रेम करना वस्छुतः प्रेम नहीं । प्रेमका झुद्ध रूप
वही है जिसमें कामना नहीं है | जिसे कोई कामना है, उसे भक्तिका
रस नहीं मिला, उसके लिये भक्ति भावमात्र है। भरद्वाजजीका मत
है कि भक्ति-भावकों रसरूपमें परिणत करके मरतजीद्वारा पहले-पहल
दिखछाया गया । यथा---
चुमकई भरत करूंक यह हम सब कह उपदेस ॥
रामभगतिरस सिद्धिेहित भा यह समय गनेस ॥
गोखामीजीका भी यही मत है, यथा--
मेस असिज मन्द्र बिरद भरत पयोधि गँमौर |
सथि प्रकटेड सुर साधु हित कृपासिंघु रघुबीर ॥
डे पे जिसके जे आफ
जाछु उर सदा व्से-भक्ति जिसके मनमें सदाके लिये बस जाय;
निकालनेसे न निकले | भक्तिसे क्षणसात्रका वियोग सहन न कर सके;
यथा---
रामभगति जछ सम सन मीना | किसि बिलूगाह मुनोस प्रबोना ॥
वैसे तो बहुत-से जीव हैं, जो जलचर कहलाते हैं; पर वे सदा
ड्ेण, *. शामराहस्थ
जल्में नहीं रहते, कभी बाहर आकर धूप भी खाने लगते हैं। सदा बसने-
चाली मछली दी है; जल्से अलग द्वोते.ही वह आण देने लगती है। यथा-
सकर उरग दादुर कमझ जर जीवन जल गेद्द।
तुलसी एके सीनकह है. साँचिलो. सनेह ॥
अवाधी-भाव यह कि उसका बाध न हो । ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तर
जगतका वाघ हो जाता है, पर भक्तिका बाघ न हो । यथा---
अस बिचारि पंडित सोहि भजदीं । पायेउ ग्यान भगति नहिं तजदहीं ॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई ।
करि न सके कछु निज अझुताई ॥
अर्थ-उस्े देखकर मायाको संकोच होता है, अपनी प्रुता
कुछ कर नहीं सकती ।
तेदि विछो कि-भाव यह कवि जिस पुरुषके मनमें उपयुक्त अन-
चायिनी भक्ति बसी हुई है, उसका खरूप देखकर मायाका साइस छूट
जाता है, भक्तिके आते ही स्ररूपमें अन्तर पड़ जाता है, विघयरससे
रूखापन और रामसे सरसता उसके चेहरेसे ठपकने लगती है |
माया सकुचाई-भाव यह कि सायामें संकोचन और विकासन दोनों
जशक्तियाँ हैं| विकासवाद और संकोचवादकी इसीसे उत्पत्ति हुईं है ।
सत्रीके देखनेसे मायासें विकास होता है, क्योंकि वही तो इसका परम वल
है। यथा---
तेद्िकर एक परम बल नारी । तेद्दि ते उबर सुभट सोद् भारी ॥
दुर्बासना कुम॒ुद समुदाई। लन्ड नल हडह ||
न । पछद्टे भचारि सिसिर रिति पाई ॥
और जिसके हृदयमें भक्ति हो उसके दर्शनमात्नसे मायाकों सझ्लोच
छोता है, क्योंकि उसके वलका हास हो जाता है, भक्तिके आगमनमानच्रसे
शतपञ्च चौपाई छ०
मायाका तेजोबघ होंता है, क्योंकि उस घरमें उसकी पेंठ अब नहीं हो
सकती ।
निज प्रभुताई-भाव यह कि जीवमात्रपर मायाकी प्रभुता है; उसी-
के इशारेपर जीवमाच नाचा करते हैं | जीवोंकों नचाना ही मायाकी
प्रसुता है, वथा--
नाचत ही निसिदिवस मरथो
तव ही ते न सयो हरि थिर जबतें जिव नाम धरयों 8
वहु वासना विविध कंचुकि भूपन लोभादि सरधों।
चर अरू अचर गगन जरू थल्में कौन न स्वॉग करधो ॥
देव-दनुज, सुनि, नाय, सजुज्ञ नहिं जाँचत कोउठ उचरपो ।
सेरो दुसह दरिद्व, दोप, छुख काहू तो न हरयो॥
थके नयन, पद, पानि, सुसमत्ति बल, संग सकल विछुरधो ।
अब रघुनाथ सरन सायों तकि भव-मय विकरू डरयो ॥
(विनय० )
करि न सके कछु-भाव यह कि सामथ्य रहते अपने हाथसे शिकार
निकल गया, पर भक्तिके कारण वह कुछ कर नहीं सकती, यथा---
मैं त्ोहिं सब जानयो संसार ।
वॉधि न सकदिं सोहि हरिके वर, प्रणट कपट-आगार ॥
देखत ही कमनीय, कछ नाहिंन पुनि किये चिचार ॥
ज्यों कंदुलीतरु-सध्य निहारत, कवहुँ च निकसत सार ॥
तेरे छिये जनम जनेक मैं फ़िरत न पायों पार!
महामोह-झुगजल-सरितास् बोरधो हों वारहिं चार ॥
खुद जल! छलछ-बल कोटि किये वस होहिंन भगत उदार ।
सद्दित सहाय तहाँ वसि लव, जेहि हृदय न नंदकुमार /
तालों करहु चातुरी जो नहिं जाने मरस तुम्हार।
सो परि हउहरें मरे रझु-जहितें, बूझे नहिं व्यवहार
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नान््या स्ष्व॒ह्ा रछुपते हृद्येडससदीये
सत्य वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्ति भ्रयच्छ रघुपुंगवर्निर्भरां में
कामादिदोपरद्धितं कुर मानसे च ॥
विज्ञानी भी पतनके भयसे इसी भक्तिकी याचना करते हैं ।
दो०-यह रहस्य रघुनाथकर बेगि न जाने कोइ ।
जो जाने रघुपतिकृपा सपनेहु मोह न होइ ॥
अर्थ-रघुनाथके इस रहस्यक्ों जल्दी कोई नहीं जान
सकता; यदि रघुपतिकृपासें जान छे तो उसे सपनेमें भी
मोह नहीं दोता )
यह रहस्थ-भाव यह कि गिरिजाका प्रश्न हुआ था कि--
ओऔरोौ राम रद्दस्य अनेका। कद हु नाथ अति बिमर बिवेका॥
इसपर छाड्कुर भगवानले काकभुशझुण्डिकी कथा कहकर दो रहस्पोंका
चर्णन किया । रहस्य कहते हैं शुत्त बातकों | सो पहले चरितविषयक
परम रहस्प कहा--
यह सब गुप्त चरित मैं गावा । दरि माया जिसि सोहि नचावा ॥
रघुनाथकर-भाव यह कि यह रहस्य चरितका नहीं है, सं
रघुनाथविषयक है| केवछ रघुनाथका प्यार भक्तिपर होनेसे ही भक्ति
सर्वश्रेयस्करी है ।
पु
बेगि न ज्ञाने कोइ-भाव यह कि 'ज्ञान मोच्छप्रद बेद बखाना!
यह बात ठीक है, और सब कोई जानता है; पर जो इस रहस्यकों जानता
है, वह ज्ञानसे भी अधिक आदर भक्तिका करेगा, पर यह रहस्य जल्दी
कोई जान नहीं सकता |
छ३े रामरहस्य
जाने जो स्घुपतिकृपा-भाव यह कि जल्दी समझमें न आनेंका
कारण यही है कि जिनपर रघुपतिकृपा होती है, उस्तीकी समझमें यह रहस्म
आता है; नहीं तो वार-बार इसे पढ़ा कीजिये कमी समझमें न आवेया।
जितनी उनकी कृपा मुझपर थी उतना ही मैंने भी समझा है, और जो
समझा है उसे छिख दिया है; कोई यह न समझ बैठे कि इसका तात्पर्य यही
याइतना ही है ।
सपनेहु मोद्द न दोइ-भाव यह कि रघुपतिकृपासे इसे जान छेने-
पर फिर सपनेमें मी मोह नहीं होता। मोह न होना दी रहस्थके जान छेनेका
लक्षण है। यदि इसके समझनेपर मोह जाता रहे तो समझिये कि जान
पाया और यदि मोह बना है तो यही समझना चाहिये कि रहस्प मैंने नहीं
जान पाया ।
दो०-ओऔरो ज्ञान सगतिकर भेद सुनहु सुप्रवीन |
जो सुनि होइ रामपद॒ प्रीति सदा अविछीन! १ १६।
अर्थ-हे सुभवीन, भक्ति और जानका और भी भेद खुनो,
जिसके सुननेसे रामजीके चरणोंमें सदा अधिचिछिन्न श्रोति
दोती है ।
ओऔरी ज्ञान भगतिकर भेद्-भाव यद्द कि अथम मेद कथनमें बीज-
रूपसे राम मगति अनुपम निरुषाधी! कहकर जिस बातकों इद्धित
किया था; आगे उसीका विस्तृतरूपसे वर्णन करेंगे। प्रथम भेदकथनर्मे
भक्तिके आदरातिशयका रहस्य बतलाया गया, अब द्वितीय भेदकथनमें
खरूप) साधन; फछ और अधिकारीका भेद वतलाया जावेगा ।
सुप्रचीन खुनहु-यहयपर सुप्रवीण सम्बोधनसे तात्पर्य यह कि इस
भेदके सुननेका वही अधिकारी है; जो सुप्रवीण हो; आप सुप्रवीण हैं, इस-
लिये सुनिये । प्रवीण कहते हँ--जानकारकों, यथा--कत्रि न होहूँ नहि
शतपश् चौपाई छछ
बचनप्रवीनू ।? दूसरा प्रसंग आरम्भड करते हैं, इसलिये श्रोताकों सुनहु
कहके फिर सावधान करते हैं!
र्मपद् सदा अविछीन प्रीति-माव यह कि शमपदसें प्रीति
शास््रोंके तथा शुरुके उपदेशसे होती तो है, पर अविच्छिन्न तैलधारावत् नहीं
होती, बीच-बीचर्मे बराबर अन्तर पड़ता जाता है और अन्तर पड़ना हो मारी
अन्तराय है अतः सब महात्मा भगवानसे अविच्छिन्न ग्रीतिके लिये ही
आर्थना करते हैं |
जो खुनि होइ-भाव यह कि पहले भेदकथनकी यह फलुश्रुति है
कि 'सपनेमें भी मोह न होय! अव दूसरे भेदकथनकी फलभ्रुति कहते हैं कि
अविच्छिन्न अर्थात् अनपायिनी भक्ति हो ! तात्पये यह कि इनके
छदयमें धारण करनेसे हरिकृपा अवश्य होती है और अनपाधिनी भक्ति
हरिक्रपासाध्य है।
द्वितीय प्रसक्ध
ज्ञानदीपक
>> <>8:<22%०७5
सुनहु तात यह अकथ कहानी ।
समुझत बने न जात बखानी ॥
अर्थ-हे तात, यह अकथ कहानी; जो कहते और समझते
नहीं बनती, उसे छुनो ।
खुनहु-इससे शिष्य ( गरुड़जी ) का प्रश्न सूचित किया ।
ज्ञानदिं भगतिहिं अंतर केता । सकर कहहु प्रभु कृपानिकेता ॥
तात-से भ्ुश्ुण्डिजीने शिष्यपर प्रेम दिखलाया )
यह अकथ-से भक्तिके साधनका सुकथ होना दरसाया )
यथा--
भगतिके साधन कहां बखानी | सुगम पंथ मोहि पायें प्रनी ॥
कद्दानी-से '(अजातवाद' दिखलाया कि हम जो कुछ कहते हैं सो
शतपश्च चौपाई ४६
कहानी है। कहानी सत्य नहीं होती। अतः यद्द भी पारमार्थिक% सत्य
नहीं है । सत्य तो एकमात्र निर्विशेष ब्रक्मकी स्थिति है। जिस प्रकार
शबदके कमी क्ष नहीं हुआ; आकाश कुसुम नहीं हुआ; वन्ध्याकों पुत्र
नहीं हुआ, उसी ग्रकार यह सब कुछ भी कभी हुआ ही नहीं, फिर
किसका बन्ध और किसका मोक्ष ? जो दिखायी पड़ता है सो श्रम हे ।
उस तहामें अंश-अंशी-मेद न है और न हो सकता है। माया भर
उसके प्रपश्चका उसमें स्पश भी नहीं है | यथा--
(१) अनध अद्देत अनवद्य जव्यक्त अज
अमित्त अविकार जआानंदसिंधो ॥
( विनयप० )
( २ ) राम सचिदानंद दिनेसा | नहि तहईँ भोहनिसा छवलेसा ॥|
सहज प्रकासरूप भगवाना । नहिं तहूँ पुनि विज्ञान बिहाना ॥
हरप विपाद ज्ञान अक्षाना । जीव धर्म जहमिति अमिसाना ॥
(३ )यन्र हरि तत्र नहिं भेद माया॥
( विनयप० )
(४ ) जग नभ वाटिका रही है फल फूलि रे,
घूजों कैसों धोरदर देखि तू न भूकिरे॥।
( विनयप० )
शिष्यकों संसार और बन्धकी प्रतीति होती है । उसे इस प्रपदञ्चके
समझने और इससे मुक्ति-छाभ करनेके लिये जिज्ञासा है, अतएव गुरुडसकी
इृष्टिके अनुसार, उसको समझानेके लिये निष्प्पश्चमें पहले प्रपद्चका अध्यारोप
करते हैं और फिर अपश्वका अपवाद करके यथार्थ खरूपका उपदेश करते
हैं, अतएव यह अध्यारोप-अपवादका उपदेश भी शिष्यके लिये ही है ।
जिज्ञासाके पूर्वके साधनचत्तुष्य सब इसी ग्रकास्के ही हैं । अतए्व
# सत्य दो प्रकारका होता दै--( १) पारमार्थिक और (२)
व्यावहारिक । पारमार्थिक मिथ्या ही व्यावद्यारिक सत्य है ।
छ७ ज्ानदीपक
इस मसिथ्या कथाकों कहानी कहा | परन्तु इस कहानी सुननेचालेको
सिद्धान्त-ज्ञान होता है; क्योंकि कहानीकी समासिपर कहेंगे कि कहे
ज्ञान-सिद्धांत छुझाई |? अतः साधनचत॒ष्टयसे ममता-मलके नष्ट होनेपर
ही इस कहानीके कहनेका भी विधान है; यह कहानी यदि “ममता-रत” से
कही जायगी, तो ऊसरमें बीज बोनेकी भांति व्यर्थ होगी, यथा--
पस्मतारत सन क्लान कहानी ॥?
'ऊसर बीज बए फरू जथा ॥7
समुझत बने न-समझते नहों बनता । भाव यह कि निगुंण ब्रह्म
और शुणमयी मायाके संयोग-वियोगका इसमें वर्णन है। निर्शुण ब्रह्म
ज्ञेय नहीं है, जाना वही जा सकता है जो शेय हो, स्वयं द्रश केसे जाना
जाय ? और द्रष्टा ही त्रह्म है; अतएवं वह नहीं जाना जा सकता, यथा--
जगपेखन तुम देखनहारे । विधि-हरि-संभु नचावनहारे ॥
त्तेड न जानहिं मरभ तुम्हारा । और तुमद्दटि को जाननिद्दारा॥
माया भी नहीं जानी जा सकती, वह तो अघटनघटनापटीयसी
है, जो हों न सके उसीकों कर दिखाना मायाका काम है) यथा--
जो भाया सब जगदि नचावा । जासु चरित्त ऊखि काहु न पावा ॥
और संयोग-वियोग ब्रह्ममें बनता नहीं, यथा--“सपनेहु जोंग
वियोग न जाके? अतएवय यदि समझते बने तभी आश्रय है ।
न जात वखानी-बखानते भी नहीं बनता । भाव यह कि उसको
कहनेके लिये उपयुक्त शब्द ही नहीं मिलते; यथा--
केसव ! कहि न जाट्ट का कहिये ।
देखत तव रचना विचित्र हरि ससुझि मनहिं सन रहिये ॥
सूनन््य भीतिपर चित्र, रंग नहिं, तनु विनु लिखा चितेरे।
धघोये मिरह् न भरइ भमींति, हुख पाहय यहि तलु हेरे प
शतपश्च चौपाई छ्८
को कद सत्य झूठ कद्ट कोऊ जुगल प्रबल कोड माने ।
चुलसिदास परिहरे तीनि असम सो आपन पहिचाने ॥#
' ( विनयप० )
परन्तु वेदान्तके वाक्योंकों गुरू-मुखद्वारा सनते-सनते अनुभव हो
सकता है| यथा---
“बिज्ु शुरू होह कि छान ।?
्अनुभवगम्य भजहिं जेद्धि संता ।?
इस चौपाईसे “नित्यानित्यवस्तुविवेक!' रूपी अथम साधन
बतलाया गया |
इंखर अंस जीव अबिनासी ।
चेतन अमरू सहज सखुखरासी ॥१५ शा
अथ-चेतन, अमछ, सहज खुखराशि जीव इश्वरका
अंश है।
इश्चर-ईश्वर और बक्षर्म अवस्थामेदमात्र है; वस्त॒भेद नहीं है ।
ब्रह्मकी कोई अवस्था न होनेके कारण, जाग्रत्, स्वर्त और सुघुसिकी
अपेक्षा उसे त॒रीय ( चौथा ) कहते हैं, और उस अपेक्षाकों भी छोड़कर
उसे तुरीयातीत था केवल तुरीय कहते हैं । यथा--त॒ुरीयमेव केवलम?
वह्दी श्रकह्न जब जगतके प्रकाशकरूप अर्थात् भायापतिके रूपसे देखे जाते
हैं , तब ईश्वर कहलाते हैं | यथा--
जगत शअकास्य प्रकासक श्र । सायाधीस ज्ञानगुनधामू ॥
अंख-उस मायापति ईश्वस्का अंश । कहनेका भाव यह कि ब्रह्म और
मायाकों लेकर ही सब प्रपद्च है। पूर्ण बह्मका खण्ड नहीं होता | यथा---
'जद्यपि एक अखंड अनंता |! फिर भी मलिनिसत्त्वा माया ( अज्ञान )
द्वारा उसके अंशकी कब्पना दोती है, जिसे कूट्स्थ या साक्षी कहते हैं ।
४०, शानदीपक
साक्षी कूटस्थ मी ब्रह्म ही है, यथा--“प्रकृतिपार प्रभु सब उरबासी परन्तु
जेंसे महाकाश और घटाकाशमे कल्पित भेद है, वैसे ही यहाँ भी कल्पित
भेद है | यथा-“म्रुघा भेद जच्पि कृतमाया ? अभिप्राय यह कि तूलछा-
विद्याका आश्रय साक्षी कूट्स है और मूलछाविद्याका आश्रय साक्षी
ब्रह्म है। प्रत्येक व्यक्तिमें तूलाविद्या मिन्न-मिन्न है और समश्टिभूता
मूलाविद्या एक ही है। वूलाधियाके भेदसे उसके साक्षी-कूटस्थमें भेद
माना जाता है। इसीलिये गोस्वामीजीने “राम! से ब्रह्म, ईश्वर और
कूठस्थ तीनोंका प्रहण किया है, क्योंकि एक ही तीन भॉतिसे प्रकाशित
होता है ।
जीच-मलिनसत्त्वा मायामें जब ब्रह्मका प्रतिविम्ब पड़ता है; तो
सच्त्वके माल्न्यसे अनन्त प्रतिविम्ब हो जाते हैं और उन प्रतिविम्बोंकी
वह मलिनसत्त्वा माया ही देह हों जाती है। वही देह कारणशरीर
कहलाती है और उसका अमिमानी जीव प्राश्ष कहलाता है। मलिन-
सच्वा-माया; वूछाविया, अशान;, अहंकार, कारणशरीर और नाम-
रूपात्मिका ये सव पर्यायवाची शब्द हैं | गोस्वामीजीने जीवकी मेले
पानीसे उपमसा दी है । यथा--
भसूसि परत भा डाबर पानी । जिमि जीवहिं माया छपटानी ॥
परबस जीव खबस भगवंता | जीव अनेक एक ओकंता ॥
अबिनासी-अर्थात् जिस भाँति ईश्वर सद्रप, अविनाशी है, उसी
भाँति जीव भी अविनाशी है; सद्रुप है । यथा--
'जोच नित्य (तैं केद्टि ऊगि रोवा )!
चेतन-अर्थात् जड़से सम्बन्ध होनेपर भी प्रश्ानधन है; यथा---
निज सहज अनुभवरूप ( तव खलू भूलि धों आयो कहाँ )।
अमरछ-यानी निर्संछ, इससे यह दिखतल्यया कि अभीतक ( सुषुप्ति-
तक ) जीव ममतारूपी मलसे रहित है । गोस्वामीजीने ममताकों मल
माना है; यथा--ममतासल जरि जाय
छ
शतपश चौपाई छू
सहज खुखरासी-अर्थात् कारणशरीराभिमानी होनेपर भी आनन्द-
भोक्ता है । इसीसे कारणशरीरकों आनन्दमय कोष कहते हैं । उसकी
अवस्था सुषुप्ति है, यथा--“अब सुख सोवत सोच नहिं |
सो मायाबस भयेउ गोसाईं ।
बँध्यो कीर मरकटकी नाईं॥
अर्थे-वह प्रभु मायाके वश हो गया और शुक ( झुग्गे )
तथा बन्द्रकी भाँति बेच गया ।!
स्लो गोखाई-वह प्रश्लु । प्रभुके अर्थमें 'मोस्वामी? शब्द रामचरित-
मानसमें व्यवद्धत है; यथा--
स्वामि गोसाएँहिं सरिस गोसाईँ। मोहि समान में स्वामि दोहाई ॥
सो गोसाएँ जेहि विधिगति छेकी | इत्यादि---
प्रभु ( कत्तुमकर्चूसन््यथाक्त, समर्थ: ) है, पर इस दशशाकों प्राप्त
हो गया | यथा---
निष्काज राज विहाय चुप हृव सपन-कारागसुष्द परयों ।
( विनय० )
ईंश्वरने तो केवछ जगत्कों उत्पन्न किया, वह उसका भोक्ता नहीं
है | भोक्ता तो जीव है, इसलिये जीवको प्रभु कहा । भोगकी कल्पना
जीवकी है । उसीने जाग्रत्से छेकर मोक्षतक संसारकी कल्पना की है |
माया-सत््व, रज और तमकी साम्यावस्थाकों प्रकृति कहते हैं;
ईश्वरकी यही शक्ति माया कहछाती है, यथा--“सो हरि माया सब शुन-
खानी ।!! अहसे प्रथक् मायाकी सत्ता नहीं है, इसलिये उसे सत् नहीं
कह सकते, परन्तु उससे प्रथक मायाका कार्य दृष्टिगोचर होता है, इसलिये
उसे असत् मी नहीं कह सकते, अतएवं माया अनिर्वचनीया है । ऋरह्मसे
प्र ' झनदीपक
यह सर्वथा विलक्षण है। ब्रह्म सच्चिदानन्द है और माया मिथ्या, जड़
एवं डुशखरूपा है। मिथ्या, यथा--/समुझे मिथ्या सोपि जड़ यथा--
“जास सत्वताते जड़ माया ।? दुःखरूपा, यथा--एक दुष्ट अतिसय
चुखरूपा ।! जिस प्रकार व्यवहारमें सत्यसे मिथ्या विलक्षण होते हुए भी;
सत्यके आधारपर स्थिर रहता है, सत्यके वछसे प्रकाशित रहता है और
सत्यक्रे ज्ञानसे बाधित होंता है, वेसे ही पारमार्थिक मिथ्या (माया) भी
पारमार्थिक सत्व (ब्रह्म ) के आश्रित, अहसे प्रकाशित तथा त्रह्मसे
विलक्षण है और ब्रह्मशानसे ही उसका बाघ होता है। यथा--
झूठ्हु सत्य जाहि विन्ु जाने | जिसि भ्रुजंग विन्न रझ पहद्धिचाने ॥
जेहि जाने जग जाह हेराई। जागे जथा सपन भ्रम जाई ॥
तीनों गुणोंका यह खमाव है कि वे एक दूसरेकों छोड़कर भी नहीं
रह सकते, और एक दूसरेकों दवाया भी करते हैं) अतः शुणोके
तारतम्बसे मायाके भी अनेक भेद हैं, जिनमें दो अघान हैं | ( १) झुद्ध-
सत्त्वा माया।--जिसमें रज और तमका लेशमान्र है, जो विद्या कदृलाती
है। और जो जयत्की रचना करनेमें समर्थ है, और ( २) मलिन-
सत्ता माया; जो अविद्या कहछाती है और जीवके वन्धनका कारण
है । यथा--
पेहिकर भेद सुनौ तुम दोऊ। बिद्य। अपर अविद्या दोऊ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेंद्वि बस जांच परा भवदृूपा ॥
एक रचइ जग गुन वस जाके। अभु प्रेरित नहिं निज वछ ताके ॥
चस भयेउड-मायाके वद्में हो गया। अघटन-घटना-पटीयसी
मायाकी यह करामात है कि वह छायाद्वारा विम्बकी वश्ीभूत कर
लेती है। यथा--
“भकरि माया नभके खश गहडईे ।?
“है छाँह सक सो न उड़ाई॥?
अतः कूटस्थ, वूला-मावा और प्रतिविम्ब तीनों मिलकर जीव हुए;
शतपश्न चौपाई ण्र्
अब माया जो-जों और जैसा-जैसा नाच नचाती है, जीव वह और चैसा
ही नाच नाचता है। यथा--
पेखा जीव नचावे जादी !!
पाचत ही निसि दिवस मरधौं ।
तबद्दीते न भयो हरि थिर जबतें जिद नाम धरपों”
चैंध्यो--अर्थौत् कूटसथ प्रतिविम्बद्यारा मायासे बेंघ-सा गया, जेसे
घटाकाश जल्ञकाशद्वारा जलसे बंघ जाता हँ। जिस प्रकार प्रतिविम्ब
जलके दोषेसि दूषित होता है, चश्चल होनेसे चख्लछ होता हैं। उछलनेसे
छछलता है, गिरनेसे गिरता है, दौड़नेसे दौड़ता है, निदान जलसे
बँंघ जाता है, उसी प्रकार जीव भी मायासे बेंध-सा गया। परन्ठ जड़का
उदाहरण देनेसे किसीको जीवके प्रति जड़का सन्देद्द न हों तथा यह
शंका न हो कि अज्ञान कोई रस्सी तो नहीं है जिससे कोई बाधा जा सके;
इसलिये कहा है कि---
बँध्यो कीर मरकटकी नाई ॥
कौरकी नाई--उम्गेकी भाँति बंघ गया । भाव यह कि बद्देलिया
दो तिल्ियों गाड़कर उनके सिरपर एक तौसरी तिल्ली बाँघ देता है और
उस तीसरी तिलीमें वॉसकी नली पहिना देता है, नीचे दाने रख देता
है। सुग्गोका स्माव ऊंचेपर बैठनेका होता है। अतएव जब वह
नलीपर बैठकर दाना लेनेके लिये झकता है तब नली घूम जाती है;
और सुग्गा उलटा छठकने लगता है। अज्ञानसे भयवश उसे छोड़ता नहीं;
अन्तमें बहेलिया आकर उसे पकड़ छेता है। विचार करनेपर मालूम
होगा कि यहाँ सुग्गोंको अज्ञानके सिवा कोई दूसरा बन्धन नहीं है ।
किसी महात्माने सुग्गोकी यह दुदंशा देखकर एक सुग्गा पाला
और वह उसे पढ़ाने रंगे-'देखों ! सुग्गा ! दारनोका छोम करके नलीपर
न बैठना और यदि बैठना तो उसके घूमनेपर निडर होकर उसे छोड़
देना ।? जब सुग्गा पढ़कर पण्डित हों गया तो उसे छोड़ दिया। उस
ण्र् ज्ञानदी पक
सुग्गेका वाक्य सुनकर दूसरे छुग्गे भी बैसे ही बोंछने रंगे। महात्मा
बड़े प्रसन्न हुए कि सभी सुग्गोंका भय निवृत्त हो गया | परन्ठ उनके
आश्रर्यका कोई ठिकाना नहीं रहा, जब कि उन्होंने एक संग्गेकों उसी
प्रकार उछया लठके हुए यह पढ़ते पाया कि 'देखों झुंग्गा ! दानोंका
लोभ न करना? इत्यादि । व्यवहारकालमें ( वाचक शानी ) पण्डितोंकी
भी खिति मूर्खा-सी देखी जाती है | अतएव पण्डितोंका अशान-बन्धन
दिखलानेके लिये 'कीरकी नाई? कहा ।
मरकटकी नाई--वानर भी ऐसे ही बंघता है? उसका हाथ
जाने लायक छेदवाली कुल्हिया दानोंसे भरकर जमीनमें गाड़ दी
जाती है। वानर उसमें हाथ डालकर मुद्ठीमें दाने पक्रड़ लेता है।
जब मुद्दी उसमैंसे नहीं निकलती तब वह वंघ जाता हैं। लोभसे,
अज्ञानसे यह मुद्दी नहीं छोड़ता | अतः वह भी अश्नसे ही बंधा है।
यह मूख होनेसे 'सुग्गा पण्डित! की भाँति मोक्ष-शासत्रका पाठ करते हुए;
बद्ध नहीं है | मूर्लका बन्धन दिखलानेके लिये 'मरकटकी नाई? कहा !
इसी तरह जीव अज्ञान-वन्धनसे बँधा हुआ है, हज़ार प्रयत्न करने-
पर भी नहीं छूठता ।
जड़ चेतनहिं ग्रंथि परि गई।
जद॒पि सपा छूटत कठिनई ॥१७॥
अर्थ-जड़-चेतनमें गाँठ पड़ गयी, चह यद्यपि झूडी है, पर
( उसका ) छूटना कठिन है ।
जड़ चेतनहिं--जड़-चेतन दोनों विद खमाववाले पदार्थ हैं |
एक अन्धकार है; तो दूसरा प्रकाश है। एक विषय है; तो दूसरा
विषयी है । एक मिथ्या है तो दूसरा सत्य है। इन दोनोंमेंसे एकका
दूसरेमें अध्यास (भ्रम) होना अथवा एकके घ्मका दूसरे अध्यास होना
मिथ्या है । यथा--
शतपशञ्च चौपाई 5ड
छिति अर पावक शगन समीरा | पंचरचित यह अधम सरीरा 0
प्रगट सो तलु तब जागे सोझा। जीव नित्य तें केष्टि छगि रोआ ॥
अंथि परि गई--गौंठ पड़ गयी अर्थात् तादात्म्य हो गया । जड़में
चैतनका अध्यास होने छगा और चेंतनमें जड़का । इस गॉठकों किसीने
बाँधा नहीं है। अनादिकालसे पड़ी हुईं है। शिष्यकों समझानेंके
सुमीतेके छिये 'पड़ गयी? कहा | कारणशरीरमें जो चेतनका अध्यास
हुआ वहीं प्रतिविम्ब है; वही गाँठ है | यथा--
रजत सीप महँ भास जिमि, जथा भाजुकर बारि।
जद्पि रूपा तिहुँ कारूमहैं, जम न सकईट कोड टारि ॥
एट्दि विधि जग दरि आश्रित रहई ॥
जदूपि झुषा--यर्याप गाँठ शड़ी है, भ्रममात्र है। सायाके साथ
असंग कूटथ्का सम्बन्ध कैसा ! घटाकाशका जल्से सम्बन्ध केवल
अ्रमसे सिद्ध है | यथा--
जद॒पि असत्त्य देत घुस जहई |
छूठत कठिंनई--छूटना कठिन है। किसीका हटाया यह अध्यास
नहीं हटता। क्या लोकका; क्या वेदका, सत्र व्यवहार इसी अध्यासपर
टिका है। यथा---
कम कि होह सरूपाई चीन््हे।
३... भू
तबते जीव सयऊ संसारी |
ग्रंथि न छूट न होइ खुखारी ॥
अरथे--जवसे जीच संखारी हो गया; तबसले न तो गाँठ
छटती है और न यह सुखी ही होता है ।
तबते--अथांत् कालका कोई नियम नहीं है, अनादि अन्ध-
परूपरासे । अनादिकाल्से संसार ऐसा ही चलछा आता है। इसीको
अविच्ा-निद्या कहते हैं | इसीमें खल्पाच्ान अर्थाद् ठुपर॒प्ति होती है।
इस अवस्थाके विभु ईश्वर है। अपरिच्छिन्न तथा अठंग होनेसे विरूमें
अहंकासक्ी गाौँठ नहीं होती; परिच्छिन्ष और उंगी होनेते जीवमें
अह्कारकी गाँठ है। इसी गाँठमें आवरण औरर विक्लेपल्पी निद्रा है।
सोह निसा सद सोवनिहारा । देखहि सपन जबनेक अकारा ॥
जाकर चारि ऊछाख चोरासी । जोनिन अनत जीव लविभासी ॥
पिरत सदा साथा कर पेंरा । कार करम सुभाव गुन घेरा ॥
इसी सुउुम्तिते चूर्तोक्नी उत्तति, स्थिति और लय होता है । कारण-
देइ-आत ईश्वरंझके मोगके लिये ईखरेच्छासे तमःप्रधान अकृतिमें (१ )
आकाश (२ ) वायु (३ ) तेन (४) ज5ऊ जौर (५) प्रध्वीतत्त्त
उत्पन्न हुए, विनके सच्चांगसे क्रमशः पदश्च ज्ञानेन्द्रियोँ और मिलकर
अन्तःकरण तथा रजांदसे क्रमशः पदश्च कर्मेन्द्रयों और मिलकर प्राण
उतच्नन्न हुए । बथा--
१ «४
गंगन समीर जनक जल धरनी । इनकर नाथ सहज जड़े करनों ॥
लत प्रेरित साथा उपदायें। चुष्टि हेतु सब अंयनि गाये ॥
विपय करन सुर जीव समेता ॥
इन पाँचों ठत्त्वोंसे जो दारीर व्ना वही लिह्नदेह हैं। ग्रहोँसे संसार
अद्लुरित हो गया; जो कि स्थृच्यवखानें पछवित और घुब्यित होगा।
इस लिल्नदेहामिमानीका नाम तैजस हैं और इसके विश्यु दिस्प्ययर्म हैं ।
इस तैजसके मोयके छिये भगवानने पद्चतत्तोंका पश्चीकरण कस्के स्थूछ
€ ऋषित० )
शतपश्च चौपाई दर
सोलह आनेमेंसे आठ आने एक तच््वविद्येषको लेकर उसमें दोन्दो
आने शेष चार तच्वौकों मिछाकर; उस तच्व-विश्येपकों स्थूल रूप दिया |
यही पश्लीकरण है। जब तैजस स्थूल देहका अभिमानी दोता है तब उसे
विश्व कहते हैं इसकी जाग्रत् अवस्था ऐ और विराट विश्वु 9ैँ । यया--
जजु जीव उर चारिड अवस्था बिभ्लुन्द सहित बिराजद्दी ।
प्रतिविम्ब चाददे किसी अवस्थाकों पहुँचे, पर चिम्बसे उसका साथ
नहीं छूटता। यथा--त्रष्म जीव इव सद्दज सँघाती ।? अवस्थाभेदके
सम्बन्धसे चिम्बमें भी भेदकी कल्पना होती है। सुपु्ति, स्वत और
जाग्रतके भेदसे जीव ऋ्रमसे प्राश, तैजल और विश्व हुभा । उसी भाँति
तुरीय ब्रष्य भी ईश्वर, हिरण्यगर्म और विराद कहलाये । ऐसा संसारका
रूप अनादिकालसे चला आता है, केवछ समझानेके लिये 'तबते? कहते
हैं | यथा---
विधि प्रपंच अस अचल अनादी ।
ज्ञीव सयड संसारी--जीव अपने सहज स॒माव सच्चिदानन्दरूपकों
छोड़कर ईश्वरांदाके ऐ/धर्यको खोकर संसारी हुआ, देहबाला हुआ ।
अब ( १ ) लिज्ञदेह (२) लिज्नदेहमें स्थित चिच्छावा और (३ )
अधिष्ठान चैतन्य, तीनों मिछ्कर जीव कहल्यये | इस प्रकार त्तीन प्रफारके
जीव हुए। (१) पाससार्थिक (२) प्रातिमासिक और (३)
व्यावहारिक | पारमार्थिक जीव कूथ्स्प है और प्रात्तिमासिक जीव चित्-
जड़की ग्रन्थिवालछा प्रतिविम्ध है और व्यावहारिक जीच लिझ्लदेहवाला है।
इसी तीसरेकों संसारी कहा । इसीका लछोकपरलोकर्म आना-जाना लगा
रहता है। स्थूछ-शरीर छूटता रहता है, पर यह लिज्लशरीर नहीं
छूटता । यथा--
कौन जोनि जनमेउ जहाँ भाहीं । में खगेंस भ्रसि श्रसि जग साहीं ॥
ऐ अंथि न छूट न होइ खुखारी--न जढ़-चेतनवाली अज्ञामकी
गॉँठ छूटती है और न जीव सुखी होता है। अज्ञानवाली गॉँठ च्चूटे
७ * झानदीप्रक
बिना सहज-खरूपकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। किसी
प्रकार जडञ-चेतनकी गांठ छूटनी चाहिये | यथा---
तुलूसिद्ास "मैं? 'मोर” गये बिचु जिव सुख कचहूँ कि पाचे
तीनों चौपाइवोंमें सर्वप्रथम साधन मुमुक्ष॒ुत्वका वर्णन किया ।
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई।
छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥१५॥
अर्थ--वेद-पुराणोंने चहुत-ले उपाय वतछायें हैं, पर गाँठ
डउलझती ही जाती है, छूटती नहीं ।
श्रुति पुरान-अर्थात् वेद-पुराणसे बढ़कर कोई प्रमाण नहीं, यथा-
( मारुत खास ) निगम निजवानी। तथापि ये भी जड़-चेतनके अध्यास-
पूर्वक ही प्रहच होते हैं | अतणव अविद्यावाले ही हैं, पर प्रन्थिमेदका
उपाय बतलानेमें भी यही समर्थ हैं ।
तस पूजा चाहिय जस देवता ॥
चहु कद्ठेड उपाई-बहुत-से उपाय वेद-पुराणोंने बतलाये हैं।
जप; तप; श्रत, यज्ञ) दानादि अनेक साधन जो बतछाये गये हैं वे
सब जीवके कल्याणके लिये ही हैं | यथा--
घप तीरथ उपवास दान सपष जो जेंहि रुचे करो सो।
पायेद्ि पर जानियो करमफलछ भरि भरि बेद परोसो॥
जागम ब्रिधि जप जोग करत नर सरत न काज खरो सो ॥
अधिर अधिक अरु्झाई-अधिक-अधिक उल्झनेका कारण यह
है कि--
जज अहेत अगुन हृदयेसा॥
अकल अनोह जनास अरूपा | अनुमव-गम्य अखंड अनूपा ॥
“का कर्मकाण्डमें उपयोग नहीं है। और वाह्मधर्म, देहधर्म, इन्द्रियधर्म
शतपश्च चौपाई ण्ट
भर अन्त/करण-घर्म-सम्बन्धी मिधि-निषेध कदकर ही कर्मकथाका
उपदेश है।
(१) बाह्मघर्म, यथा---
पूजहु आमदेव सुर नाया। को बहोरि देन बलि भागा ॥
(२ ) देहधर्म, यथा--
करहु जादू त्प सेलकुमारी ।
( ३ ) इन्द्रियर्म, यथा---
काटिय तासु जीह जो वलाई | श्रवन मुद्दि न तु चलिय पराई ॥
(४ ) अन्तम्करण-घर्म, यथा---
सनहु न आनिय अजमरपति रघुपति भगत अकाज्ञ ।
इन विधियोंके पालनमें धर्म है। स्वर्ग है, पर कर्मसन्तति बढ़ती हीं
जाती है | बिना अध्यासकी दृढ़ता बढ़ाये कोई धर्म नहीं हो सकता !
अतः वाह्मपदार्थ, देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणमें अध्यार्सोंकी उलक्षन
बढ़ती ही जाती हैं, यथा--“मर कि जाहि मल्हीके धोये ।?
छूट न-चित््जड़-अन्यथि नहीं छूटती | कारण यह कि साधन-
चतुष्टयकें बिना तत्व-विवेकका अधिकार नहीं होता । अतः जिसने
साधन नहीं किया उसे शात्रके पाण्डित्यसे मी शान नहीं होता, वथा---
वाक्य ज्ञान जर्त्यंत मिपुन भवपार कि पावे कोई ।
लिसि शृद्द साक्ष दोपके बातनिह तस निदृत्त नहिं होह।
( विनय ० )
( १ ) नित्यानित्य-वस्तु-विवेक ( २) इहछोंक और परलोकके
विषयभोगसे विराम ( ३ ) पद-साधन-सम्पत्ति और ( ४ ) मुमुझुत्व ये
चार साधन हैं और शम, दम, उपरति, तितिक्षा; श्रद्धा और समाधान
ये घद्सम्पत्तियाँ हैं, इन सबका वर्णन यथास्थान किया जायगा |
ण्ष्् छानदीपक
इस गकार साधन-चत॒ष्टय-सम्पन्न अधिकारी जब गुरुवेदान्त-वाक्य-
जन्य शानसे ग्रन्थि-मेद करना चाहे तभी सम्मव है | नहीं तो--
सुनिय गुनिय समुझिय समुझाधय दसा हृदय नहिं जावे ।
जेद्दि अनुभव विनु मोहजनित दारुन भव विपति सतावये ॥
केवल शाल्रचर्चा या यों कहिये कि अनधिकार चर्चासे गाँठ
नहीं छूटती ।
जीव हृदय तम मोह बिसेषी ।
ग्रंथि छूट किमि परे न देखी ॥
अर्थ-जीवके हृदयमें चिशेप मोहान्धकार है, इससे दिखायी
दी नहीं पड़ता, फिर गाँठ तो कैसे छूटे !
जीव हृद्य-यहाँ हृदय कहनेंसे स्थूछ देहकी प्राप्ति दिखछायी ।
जीवकी स्थूल देहमें हृदय ही राजप्रासाद है, यथा---
अस प्रश्नु हृदय जछत अविकारी ।
तम मोदद विसलेपी-मोह अविवेककों कहते हैं, उसीको तम अर्थात्
अन्धकार कद्दा गया है, इसीके कारण अध्यास होता है और यही
अध्यासको बढ़ाता है | यथा--
मोह न ऊंध कोन्द्द केद्दि केह्टी ॥
अविद्यानरात्रिम मोह-तमकी प्रवछता होती है। जीव-हृदयपर
अधिदाका अधिकार है, क्योंकि वहीं जड़-चेतन-प्रन्थि पड़ी हुई है ।
अन्धकार तो संसारी होनेके पहले ग्रन्थिमात्रसे दी था, परन्तु अब संसारी
होनेसे अधिक हों गया | यथा--
भस हृदयसवन श्रभ्ु तोरा। तहँ बसे आई वहु चोरा॥
अति कठिन करहिं बरजोरा | सानहिं नहिं बिनय निहोरा ॥
शतपख् चौपाई ६०
त्तम मोह लोभ अ्ँकारा | मद क्रोध बोध रिपु सारा ॥
ऊति करहिं उपद्रव नाथा। मर्दहिं मोधहि जानि जनाथा ॥
मैं एक, अमित बटपारा। कोड खुनद न मोर पुकारा ॥
भागेड नहिं. नाथ उयारा। रघुनायक करहु सैँमारा ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा | तस्कर छटह्ठधिं तव घामा॥ए
चिंता मोहि नाथ अपारा | अपजस जनि होद तुम्दारा ॥
अंथि छूट किमि-गाँठ कैसे छूटे ! छूटना तभी सम्भव है; जब
प्रकाशमें दिखलायी पड़े कि गाँठ कहाँ है और कैसी है! नहीं तो बिना
देखे ही व्योलकर ममताके सूत्रोको इधर-उधर खींचनेसे बन्धन ही दृढ़
होता है | छूटनेकी कहाँ सम्भावना है
परे न देखी-अविद्या-रात्रिमें मोहान्धकफार छाया हुआ है । हृदयके
भीतर और भी घना अन्धकार है| जड़-चेतनकी गाँठ दिखायी ही नहीं
पड़ती । अतएव दीपक जल्णना चाहिये ।
अस संजोग ईस जौ करई।
तबहु कदाचित सो निरुअरई ॥१४॥
अर्थ-यदि ईश्वर ऐसा संयोग वना दे, तो कदालित् वह
गाँठ खुलझ जाय |
अख संजोग-भाव यह कि ऐसा होना क्रिया-साध्य नहीं है !
संयोग जान पड़े तो हो जाय; संयोग ब्ह्माके दाथक्री बात है, मनुष्यकी
सामथ्यसे सर्वथा परे है । यथा--जो त्रिघिवस अस बने सजोगू ।? ऐसा
कहनेका भाव यह कि संयोगोंका सिलसिला बंध जाय । अर्थात् गौ भी
सिछ जाय; चाय भी मिले, दूइनेवाछा; औदनेयाला, दूध उण्डा करने-
वाला, दद्दी मथनेवाल्ा इत्यादि यथेप्सित मिलते ही चले जायें |
ईस जौ करई-अर्थांत् ईश्वर यदि करें। भाव यह कि ऐसा
संयोग विधि मी नहीं कर सकते, वे तो खमके विश्वु हैं, कारणपर उनका
घर ज्ञानदीपक
अधिकार नहीं है, कर्म शुभाद्यम दिया करते हैं, यथा-कर्म सुमासुम
देइ बिधाता ।! और ईश्वर सुपुप्तिके विभु हैं। कारणपर भी उनका
अधिकार है, कर्मकी अपेक्षा न करके भी संयोग कर सकते हैं | अथवा
जीव जिनका अंश् है, जिन्होंने करुणा करके उसे नरदेह दी है, वही चाहे
तो करुणा करके ऐसा संयोग भी कर दें, यथा--
कवहूँ करि करुना नरदेही | देत ईंस विद्व देत सनेही ॥
और वह ईशका किया हुआ संयोग इस प्रकार हो कि सात्विकी
श्रद्धा हरिकी कृपासे हृदयमें बसे, और उस श्रद्धाद्मरा खूब घर्माचरण हो
जिसमें श्रद्धा परिपुष्ट होती जाय और धर्मके साथसे रण और तमक्रे
अमिमूत होनेसे साक्चिक भाव उत्पन्न हो । तब श्रद्धा द्ववीभूत शोती है;
धर्माचरणका सात््विक परिणाम अहिंसा--दया-भावमें प्रकट होता है ।
तब वशीभूत निर्मल मनको श्रद्धाके चरणोंमें छगा दे, और दृढ़ विश्वास
करके अहिंसामें ग्रतिष्ठित हो जाय, प्राणिमात्रकों अमयदान दे | जबंतक
धर्मत्रतधारीके हृदयमें दयाका प्रादुर्भाव नहीं होता, तवतक समझना
चाहिये कि परम घर्मका उदय नहीं हुआ । अहिंसामें प्रतिष्ठित होनेपर
निष्कामतासे अद्दिसागत कामनाके अंश्वको दूर करे | कामनाकै अंशको
दूर करनेंसे जो ताप होता है उसे क्षमाद्वारा तोषसे दूर करे | जब शीतल
निष्काम दयाभाव हो जाय तो उसे घृतिसे ठोस करे | तव उस शीतल
ठोस निष्काम दयाभावक्रा दमपूर्वक ग़ुरुगासत्रोपदेशानुसार विचारसे
सन््यन करे । ( दसपूर्वक इसलिये कहा कि छृदय-दौर्बेल्यकों खान न
मिले, जैसे व्यमिचारी व्यक्तिकी तृप्ति आदि शाल्रविरुद्ध विधयका दयामें
समावेश न हो ), विचार करे कि संसार दुःखसय है | इस जीव इसमें
पड़े हुए छेश उठा रहे हैं, इस दुःखकी अत्यन्त निशृत्ति केसे हो
इत्यादि | इन विचारोंसे साधक जिस निमश्चयपर पहुँचेगा, वही वैराग्य
है | उस निश्चयका यह रूप होगा कि “ये विषय अनित्य हैं, दुगःखकी
योनि हैं, चाहे ये इस छोकके हों चाहे परछोंकके ।! और फिर उनसे
शतपश्च चौपाई चर
अपने-आप जी हटेगा । जब चित्तमें विराग आ जायगा तब बह
विधयोंकों छोड़ सकेगा, और तब उसे योगका अधिकार होगा |
चितद्ृत्तिका निरोध योग है| वेराग्यसे चित्तइत्तिनिरोधकी योग्यता
प्राप्त होती है, परन्तु शुभाशुभ कर्मसे सम्बन्ध त्याग किये बिना निरोध
नहों हो सकता । चुद्धिद्दारा झुमाशुभ कर्म-सम्बन्ध त्यागते ही चित्त
निरुद्ध दोता है। ममता नष्ट होती है, तब सत् वस्तु॒में चित्त एकाग्र
होता है । 'तत्” पदका ज्ञान अर्थात् परोक्षज्ञान होता है । तब विज्ञान-
रूपिणी ( उपनिषद्-जन्य ) बुद्धि उत अपरोक्षशानको चित्तमें जमाकर
समता स्थापन करती है । अब (त्वं” पदार्थका झोघन छोष है | अतः
इस प्रकारका परोक्षशानी ध्यानमें स्थित होंकर अपनेकों स्थूछ, सक्षम;
कारण तीनों शरीरोंसे पृथक भावना करके, अर्थात् त्व! पदार्थका
शोधन करके तुरीयावस्थाको प्राप्त होता है | फिर तु॒रीयावस्थाके संस्कारों-
को एकीमूत करके परोक्ष-ज्ञानमें मिला देता है | यह “असि? पद है।
और तव शब्दानुविद्ध समाधिमें स्थित होनेसे आत्मानुमव प्रकाश उत्पन्न
होता है, और वह 'सोडहमस्मि! चइत्तिवाछा अपरोक्ष होता है। यह
मोहान्धकारकों मिटा देता है। परन्तु अभी चित्-जड़-पन्थि बनी हुई
है । विज्ञानरूपिणी बुद्धि इस प्रकार अन्थि-मेदन कर सकती है। यदि
ग्रन्थि-मेदन हो गया तो अध्यास सदाके लिये मिथ गया और सहज-
स्वरूप कैवल्यकी प्राप्ति हुई | यही परमपद है । इसी बातकों दीपकके
रूपकमें सुलमताके लिये विशद्रूपसें वर्णन किया जायगा |
तबहु कदाचित-माव यह कि ईशके ऐसा संयोग कर देनेपर भी
कार्य-सिद्धिमं बहुत सन्देह है | क्योंकि साधन बहुत कठिन है और
संसारी जीव रोगी हैं | रोगीकी क्या सामर्थ्य जो कठिन साधनका
सासना कर सके । यथा---
मोह सकक व्याधिनकर मछा । तेहिते घुनि उपजें बहु सूछा ॥
यदि विधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरव सय प्रीत्ति बियोगी ४
द्३े ज्ञानदीपक
एक व्याधिवस नर मर, ए असाध्य बहु व्याधि।
संतत पीडहि' जीव कहेँ, सो किमि रद्द समाधि ॥
और दूसरी वात यह है कि “अक्वतोपास्ि-ज्ञान' जिसमें भक्तिकी
सहायता नहीं है, सिद्ध नहीं होता, यथा---
जे क्लानमान विमतच तव भयहरनि सगति न आदरी।
से पाह सुरहुर्लन पदादपि परत हम देखत हरी ॥
सो--वबह चित्त ( अस्ति; भाति; प्रिय ) और जड़ ( मामरूप )
की गांठ ।
निरुअरई-अर्थात् वह गाँठ सुछझे । अस्ति ( सत् ), भाति
( चित् ) और प्रिय ( आनन्द ) ये तीन अंश ब्रक्मके, और नाम और
रूप) दो अंश मायाके, इन्हीं पॉँचॉने उल्झकर प्रपश्चकी गाँठ बना
खखी है, और इन्हींके उठ्झनपर उलझन पड़नेसे संसार बना हुआ है,
सो सुल्झ जाय ! अर्थात् तीन अंश ब्रह्मके प्रथक् और ( नाम-रूप ) दो
अंग मायाके प्रथक हो जाये । गॉठके अधेरेमें होनेके कारण प्रकाशके
लिये दीपका संकल्प हुआ | दीपके साधनमें, ठदृरनेमें, ऐंसा विज्न-
वाहुल्य है कि संयोग अनुकूल होनेपर भी कहना पड़ा कि कदाचित् ही
वह सुलछ्झ सके | यथा---
साधव ! भमोहफाँस क्यों दृटे ?
थाहिर कोटि उपाय करिय अभ्यंतर अंथि न छूटे ॥
घृत-पूरन कराह अंतरगत ससि-प्रतिबिम्ब दिखावे।)
इँघन जनक छगाय कऊपसत औटत नास न पाते ॥
त्तरुकोटर भहँ वस विंग तरू काटे मरे न जैसे ।
साधन करिअ विचारहीन मन सुद्ध होट्ट नहिं तेसे !
अंतर मलिन विपय भन अति तनु पाचन करिय पखारे ।
सरइ न उरग अनेक जतन वलमीकि विविध विधि सारे ॥
शतपञथ्च चौपाई दे
तुलसिदास हरि-गुरु-करुना विजु बिमझ विवेक न होई।
बिहु विबेक संसार-घोर-निधि पार न पाये कोई ॥
सात्विक श्रद्धा घेनु सोहाई।
जो हरिकृपा हृदय बसि आई ॥
अर्थ-सार्विकी अ्रद्धा वियायी हुई अच्छी गो दै। यदि वह
हरिरपाले हृदयमें आकर बसे ।
सात्विक अद्धा-अड्धा तीन प्रकारकी होती है (१) तामसी (२)
राजसी और ( ३ ) सात्त्विकी । यहाँ तामसी एवं राजसी श्रद्धाका उपयोग
नहीं है। यहाँ तो साक््विकी भ्रद्धकी द्वी आवश्यकता है; क्योंकि यह
पुरुष भ्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है वैसा ही यह है, अतएुब
सात्विकी भ्रद्धावाछा पुरुष भी सात्विक होगा ।
घेलु खोदाई--सोहाई व्यायी गो है;माव यह कि राजसिक-तामसिक
श्रद्धा भी गो हैं, पर वे सोहाई नहीं हैं, दूध नहीं देंगी, यथा--
तामस घर्से करहिं नर, तप मप ब्रत जप दान।
छेव न बरसहिं धरनिपर वोए न जामहिं घान ॥
जहु रज स्वहप सच्व कछु तामस | द्वापर हप सोक भय मानस ॥
इहरिक्ृपा--हरि सच्चगुणके अधिष्ठाता हैं। अतएव साक्त्विकी अद्धाकी
प्राप्तिके लिये हरिकी ऊंपाकी आवश्यकता हे ।हर तमोगुणके अधिष्ठाता ह्ँ
सुधुसिके विश हैं; उनकी कृपासे हरिकी कृपा होती है, सुघुत्तिकी कृपासे
जाणति होती है और जाते ही ठुरीयका द्वार है। जब शंकर कृपा करके
तमकों दबावेँंगे; तब सच्तका उदय होगा |
जो हृदय बसि आई-अथौत् जो हरिकी कृपासे हृदयमें आकर
बसे, क्योंकि 'जीव छदय तम मोह बिसेषी -छृदयमें अन्धकार मरा हुआ है।
च््ण जशानदीपक
बछड़े वाली गौ तमोंमय अंधेरी जगहमें जाना नहीं चाहेंगी। (इस चौपाईसें
अद्वौसम्पत्तिका वर्णन किया है | )
जप तप ब्रत जम नियम अपारा।
जे श्रुति कह सुभ धरम अचारा ॥१ण।
अर्थ-जप) तप+ श्रत, यम, नियम और वेद्विद्वित धर्मांचार
येसव अपार हैं। जप, तप, बत; शुभ धर्माचार ये सब उपरामता-
के अंग हैं; यम-नियम दोनों समाधानके अंग हैं।
जप तप त्रत-यहाँ जपसे वाचा, तपसे मनसा और बतसे कर्मणा
शर्मांचण बतछाया है, नहीं तो नियममें तीनोंका समावेश हो जानेसे
पुनर्क्ति दोष आ जायगा । और गोस्वामीजीने यही अर्थ लिया भी है।
जप, यथा-
तुम पुनि रास राम दिन राती । सादर जपहु अनंग अजराती ॥
तप; यथा--
विसरी देह तपहिं मन छागा ॥
(इससे तितिक्षाका वर्णन किया । )
ब्त, यथा--हरितोपन बश्रत ह्विज सेवकाई ॥
यम पॉँच हैं--अ्रह्मचयमदिंसा व सत्यास्तेगापरिगद्दाः ।
(१ )--ब्रह्मचयें--स्मरणादि अष्टचिंघ मैथुनके अभावकों
कहते हैक | यथा--
ब्रह्मचय ब्रत रत मति धीरा । तुमद्धि कि करदह्द मनौभव पौरा ॥
(२) अहिंसा--सदा-सर्वदा किसी भी प्राणीसे द्ोह न रखनेको
कहते हैं, यह सव यम-नियमोंकी जड़ है । यथा-- _
१-यह पद सम्पत्तियोंमेंसे पॉचवीं है ।
२-शीतोष्ण छुख-दुःखादि सहनेको तितिक्षा कहते हैं। यदद पट सम्पत्तियों मेंसे
चौथी है।
* स्मरण कीतेन केकछिः प्रेक्षणं गुद्ममापणम् ।
सह्ूूल्पोध्ध्यवसायश्व क्रियानिद्र तिरिव चच
णज्
आतपश्च चौपाई ध््दे
परस धर्म श्रुति बिदित अहिंसा ।
चरम कि दया सरिस हरियाना ॥
इसीकी सिद्धिके लिये शेष यम-नियमोंका उपयोग है | अहिंसाकी
अतिष्ठा होनेपर उसके सन्निकटमें रहनेवाले प्राणिसात्र चैर त्याग
द्वेते हैं, यथा--
चरहिं एक सेंग गज पंचानन । बैर॑ बिगत बिचरहिं सब कानन 0
(३) सत्य---इन्द्रिय और मनके छारा जेसा निश्चय किया गया;
बैसी ही वाणी और बैसे ही मनके होनेको रुत्य कहते हैं | वह वाणी
बश्विता।; आन्ता। और प्रतिपत्तिवन्ध्या $ नहीं होनी चाहिये । प्राणियोंके-
उपकारके लिये होनी चाहिये, उपघातके लिये नहीं ।
एतन्मैथुनमण्ज्ध अवदन्ति.. मनीपषिण+ ।
विपरीर्त जहामचयेमनुष्ठेयं मुसुक्षुमिः ॥
“ल्लीके रूपछावण्य, ह्वभाव आदिका स्मरण करना, दूसरेंके प्रति कहना,
ल्लीके साथ क्रीढ़ा करना, ल्लीका दर्शन करना, एकान्तमें सम्माषण करना,
स््रीके संगके लिये इढ़ निश्चय करना,उसकी प्राप्तिके ल्यि उयोग करना तथा अमीष्ट
सिश्वयकी पूर्ति करना-श्न आठ प्रकारके आचरणोंसे वचनेको जछ्मचर्य कहते हैं
+ बब्ननापूर्ण, जैसे अपने पुत्र अइ्वत्यामाका मरण सुनकर द्रोणाचार्यने
युधिष्ठिससे पूछा हे जायुष्मन् , हे सत्यवादी, सचमुच अद्व॒ृत्थामा मारा गया ??
इसके उत्तरमें, थुधिष्ठिरका अद्वत्थामा नामक हाथीको अमिलक्ष्यकर, “हाँ, सच
अश्वत्थामा मारा गया।? ऐसा कथन वच्ननापूर्ण है। यही वाणी वश्चिता कही जाती:
है। वक्ताका अभिप्राय जन्य हो और श्रोता अन्य समझ जाय । जैसे यहाँपर
शुधिष्ठिरने द्ाथीको लृक््यकर कहा और द्रोणाचार्यने अपना युत्त समझ लिया । पर
इसको कहनेमें युधिष्ठिरने छलसे काम लिया। इसलिये यह वाक्य सत्य नहीं है ।
[| आ्ञान्तिसयुक्त। वक्ताको खयं अम हो और दूसरेको समझाना चाहे।
$ अप्रसिद्ध पदोके रहनेसे यथार्थ वोध करनलेमें गक्षम। जैसे आवेल्ोगोंके
अति स्लेच्छ भाषा वोध करानेमें मसमथ हैं ।
दछ ज्ञानदीपक
यथा--कह॒हिं सत्य प्रिय बचन विचारी” इससे क्रियाके फलकों
आश्रय मिल्ता है, यथा--
“सत्य मूल सब सुकृत सुहाये |?
(४) अस्तेय--आ्वाखविधिके प्रतिकूछ दूसरेके द्वव्यकों लेना
स्तेय कहलाता है, और उस स्तेयके निषेघकों अस्तेय कहते हैं | स्पृहा
न रखना भी अस्तेय कहलाता हे। यथा--धन पराव बिषते विष
भारी ॥! इससे सब रल उपस्थित होते हैं, यथथा--डारहिं रतन तर्हिं
नर लहदीं ॥?
(०) अपरिश्रद्द-विषयोंक्रे अजन, रक्षण, क्षय और संगसे
हिंसादि दोष होते हैं; अतएव उनके अखीकारकों अपरिग्रह कहते हैं |
यथा---
यद्यपि जर्थ जन सूल तम कप परव पुद्धि छागे।
त्तदपि न तजत मूढ़ ममतावस जागतह्ट नहिं जागे ॥
( विनय० )
इससे जन्मकथनताका बोध होता है, यथा--“निज-निज मुखन
कही निज होनी |?
नियम भी पाँच हैं---
शौचसन्तोपतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि. नियमा$ ।
(१) झ्ौच-देद और मनके मछूकों दूर करमा शौच है | यथा--
सकल सौच करि जाइ अन्हाये ।? शौचकी स्थिरतासे बुद्धिकी शुद्धि, उससे
मनकी प्रसन्नता; उससे एकाग्रता; उससे इन्द्रियजय और उससे आत्म-
दर्शनकी थोग्यता होती है। अपने शरीरसे घृणा और दूसरेके संसर्गसे
घृणा होती है । यथा--रह्हिं न अंतहु अधम सरीरू ।!
(२) सन्तोप-प्रात्त साघनसे अधिक पैदा करनेकी. अनिच्छाकों
सनन््तोष कहते हैं, यथा--“आठवे जथालाभ संतोषा |? इसके द्वारा
सबसे बढ़कर सुखकी ग्राप्ति होती है, यथा--“मन संतोष सुनत कपि
बानी ।?
इझातपश्च चौपाई ६८
(३) तप-जाड़ा-गर्मी, भूख-प्यास आदि इन्द्रके सहनेकी कहते
हैं। यथा--
कछु दिन भोजन बारि बतासा | किये कठिन कछु दिन उपचासा ॥
इससे देह-इन्द्रियकी सिद्धि और अश्जुद्धिका क्षय होता है। यथा--
बरप सदहस दस त्यागेउ स्रोऊ। ठाढ़े रहे एक पणग दोऊ॥ा॥ा
सॉंगहु बर वहु भाँति छोमाये | परम धीर नहिं चलहिं चलाये ॥
(७) खाध्याय-मोक्षशासत्रका पढ़ना अथवा प्रणबका जप करना ।
इससे देवता-ऋषियोंके दशेन होते हैं | यथा---
नाम जपत प्रञ्चु कीन्ह असादू। भगतसिरोसनि से प्रहलादू॥
(५) ईश्वरप्रणिचान-सव कर्मोंकों ईश्वरापंण कर देना, यथा--
“प्रमुहिं समर्पि कर्म भव तरहीं।|? इससे समाधिकी सिद्धि होती है। यथा---
“सहज बिमछ मन छाग समाधी ॥?
अपारा-कहनेका भाव यह है कि इन द्शों थम-नियमेमेंसे एक-
एक असाध्य है। इनका पार नहीं पाया जा सकता । यह रोगी जीव क्या
पार पावेगा १
जो श्रुति कहद-जिसके लिये वेदमें विधि है। वेदकी आशा
धर्म है। वेदकी आज्ञा दो अकारकी होती है--(१) विधि और (२)
निषेध | इनमें निषेघ स्वथा त्याज्य है, इसलिये 'सुम धरम अचारा
कहा |
छुस चरमस अचारश-इसस सम्पूर्ण कमंकाण्ड आ गया। यज्ञ-
दानादि शेष धर्म सब इसीके अन्तर्गत हैं | यथा--
जहँ छगि कह्यो घुरान श्रुति एक एक सब जाग।
वार सहस्त सहस्त्र लुप कियो सहद्तित अनुराग ॥
द््ष जशानदीपक
(इस चौपाईसे उपरम # कहा | )
तेइ तृन हरित चरइ जब गाई।
पेन्हाई
भावबच्छ सिसु पाई पेन्हाईं ॥
अर्थ-डस हरे ठुणको जब गाय चरे और भावरूपी चछड़ा
पाकर उसके थनमे दूध आ जाय
तेइ ठून हरित-वे ही हरे ठण अर्थात् जप, तप, ब्रत, यम;
नियम और झुभ धर्माचार--ये छह्ाँ प्रकारके सरस तृण उस श्रद्धारूपिणी
गौके लिये चारारूप हैं | लौकिक गौका चारा ठृण, ओषधि और
वनस्पति-भेदसे तीन प्रकारका होता है और उनके भी वीजरुद तथा
काण्डरह-मेदसे दो प्रकार होते हैं) कुछ छः प्रकार हुए; | इसी भांति
श्रद्धारूषिणी सौके चाराके भी जप-त्तपादि-मेदसे छ+ प्रकार कहे हैं
हरा तृण कहनेका भाव यह कि तृण सूखा न हों यरं॑ सरस हो,
नहीं तो गौ चावसे नहीं खायगी, फलतः यथार्थ तृप्ति न होगी; दूध भी
कम होगा, जिससे बछड़ेकी तृत्ति भी कठिन हों पड़ेगी, किर और कार्मो-
के लिये दूधका मिलना तो दूरकी बात है | अतः जप-तपादि आनन्दरहित
न हों, यथा--
अस्थिमात्र है रहा सरीरा | तद॒पि मनाक मनहि नहिं पीरा॥
चरइ जवब-मभाव यह कि जैसे गौ गोंठ छोड़कर बाहर जाय और
गोचरभूमिमें चरे, इसी मौति श्रद्धा भी हृदयसे बाहर शब्द, स्पर्श, रूप)
रस, गन्धरूपी गोचरमें, जिस रुचिसे भूखी गाय इरी घास चरती है;
उसी रुचिसे शुम धर्माचरण करे और तृत्त हों, यथा---
नित नव रास प्रेमपन पीना। बढ़्दह ध्मदक सन से सलीना व
गाई-गाय कहा; थेनु नहीं कहा) क्योंकि वश्या घर छोड़ आयी
है | अकेली घास चर रही है; पर चित बश्चेकी ओर छगा है; यथा--
# उपरम खधर्मानुष्ठानकों कहते हैं, यह पट. सम्पत्तियोंगसे तीसरा दै ।
शतपश्च चौपाई ७०
जज्ञु धेज्न बारऊक बच्छ तजि शृद्द चरन बन परवस गहड।
यह गाय जब अघाकर त्ृण चरे तभी इतना दूघ दे सकेगी कि
जिसमें बच्चेका भी काम चले और अपने काम भी आवे | स्मरण रखना
चाहिये कि चरा हुआ चारा गौके पेटर्मे है | यह सामथ्यं गौमें ही है कि
उस चारेका सात्त्विक परिणाम दूधघके रूपमें जगत्के कल्याणके लिये देवे,
राजसिक परिणाम अपने शरीरके पोषणके लिये अलय कर छे और
तामसिक परिणाम गोवर आदि प्रथक् दें । किसी भी शिल्पीकी सामर्थ्य
नहीं है कि इस प्रकारसे साक्त्विक, राजसल और तामस परिणाम किसी
उपायसे प्रथक कर सके । इसी भांति श्रद्धासे आचरित झुम धर्म भ्रद्धाके
उदरमें जाकर परिणामकों प्रास होता है और उसके साक्त्तिक परिणाम--
परम घर्मसे जगत्का हित होता है, नहीं तो जिस भाँति तृणादि
मनुष्यके ग्रहणयोग्य नहीं रहते, उसी भाँति भ्रद्धाहीन शुभ धर्म भी मनुष्यके
कामके नहीं होते, वथा--
श्रद्धा बिना 'धरस नहिं होई। बिनु महि गंध न पाने कोई ॥
गौने जितने प्रकारका तृण खाया है उन सबके सार्विक परिणाम-
का स्वास्थ दूघ है, इसी प्रकार श्रद्धासे जो यम-नियमादि आचरित हुए
हैं उनके साक्ष्विक परिणामका स्वारस्थ परम धर्ममें है ।
भाववच्छ सिद्धु-भ्रद्धारूपिणी घेनुका साक्ष्चिक भाव अबोध
बच्चा है, वह छल-कपट नहीं जानता, अतएव बहुत प्यारा है। चरनेके
समय भी उसीकी ओर ध्यान छग्ा रहता है। इसी भाँति श्रद्धासे
धर्मांचरण हो और वह भाव हत न होंने पावे, यथा---
किये सहित सनेह् जे अध हृदय राखे चोरि।
संग बस किय सुभ सुनाये सकल छोक निहोरि॥
करों जो कछु धरों सचि-पचि सुकृत-सिा बदोरि।
पैडि उर बरबस कृपानिधि दंभ छेत झँजोरि ॥
9१ जशञानदीपक
पाइ पेन्द्राई-जब गौ दरी-हरी घास चरके तृत्त होंकर सम्ध्याके
समय घर छौटती है, तो वालक-बच्छकों पाकर द्रबीभूत हो जाती है ।
उसके थर्नोमे दूध आ जाता है। इसी भाँति श्रद्धा धर्माचरण करके
कृतझत्य होकर भावपुष्टिके लिये अन्तर्मुख होती है। उस समय वह
परम घमे प्रसवमें समर्थ होती है, यथा--
दिन जंतपुर रुख श्रवत थन हुंकार करि घावत्त भई ।
नोइनि वृत्ति पात्र बिसवासा।
निर्मल मन अहीर निज दासा॥ १८॥
अर्थ-चत्तिको नोइन, विश्वासको दोहनी और दासीभृत
निर्मंछ मनकों अहीर वनाचे।
नोदनि-दूहनेके समय जिस रज्जुसे गौका पैर बाँधते हैं उसे
नोइन कहते हैं। वह नोइन बृत्ति है। अर्थात् इत्तिकों उस समय भ्रद्धाके
चरणंमें लगा देना चाहिये, जिसमें श्रद्धा अचल रहे |
पात्र विसवासा-विश्वासको पात्र ( दोइनी ) वनावे; जिसमें दूध
रखा जा सके | विश्वासमें छिद्र होनेसे दूध बह जायगा। यथा--
कौनिउ सिद्धि न बिन. विसवासा |
निर्मल मन अहीर-अहीर अर्थात् दूहनेवाला निर्मठमन हों ।
काम-संकल्पवाला मन मठीन और कामवर्जित मन निर्मेह कहलाता है;
अशुद्ध मन श्रद्धाकों छटका देगा; तो बना-बनाया कास बिगड़ जायगा ।
निजञ्ञ दासा-वह अद्दीर अपना दास हो, अपने वचमें हो अर्थात्
मन निर्मल होनेपर भी अपने काबूमें न हो तो काम नहीं चछता; अतः
वह निर्मल भी हों और अपने काबूमें भी हो । गौके पेन्द्रानेपर वह
निर्मल मनरूपी सेवक अद्दीर जब उस गौके चरणोंमें उसे निश्चक करनेके
लिये नोइन लगाकर देखे कि अब वछड़ा अपनी पुष्टिके लिये योग्य
इातणञ्थ चौपाई ०
जनु घेहु बाहक बच्छ तजि शृह चरन बन परवस गई।
यह गाय जब अधाकर तृण चरे तभी इतना दूघ दे सकेगी कि
जिसमें बच्चेका भी क्राम चले और अपने काम भी आवे। स्मरण रखना
चाहिये कि चरा हुआ चारा गौके पेटमें है। यह सामथ्थ्य गौमे दी है कि
उस चारेका सात्त्विक परिणाम दूधके रूपमें जगत्के कल्याणके लिये देवे,
राजसिक परिणाम अपने शरीरके पोंषणके लिये अछग कर ले और
तामसिक परिणाम गोबर आदि प्रथक् दे । किसी भी शिव्पीकी सामर्थ्य
नहीं है कि इस प्रकारसे साप्यिक, राजसल और तासस परिणाम किसी
उपायसे प्रथक कर सके । इसी भाँति श्रद्धासे आचरित शुम धम श्रद्धाके
उदरमें जाकर परिणामकों प्राप्त होता है और उसके साक्त्विक परिणाम---
परम धर्मसे जगत॒का हित होता है, नहीं तो जिस भाँति तृणादि
मनुष्यके ग्रहणयोग्य नहीं रहते, उसी भाँति श्रद्धाही न शुभ धर्म भी मनुष्यके
कामके नहीं होते, यथा--
अछ बिना धरम नहिं होई। बिच महि गंध न पावे कोई ॥
गौंने जितने प्रकारका तृण खाया है उन सबके सात्विक परिणाम-
का स्वासस्य दूघ है; इसी प्रकार श्रद्ास जो यम-नियसादि आचरित हुए
हैं उनके साक््विक परिणामका खारस्य परम धर्ममें है ।
भावबच्छ सिखु-भ्रद्धारूपिणी घेनुका सातक्त्विक भाव अबोध
बच्चा है; वह छल-कपट नहीं जानता; अतएब बहुत प्यारा है। चरनेके
समय भी उसीकी ओर ध्यान लगा रहता है। इसी मौंति श्रद्धासे
घर्माचरण हों और वह भाव हत न होने पावे, यथा--
किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि।
संग वस किय सुभ सुनाये सकक ऊछोक निहोरि ॥
करों जो कछु घरों सचि-पचि सुकृत-सिकछा घटोरि ।
पेंडि उर बरचस कृपानिधि दंस लेत जखैजोरि ॥
१ “ जझानदीपक
पाइ पेन्द्राई-जब गो हरी-हरी घास चस्के तृत् होकर समन्ध्याके
समय घर लौटती है, तो वालक-बच्छको पाकर द्रवीभूत हो जाती है ।
उसके थनोंमें दूध आ जाता है। इसी भाँति श्रद्धा धर्माचरण करके
कृतकृत्य होकर भावपुष्टिके लिये अन्तर्मुल होती है। उस समय वह
परम धर्म प्रसवर्में समर्थ होती है; यथा--
दिन अंतपुर रुख श्रवत थन हुंकार करि घावत्त भई ।
नोइनि बृत्ति पात्र बिसवासा।
निर्मल मन अहीर निज दासा॥ १८॥
अर्थ-तुत्तिको नोइन, विश्वासको दोहनी और दासीभृत
निर्मल मनको अहीर बनाघे
नोइनि-दूहनेके समय जिस रज्जुसे गौका पैर बॉधते हैं उसे
मोइन कहते हैं। वह नोइन बृत्ति है। अर्थात् इक्तिकों उस समय श्रद्धाके
चरणंमिं गा देना चाहिये, जिसमें श्रद्धा अचल रहे |
पात्र विसवासा-विश्वासको पात्र ( दोहनी ) बनावे, जिसमें दूध
रखा जा सके | विश्वासमें छिद्र होनेसे दूध बह जायगा, यथा---
कौनिउ सिद्धि न बिन. विसवासा |
निर्मेछ मन अहीर-अहीर अर्थात् दृइनेवाछा निर्मलमन हो |
काम-संकल्पवाल्ा मन मलीन और कामवर्जित मन निर्मेल कहलाता छे
अश्युद्ध मन श्रद्धाकों छटका देगा, तो वना-बनाया काम बिगड़ जायगा |
निज दासा-वह अद्दीर अपना दास हो, अपने वश्में हो अर्थात्
मन निर्मल होनेपर भी अपने काबूमें न हो तो काम नहीं चछता, अतः
वह निर्मेल भी हो और अपने काबूमें भी हो। गौके पेन्ानेपर वह
निर्मल मनरूपी खेवक अहीर जब उस गौके चरणोंमें उसे निश्चक करनेके
लिये नोइन लयाकर देखे कि अब बछड़ा अपनी पुष्टिके लिये योग्य
झातपञ्च चौपाई २
मात्रामें दूध पी छुका तब उसे इृटाकर दोहनीमें दूध डुह्दे। इस भाँति
धर्माचरणके द्वारा कझृतकृत्य होकर श्रद्धा अन्तमुंखी हो और सम्पूर्ण
धर्मोके सात्विक परिणामसे सात्तिक भावकी पुष्टि करने छगे, तत्र भली
भाँति वश किये छुए. कामसंकल्परहित मनकी जइत्ति लगाकर अपनी
श्रद्धाकों अचछ कर ले । नहीं तो साक्ष्चिक भाव ( छुखभाव ) के हृटाते
समय श्रद्धा छठक जायगी । और यदि सातक्त्विक भाव न हटाया जायगा;
तो वह अनुष्ठित धर्मके सम्पूर्ण साक्विक परिणामकों पी जायगा । मनके
सात्िक भावमें अनुरक्त दोनेसे भी सुखके साथ बन्धन होगा, अतएव
साक्त्विक भावकों भी धीरे-घीरे हटाकर मनको परिपूर्ण विश्वासका पात्र
करनेके लिये उसे श्रद्धामें लगा दे |
(इस चीपाईसे शम# कहा गया | )
परम घरमसय पय दुहि भाई ।
ओऔटइ अनलरू अकाम बनाई॥
अर्थ-हे भाई! परम धर्ममय दूध दुद्धकर उसे अक्रामकी
आग वनाकर औटटे।
परम घरममय पय-जो सात्त्विक परिणाम दूधरूपमें परिणत हुआ
उसीको परम घर्ममय कद्दा अर्थात् अहिंसामय कह्दा, क्योंकि अहिंसामें ही
शेष सब घर्मोकी चरितार्थता है, यथा--
“परम घरम शरुतिबिदित अहिंसा! । “धर्म कि दया सरिस दरिजाना ।?
दूसरा परम घममय”! कहनेका भाव यह है कि 'मयद प्रत्यय
बहुतके अर्थमें होता है; अर्थात् उस दूघमें परम घर्म बहुत है, पर थोड़ा-
सा काम, वासना; ममतादिरूप दोष मी हैं ।
डुद्धि भाई-विश्वासरूपी पात्रमें ही यह दूध डुह्य जा सकता है,
+--+-पपपत्+-+टर्््पाय ::ैप।भभप:भ/््चघ्प्प्"--...त.
# शाम मनोंनिम्मदकी कददते हैं, यद् पद् सम्पत्तिमें प्रथम है ।
छ३् शानदी पक
अन्य पात्रमँ रखनेसे बिगड़ जायगा, अतएवं परम धर्ममय सात्विक
परिणामसे विश्वासरूपी पात्र भर लेना चाहिये | न मावके काम आ सके
न मनके । क्योंक्रि भाव और मन दो ही पदार्थ ऐसे हैं जो श्रद्धासे
घममके साक्ष्विक परिणामकी अलग कर सकते हैं, और केवल मन ही
ऐसा है, जो उसे श्रद्धासि छेकर विश्वासके सुपुर्द कर सकता है। “भाई
सम्बरोधन है तथा विचारके लिये आश्वासन है, यथा---
करे बिचार करों का भाई ।
ओऔटइ-अर्थात् पाक करे; गुणाधिक्यके लिये, घनीमावके लिये;
जलरूपी अबगुणके नाशके लिये | यथा--
शद्धि गुन पय त्तजि अवगुन वबारी।
अनछ अकाम वनाई-अकामकी आगको प्रज्वलित करके औटे,
अर्थात् आगपर रखकर देश्तक गरम करे, जिसमें उसके एक-एक
परमाणु तकर्मे भी अकामकी आग पहुँच जाय | धर्मके सात््विक परिणामर्मे
भी काम रह जाता है, क्योंकि धर्म सदासे ही कामका संगी है। धर्मका
साथ सुख और स्वर्गसे है, और ये द्वी काम है | अकामकी अभि इसलिये
कहा कि 'काम! शब्द यावत् वैषयिक सुखका वाचक है ( केवल स््री-
सुखका दी नहीं ) । उसका त्याग ही अकाम है ) वेघयिक सुखमात्रके
त्यागके ध्यानसे ताप दोता है, अतएव उसे अमि कहा; इस अभिकी
उत्पत्तिके लिये कामकों दूर करना कर्तव्य है। फिर वह अभि आप-से-
आप बनी रहेगी इसलिये बनाई कहा | अकामकी अग्नि परम घर्ममय
पयका पाक करके उसके ग़ुणकों बढ़ा देगी, उसमें घनत्व पेदा करेगी
और उसके कामांशकों दूर करेगी । औवनेसे दूध अत्यन्त गरम हो जाता
है | यदि ऐसे समय जाँवन डाल्य जाय तो वह फट जायग्रा, अतएव
उसे ठंडा करना चाहिये | गायके चरानेसे लेकर दूध औदनेतक मनका
काम था; अब ठंडा करनेका काम क्षमाका है। क्षमा; मुदिता और
बुद्धि ये सब मनके परिघार हैं ।
आातपश्च चौपाई छ
तोष सरुत तब छसमा जुड़ाबे ।
धृति सम जाँवन देइ जमाबै ॥१०॥
अर्थ-प्षमा-तोष रूपी वायुसे उसे ठण्डा करे । तब चैयका
सम जॉवन देकर ( दही ) जमावे ।
तोष मरुत-तृषा शानन््त करनेवाले गुणकों तोष कहते हैँ। तोषकी
उपमा मझत् (हवा ) से दी गयी है। हवासे गर्मी झान्त होती है,
दूध ठंडा होता है | परम धर्ममय पयका कामांश तो दूर हुआ, पर ऐसा
करनेसे वह सनन््तप्त हों उठा; उस सस्तापकों दूर करनेके लिये तोषकी
आवश्यकता हुई | भाव यह कि--
सर्वे च सुखिनः सन्तु सर्चे सन््तु निरामयाः |
ऐसी धारणा अग्ल होनेपर भी कामसे भय रहता है; क्योंकि वह
क्रोध उत्तन्न कराके हिंसा करा देता है। कामका विरह हुआ, कामके विरहसे
सन्ताप हुआ अतएव उस सनन््तापकों तोषसे दूर करे | जो अहिंसामें
प्रतिष्ठित हो गया है उसके लिये आत्मघातक (जिससे आत्माका
आवरण बढ़े ) दोषोंका दूर करना परम कततंच्य है |
छमा जुड़ावै-दूसरेके अपराधसे मी न सन्तस होनेवाली क्षमामें ही
कासके विरहसे उत्पन्न ध्मके सन््तापकों दूर कर सकनेकी शक्ति है अतएव
क्षमा ही उसे तोषकी वायुसे शीतल करे | दूसरी बात यह है कि तोषके
प्रास करनेमें क्षमा ही समर्थ है। अतः वही सन्तप्त परम घर्ममय पयकों
शीतल करे | यथा--
त्रिबिध पाप संभव जो तापा। मिट॒ट्ट दोष दुख दुसह कछापा ॥
परम सांत सुख रहे समाई । तहँ उत्पात न ओेदै आई।॥
तुलसी ऐसे सीतछ संता सदा रहहिं एड्टि भाँति एकन्ता॥
(् चै० स०)
५ शानदीपक
ठंडा करनेका दूसरा यह भाव भी है कि साधकको व्यर्थ काल
बिताना उचित नहीं; अनायास भी दूध धीरे-धीरे ठंडा हो जाता है;
पर उसमें देर लगेगी, अत्णव तोषरूपी शीतल वायुसे उसे क्षमाह्दारा
शीतल करनेका उद्योग करे |
घृति सम जॉवन--ध्रति अर्थात् धैर्य, ऋतकार्य होनेका प्रधान
साधन है, यथा--“घीरज घरइ सो उतरे पारा? (सम से भाव यह कि
समतावाला पैय॑ होना चाहिये, विषमतावाछा नहीं । इसीकों जाँवन
बनावे | जाँचन दहीकी उस मात्राकों कहते हैँ जिसे दूधमें डालकर दहो
जमाया जाता है। खाई आदिसे भी दही जमता है पर चह अच्छा
नहीं होता । अथवा सम जॉवनसे यह तात्पय दै कि जितना उचित हो
उतना ही जाँवन दे, क्योंकि उचित मात्रासे कमम दही नहीं जमेगा,
और अधिक होनेसे वह पानी छोड़ देगा । अतएवं जितने पघेर्यकी
आवश्यकता हो उतनेद्दीसे काम छे, धैर्य कहीं हठमें परिणत न हो जाय ।
देइ जमाबै--जॉवन देकर जमा दे | अर्थात् जाँवन डालकर उसे
उतना समय दे, जितनेम जॉवनका प्रभाव सम्पूर्ण दूधपर पड़े और
यह जमकर एक थका द्वो जाय | दूधके जमानेमें जाॉवनके लिये दूसरे
दहीकी आवश्यकता पड़ती है, और उस दूसरेके लिये तीसरेकी | इस
भाँति यहाँ अनादिकालसे साधनपरम्परा दिखलछायी है। यह नहीं
समझना चाहिये कि ऐसा उद्योग आजतक कभी नहीं किया गया |
जीवकी स्थिति अनादि कालसे है ओर उसका उद्योग बराबर जारी है। न
जाने कितनी वार दही जमा, पर काम पूरा चौकस न उतरा | इस बार
भी दद्दी जमकर तैयार हुआ । जिस प्रकार हरे तृणका परिणाम बूध एक
वूसरी वस्तु तैयार हुई; इसी भाँति दूधका परिणाम दही एक बिल्कुल
तीसरी वस्तु है| इसमें दया, निष्कामता, तोप और घेय॑ चार्रोका सेल
है | क्षमाका कार्य समाप्त होते ही मुदिता अपने-आप उपस्थित हो जाती
है | इसी प्रकार अन्य पात्र भी आते जायेंगे ।
इातपश्च चौपाई दे
मुदिता सथे बिचार मथानी।
दम अधार रज़ु सत्य छुबानी ॥
अर्थ-मुद्ति विचारकी मथानीसे, जिसका दम आधार
और सत्य खुवानी डोरी हो, दह्दीको मथे ।
मुद्दिता मणै--दहीको मुदिता अर्थात् दूसरेके सुखरमें आनन्दित
होनेवाला गुण भथे। यहाँ मथना विचार करना है। विचारमें
मुदिताकी बढ़ी आवश्यकता है ।
विचार मथानी-विचारकी मथानीसे मुदिता मथे | धर्मको
सदासे कामके साथका संस्कार है | धर्मके साथसे काम हटा दिया गया,
पैसे मैत्नी करायी गयी; पर अब भी उसमें ( दुःखके बीज ) कामका
संस्कार शेष है, उसी संस्कारकों तोंड़नेके छिये उस दहीके थक््केकी
विचार ( वस्तु-विचार ) से मथे ।
दम अधार-दम# अथोत् इन्द्रियदू्मन, उस बस्घु-विचारका
आधार होगा; मथानीका फछ होगा | उसकी चोंटसे यह जमा हुआ
दहीका थक्का छिन्न-मिन्न होकर रवा-रवा हो जायगा ।
रज़ु सत्य खुबानी-सत्य सुबानी अर्थात् हितकर सत्यवाणी
(गुरु तथा शाज्रकी ) उस विचार-मथानीकी डोरी होगी ) उसकी
खींचके अनुसार जब वस्तु-विचार-दण्ड अपने फलके साथ घूमेगा;
अथात् शास्त्रभयोदाके भीतर तक होगा; तब दही मधित होकर
नवनीत ( मक्खन ) प्रसव कर सकेगा । विचारका दिग्दशंस--यथा--
जिय जबते हरिते बिछगान्यौ। तबते देह गेह निज सान्यो |
मसायावस॒सरूप विसरायो। तेह्ि श्रमते दारुन दुख पायो 0
# यह पद सम्पत्तियोंमैंसे दूसरा है ।
3
क्षानदीपक
पायो जो दारुन दुस॒ह हुख सुखलेस सपनेहु नहिं मिलयोौ।
भय सूल सोक जनेक जेद्दि तेद्टि पंथ तू. इठि ह॒ढि चलल््यो ॥
बहु जोनि जन्म जरा ब्रिपति सतिसंद हरि जान्यो नहीं।
श्रीरास विन्नु विश्राम मूढ़ विचारि छखु पायो नहीं॥
झआरनेंद-सिंधु मध्य तव धासा | बिलु जाने कस मरसि पियासा ॥
रूग-अ्रम बारि सत्य जल जानो | तहेँ तू सगन सयठ सुख मानी ॥
तहँ समगन मज़सि पान करि न्रयकाल जल नाहीं जहाँ ।
निज सदज अनुभव रूप तव खलु भूलि जनु कायो तहाँ॥ए
निर्मठ निरंजन निर्चिकार उदार सुख ते परिहरपो।
निईकाज राज बिहाह नूप हव स्वप्न-काराशणुदह परपों॥त
हैं निजकरम छोरि दठ कौन्दं। अपने करन्ह गाँठि हृढि दीन्हों 0
छेहिते परवस परपी छमाणे १ रा फऊः शर्भवास दछुसक आएो ५
आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यों सोऊ।
सिर हऐैेठ ऊपर चरन संकट बात नहिं पूछे कोऊ॥
सोनित पुरराप जो मूत्र मर कृमि कदंसाइत सेवद्दीं।
कोसऊ सरीर गरभीर बेदन सीस धघुमि धुनि रोवहीं ४
प्रेरेठ जो परम पचंड भारुत कष्ट नाना तें सथ्ो।
सो ज्ञान ध्यान विराम जनुभव जातना पावक दो ॥
अति खेद प्याकुछ अल्पवरू छिन एक बोल न आवई ॥
तब तीम्र कष्ट न जान कोड सबलोग हरपित गावई ॥
बालरूद्सा जेते छुस् पाये। अति असीम नहिं जाहेँ ग्रिनाये #
छुथा व्याधि बाघा भट्ट भारी । चेदन नहिं जाने महतारी॥
जननी न जाने पीर तथ केहि हेतु सिखु रोदन करे।
सो करे विविध उपाय जाते अधिक तुच छाती जरे ॥
कौसार सैंसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सके ।
वितरेक तोहि निर्देय महाखल आन कहु को सहि सके ॥
शतपञ् चौपाई 3८
जोयन झुवत्ति संग रंग रात्यी। तब तू महामोदद मद सात्यों ॥
ताते तजी धर्म-मरजादा । बिसरे तय सथ प्रथम बिपादा ॥
बिसरे बिपाद निकाय संकट समुझि नहिं फादत हियो |
फिरि गर्भगत जावर्त संचतिचक्र जेहि द्वोष्ट सौदद कियो ॥
कृमि भस्त्र बिट परिणाम तनु तेहि छाम्रि जय यैरी भयो
परदार परधन द्रोहपर संसार वादे नित नयो॥
देखत ही जाई घिरधाई | जो तें सपनेहु नाहिं घोछाई ॥
ताके भुन कछु कद्दे न जाहीं । सो अब श्रगट देखु जगमाहों॥
सो प्रगट तनु जजर जराबस व्याधि-सूछ सतावई ॥
सिर कंप इंद्धिय सक्ति अतिदत बचन काहु न भावई ॥
गरृहपालहूते अति निरादर खानपान ने पावई ॥
ऐसिठ दसा न बिराग तहेँ तुस्रात्तरंग बढ़ावई॥
को कह्लि सके महाभव त्तेरे। जन्म पुकके कछुक गनेरे॥,
ख़ानि चारि संत्तत जवगाहीं । जजहुँ न कर विचार मन माही ॥
एट्टि तजुकर फल विषय न भाई | स्वर्गहु स्वल्प अंत छुखदाई ॥
नरतज्नु पाए विपय सन देहाँ। पलटि सुधा ते सठ बिप लेही ॥
सुर-नर-सुनिकर याही रीती | स्वारथ छामि करहिं सब पीती ॥
जेहिते कछु निज स्वारथ होई । तेद्ठि पर ममता कर सब कोई ॥
जग अनभलरू भर एक गोसाएँ । इत्यादि ।
सव कार्य श्रद्धासे छेकर ग्रन्थि-मेदतक विधिके अनुसार होने
चाहिये; अविधि होनेसे वह असुरोंका भाग हों जायगा |
तब सथि काढ़ि लेइ नवनीता ।
बिसल बिराग खुमग सुपुनीता॥ २० ॥
जर्थे पे
के थ-तवब दद्दी मथकर झुन्द्र पवित्र विरागरूपी मक्खन
निकाल ले |
९, जशानदीपक
लवब भधि-इस प्रकार विचार-मथानीद्वारा मथनेसे काम-संस्कार
दृट जायगा और उसके टूटते ही नरिवर्ग वा घडविकारकी जो कुछ वासना
परम धर्मके सारकों ढके हुए. थी, छिन्न-मिन्न होकर अछग हो जायगी
और नवनीत ( विराग ) प्रकट हो जायगा |
काढ़ि छेह नचनीता-तव नवनीतकों उस तक़से अछय निकाछ
ले | अबतक सव काय॑ विश्वासरूपी पाचमें ही होता आया। उसीमें
दूध दुह्य गया, औंदाया गया, ठंडा किया गया; जमाया गया और
सथा गया | अब मक्खन निकल आया तो उसे (विश्वास ) पाचसे
अछग कर लिया गया । भाव यह कि विरागका केवऊ विश्वास होनेसे
काम नहीं चलेगा |
विमल विराग-वह मक्खन विमर विराग है, यथा--
भूपन बसन भोग सुख भूरी । सव तन बचन तजे तन तूरी ॥
अवधराज सुरराज सिहाई। दसरथ घन खुनि धनद लजाई ॥
तेष्टि पुर वसत भरत विनु रागा | चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ए
विराम साधन-चत॒ष्टयमेंसे दूसरा साधन है |
खुभग खुपुनीता-मक्खन झुन्दर हे और भलीमाँति पवित्र
है। वूध-्सा सुमग है; पर दूध पुनीत था यह सुपुनीत है। अब
साधन-चव॒ष्टयक्रे प्रूण होनेमें केवठ समाधानकी चुटि है। अतएब--
दो०-जोग अगिनि तन प्रगट करि कम सुमासुम छाइ।
बुद्धि सिरावे ज्ञानघुत ममता मरू जरि जाइ ॥
अर्थे-शुभाशुम कर्मकों छगाकर दारीरमें योगाझि प्रकट
करके वुद्धि-जशान-घुतको तैयार करे, जिसमें ममतारूपी मर
जरू जाय]
शतपश्च चौपाई ८०
जोग अगिनि-जब विराग उत्पन्न हुआ तब योगका अधिकार भी
हो गया। चित्तव्ृत्तिका निरोध करके सत् छक्ष्यमें एकाप्र होना योग है
और वह अभ्यास तथा वैराग्यसे छोता है । बेराग्यद्वारा चित्तव्ृत्तिनिरोध
कहनेसे ही यह बात आ गयी कि वैराग्यका निवास चित्तवृत्तिमें हुआ ।
तन प्रमट करि-योगामिको प्राण-अपानके संघर्षणसे झरीरमें
प्रकठकरके अर्थात् हृठयोग करके जिसमें मनकी गतिकी भाँति देहकी
क्रिया श्वास-प्रश्यासादि रक जाय | मनके रोकनेसे वायु रुकता है और
चायुके रोकनेसे मन रुकता है। यथा--
जिति पवन मन गो निरस करि झुनि ध्यान कबहुँक पावहीं |
अतः राज; हठ दोनों योग युगपत् होने चाहिये) इससे समाधान
कहा ।
अब साघन-चट॒ष्टवके पूरा होनेसे साधक तत्वज्ञानका अधिकारी
हुआ । ऐसे अधिकारीके लिये ही “तत्वमसि? महावाक्यका उपदेश है
यथा---
ह सोद्धि पर्स अधिकारी जानी।
छागे करन श्द्म उपदेसा | अज सद्दैत अगुन हृदयेसा॥ा
सो छें (तरचम )तोहि ताहि नहिं सेदा ।(असि)वारि वीचि इच गावद्िं बैदा ॥
कमे छुमासखुभ लाइ-अग्रिको स्थिर रखनेके लिये इंघन चाहिये।
अतः शु॒भाशुभ कमको रूगाकर अम्नि जलावे | योगसे परोक्षशान होता
है। यथा--
घरम ते बिरति जोग ते प्वाना।
४ और परोक्षज्ञानसे बुद्धिपूर्वक किया हुआ पाप नष्ट होता है | योगीका
कर्म अश्क्लाकृष्ण होता है, पाप-पुण्यसे रहित होता है, अतः सशखित आगामी
कि किक ४-५2 03424 0-00 3५ 40022
# चित्तकी एकाय्रताको समाधान कहते हैं, यद्द साधन सम्पत्तियोंमें
छठी सम्पत्ति है|
<१ छानदीपक
यावत् झभाशुम कर्माकों नष्ट करती हुई योगापि प्रकट होती है, केवछ
आरूध बच रहता है | यथा--
कद भुनीस द्विमवंत सुचु जो विधि लिखा लिलार |
देव दनुज नर नाग स्॒ुन्नि कीड न मेटनहार॥
चुद्धि सिरावे-घुद्धि मक्खनको पिघलानै, अर्थात् वैराग्यसे और
सत् लक्ष्यपर चित्तके स्थिर करनेके अभ्याससे चित्तद्नत्तिका निरोध करे |
मक्खन निकालनेतक मुदिताका काम था; अब गरम करना बुद्धिका
काम है| घी कच्चा रह गया) ममता कुछ शेष रह गयी, तो ज्ञानदीपके
जलनेमें कठिनता होगी और जों खर हो गया; तो योगशाज्रोक्त
असंप्रशात समाधि हो जायगी । आगेकी सब्र क्रिया रुक जायगी ।
मसल है कि धी जलकर तेल होता है | असंप्रज्ञात समाधि तो हुईं, पर
ज्ञान न हुआ |
शानघृत-यदि घुद्धि ठीक तरहसे पका सकी; तो ज्ञान-छत तैयार
हो जायगा | यह “तत्! पदका ज्ञान परोक्षक्षान है, यथा--
तव प्रसाद सब संसय गयऊ । रास सरूप जानि मोहि परेऊ ॥
ममता मछ् जरि जाइ-भाव यह कि विरागमें यह धारणा रही
कि ये सब विधय-विलास मेरे वश हूँ, में इनके वदामें नहीं हूँ । अतः
उसमें ममता-मल रहा । वह ममता योगामिसे जलती है । इस प्रकार 'तत्
पदुका शोघन हुआ । ज्षानदीपकर्म योगशास््रातुमोदित असंप्रज्ञात
समाधिका उपयोग नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण इत्तियोंका निरोध न मानकर,
शानी लोग ब्रह्माकारजृत्तिकों असंप्रशात समाधि मानते हैं, और कारण
यह देते हैं कि योगवाली असंप्रशात समाधिसे छौटनेपर, संसार ज्यो-का-
स्यों छौट आता है, ज्ञान कुछ भी नहीं होता । यहाँतक बुद्धिका
कार्य समास हुआ ।
दो०-तब बिज्ञानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाय ।
चित्त दिया भरि धरे दृढ़ समता दियट बनाय ॥
हे |
दातपशथ्च चौपाई ८
अर्थ-तवब विज्ञानरूपिणी बुद्धि खच्छ घी पाकर चित्त-
रूपी दीयामें भरे, और समताकी दीवट चनाकर उसपर डइढ़
करके रक्खे ।
तब विज्ञानरुपिनी चुद्धि-अब गुरुसे उपदिष्ट 'सो तें तोहि ताहि
नहिं भेदाः (तत्वमसि ) महावाक्यसे उत्पन्न विशञान जिसका रूप है,
ऐसी बुद्धिका कार्य आरम्भ होता है। अर्थात् गुरु-वेदान्त-वाक्यसे जो
ब्रह्मात्मेक्थका अनुभव होता है, उसे विज्ञानरूपिणी बुद्धि कहते हैं |
विखद् छुत पाय-उपयुक्त निर्मल घी ( परोक्षश्ञान) को जब
विज्ञानरूपिणी बुद्धि पावे, तब--
चित्त दिया भरि घरे हढ़-चित्तके दीपकममें भरकर दृढ़ रक्खे |
भाव यह कि “ब्रह्म समान सब्र माहीं' यह भाव हृढ़रूपेण चित्तमें
जमा रहे ।
समता द्यिट वनाय-और समताकों दीपक बनाकर उसपर
शानघृत मरे हुए, दीपकको स्थापित करे, जिसमें दीपकके टेढ़े हो जानेसे
छत गिर न जाय | भाव यह कि चित्तमें वैधम्य न होने पावे; नहीं तो
ज्ञान नष्ट हो जायगा | यथा--
ज्ञान मान जहँ एकौ नाहीं। देखिय अह्य समान सबसाहीं ॥?
यह बाह्य समाधि हुई ।
इस ग्रकार ज्ञान-घृत तैयार हुआ, उसे दीयेमें भरकर सुरक्षित खानमें
रख दिया गया, ठब्र साधककी साध्ठु पदवी होती है, यथा---
चंदी संत समान चित हित अनहित नहिं कोड ।
अंजलिगत सुभ सुमन जिसि सम सुगंध कर दोड ॥
ऐसे ही साधु मद्ापुरुषोंकी कपाससे उपसा दी गयी है। साधुका
चरित्र कपासका चरित्र कह्य गया है, मीरस, विद्यद और शुणमय
करके उसके फकछका वर्णन किया गया है, यथा--
साधु चरित्र सु चरित कपासू। निरस बिसद गुनसय फल जासू॥
€३ जानदीपक
अपना कार्य जिससे हो उसे फल कहा गया है। जैसे तलवारका
फछ, वरछेका फल, वृक्षका फल | इसी प्रकार कर्मका फल देह है ।
साधुका दरीर विषयरसरूखा होनेसे नीरस कहा गया और पुनीत
होनेसे विशद कहा गया । ऐसी ही देहसे तीनों शरीरोंका प्थक् करना;
ठुरीयाकी प्राप्ति आदि, जिसका वर्णन पीछे किया जायगा, सम्मव है,
दूसरेसे नहीं । दूसरोंके तीनों शरीर सरस होनेसे, मलिन और दोषयुक्त
होनेसे एक दूसरेम ऐसे सने होते हूँ कि उसको पार्थक्यका अनुभव नहीं
हो सकता | यथा---
काम क्रोध मद छोमरत ग्रुहासक्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मृढ़ परे तम-कृप॥
दो०-तीनि अवस्था तीनि ग़ुन तेहि कपासते काढ़ि ।
तूल तुरीय सेंबारि पुनि बाती करिय सुगाढ़ि ॥
अर्थ-उस कपाससे तीन अवस्था और उसमेंसे तीन
शु्णोंकों निकालकर, सुरीयरूपी रूईकों सँवारकर, अच्छी
मोटी बत्ती चनावे ।
तेहि कपासते-अर्थात् उस कपाससे | कपासकी उपमा देहसे
दी गयी है | जिस प्रकार कपासमें तीन कोष ( खाने ) होते हैं, उसी
प्रकार देहमें तीन शरीर होते हैं--स्थूछ, सूक्ष्म ओर कारण | पाश्चमौतिक
देहको स्थूछ शरीर कहते हैं । पश्चज्ञानेन्द्रिय--श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, जिहा
और घाण, तथा पशञ्चकर्मेन्द्रिय---वाक + पाणि; पाद, पायु और उपस्थ
तथा पश्चप्राण--प्राण; अपान; समान) उदान और व्यान तथा बुद्धि
और मन; इन सत्रहके समूहकों सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इन दोनोका
कारण आत्माका अज्ञान है, जो आत्माके आमभाससे युक्त होकर 'कारण-
शरीर” कहलाता है ।
शतपश्त चौपाई ८8
तीनि अवस्था तीनि झ़ुन-जाग्त्; खप्त और सुषु्ति ये तीन
अवस्थाएँ हैं | इन्द्रियोंसे विषयका ज्ञान जिस अवस्थामें होता है उसे
जाम्मत् कहते हैँ । इन्द्रियोंके उपरत होनेपर जाग्मत् संस्कारजन्थ संविषय
ज्ञानकों स्प्त कहते हैं और जिस समय किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता,
बुद्धि कारण-शरीरमें जाकर ठददरती है उसे सुपुप्ति अबस्था कद्दते हैं ।
यथा--
ततेरेसि तीनि अवस्था तजहु भजहु भगवंत्त । (विनय० )
सत्त्त; रज, तम ये तीन शुण हैं । जाग्रत् सच्त्यप्रधान है; खभ
रजभ्रघान है और सुषुति तमश्प्रधान । ये ह्वी तीनों अवस्थाएँ कपासके
तीनों कोर्षोकी तीन ढेढ़ियाँ हैं और सत्त्व, रज, तम उनके क्रमसे ब्रीज
(बिनौले) हैं । कपासके प्रत्येक कोषमें विनौंलेसे लिपटी हुईं रूई होती
है उसे ढेढ़ी कहते हैं ।
काढ़ि-निकालटकर। भाव यह कि वैराग्य उत्पन्न होते ही
साधु तीनों शुणोंकों त्यागना चाहता है। उसकी विधि यह है कि
स्थूठल. शरीरसे ढेढ़ीरूपी जाग्रतू अवस्थाकों अलग करके
उससेंसे बिनौलारूप सत्व अथात् वैधयिक शानको दूर करे | सूक्ष्मकी
अवस्था स्मप्ममेंसे उसी वैषयिक ज्ञानके संस्कारकों दूर करे। कारण
शरयरकी सुषुप्ति अवख्थामेंस आत्माके अज्ञानकों दूर करे | ये सब
क्रियाएं मनसे होती हैं | अतएव राजयोगक्रे अन्तर्गत हैं। यथा--
कहिय तात सो परम बिरागी | तून सम सिद्धि सीन ग़ुत्त त्यागी ॥
यह परम विराग ज्ञानरूप ही है। यह इश्यानुविद्ध समाधि हुईं ।
तूल तुरीय सँवारि पुनि-जब तीनों अवस्थाओंमेंसे तीनों शुण
निकल गये; ढेढ़ीमेंसे त्रिनौले बाइर निकाल लिये गये, ओंटनेका काम
समास हुआ तब केवल रूई बच गयी वहीं तुरीयावस्ा है । उसे भी
सवार ले अर्थात् ठुनकर उसमेंसे कोषोके संस्कारकों दूर करे। इस प्रकार
लि? पदका शोधन हुआ |
<्ज् झानदीपक
वाती करिय खझखुगाढ़ि-खूब मोटी बत्ती बनावे। अर्थात् तुरीया-
वस्थाके संस्कारोंकों मढीमौँति घनीभूत करे, जिसमें सब मिलकर एक
हो जाये ।
सो०-एहि बिधि लेसे दीप तेजरासि बिज्ञानमय ।
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलूम सब
अर्य-इस प्रकारसे तेजराशि विज्ञानमय दीपक जछाचे,
जिसके समीप जानेसे मदादि सब पतंग जरू जायें।
एहि विधि-इस विधानसे अर्थात् जो विधान ऊपर कह आये
हैं। प्रकाशके और भी बहुत उपाय हैं | तेलके दीयेसे भी प्रकाश होता
है, विद्युत्से भी प्रकाश होता है, परन्तु अन्य उपायोंसे आत्मानुमव-
झुखका प्रकाश न होगा । शासत्रकी विधिका त्याग करनेसे कदापि
कल्याण नहीं हो सकता । ग्रन्थि छूटनेके पहले ठीक-ठीक विधिनिषेधके
अनुसार बरतना होगा, अतएव जो विधान कहा गया है उसीके
अनुसार करे यह नहीं कि दूधकों ही मथकर मक्खन निकाछ ले
अथवा घीका काम तेलसे ही ले ले ।
लेसे दीप-अर्थात् उस बत्तीको घीके दीपमें छोड़ दे जिसमें
बत्ती छघीसे मींग जाय तब उसे योगामिसे लेस दे । भाव यह कि
ठुरीयाको परोंध्ष शानमें डुबा दे | “त्वं! पदके रूक्ष्याथंकों 'तत्? पदके
लक्ष्यार्थमं लीनकर सानन्द समाधिमें स्थित हों। इसे शब्दानुचिद्ध
समाधि कहते हैं ।
तेजरासखि विज्ञानमय-इस प्रकार विधिसे जलाया हुआ दीप
तेजोमय होता है | उसे विज्ञानमय इसलिये कहते हैं कि उससे अपरोक्ष
ज्ञान होता है, यथा--
दुलेम बरह्मलीन बिज्ञानी |
शतपज्च चौपाई <द
मदादिक सलूभ सब-जहाँ दीया जछा कि शलभ अर्थात्
पतञ्ञ चले | झण्ड-के-झुण्ड कभी-कभी दीयेपर टूट पड़ते हैं, खय॑ जछते
जाते हैं, पर यदि दीया छुवंल हो तो उसे चुझाकर ही छोड़ते हैं । मद,
मात्सतय आदि शल्भ हैं । शल्म इसल्यि कहा कि मायाका परिवार
बहुत बड़ा है। यथा--
यह सब साथा कर परिवारा | प्रवकू अमित को वरने पारए ॥
जातहिं जाखु समीप जरदि-भाव यह कि इतने प्रवल
होनेपर भी उस दीयेतक नहीं पहुँचने पाते, समीप आते ही नष्ट
हो जाते हैं। अर्थात् मदादिकी इस शब्दानुविद्ध समाधितक गति
नहीं है । इससे तेजोराशि विजश्ञानमयका साफल्य दिखलाया |
की ७
'सोहमस्मि' इति बृत्ति अखंडा।
दीपसिखा सोड़ परम प्रचंडा॥
अर्थ-चह मैं हैँ” ऐसी अखण्ड चृचि ही उस दीयेकी परम
प्रचण्ड शिखा है ।
सोहमस्सि-माव यह कि “सो तें तोहि ताहि नहिं भेदा? इस
मह्यवाक्यके अवण-मननके पश्चात् “वह मैं हूं? इसी रूपमें निदिध्यासन
होता है ।
इति वृत्ति अखंडा-“वह मैं हूँ? यह इत्ति बराबर वनी रहे, विक्षेप
न होने पावे | भाव यह कि समाधिमें निर्वात दीपकी भाँति अचल
एकरस चित्त बना रहे |
दीपसिखा सोह परम प्रचंडा-यही जपरोश्ष शानब्ृत्ति दीपकी
परम अचण्ड ली है। सायाकी सेना पचण्ड है, यथा---
ज्यादि रझो संसारमहँ भाया कटक प्रचंड |
उसके भस्म करनेके लिये परम प्रचण्ड अमिकी आवश्यकता है,
अतः यह दीपशिखा परम प्रचण्ड है ।
<छ शानदीपक
आतम-अनुभव सुख सुप्रकासा |
तब भव मूल भेद अ्रमनासा ॥श्शा
अर्थ-आत्म-अनुभव-छुख उस दीयेका प्रकाश है, तव
संसारके मूल भ्रममेद्का नाश दोता दे ।
आतम-सजुभव झखुख-इस सुखसे बढ़कर कोई सुख नहीं है।
क्योंकि इत्तिजन्य अपरोक्ष ज्ञान भी आत्मानुभव सुखरूप ही है। यथा--
जेद्दि अनुभव बिन्ु सोहजनित दारुन भव ब्रिपति सत्तावे ॥
मह्म पियूप सधुर सोत्ततक सन जोपे सो रस पथ ।
तो कत भुगजलरूप विषय कारन निसिवासर घावे ॥
झखुप्रकाला-जब दीप हुआ तो उसका अच्छा प्रकाश भी चाहिये,
सो आत्मानुमवसुख ही सुप्रकाश दे । भाव यह कि ब्र्माकारबत्ति करके
समाधिर्म स्थित होनेसे अपरोक्ष शानकी अखण्ठ चृत्ति होती है और
उससे आत्मानुभवसुख द्वोता है, और जब आत्मानुभवसुख होता है;
तब--भव मूल भेद श्रमनासा ।
भेद श्रम-कहनेका भाव यह कि वस्त॒तः ब्रह्म-जीवमें अभेद है ।
भेदभाव केवल भ्रम है, यथा--
निज अमते संभव रबतिकर सागर अति भय उपजावे ॥
अवगाहत बोधित नौका चढ़ि कबत्रहँ पार न पाये ॥
चुलसिदास जग आपु सहित जब छगि निर्मछ न जाई।
तब छूबगि कफोदि कऊूप उपाय करि भरिय तरिय नहिं भाई ॥
भेद न होनेपर भी भेदका भ्रम होता है, यथा--
चितव जो लोचन अंशुलि छाये | प्रगट ज़ुगल सस्ि तेहिके भाये ॥
“और भेदकश्षमसे खरूपका विस्मरण होता है, यथा--
दातपथ्च चौपाई ८८
सायावस सझूप चिसराये | तेट्टि अमते दारुन दुख पाये॥
पायो जो दारुन घुसह दुख खुखलछेस सपनेहु नहिं मिल्यों।
सव-सूल सोक अनेक" ' ** * *****००००*०*०*००५०*००+०*००*०*०**“*** ॥
भव सूछ-अर्थात् यह भेदअ्रम ही संसारका मूल है, और
जिसका मूल भ्रम है वह पदार्थ वस्तुतः नहीं होता । यथा---
जग नभवाटिका रही हैं फलि फूलि रे।
धुवों केसो धोरहर देखि तू न भूछि रे ॥
नास(-भाव यह कि मूल नष्ट दोते ही वस्तु छिन्ममूठ होकर गिर
जाती है; पर जिसका मूल भ्रम है उस वस्त॒का तो भ्रमके नष्ट होनेपर
पता भी नहीं चछता | यथा---
जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
प्रबक्ष अबियया कर परिवारा ।
मोह आदि तम मिट॒हिं अपारा ॥
जरथे-अविद्याके प्रवक् परिवार मोह आदि अपार तम
मिठ जाते हैं।
अविद्या परिवारा-अविद्याके परिवार अरथात् अविद्याके बाल-
बच्चे, यथा---
मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेंही ॥
तुर्तर/ केहि न कीन््ह बौराह्य | केट्टिकर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
ज्ञानी तापस सूर कबि कोबिद गन झागार ।
केहिके लोभ बविडंबना कीन्द्र न एह्टि संसार ॥
श्रीसद चक्र न कीन्ह केहि अभ्रुवा बधिर न काहददि ।
रूगनयनीके नेन-सर, को अझअस छाग न जाहि ॥
गुनकृत सन्निपात नहिं केह्दी । कोड न मान मद स्ञेउ निवेही 0
< जानदीपक
जोबन ज्वर केष्टि नष्टिं चछकावा। समता केहिकर जस न नसावा ॥
मत्सर काहि कलंक न छावा | काहि न सोक-समीर ठोलावा ॥
चिंता सॉपिनि काद्दि न खाया | को जग जाहि न व्यापी साया ॥
कीट मनोरथ दारू सरीरा। जेंहि न छाग घुन को अस घीरा ॥
सुत बवित नारि ईपना तौनी | केष्टिकर मति इन कृत न सछीनी ॥
यह सत्र साया कर परिवारा | प्रबल अमित को यरने पारा ॥
प्रवलू-अर्थात् बढ़े बलवान । यथा---
सिध चततुरानन जाष्टि त्राष्ट्री । अपर जीव केद्दि लछेखे माही ॥
भोद्ध आदि तम अपारा-भाव यह कि अविद्यानरत्रिमं मोहादि
अन्धकार हैं, वया--
भसदामोह तम-पुंज!
मिठ्हिं-अर्थात् आत्मानमवसुख-प्रकाशसे द्वी यह अपार अन्धकार
मिठता है। यया--
सयउ अकास कतहुँ तम नाहीं । ज्ञान उदय जिमि संसय जाही ॥
तब सोइ बुद्धि पाइ डँजियारा।
उर गृह बेठि ग्रंथि निरुआरा ॥१२॥
अर्थ-तव चह्दी चिज्ञानरूपिणी बुद्धि हृद्यरूपी घरमे
चैंठकर गाँठ छोड़ती है ।
तब-अर्थात् मोद्दादि तम मिटनेके बाद ।
सोद चुद्धि-अर्थात् वही विशानरूपिणी बुद्धि, जिसने ज्ञानश्वतको
चित्तरूपी दीपकर्मे भरकर समतारूपी दीवटपर स्थापित किया था, जिसने
कपाससे रूई निकालकर बत्ती बनायी और दीपक जलाया था |
पाइ उँजियारा-भाव यद्द कि उपयुक्त सत्र कार्य अधेरेंम हुए;
केचल पहले थोड़ा-वहुत डँजियाला अकाम अप्निका दूधके औदनेतक;
दातपञ्च चौपाई ९७
और बाद उसके योगाप्िका दीया जलनेतक स्थूछ कार्य करनेयोग्य था।
उनसे सोहादि तम मिट नहीं सकते थे; अब परम प्रचण्ड शिखाका
प्रकाश ऐसा हुआ कि मोह आदि तस मिट गये, और सन्थि सूझ
पड़ने लगी।
उर गृह बैठि-भाव यह कि पहले वह बुद्धि दीवट छामे; दौया
रखने, कपास ओटने, ठुनने, बत्ती बनाने और दीया जलछानेमें व्यस्त थी,
कभी अन्तर कभी बाह्य संप्रज्ञात समाधि#में छगी थी, अब छृदयरूपी
घरमें स्थित होकर बेटी |
अंथि निरुआरा-समाधिमें स्थिर होकर जड़-चेतनकी गाँठ
खोलने लंगी !
गॉठ तीन प्रकारसे पड़ी हुई है-( १) प्रान्तिजन्य; ( २ ) सहज
और ( ३ ) क्मजन्य । अहंकार ( कारण शरीर ) का जो कूटरथके साथ
तादास्म्य है सो श्रान्तिजन्य है, चिच्छायासे जो तादात्म्य है सो सहज है
और देहसे जो तादात्म्य है सो कर्मजन्य है। कर्मजन्य ग्रन्थि कर्मके
नाझसे नष्ट होती है | कर्म तीन प्रकारका होता है-(१) जन्म-जन्मान्तर-
का कर्मसमूह जिसे सश्ित कहते हैं, (२) जिन्हें वर्तमान जन्ममें भोगना
है उन्हें भारन्ध कहते हैं और (३) जो वर्तमान जल््ममें करते हैं बह
आगामी कहलाता है | सश्चित कर्म श्ञानीका नष्ट हो जाता है; आगामीसे
उसका लेप ही नहीं होता, केवल प्रारब्ध शेष रह जाता है, यह जबतक
शरीर है तबतक उसका भोग होगा ही । अतएवं कर्मज अस्थि बिना
कमृक्षयके नहीं छूटती । जबतक भ्रान्तिजन्य और कर्मजन्य जृत्ति रहती
है तबतक अन्थि नहीं छूट सकती, प्रतिविम्बके नाशसे नष्ट होती है!
अत्व ज्ञान्विजन्य ग्रन्थिका सुलझाना ही परम पुरुषार्थ है|
# आदि, मध्य भोर ठतीय तीन 'बाह्य समाधि! और इश्यानुविद्ध,
शब्दाज्ुविद् तथा असंग्रश्ञात तीन “अन्तःसमाविः हे
कम 63-
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जज
न
१ शानदीपक
छोरन ग्रंथि पाव जो सोईं।
तो यह जींब छृतारथ होई ॥
अर्थ-यदि चद्द चुद्धि, चिदू-जड़-अन्धि, छोड़ सके तो यह
जीव छृतार्थ हो जाय ।
जौं-सन्देहसूचक है, भाव यद्द कि विश्नव्राहुल्यसे कार्य कठिन है ।
सोई अंधथि छोरन पाव-वही विज्ञानरूपिणों बुद्धि यदि भन्थि
छोड़ने पावे | भाव यह कि उसके सुलझानेमें सन्देह नहीं, पर विश
उसे ऐसा नहीं करने देंगे ।
तौ-अर्थात् विश्नोके अमिभूत होनेके बाद |
यह जीव-अर्थात् जो अपने ही घरमें अशानद्वारा बँधा-सा पड़ा है।
ऊतारथ होई-अहंकारके साथ तादात्म्य कर अपने खरूपकों
विस्सरण करके अनादिकालसे जीब निद्वित पड़ा हुआ, संसारका खम्,
जनन-मरण, सुख-दुःख, शत्रु-मिच्ादिका अनुभव कर रहा है। जिस
प्रकार कोई राजा खम्ममें अपने कारागारमें बद्ध होनेका अनुभव कर रहा
हो। अतः निर्विम्न असंग्रशात समाधिक्रे सिद्ध होनेसे, वह श्रान्तिजन्य
अन्थि नष्ट हो जाती है एवं वह निद्रासे जाग पड़ता है । निद्रासे जाग
जाना ही कृतकारय होना है।फिर तो इस कारागारकी एक ईंट भी
कहीं खोजनेसे नहीं मिछती । सखाराज्यसुख तो उसका कहीं गया ही
नहीं था; प्राप्त ही था। केवछ निद्रादोपसे अप्रात्त-सा हो रहा था; सो
ग्राप्त हो जाता है । निदान, सहज खरूपकी प्राप्तिसे वह कृतार्थ हो जाता
है | यथा--“जानत छुमहिं तुमहिं होइ जाई |!
छोरत ग्रैथि जानि खगराया।
बिघन अनेक करे तब साया ॥२३॥
हशतपश्व चौपाई ९२
अर्थ-देे पक्षियाँके राजा ! गाँठके छोड़नेकी चात जानकर
माया अनेक विश्न करती है।
खगराया-सम्बोधन है; भाव यह कि, आप राजा हैं, जानते हैं कि
खतन्त्रता चाहनेवालेंका मार्ग कैसा कण्ट्काकीर्ण होता है ।
छोरत अंधि जानि-माया जब जान छेती है कि विज्ञानरूपिणी
बुद्धि जड़-चेतनकी गाँठ छोड़ रही है, असंमशात समाधिमें छगी है;
जीव हमारे फंदेसे निकला ही चाहता है ।
विघन अनेक करै-तब अनेक विश्न करती है; जिसमें ग्रन्थि न छूटने
पावे और जीव सदा मेरे वशमें पड़ा रहे | दु्शेंका यह स्वभाव ही है कि
वे दूसरेका भला नहीं देख सकते । आत्मानुभव-प्रकाशसे मायाका दिव्य-
रूप दिखायी पड़ता है | इसके पहले तो इसका परिच्छिन्न स्थूल रूपमात्र
दिखायी पड़ता था | इस रूपकी ओर ध्यान न देकर असंप्रशातमें
तन्मय हो जाना असम्भव हो उठता है। यथा---
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेहि बस जीव परा भवकूषा ॥
तव-अर्थांत् माया जब देख छेती है कि मोहादिका किया
कुछ भी न हुआ, दीपक जल गया और अब गाँठ छूट रही है ।
माया-यहाँ अविद्याका प्रदण है, क्योंकि विद्या तो छोड़नेवाली है |
सिर बिरंचि कहँ मोहई को है बपुरा आान।
मैं जरू मोर तोर से साया। जेहि वस कौन्द्रैद जीव निकाया ॥ ,
गो गोचर जहँ रगि सन जाई । सो सब साया जानेहु भाई ॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम सोझ | बिचया अपर अविद्या दोऊ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेहि वस जोव परा भवकूपा ॥
एक रचइ जग शुन बस जाके। भ्रश्ञु भेरित नहिं निज बल ताके ॥
हरि सेचकहिं न व्यापि अविद्या | अम्लु प्रेरित तेद्दि ब्यापें विद्या 0
श्र जश्ञानदीपक
ऋद्धि सिद्धि प्रेरें बहु भाई।
बुडिहिं लोभ दिखाबे आईं ॥
अर्थ-दे भाई | वहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियोंकों प्रेरणा करती
है, और आकर चुद्धिकों छलचाती दे ।
ऋद्धि सिद्धि-कद्धि अर्थात् ऐवर्य | सिद्धि अर्थात् अणिमा;
गरिमा, रूघिसा; महिमा; प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ।
( १ ) अणिमा) यथा--
ससक समान रूप कपि घरीं ।
(२) महिमा; यथा--
अद्ृदास करि गरजा कपि बढ़ि छाग्रु अकास ॥
(३ ) गरिसा, यथा--
जेहि गिरि चरन देह हन्चुमंता । चछा सो गा पाताल तुर॑ता ॥
(४ ) रूघिमा। यथा--
देह विसारू परम हरुआई।
(५ ) प्राप्ति, यथा--
भट्ट सद्दाय सारद मैं जाना ॥
( ६ ) प्राकाम्य, यथा---
गरल सुधा रिएर करे मिताईं। गोपद सिंधु जनल सिंतलछाई ॥
(७ ) ईशित्व, यथा--
देखि प्रताप न कपि मन संका |
( ८ ) वशित्व; यथा--
हरि प्रेरित तेहि अवसर चलेउ मरुत उनचास |
इत्यादि ।
बतपज्च चौपाई थ्छ
प्रेऱे बहु-माव यह कि ऋचद्धि-सिद्धि सायाकी प्रेरणासे उसकी
सेवाके लिये अपने-आप उपस्थित होती हैं ।
साई-कहनेका माव यह कि हमछोंग सव बराबर हैँ । क्या राजा
क्या रह; क्या पण्डित क्या मूढ़, माया किसीकों नहीं छोड़ती ।
चुद्धिद्चि-अर्थात् यही विज्ञानलूपिणी बुद्धि ही सब कुछ करनेवाली
है, इसीको फसाना चाहिये ।
आई कोभ दि्खिावे-कोई उसे चुलाने नहीं जाता, खय॑ आकर
बुद्धिकों छोम दिखाती हुईं मानो कहती हे कि क्या व्यर्थ काममें छूग
रही हो ( यद्द साम है )) ऋद्धि-सिद्धि जो कुछ चाहो) मैं देनेको पैयार
हूँ ( यह दान है ), जिसके हितके लिये ठुम सब करती हो, बह मुक्त
होते ही तुम्हें भी त्याग देगा ( यह भेद है ) ।
कल बल छल करि जाइ समीपा ।
अंचछ बात बुझाबे दीपा॥२श॥।
अर्थ-करू-वलछ-छलसे समीप ज्ञाकर; अद्धरकी हवासे
दीपक चुझा देती है।
कछ वर छल करि-कछ अर्थात् कल्य ( उपाय ) से पहले
काम छेती है, साम, दास, भेदका अयोग करती है। जब इनसे काम
५८, ७ 8 [4 ५७.
नहीं चलता तब बल अर्थात् दण्डका प्रयोग करती है, यहाँतक, माया-
रानीकी नीति है, यथा---
सास दाम जरू दंड विभेदा। हूप उर बसहिं नाथ कह वेद
नोति घर्मके चरन सुद्दायें।
नीतिसे है प है. होते देखती हक ठिसे [>प
हे जब नीतिसे कार्य सिद्ध होते नहीं देखती तब अनीतिसें भी काम
है । छल करती है।
जाइ समीपा-भाव यह कि मायाका विज्ञानरूपिणी बुडिसे प्रेम
५ घानदी पक
होनेका तो कोई क्रारण नहीं है, वद्ध किसी-न-किसी उपायसे बुद्धिके पास
अपनी खार्य-सिद्धिके लिये पहुँचना चाहती है| अतः वहाँ पहुँचकर---
अंचल चात-भाव यह कि न्त्रियों अश्लकी हवासे दीया बुझाया
करती हैँ । अतः माया भी समीप जानेपर बुद्धिकी कोई अपेक्षा न करके
| अश्वल-वातसे अमायास ही दीप बुझा देतो है । बातका अर्थ यद्दाँ हवा
हैं| हवाफा उपमेय विपव दे। अश्ललके विपयसे तात्पर्य मायारुपी
नारीसे है। यथा--
सबते अति दारन छुसद सायारूपी नारि॥
'देम्ि रूप मुनि बिरति बिप्तारी ।?
कु बिधि सिरे कोन बिश्ि घाछा ॥
मोह आदि तो अविया-रानिक्के तम हूं, पर 'नारि निविड्ड रजनी
अँधियारी” है ।
चुझ्ावे दीपा-बुछि जहाँ तनिक भी मायाके भुलावेमं आयी कि
उसने अवसर पाकर शानदीपकको बुझाया | विशानरूपिणी बुद्धिका संसर्ग
जहाँ मायासे हुआ कि वह अपने स्वरूपसे च्युत हुई, और ऐसा दोते दी
सारी इमारत घराश्ायी हो जाती है । यथा--
सो एरि साया सब ग़नखानी | सोसा तासु कि जाइ् बखानी ॥
देखि रूप मुनि विरति बिसारी। बढ़ी बार छमि रहे निद्वारी॥
साया विवस भय मुनि सूठा | समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा ॥
मुनि अति बिकल मोह सत्ति नाठीं। सनि गिरि गयउ छूट जिसि गॉटी ॥
जब हरिमाया दूर निवारी | नए्ठगिं तईं रसा न राजकुसारी ॥
होइ बुद्धि जो परम सयानी ।
तेहि तन चितव न अनहित जानी ॥
अर्थ-जों बुद्धि परम सयानी हो तो मायाकों अनद्वित
समझकर उसकी ओर इष्टिपात न करे ।
दतपश्च चौपाई हि
घुद्धि परम सयानी-अर्थात् विज्ञानरूपिणी बुद्धि तों सयानी
होती है। जो अपनी छाम-हानि देख सके सो सयानी है, यथा--
कह राचन सुन सुखखि सयानी। संदोदरी आदि सब रानी ॥
तव अनुचरी करों पन भोरा | एक वार विलोकु सम ओरा ॥
अतः बुद्धि यदि केचछ सयानी होगी तो छोममें आ जायगी, और
यदि परम सयानी ( धीरत्वसम्पन्ना ) होगी तो अपने स्वामी युरुषका
लाभ देखेगी। यथा--
निज घरकी बर वात विलोकहु हो तुम परम सयानी॥
होइ जो-भाव यह कि साधारण नियम तो ऐसा ही है कि बुद्ध
परम सयानी नहीं होती, मायाकी वा्तोंमें आ जाती है, और यदि हो
तो वात दूसरी है ।
तेहि तन चितव न-भाव यह कि उस मायाकी ओर आँख
उठाकर देखे ही नहीं, और न उसकी बात घने, अपने ग्रन्थि सुलझानेके
काममें छगी रहे | जबतक विशामरूपिणी बुद्धि स्थिर है; तबतक मायाकी
भी सामर्थ्य नहीं कि उसके निकट जा सके, दीप बुझाना तो दूरकी बात
है। यथा--
परमाश्थ खारथ सुख सारे । भरत न सपनेहु सनहु निहारे॥
अनदित जानी-अर्थात् बात हितकी-सी करती है; पर है वह
माया अहितकारिणी, वह स्वामीका अकल्याण चाहती है, ऐसा समझकर
उसकी ओर न देखे ।
जो तेहिः बुद्धि बिघ नहिं बाघी।
तो बहोरि सुर करहिं उपाघी॥२प।
अर्थ-यदि उस चुद्धिको विन्न वाधा न कर सके तो फिर
देचता छोग उपाधि करते हैं ।
१-सुख इरखहिं जड़ दुख बिलखाही । दोठ सम धीर परदि मनमाहीं॥#/
द्छ जझानदीपक
तेद्ि चुद्धि-अर्थात् परम सयानी बुद्धिकों, जिसने मायाकी ओर
हजार चेष्टा करनेपर भी ध्यान नहीं दिया |
जौ विध्य नि वाधी-यदि मायाकृत प्रत्यमोमन आदिने बाधा
नहीं की और माया समीप न जा सकी एवं उसके अश्वल्यातकी गति
शानदीपकत्तक न हो सकी । ( विशानकूपिणी चुद्धिद्वारा असम्प्रशात-
समाधिमें कोई अन्य चृत्ति नहीं उठने पाती, इससे विषयरूप वायुका
प्रचार वहाँतक नहीं हो सकता । )
कल जे
तौ घद्दोरि-तब माया देवताओंको प्रेरणा करती है कि वे बलपूर्वक
इन्द्रियद्वासी खोल दें, जिसमें विपयवश्रारि भीतर प्रवेश करके अन्य
वृत्तियोंकी खड़ी कर दे | क्योंकि देवता भी मायाके वश हूं, यथा---
देव दनुज नर नाग असुर सब साया विवस बिचारे |
( विनय० )
खुर करहि उपाधी-अर्थात् देवता लोग उपाधि करते हैं, जिसमें
अन्थि न छूटने पावे और जीवके द्वारा जो भोग उनको मिला करता है;
उसमें बाधा न हो | जीव देवताओंके पश्च॒ हैं, इस छोक और परलोक
दोनोमें वे देवताओंद्वारा उपभुक्त होते हैं; यथा---
जाये देव सदा स्थारथी | वचन कहेँ जलु परभारथी ॥
इंद्रिय. वार झरोखा नाना।
तहँ तहँ घुर बैठे करि थाना ॥
अर्थ-देहग्रदमें इन्द्रियद्धार ही माना प्रकारके झरोखे हैं,
जिनमें देवता गद्दी ऊगाये बेठे हैं
इंद्रिय द7९-इन्द्रियाँ दस हैं-पाँच बामेन्द्रिय और पॉच कर्मेन्द्रिय ।
शानेन्द्रिय-ओच; त्वकू; चक्षु; रसना और प्राण । तथा कर्मेन्द्रिय-
वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ | इन्द्रियोंके द्वार अर्थात् गोलक मी
झतपशञ्च चौपाई ९८
फलतः दस ही हैं। इन्द्रियाँ सृक्ष्म हैं, दिखछायी नहीं पद्धतीं, उनके
द्वार दिखलायी पढ़ते हैं | अर्थात् इन्हीं द्वारोसे निकलकर इन्द्रियोँ
अपने घविषय शब्द, स्पश) रूप, रस, गन्ध, भाषण, ग्रहण, गमन।
मलत्याग तथा आनन्दका क्रमशः ग्रहण करती हैं ।
झरोखा नाना-ये ही द्वार नाना प्रकारके झरोंसे हैं । नाना इस-
लिये कहा कि किसी-किसी इन्द्रियोंके दोहरे झरोखले हैं, जैसे ऑँख और
कानके, और स्पद्ा-इन्द्रियका तो रोम-रोम झरोखा-ही-झरोंखा है।
तहें तह-उन प्रत्येक झरोंखोंमे ।
खुर-देवता अर्थात् इन्द्रियोंके देवता। श्रोत्रके दिकू, त्वकके
वायु, चक्षुके सूर्य; रसनाके वरुण, घाणके अश्विनीकुमार, थाकक़े वहि,
हाथके इन्द्र, पादके विष्णु, पायुके मृत्यु और उपस्थके प्रजापति
देवता हैं ।
बैंठे करि थाना-इन देवताओंका प्राणिमात्रकी देहेन्द्रियोपर
अधिकार है। ये साधकके इन्द्रियद्धारूूपी झरोंखोंमि अधिकार जमाये
बैठे हैं। भाव यह कि वहींसे उनको भोग मिछता था | बृक्तियोंके न
उठनेसे भोग मिलना बंद हो गया है, अतः वे उत्ति योौको उठानेके लिये
अवश्य प्रयक्ष करेंगे ।
आवत देखहिं बिषय बयारी |
ते हठि देहि' कृपाट उघारी ॥२७॥
अये-जवब विषयरूपी हवाके झाँकेकी आते देखते हैं, तो
चवलपूबेक कियाड़ खोल देते हैं ।
विषय वयारी-विषयरूपी हवाका झोंका | भाव यह कि बुद्धि
झुलवेमें नहीं आग्री तो इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है कि किसी
भांति दीया बुझ् जाय | और दीया बुझानेमें समर्थ दवाका झोंका है |
० शानदीपक
इसी विपय-बयारिके डरसे बुद्धि उरण्हमें दीया जलाकर गाँठ छोड़ने
बैठी है, कि बाहर रहनेसे हवाके झोंकेसे दीया बुझ जायगा। अतएव
मायाकी प्रेरणासे सब प्रकारके विषयोंके झोंके आने लगते हैं |
आवत देखहिं-ये देवता लोग जब झरोखेसे अर्थात् इन्द्रियह्वारसे
देखते हैं कि झोंका आया।
ते हढि देहिं कपाट उधारी-तव जबरदस्ती झरोखेका
किवाड़ खोल देते हूँ | बुद्धि आसन और मुद्राद्वारा इन्द्रियद्धार झरोखों-
को बंद करके उरगइमें बैठी थी; ये हठ करके झरोखेका किवाड खोल
देते हैं | बुदि मना करती ही रह जाती है; उसकी एक नहीं सुनते ।
भाव यह कि साधककों मधुमती भूमिकाकी प्राप्ति होती है, और बह
सिद्धियोमें आसक्त हो जाता है ।
जब सो प्रमंजन उरणह जाई ।
तबहिं दीप बिज्ञान बुझाई॥
अर्थ-ज्ञब वह हवाका झोंका छ॒ंद्यरूपी धरके भीतर जाता
है, तो विज्ञान-दीप चुझ जाता है।
जब स्रो प्रभंजन-प्रमंजन इसलिये कहा कि प्रकरष करके भज्ञन
करनेवाला है, बड़े-बड़े पेड़ तोड़ डाले, मकान मिरा दिये; फिर दीया
बुझाना क्या चीज है !
डउरगृह जाई-अर्थात् झरोखेका कपाठ खुलते ही प्रमेज्ञन घरके
भीतर पहुँचा, दिव्य विषय अपने-आप उपस्थित हो गये ।
तबईहिं दीप विज्ञान बुझाई-भाव यह कि पलमात्रमे दीवट
कहीं गयी; दीया कहीं गिरा; बची कहीं बुझकर उड़ गयी | एक पल्में
अति दुरूह साधन ऐसा नष्ट हुआ कि कहीं पता नहीं । साधक दिव्य
विषयोमे लिप्त हो गया ।
दातपश्च चौपाई की
अंधि ने छूटे मिटा सो प्रकासा।
बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥रणज।
अर्थ-गाँठि भी नहीं छूटी, चह उजेला भी मिट गया और
विषय-चायुस्ते चुद्धि विकलछ हो गयी ।
अंधि न छूटि-जड़-वेतनकी ग्रन्थि छूटने न पायी, जिस काम-
के लिये इतना परिश्रम किया गया सो हुआ ही नहीं । ह
मिंठा सो प्रकाला-'आतम अनुभव सुख सुप्रकासा' मिट गया ।
वह प्रकाश तो 'सोडहमस्मि' वृत्तिके आश्रय था, जब विधयके झेकेसे
सोंडइमस्मिवृत्ति ही न रही तब भला प्रकाश कहाँ रहे ! ४
विषय वतएसलए-विपयकी प्रचण्ड हवासे | अर्थात् प्रचण्ड दवाके
बेगको बृत्तिजन्य ज्ञानदीप नहीं सह सकता ।
चुद्धि विकछ भइ-और इतने परिश्रससे तैयार किये हुए. प्रिय
दीपके बुझनेसे तथा स्वामीके उद्धारके उपायमें भम्न-मनोंरथ होनेसे एवं
झोंकीकी चपेट्से बुद्धि मी विकल हो जाती है, उसका साहस टूट जाता
है और कुछ सूझ नहीं पड़ता |
इंद्रिय-सरन्ह न ज्ञान सोहाई ।
बिषयसोगपर प्रीति सदाई ॥
अर्थ-इन्द्रियके देवताओंकी भ्रीति सदा विषय-भोगोंपर
रहती है, उन्हें शान नहीं खुदाता ।
इंद्विय-खुरस्दद-इन्द्रियके देवताओंकों | देवताभोके अनेक भेद
हैं। उनमें शानी देवता और विरक्त देवता भी हैं, यहाँपर उनसे तात्पर्य
नहीं है, इन्द्रियोंके देवताओंसे तात्पर्य है )
न ज्ञान सोहाई-शान नहीं अच्छा छुगता। शान होनेसे प्राणी
१०१ शानदीपक
विषय-विमुख हो जाता है; अतएवं देवताओंके भोगर्म कमी आने
लगती है । सष्टिके प्रारम्ममें विरादकी उत्पत्तिके बाद जब उसे क्षुधा-
तृपासे युक्त किया, तब भूख-प्याससे दुखी होकर इन्द्रिय-देवताओंने
अपनी ततिके लिये बद्यदेवसे व्यध्टि शरीर रचनेकी प्रार्थना की। अक्षदेवने
ऊपर दॉतवाली गी रची उससे वे ल्लोग तृत्त नहीं हुए । उन्होंने कद्य
'नायमलछूमिति)% | तब ऊपर-नीचे दोनों ओर दातवाला घोड़ा रचा |
तब वे बोले क्रि इससे भी हमारा काम नहीं चलेगा, तब मनुष्य रचा |
डसे देंखकर देवता बड़े प्रसन्न हुए. कि दससे हमारा काम चलेगा। अतः
देवता दन्द्रियोँके रूपसे यथास्थान अश्ठेमें प्रवेश कर गये | अतएव ऐसे
भोंगसाधन (मनुष्य ) का विषय-विमुख होकर ज्ञानी होना उन्हें
अच्छा नहीं लगता ।
विपयभोगपर पधीति सदाई-ज्ञान न अच्छा छगनेका कारण
कहा कि सदा इनकों विपय-भोगपर भीति बनी रहती है, वे एक क्षण भी
विपषयसे अलग रहना नहीं चाहते, फिर इन्हें विषयका विरोधी शान कैसे
अच्छा छंगेगा ? यथा---
ऊँच निवास नीच करदूती । देखि न सकट्दू पराइ विमृत्ती ॥
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी |
तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥ २८ ॥
अर्थ-विपयचायुने चुद्धिकों पगछी चना दिया; अब उस
विधिसे फिर दीप कौन जछाता है ?
विषय समीर-समीर अर्थात् वायु । समीर-शब्दका व्युत्यत्तिलम्य
अर्थ है (अच्छी तरह चलनेवाला ।* भाव यह कि विपयका अंधड़ बंद
नहीं होता, चला ही करता है।
# यद्द हमारे लिये यथेष्ट नही है।
आतपथ्च चौपाई १०२
बुद्धि रूत भोरी-अर्थात् उस समीरने परम सयानी बुडिकों
भोरी ( पगली ) बना दिया ।
तेहि विधि दीप-भाव यह कि जितनी श्रद्धा, चैये और परिश्रम-
द्वारा, जिस विधिसे यह दीप जछाया गया था, उस विधिसे भम्ममनोरथ होंने-
परफिरसे संभव नहीं है ओर अविधिसे जछाये हुए; दीपमें 'सो5हमस्मिः इस
अखण्ड वृत्तिकी न दीपशिखा होगी और न आत्मानुभव-सुप्रकाश होगा ।
को वार बहोरी-फिर कौन जलछाता है ? भाव यह कि जलानेवाली
तो विज्ञानरूपिणी बुद्धि है; वह भोरी हो गयी, बिना उसके दूसरेकी
सामर्थ्य नहीं कि ऐसा दीप कोई जला सके । अतः फिर इस जन्ममें
ऐसे दीपका जलना सर्वथा असम्भव है |
गोखामीजी विश्नेंसि बचनेका उपासनाके अतिरिक्त कोई उपाय
नहीं देखते और न एक बार दीप बुझनेपर इसी जम्ममें अव्पायु होमैके
कारण फिर जलाया जाना सम्भव समझते हैं। विधा नाश उपासनासे
होता है, यथा--
सकलछ बिन्न व्यापे नहिं तेही । रास सुकृपा विछोकद्दिं जेद्ी ॥
दो०-तब फिर जीव बिबिध बिधि पावे संसति क्लस ।
हरिमाया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥
अर्थ: ह.०.६ [..]
-तब फिर जीव अनेक प्रकारके संसारयी फलेश पाता
है, हरिमाया अति डुस्तर है, उससे पार नहीं पाया जाता ।
तव फिर-अर्थात् जिस भाँति साक्त्विकी श्रद्धाके हृदयमें आनेके
पहले अवस्था थी वही फिर हुईं, इतना बड़ा अयास व्यर्थ गया।
भाव यह कि अनन्तकालसे जीव ज्ञानदीपके उद्योगर्मे है। अनेक जन्ममें
दीप जला और बुझा, पर अन्थि नहीं छूटी, संसार ज्यों-का-त्यों बना
रह गया ।
१०३ ज्ञानदीपक
जीव-भाव यह कि 'सोडहमस्सि वृत्तिकों छेकर अपनेकों ब्रह्म मानते
थे, सो फिर जीव-के-जीव हो गये |
विविध विधि पाबे संख्ति फ्लेस-अर्थात् अनेक मकारके सांसारिक
कलश पाता है| जन्मका छेद, बाल्यावस्थाका छेश, यौवन तथा वार्द्धक््पका
क्लेश, तत्पश्चात् मृत्युका छेश, तदनन्तर फिर जन्म, फिर मरण, छेंशका अन्त
नहीं है । कछेश पाँच दँ--अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेप और अभिनिवेश |
हरिमाया अति उुस्तर-दरिमाया अति अपार है, यथा--
हरिसाया कर अमित प्रभावा | चिपुल बार जेहि सोदधि नचादा ॥
खग जगमय सथ मम उपजाया | नहिं. आचरज मोह खगराया ॥
सो ज्ञानिहु कर चित अपहरई । वरियाई विभोह बस करई॥ा
इरिसाया सोद्दृद्धि झुनि ज्ञानी
तरि न जाइ-अर्थात् तरा नहीं जाता । भाव यह कि जब आसुरी
माया और दैवी सायाका तरना ही भनुप्यके लिये असम्भव है; यथा--
ज्ञानि न जाय निसाचर माया ।! 'खुर मायाबस छोग बिसोहे ।?
इत्यादि, तब इरिमाया कैसे तरी जायगी |
विहगेस-गरुड़कों विहगेश कहकर मायाके विप्तका प्रकरण
समाप्त करते हूँ, प्रकरण 'खगराया? से आरम्म किया था। यथा--
छोरत भ्ंथि जानि खगराया । विन्न अनेक करे तब साया ॥
दो०-कहत कठिन समसुझत कठिन साधन कठिन बिबेक।
होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों पुनि प्रत्यूह अनेक॥
अर्थ-कटना कठिन, समझना कठिन, साधन कठिन और
विवेक कठिन है, यदि घुणक्षरन्यायसे दो भी जाय; फिर भी
अनेक विषघ्न हैं ।
शतपशञ्च चौपाई १०४
कहत कठिन-अर्थात् कहते नहीं बनता, यथा---
उर अनुभवत्ति न कहि सक सोऊ | कौन प्रकार कहें कवि कोऊ ॥
धन जात बखानी' कहकर मक्रण आरम्म किया था और “कहत
कठिन” कहकर उपसंहार करते हैं
समुझत कठिन-प्रमसे सनी हुईं बुद्धि है; अतएवं यदि कोई
कहे भी तो समझना कठिन है, यथा-समुझि न परे बुद्धि श्रमसानी !!
धसमुझत बने न! कहकर उपक्रम किया; अब 'समुझत कठिन कहकर
उपसंहार करते हैं।
साधन कठिन-यदि किसी भाँति कद्दते-सुनते भी बने तो
साधन कठिन! है क्योंकि मनको कोई आधार नहीं मिलता, निगुंण
निराकारमें मनकी गति नहीं है। यथा--
साधन कठिन न मन कहूँ टेका ॥
कठिन विवेक-अर्थात् सुनने-समझने, साधन करनेपर भी
विवेक-शान होना कठिन है, यथा--
सुनिय गुनिय समलझ्िय समुझाइय दसा छदय नहिं जावे ।
जेहि अनुभव विज्वु मोहजनित दारुन भव बिपति सतताबे #
(विनय० )
होइ छुनाक्षर न्याय ज्यों-काठमें घुन लगते हैं, जिससे उसमें
कभी-कभी अक्षर बन जाता है । घुनकों अक्षरका ज्ञान नहीं जो बना
सके, फिर भी देवयोगसे कोई अक्षर बन जाता है। उसीको घुणाक्षर-
न्याय कहते हैँ । इस न्यायसे भी यदि शानदीपक ठीक उतर जाय तो--
धुन्ाक्षर न्याय! कहकर 'अस संजोंग ईशा जब करई” का
साफल्य दिखलाया |
पुनि अ्त्यूह अनेक-फिर भी वहुत-से विष्न हैं, जो जड-चेतमकी
अन्थि नहीं खोलने देते |
श्ण्५ शानदीपक
ज्ञानपंथ कृपान कर धारा।
परत खगेस होत नहीं बारा ॥
अर्थ-शानमार्ग तलवारकी धार है। इसपरसे गिरते, हे
गरुड़ । देर नहीं लगती ।
शानपंथ-अर्थात् अकृतोपास्तिशानका साघन। भाव यह कि
छउपासनाकी सहायता बिना लिये जो ज्ञान-सिद्धि चाहते हैं, उनका मार्ग ।
कृपान कर धारा-भाव यह कि शानपन्थ बड़ा ही सूक्ष्म है
बस, उसे तलवारकी धार दी समझिये । रास्ता क्या है, निरालम्ब मार्गमें
एक रेखा है । झलेपर चलना कितना कठिन है ! फिर उस कृपाणकी
धारापरसे कोई क्या चलेगा !
खगेस-सम्बोधन, मायाकृत विष्नसूचक |
परत होत नहिं' चारा-गिरते देर नहीं लगती । चलते बड़ी
देर लगती है | तारपर या रघस्सेपर चलनेवाले समताकों बनाये हुए बड़ी
कठिनता और देरसे पैर रखते हैँ | तनिक-सा समतामें चैषम्ध आया कि
पतन हुआ; यहाँ तो कृपाणघारा-सा रृक्ष्म पथपर चलना है; पतनमें 'क्या
देर है ! यथा---
जे ज्ञान मान बिमत्त तब भय-हरति भगति न आदरी।
ते पाहू खुर दुरकूभ पद्राद॒पि परत हम देखत हरी ॥
जौ निर्बिन्न पंथ निरबहई ।
तो केवल्य परमपद लहई ॥श्था
अर्थ-यदि विन्चनकोी अतिक्रमण करता हुआ रास्ता पार
करे तो कैचल्य परमपद् पाये ।
डातपश्च चौपाई १०६
निर्विन्न पंथ-बहुत बड़े और घने विज्नवाले मार्गकों निर्विन्न
निवाहना परम पुरुषार्थ हे ।
जन निरवद्ई-जो परम पुरुषार्था आश्रय करके सब विन्त-
बाधाओँकों झेलता हुआ बिना पतनके पार पहुँच जाय )
तो कैबल्य परमपद् लरद्दई-तों केबल्थ नामक जो परमपद
है उसको प्राप्त होता है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मकी स्थितिक्रों प्रा होता है;
यथा--
जानत सुमहिं ठुमहिं होइ् जाई ॥
अति दुलेस कैबल्य परमपद् ।
संत पुरान निगम आगम बद ॥
अर्थ-कैचल्य परमपद् अति दुलम है। संत, पुराण, वेदः
शास्त्र ऐसा ही कद्दते हैं ।
केवल्य पद-त्रिदेवके अधिकारकों पद कहते हैं, यथा--
भरतहिं होइ न राजमद विधि-हरि-हरपद पाई? परन्तु केवल्यपद
उससे भी बड़ा है; इसलिये परमपद कहा ।
अति दुलेभ-भाव यह कि अन्तिम देह ब्राह्मणकी सुर-दुलभ है;
यथा--
चरम देह ह्विज कर मैं पाया | सुरदुलूभ घुरान श्रुति गावा ॥
5 ० हज विचे हर रु मुनिदुर्लभ_ के
उस शरीरमसें भी विरति, विवेक, ज्ञान, विज्ञानका होना मुनिदुलभ_
है, यथा--
ज्ञान विबेक बिरति बिज्ञाना | सुनिदुर्लम गुन जे जग जाना 0
. उन शुर्णोंके होते हुए मी, उनका फलरूप करेबल्यपद अति
दुलम है|
१०७ शानदीपक
संत पुरान निगम आगम चद-अथांत् साधु) वेद, शास्त्र,
पुराण सभी कद्दते हैँ | भाव यह कि वेद, दान्त्र, पुराणके कहनेपर भी
साधुरओके अनुमोदनकी अपेक्षा रहती है | क्योंकि वेद, पुराण सर्वाश्चर्मे
समुद्रल्प ऐोनेपर भी उनके वाक्यरूपी जलसे काम नहीं चलता | जन्र
बह चेंद, पुराणरूपी समुद्रका चादय-जछ मेघलानीय साधुओंके मुखसे
च्युत दोता है तब संसारके कामका दोता ऐ। यथा--
खेद घुरान उदयुधि घन साथू।
परी रच रह
जतः वेद, पुराण, शाल्र और साधु सब एक स्वस्से कहते हैँ कि
कैवल्यपद अति दुलंभ दे, यही परम पुरुषार्थकी सिद्धि है ।
तृतीय ग्रसद्भ
श्रीभक्ति-विन्तामणि
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राम सजत सोइ मुकुति गोसाईं ।
अनइच्छित आबे. बरिआई ॥ ३०॥
जर्थ--हे गोसाई | रामको मजते-भजते वह्दी मुक्ति विना
चाहें भी चलपूर्वक आती है।
राम भमजत-भाव यह कि साधारणतः संसारी जीव संसारकों मजते
हैं । संसासमें ममता होना ही संसारकों भजना है; और देहमें, गेहमें,
कुटम्बमें, परिवारमें, घनमें, सम्पत्तिमें ममता होना ही सांसारिक ममता या
संसारित्व है । मनसे इत्तिरूप मसताके तागे निकलकर देह-गेह-कुटम्बादि-
में छगे हुए हैं, जिनकी चौतरफा खींचतानसे मन सतत विकल रहता
है, कभी विश्वाम नहीं पाता, वथा--
कवहूँ सन विश्वास न सान्यो |
चिसिदिन अमत वबिसारि सहज सुख, जहेँ तहँ इंड्धिय तान्यो |
|
१०९ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
इसी दु»खसे छूटनेके लिये शारत्रोंकी उपयोगिता है, और पुरुषार्थ-
की प्रचृत्ति है। इस दुःखसे छूटनेके दो ही रास्ते हैं । या तो ममताके
तागे ही काट डाले जाये, या ममता संसारसे तोड़कर राममें जोड़ी जाय;
यथा-
को करू ममता रामसे की ममता परहेलछ ।
इनमें ममता-तागें काटनेवाले रास्तेकों ज्ञानपंथ कहते हैं; यथा--
“ममता त्याग करहिं जिमि ज्ञानी ।! परन्तु यह मार्ग दुर्गम है, इसमें
विन्न बहुत हैं, साधन भी कठिन है, मनकों कोई अबरूम्ब नहीं मिलता ।
अतः इस रास्तेमें कष्ट बहुत हैं; यथा--
ज्ञान अगम भत्यूह जनेका | साधन कठिन न मन कहूँ टेका ॥
करत कष्ट बहु पाने कोऊ | भक्तिदीन मोहिं प्रिय नहिं सोऊ ॥ -
इसमें पर्स अधिकारकी आवश्यकता है। अतः इसके अधिकारी
भी बहुत कम हैं । भुशुण्डिजीने खयं अपनेको इसका अधिकारी नहीं
माना) यथा---
, 'मोहि परम अधिकारी जानी ॥! “छगरे करन ब्रह्म उपदेसा ।!
सो हें तोदि ताहि नहिं भेदा। वारि बीच हव गावरहि बेदा ॥
यदि किसी भाँति ज्ञानकी प्राधि हो भी जाय, तो उसका टिकना
बिना उपासनाके सम्भव नहीं, उसका पतन हुए बिना नहीं रहता, यथा--
जे ज्ञान मान चिमत्त तव भयहरनि भगति न आादुरी।
ते पाह सुर हुरलूम पढदादपि परत हम देखत हरी ॥
अतः दूसरा सुगम मार्ग यह है कि ममता राससे जोड़ी जाय |
इसीको मक्तिपथ कहते हैं | इसमें ममताके तागे काटे नहीं जाते, क्योंकि
इनको काटनेमें जन्म-जन्म अभ्यासनिरत मनकों महाकष्ट होता है।
मनसे भी ममतात्यागका ध्यान करनेसे अस्य बेदना होती है। अतः
इसकी विधि यह है कि देह-गेह-कुठम्वादिमें जहॉ-जहाँ ममताके तागे छगे
हो, वहाँसे हदाकर सबको बट डाला जाय; यथा--
दतपशथ्च चौपाई ११०
जहँ ऊगि नाथ सनेद्र सगाई | भीति प्रतीति निगम निज गाई ॥
सोरे सघुद्द एक तुम खासी ।
और इस भाँति बँटी हुई डोरीको भगवच्रणोंमें बॉधे, यथा--
जननी जनक वंधु सुत दारा । तन घन सहज सुहद परिवारा ॥
सबके ममता ताम बटोरी | मम पद भनहिं बाँधु बरि डोरी गा
समदरसी एच्छा कछु नाहीं | हपँ सोक भय नदिं मनमाहीं ॥
इस भाँति ममताकी डोरी भगवच्चरणोंमें लग जानेपर मन खींचा-
तानीसे छूटकर स्थितिकों आस होता है, केवल अस्मितामान्र रह जाती है,
जिसे ज्योतिष्मती प्रत॒त्ति कहते हैँ । इससे प्रकाश होता है, और सबमें
समान रूपसे ब्रक्ष दिखायी पड़ने ऊगता है, और साधक दृर्ष-शोकसे
छूट जाता है । वद्दी ममता संसारमें होनेसे अन्धकारमबी अविद्या थी, और
वही ईश्वर-प्रणिधानसे ज्योतिष्मती विद्या हो गयी | यही राममजन है।
खोद झुकुति-भाव यह कि साधनकी सुगमतासे कोई सिद्धिमें
च्रुटि न मान ले; अतः कहते हैं कि सालोक्य, सामीष्य, साष्टर्थ या
सारूप्य नहीं, बल्कि वही चित्जड्ग्रन्थिविमोकरूपा कैवल्यमुक्ति-
( वह्दी शुतिस्म॒तिप्रसिद अति दुलूभ परमपद ) जिसके लिये इतना वड़ा
मगीरथ प्रयक्ञ करके ज्ञानदीप जछाया गया, और फिर भी विष्नवाहुल्य-
के कारण प्राप्त न हो सकी ।
गोखाई-भाव यह कि आप भी ख्ामी हैं, आप जानते हैं कि
सेवककी भक्तिसे प्रसन्न होकर, स्वामी उसके अभिमुख होते हैं, उसपर
अनुग्रद करते हैं, इसी भाँति भक्तिविशेषसे ( मानसिक, बाचिक वा
कायिकसे ) भीराम अमिमुख होकर अभिष्यान# मान्नसे भक्तपर अनुग्रह
करते हैं, और उसके मनोरथको पूर्ण करते हैं, यथा--“भजत कृपा
करिहेँ रघुराई ॥?
+# संकल्प ।
१११ श्रीमक्ति-चिन्तामणि
अनइच्छित-भाव यह कि सामान्यतः जीव अति आवदे होकर;
जिज्ञासु होकर, अर्थार्थी होकर अथवा ज्ञानकी स्थिरताके लिये रामके
सम्मुख होते हैं, यथा---
शस भगत जग चारि प्रकारा | सुकृती चारिड अनघ उदारा श।
परन्तु ऐसी एकाड्भी ग्रीति करनेवाले निष्काम भक्त भी होते हैं,
जिनको भजनमें ही ऐसा आनन्द मिल गया है कि वे मुक्ति तककी उपेक्षा
करते हैं, उनके लिये मुक्ति अनइच्छित है, यथा--
अर्थ न धर्म न काम रुचि; गति न चहों निर्वान ।
जनम जनम रति रामपदु, यह चरदान न जान ॥
जैसे अर्थ ( रुपया ) सुखका साधनमात्र है; और इसीलिये जगत्
उसके लिये छाल्ययित रहता है; और समी थोड़ा या बहुत परिश्रम
अथॉपार्जनके लिये करते हैं, परन्तु फोई-कोई ऐसे भी हैं जिन्हें अर्थ-
संग्रहमें ही कोई ऐसा विशेष आनन्द मिल गया है; कि वे अर्थके लिये
ही सब्र दुःख उठाते हैं, और उस अर्थसे कोई सुख लिया नहीं चाहते,
किसी भाँति जीवन-निर्वाह कर छेते हैं, और सुखकी ओरसे उनकी
सर्वथा उपेक्षा-बुद्धि हों जाती है, सुख उनके लियि अनइच्छित पदार्थ
हों जाता है, इसी भाँति अनन्य भक्तके लिये मुक्ति भी अनिच्छित हो
जाती है, यथा--
सम गुन आस नासरत, गत इर्पा मद भोह।
तेहि कर सुख सोह जाने, चिदानंद संदोह ॥
तथा---
जलद् जनम भरि सुरति बिसारै। जाचत जछ पबि पाहन डारे ॥
चातक रटनि रटे घटि जाईं। बढ़े प्रीति सब भाँति भछ्ाईं ॥
[५|
आधे वरिआई-रामका मजन करनेसे विज्नोंका अभाव तो हो ही
जाता है, यथा--
शतपशथ्च चौपाई श्र
- सकल विन्न व्यापह्दिं नहिं तेही | रास सुकृपा बिलोकट्ठिं जेही #
उसके साथ-साथ प्रत्यक् चेतनका अधिगम अर्थात् ख्वरूपका दशशन
भी होता है । भाव यह कि भमताकी डोरी राममें छगनेसे तत्पदवाच्य-
का दर्शन तो उसे होता ही है, साथ-ही-साथ उसे त्वंपदवाच्यक्रा भी
दर्बान हो जाता है; यथा--
»भंम दरसन फल परम अनूपा। जांच पाव निज सहज सरूपा ॥
जिस भाँति ईश्वर-पुरुष, झुद्ध, प्रसन्न, केवल है और जात्यायु-
भोगसे रहित है, उसी भाँति बुद्धिका प्रतिसंवेदी# पुरुष त्वंपदार्थ भी है;
अतः एकके साक्षात्कारसे दूसरा भी जाना जाता है। सदृश अर्थक्रे
अनुच्चिन्तनसे दूसरे सदश पदार्थके साक्षात्कारकी उपयोगिता होती है,
जिस माँति एक शासत्रके अभ्याससे उसके सहश दूसरे शास्रके श्ञानकी
उपयोगिता होती है । तत्पश्चात् भेदासहिष्णु भक्ति दोनोंका ऐक्य कर
देती है, अर्थात् चितजड्श्रन्थि छोड़ देती है, यथा--
, देखा जीव नचावे जाहो। देखी भगति जो छोरे ताही ॥
इस प्रकार मुक्ति वरिआईसे आती है । ऐसी अवस्थामें यदि सैवक-
सेंग्यमाव भयल रह जाय तब तो मुक्ति रुकती है नहीं तो बिना चाहे भी
मुक्ति हो जाती है, यथा--
सो अनन्य अस जाकर, भत्ति न टरै हजुसंत |
हा]
सें सेवक सचराचर, रूप स्ामि भगवंत॥ा॥ा
यही मुक्तिका बलपूर्वक आना है। मुक्तिके इस माँति आनेका
कारण यह है कि--
जिमि थल बिचु जल रहि न सकाई । :
कोटि भाँति कोड करे उपाई ॥
# प्रतिविम्बित ।
श्श्३ शरीभक्ति-चिन्तामणि
तथा मोच्छसुख सुनु खगराई ।
रहिं न सके हरिसगति बिहाई ॥३११॥
अर्थ-जैसे धलके विना जल नद्ठीं रह सकता, चाहे कोई
कोटि भाँति उपाय करे, चैसे ही हे गरुड ! मोक्षखुख हरिभक्ति-
को छोड़कर ठद्दर नहीं सकता |
जिमि जल धलर-यहाँ जलछ-थछका दृष्टान्त दिया गया है। जल-
थलमें आधाराधेय सम्बन्ध है । जल आधेय है, थल आधार है । जलका
प्च्यवनशील ख्माव है, अतः उसके ठहरनेके लिये थलकी आवश्यकता
है | जो जिसका आधार नहीं है, बह वहाँ ठहर नहीं सकता । आकाश;
वायु और अम्नि ये भूतत्रय जल्के आधार नहीं हैं, अतः वहाँ जाकर भी
जल नहीं ठहर सकता । इसके कारण ईश्वरीय नियम हैँ, तदनुसार
रहनेमें ही सुख है, यथा--
गगन समीर अनल जल धरनी । इनके नाथ सहज जड़ करनी ॥
अस्षु प्रेरित भाया उपजाये | सृष्टि देतु सब अ्रथनि गाये ॥
प्रभु आज्ञा जेड्टि कह जस जहई । सो तेद्दि भाँति रहे छुख रूदई ॥
विज्ठु रहि न सकाई-भाव यह कि थछका साथ नल नहीं छोड़
सकता | जहाँ जल-ही-जलू हो वहाँ मी अनुमान करना पड़ेगा कि
आधाररूपमें थल विद्यमान है; क्योंकि ईश्वरीय नियम भन्ञ नहीं होता ।
कोड-भाव यह कि साधक चाहे कैसा ही समर्थ हो । जीव तीन
प्रकारके होते हं--( १ ) विधयी, ( २) साधक और (३ ) सिद्ध, यथा-
निपयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ॥
सो इनमेंसे चाहे कोई भी हो वह उपर्युक्त नियम भन्न करनेमें
असमर्थ है ।
कोटि भाँति उपाय करे-जों कार्य सासान्य रीतिसे नहीं होता,
उसके लिये उपाय किया जाता है; यथा--
८
शतपश्च चौपाई ११७
तद॒पि एक मैं कहव उपाईं | करिअ दैव जो होय सहाईं॥
अतः उपायद्वारा, यन्चद्वारा चाहे जल अन््तरिक्षमें फेंका जाय;
अथवा ईश्वरीय नियमसे मेघदढ्वारा आकाशपर चढ़ जाय; पर वहाँ ठहर
नहीं सकता । ठहरेगा तो थूपर आकर ही ठहरेगा ।
मोच्छरुख-भाव यह कि मोक्ष और सुख कोई दो पदार्थ नहीं हैं ।
सुख, ब्रह्म और मोक्ष ये समानाथंक शब्द हैं, यथा---
रास बअह्मय परमारथ रूपा।
सुख सरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ज्रह्यसुख दी सब छुखोंका मूल है। प्रकारान्तरसे विधयसुख भी
ब्रह्मसुखकी दही झलक है | इसीलिये “मंगल मोद निधान? कहा । सो यहाँ
'मोच्छसुख” शब्दके प्रयोगका तात्पर्य यह है कि मोक्ष होनेके पहले
साधनद्वारा भुक्तिके साह्निध्यसे मोक्षतुखका अन्नुभव होने छगता है
अथवा ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर भी प्रारब्घक्रे प्रतिवन््धक रहनेसे मुक्ति
रुकी रहती है, पर मोक्षसुख नहीं रुक सकता, अतः यहाँ मुक्ति न कहकर
मोक्षसुख कहा ।
खुल खगराई-सनु खगराई कहकर यह जतलाया कि उड़ने-
वाल्में प्रथम गणना आपकी है | आप जानते हैं कि कितना भी कोई उड़े;
पर बिना थरूके विभाम नहीं मिल सकता ।
इरिभगति बिहाई-भाव यह कि हरिमक्ति तथा अहृृखुखर्मे
आधाराधेय भाव है, जहाँ ब्रह्ममुख हे वहाँ हरिभक्ति अवश्य है, परन्तु
मोक्ष तो सब किसीको खभावसे ही प्रात है, क्योंकि वह कृतक नहीं है,
नित्य है; फिर उसका आधार कहना नहीं बनता | इसीलिये सोक्ष न
कहकर मोक्षसुख कहा, क्योंकि नित्यप्राप्त मोक्षसुखकों आच्छादित
रखनेवाली अहन्ता-ममतारूपा अविद्या है, यथा---
कबिट्टि अगस जिसि अहासुख, अह मस भलछिन जनेघु ॥
सो चाहे अहन्ताकों भगवच्रणोंमें बाँघनेसे अर्थात् अहँग्रहो-
५१५० श्रीभक्ति-चिन्तामणि
पासनासे मोक्षसखुत्ध मिले, अथवा ममताकों उन चरणोंमे बॉधनेसे
मोक्षसुख मिले, उसके मूल दरिभक्ति तो हुई है, पर अन्य उपायंसि
अर्थात् जप; तप, मखादि कर्मोंसे भी जहाँ मोक्षखुख प्राप्त हो वहाँ भी
इरिभमक्ति ही अनुसित है, क्योंकि हरिभक्ति छोंड़नेका अथ ही हरिसे नाता
तोड़ना है, और उनसे नाता तोड़नेपर सुख कहाँ ! यथा--“बिनु हरि
मभगति जाय जप जोगा ।*
तथा रदि न सफे-भाव यद्द कि हरिभक्तिकों छोड़नेपर ब्रह्म
सुख निराधार हो जाता है, उनसे नाता बनाये रखनेपर ही, जप तप
मखादि कर्मों भी ब्रफ्सुखकी आशा की जा सकती है, और तोड़नेपर
तो उसकी कोई आशा ह्वी नहीं । यथा--
जोग कुजोग ज्ञान अज्ञान् । जहेँ नहिं रामप्रेस परधानू ॥
अस बिचारि हरिसगत सयाने |
स॒ुकृति निरादर भगति छोमाने ॥
अर्थ-पऐसा विधारकर ही तो खयाने दरिभक्त भक्तिके
छोभमें पढ़कर मुक्तिका निरादर करते है।
अस विद्यारि-भाव यह कि भक्तिसे द्वी आतंजीवके संकट कटते
हैं और सुखकी प्राप्ति होती है। भक्तिसे अर्थार्थियोँंकीं अणिमादि सिद्धि
मिलती है; भक्तिसे जिज्ञासुओंकों गूढ़ गतिका ज्ञान होता है, और
भक्तिसे द्वी शान दृढभूमिक होता है; यथा---
नाम जीद्द जपि जागहि जोगी। विरति बिरंचि प्रपंच वियोगी ॥
महासुखहिं जनुभवदिं जनूपा | अकथ जनामय नाम न रूपा ॥
जाना चद्॒टि गूठ गति जेऊ | नाम जीह जपि जानहिं तेऊ #
साधक नाम जपद्िं छय लाये । होईदि सिद्ध अनिभादिक पाये ॥
जपहिं चाम जन आरत भारी । सिट॒हिं कुर्सकट होहि सुखारी ॥
शतपश् चौपाई श्श्द
तथा---
एकहद्नटि साधन सब रिघधिसिधि साथि रे।
प्रसे. कलछिकाछ जोग संजम समाधि रे॥
( विनय० )
हरिभगत खयाने-कहनेका भाव यह कि सयाने लोगोंकी यह
रीति है कि उपायकी उपेयसे भी अधिक ग्रतिष्ठा करते हैं, यथा--
तुमतें अधिक गुरुद्दिं जिय जानी। सककछ भाँति सेवद्वि सनमानी ॥
इस माँति यद्यपि घन सुखके ही लिये है, पर सयाने छोग सुखसे
अधिक प्रतिष्ठा धनकी करते हैं, और धनसंग्रहमें किसी ढुःखकों दुःख
नहीं गिनते, इसी तरह हरिभक्तोंमें सयाने अनन्य भक्तलोंग हैं,
मक्तिके सामने मुक्तिकों भी नहीं मानते |
सुकुति निरादर-भाव यह कि करगत मुक्तिसे मी पीछे हठते हैं,
भक्तिके आनन्दमें ही मिमग्न हैं, मुक्तिकी ओर देखनेके लिये उन्हें
अवसर नहीं, यथा---
दिसि अरु विदिसि पंथ नहिं सूझा । को मैं कौन कहाँ नहिं. घूझा॥।
मुनि सगमाँझ अचल है बैंसा | पुछक सरीर पनस फल जैसा ॥
मुनिद्धि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजमित सुख पावा॥
सगुन उपासक सोच्छ न लेहीं | तिन कहे राम भगति निज देहीं ॥
भगति छोमाने-भाव यह कि भक्तिशास्त्रमे कार्पण्यविशेषका
आदर है। जैसे कृपणकों घनका छोम होता है, धनके लिये सुख त्याग
करनेका उसका ऐसा खमाव पड़ जाता है कि वह मुफ्तमें मिले हुए
सुखको भी नहीं भोगना चाहता, दूसरेके भोगकों भी नहीं देख सकता,
उसी भाँति भक्तको भी भक्तिका छोम हो जाता है, उसे खय॑ भी
मोक्षकी इच्छा नहीं रहती, ओर दूसरोंकों भी मुक्ति छोड़कर भजन
करनेका ही उपदेश देता है, यथा--
कासिद्धिं नारि पियारि जिमि, छोमिहिं प्रिय जिसि दास ।
सिसि रघुनाथ निरंतर प्रिय लछागहु मोहिं राम ॥
१५७ श्रीसक्ति-चिन्तामणि
भजन करत बिन्नु जतन प्रयासा |
संस्ति मूठ अबिद्या नासा॥३२॥
अर्थ-भजन करते हुए बिना यल्न और प्रयासके। संसारके
मूल अविद्याका नाश हो जाता है।
भजन करत-भाव यह कि भजन करनेमें तीन चत्छठ अपेक्षित
हैं---( १ ) भजनीय भगवान्, ( २ ) भक्ति और ( ३ ) अधिकारी ।
भगवानके दो रूप हैँ, निर्गुण और सग्रुण | सो निर्मुककी उपासना
अमेद भक्तिसे होती है। सगुण ब्रह्मकी दो उपाधियाँ हैं---नाम#
और रूप| । इन्हींके द्वार इनका भजन होता है, यथा--
# नाम-मवन प्रधान ए, क्योंकि इसके द्वारा निर्युण-सग्रण दोनों
रूपोंका भजन हो सकता है। नामका जप अर्थमावनाफे साथ ऐना चाएये।
लामोंमें मी प्रणबरूप ोनेसे, सुखमुखोद्यार्य शोनेसे, सर्वदित ऐनेसे तथा अधिक
प्रापनाशक दोनेसे राम-नाम सब नामोंमें श्रेष्ठ ऐ ।
+ उस विश्वरूपके पाँच भजनीय रूप मदात्माओंने माने ईं---१ परमरूप,
३ व्यूदरूप, ३ विभवरूप, ४ अन्तयोमीरूप और ५ अर्चावताररूप ।
२०-परमरूप-नित्य विभूतिमें ऐ | परमरूप और वासुदेव एक दी हैं।
वामुदेव च्यक्ताव्यक्तात्मक विप्णुको कएते हैं, यया--वामुदेव पदपंकरुदद,
दंपति मन अति छाग्र 7! इसी रूपको व्यूइमें मिलाकर चारकी संख्या पूरी
करते हैं ।
२-अ्यूदरूप चार ऐं,--वासुदेव, सझुपंण, प्रयुम्न और अनिरुद्ध । ये छी
क्रमशः राम, लक्ष्मण, भरत और झत्रुष्न एैं। शान और बलकी प्रधानता
समूपंणव्यूइमें है, ऐश्वर्य और वीयंकी प्रधानता प्रयुन्नव्यूएमें, शक्ति और ठेजकी
प्रधानता अनिरुदव्यूइमें, और छट्ों शुर्णोक्ती पूर्णझूपसे एक साथ छी स्थित्ति
वाझुदेवरूपमें है, यथा---
शातपश्च चौपाई श्१८
अगुन सगुन& दुद ब्रह्मस्यरपा। जअकथ अगाधि अनादि अरूपा #
भक्ति नं प्रकारकी होती है, यथा--“अवनादिक"] नव भक्ति इृढाहीं |?
यह अवणादिक भक्ति वर्णाअमधर्माधिकारियोंके लिये है, यथा--
चारिड रूप-सीलू-सुन-धामा | तदपि अधिक सुखसायर रामा॥
इ-मक्तोंपर अनुग्नद करके संसारमें जिस रूपसे अवतरित दोते हैं, उसे
विभवरूप कहते हैं, यथा---
इच्छामय नरदेह संवारे | होहों प्रग/ निकेत तुम्दारे ॥
४--अर्वावताररूप-भक्तलोग जिस खरूपका ध्यान करते हैं, और जिस
सामका स्मरण करते हैं वैसा ही नाम और रूप धारण करके भगवान् अर्चा-
वतारमें विराजते हैं । सर्वश्, सर्वशक्ति, पूर्णकाम, रक्षक और सबेखामी होते
हुए भी भश और असमर्थ-से दोकर, अपेक्षा करने और रक्षा करनेयोग्य मालम
पड़ते हैं, भक्तके अधीन अपने ख्वरूपको कर देनेसे नेत्रोंको सुलूभ हो जाते हैं,
यथा---
कर नित करहद्ििं रामपद पूजा ।
# सगुणरूपके साथ-दी-साथ लीला और भामका भी झद्दण द्योता है ।
'नित्यधामदायक दोनेसे लीलाधामकी मद्दिंमा नित्यभामसे भी वढ़कर है, यथा-
“मम थामदा पुरी सुखरासी 7?
+ अश्रवर्ण कीत्तेन विष्णोंः स्सरणं पादसेंवनस्।
अच ने वन्दन दास्यं सख्यमात्मनिवेदनस् |
( १ ) अवण, यथा-मासा असन व्यसन यह तिनहीं | रघुपतिचरित
होइ तहँ सुनहीं ॥ ( २) कीतेंन, यथा-कहत फिरों दरिग्युन अन्ुवादा। (३ )
स्मरण, यथा-राम-नाम सिव झुमिरन छागे। ( ४ ) पादसेवल, यथा--चरन-कमल
चापत विधि नाना ॥ (५) अचल, यथा-कर नित करहिं राम पद पूजा ।
(६ ) बन्दन-राम लमामि नमामि नमामी ॥ ( ७) दास्य, यथा-मोर दास
कंद्ाइ नर जासा। करे तो कहाँ रक्बौं विखासा॥ ( ८ ) सख्य, यथा-कीन्द प्रीति
कछु वीच न राखा | ( ९ ) आत्मनिवेदन-अव प्रश्न पाहि सरन तकि आाएडें ।
१५१०, श्षीमक्ति-चिन्तामणि
भ्रथमष्टिं विप्रचरन अति प्रोत्ती । निज निज घर्मनिरत श्रुतिरीतों
सेहिकर फछ पुन्ि ब्रिपय बिरागा । तब मम धर्से उपज अनुरागा ॥
परन्तु आचाण्डाल मनुष्यमात्रके लिये जिस नवधाशभक्तिका उपदेश
है बह शबरीके प्रसज्ञमं कही गयी है। बिना संसारसे चित्त हृटाये भमगवत्-
घचरणोंम चित्त नहीं छग सकता। बिना वेराग्यके साधनभक्ति भी नहीं हो
सकती | सो वैराग्य ज्राएणभक्ति करते हुए स्वधर्माच एणसे होता है, यथा-
घंदौं प्रथम मदहीसुर चरना | मोहजनित संसय सब हरना ॥
तब भागवतघम्ममें अनुराग होता है तत्पश्नात् श्रवणादिक साधन-
भक्ति दृढ़ होती है |
अधिकारी-
राम-भगतिके ते अधिकारी । जिन कह सतसंगति अति प्यारी ॥
विज्ञु ज़जन प्रयासा-भाव यह कि यज्ञ उपायको कहते हैं यथा-
'कौनिउ जतन देइ नहिं जाना !? और यज्ञ करनेमें जो भ्रम होता है
उसे अयास कहते हैँ | सो यत्ष और प्रयास ज्ञानमार्गमे है। भक्तिमें तो
सबसे ममता हटाकर राममें जोड़ना ऐ, और किसी यज्ञ तथा प्रयासकी
आवश्यकता नहीं है; यथा--
कहदहु भगत्ति पथ कौन अ्यासा । जोग न जप तप सख उपवासा ॥
# प्रथम मगति संतन कर संगा । दूसरि रति मम कथा असंगा ॥
चुरुपदर्षकन सेवा त्तीसरिं सगति अमान |
चींगि भगति मम गुनगन, करइ कपट तजि गान ॥
मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो बचेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरत बहु करमा। निरत निरंतए सज्जन धरमा ॥
सातवें सम मोदिमय जग देखा | मोदिते अधिक संत करि लेखा ॥
आठवें जथारहाभ संतोपषा | सपनेड नहि देखइश परदोपा॥
नवम सरल सब सन छलद्दीना | मम भरोसत द्विय दरप न दीना॥
शतपश् चौपाई १२०
संख्ति मूछ-यद्यपि यह सृष्टि मायाकी रची हुईं है, पर हरिकी
प्रेरणासे रची गयी है, यह बन्धका कारण नहीं है । बन्धका कारण
जीवकुत सृष्ि है। यह अविद्यासे है, यही दुध्खरूपा है; इसीके कारण
जीव भवकूपमें पड़ा है, यथा--
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेंहि वस जोव परा अवकूपा ॥
सअविद्या-अवियया पश्चपर्वा है, इसकी पॉच अवस्थाएँ हैं! अविया,
२ अस्मिता, ३ राग, ४ द्वेष और ५ अभिनिवेद्य; यथा-दारुन अविद्या
५. ८ हे हि.
पंचजनित बिकार भ्रीरघुबर हरे ।?
१ अविद्या-अनित्य, अश्चि) दुःख और अनात्ममें नित्य, झुचि;
सुख और आत्मके भानकों कहते हैं, यथा-
तहूँ मगन संजसि पान करि तन्रय कार जल नाहीं जहाँ |
निज सद्दज अज्ञभव रूप खल तू भूलि थों आयो कहाँ ॥
२ अस्मिता--चित-शक्ति और जड-दक्ति (बुद्धि) की एकात्मता-
को कहते हैं ! भोक्तुशक्ति और भोग्यशक्तिकी एक स्परूपापत्ति (अध्यास)
ही भोग है, यदि दोनों एथक् कर दी जायें तो कैवल्य हो जाय, यथा---
संसतिमूल सूलभअद नाना। सकल सोकदायक शझमिसाना ॥
३ राग-सुखके जानकारकी सुखानुस्मृतिपूर्वक सुख या सुखके
साधनमें जो तृष्णा है, उसको राग कहते हैं, यथा--
अलि पतंग मूंग सीन गज जरत एकहदी आँच।
चुलसो वें कैसे जियं जिनके लऊागे पाँच ॥
४ दछेष-दुशखके जानकारका दुः्खानुस्मृतिपूर्वक दुश्ख या
दुःखके साधनमें जो क्रोध होता है, उसको द्वेंष कद्दते हैं; यथा-
खर दूधन बिराध तुम मारा। हतेउ व्याध इव बालि बिचारा ॥
२०००००००००० ००० ०००५०» ]आज बैर सब छेडें निबाद्दी ।
१२५१ शीमक्ति-चिन्तामणि
७-अभिनिवेश--मरणमयकोी कहते हैं। यथा-
उत्तर देत सोहि बचव जअभागे।
नासा-माव यह कि ममताके रामचरणमें छग जानेसे पश्चपर्वा
अविद्याका नाश होता है, यथा-
अविद्याका नाशा-
हरिसेवरद्टि न उयाप अविद्या। प्रशुप्रेरित व्यापे तेहि विद्या ॥
अस्मिताका नाश-
जन अभिमान न राखहिं काऊ। दीनवंधु अति मदुर सुभाऊ ॥
शागका नाश-- ;
जी तुम राम छागते मीछे।
तौ नवरस पटथरस रस अनरस छे जाते सब सीठे ।
द्वेषका नाश--
निज प्रश्लुमय देखहिं जगत का सन करहिं विरोध ॥
असिनिवेशका नाश-
सपने नहिं. काछहुते ढरिये | (कवित० )
अब प्रश्न यह है कि संसारमें जहा-जहाँ ममताके तागे छगे हुए, हैं,
बहाँ-वहाँसे उन्हें हटाकर, उनकी एक डोरी ववकर भगवत्-चरणोंमें बॉघना
भी तो साधारण व्यापार नहीं है, बिना प्रवल वैराग्यके इस नरिशुणात्मक
संसारसे ममता छूट भी तो नहीं सकती; यथा---
कहिज तात सो परस विरागी। ठून सम सिद्धि तीन गशुन स्थागी ॥
अतः उस चैराग्यब॒लका सम्पादन करनेके ल्ये तो क्लिष्ट साधनोका
सामना करना ही पड़ेगा । अतः कहते हैं---
भोजन करिओअ तृपिति हित छागी।
जिमि सोइ असन पचब जठरागी ॥
शतपश्च चौपाई १२२
अर्थ-जैले भोजन ठृप्ति और दवितके लिये किया जाता
है, और उस भोजनकों जटठराशि पचाती है।
जिमि-दृष्टान्तवोघक शब्द है, दृशन्त पीछे कहा जायगा ।
भोजन करिअ-भाव यह कि इस शरीरयन्बका परिषोधषण और
चर्धन भोजनसे ही होता है | शरीरमें रातदिन श्रवण, स्पशन, दान)
रसन। प्राण और गमनादिक क्रियासे शक्तिक्षय हुआ करता है| भोजनसे
ही उस क्षतिकी पूर्ति और बलवीर्यवर्धन तथा संग्रह हुआ करता है;
भोजनके विना यह शरीर-यन्त्र चछ नहीं सकता । इतना आवश्यक
होनेपर भी भोजन-ऐसा सुगम व्यापार कोई भी नहीं; इसमें कोई
आयास नहीं होता, छोग सुखपूर्वक ग्रास-प्रास करके भोजन करते हैं।
और स्वाद छेते हुए, शनेः-शने: तृत्त हो जाते हैं ।
तृपिति द्वित छागी-माव यह कि खाली पेट होनेपर पेटमें जलन
होती ( भूख लगती ) है। यह नित्यरोग है, यथा-'क्षुध। व्याधि वाघा
भइ भारी” पर यही भूख खास्थ्यका लक्षण है; यही बलका मूल है।
जिसे भूख नहीं, समझिये उसकी अम्रि दुष्ट हो गयी है; वह मन्दाग्नि
आदि रोगोंके वशीभूत है, इससे और भी आगन्ध॒ुक रोग उत्मन्न होंगे,
शरीरयन्न ही खतरेमें है । यदि भूख ठीक लगे तो उसका प्रकृत औषघ
भोजन है । भोजन न मिलनेसे अन्नामिलाषा बढ़ती है, त॒रन्त दुर्बछताका
अनुमव होने छगता है | अतः उक्त अभिलाषाकी पूर्ति अर्थात् तृप्तिके
लिये तथा दुर्बछता दूर करनेके लिये, बलाधानके लिये अर्थात् द्वितके लिये
भोजन किया जाता है | भोजनके एक-एक आससे क्रमशः ठुष्टि और
पुष्टि होती है; आँख खुल जाती है और प्राणका सद्चार हो उठता है ।
सोइ असन-भाव यह कि वही भोजन जो तुष्टि और पुष्टिके लिये
किया गया था; तात्कालिक तुष्टि और धृष्टि सम्पादन करके ही अपनी
उपयोगिता समाप्त नहीं करता; इतना लाभ तो इसका आह्ुषज्ञिक फल
है, जिसका मनुष्य अनुमव करता है, परन्तु उसका यथार्थ छाम तो
मनुष्यके बिना जाने हुआ करता है |
श्श्डे शओरीभक्ति-चिन्तामणि
पचवच जठरागी-भाव यह कि जिस भाँति यन्त्रोंके सश्लालनके
लिये भौतिकाग्निकी आवश्यकता होती है उसी भाँति इस शरीर-यन्त्रके
लिये जठराग्नि ( पेट्की अग्नि ) है। जठरारिन उदरख भोजनकों
पचाती है; उसीसे रस-रक्तादि सात्तों घातु बनकर इस शारीस्यन्त्रका
पोषण करते हैँ और बल-सम्पादन करते हैँ । जब इस अमिकों भोजन
नहीं मिलता, तो यद मल ओर घाठुओंको पचाने छगती है तब जलन;
अन्नामिलापा और दुर्बलता उत्पन्न होती है। कुछ दिनोतक अनशन
करनेसे शरीरयन्च ही नष्ट हो जाता है। अति तीम्र वेराग्यवान् अब भी
असाध्य घातक रोगमे फेस जानेपर अनशनत्रत करके ही प्राण देते हैं
जब भोजन मिल जाता है, तव वही अग्नि मल-घातुओंका पचाना
छोड़कर अन्न पचाने लगती है और दशरीरकी रक्षा करती हुई बल-
सम्पादनका हेतु दो जाती है ।
अस हरिसमजन सुगम सुखदाई ।
को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥१३॥
अर्थ-ऐसा दी हरिभजन सुगम और ख़ुखदायी है, पेसा
कौन मूढ़ दे जिसे अच्छा नहीं रूगता ।
अस-यह दाशन्तसूचक शब्द है। भाव यह कि मोंजनकी भाँति
भजनकी भी व्यवस्था समझ लेनी चाहिये | जिस माँति इन्द्रियगम्य यह
स्थूछ शरीर है, उसी माँति अनुभवशम्य इस शरीरमें व्यात्त सूक्ष्म या
मानसिक छारीर है | असली शरीर तो यही है, इसीलिये इसकों अन्त:-
करण कहते हैं, स्थूछ शरीर तो आयतनमात्र है । जिस भाँति स्थूलछ
शरीरका घारक; पोषक और नाशक जठराग्नि है, उसी मौँति मानसिक
शरीरका सर्वस्व सुमति है, यथा--सुमति छुघा वाढ़े नित नई”, और
जिस भाँति हित-मित और पशथ्य भोजनके जठराग्निद्वारा परिपाकसे
शरीरका धारण, पोषण तथा बलवर्धन होता है, उसी भाँति हरिभजनके
दशातपञ्च चौपाई १२७
प्ररिषाकसे मानसिक शरीरका धारण, पोषण तथा परम देराग्यका उदय
होता है, यथा-- ३
जामनिआ तब मत बिरुज गोसाईँ । जब उर वल बिराग अधिकाई ॥
जिस भाँति खयं भोक्ताको पता नहीं चछता और उसके भीतर
भोजन पककर रस-रक्त-मांसादि वनकर शरीर पुष्ट किया करता है; और
बल बढ़ता जाता है, उसी माँति भक्तकों भी पता नहीं चलता कि
उसका किया हुआ भजन किस भाँति मानसिक शरीरका पोषण करता
हुआ वेराग्यकों बढ़ाता चला जा रहा है | जिस भाँति अग्नि दुष्ट होकर
शरीरका अपकार करती है, और दुर्बलता बढ़ातो है, उसी मॉति सुमत्ति
कुमति होकर मानसिक रोग उत्पन्न करती है और विषयाशा बढ़ाती है;
यथा--जह्ँ कुमति तहेँ विपति निदाना' तथा--बिषय आस दुर्बलता
( गई )! जिस भाँति मोजन न मिलनेपर जठराग्नि अज्नामिलाषा;
डुबंलता उत्पन्नकर शरीरका ही नाश कर देती है, उसी भाँति सुमतिमें
भजनकी आहुति न पड़नेपर वैषयिक सुखाभिछाष विषयादा उत्पन्न करके
सानसिक शरीरका सत्यानाश कर देती है, जिस प्रकार किसी भॉंतिका
भी भोजन न मिलनेसे अथोत्त् अनशनज्रत करनेसे मृत्यु होती है, उसी
भाँति किसी प्रकारका भी भजन न करनेसे, अथात् संसार और ईश्वर
किसीका भजन न करनेसे मानसिक शरीरका भी पतन हो जाता है ।
जिस भाँति चटनी; अँचार आदि उत्तेजक पदार्थोंसे न पेट भरता है
और न यथोक्त छाम होता है, बल्कि तृषा बढ़ती है, उसी भाँति कामोप-
भोगसे वासना बढ़ती है, शान्ति कमी नहीं होती, यथा--
सेचत विषय बिबधें जिसि निति निति नूतन सार।
जिस भाँति पेवक्ी जलन बिना भोजनके नहीं जाती, उसी भाँति
जियकी जरनि बिना भजनके नहीं मिटती, यथा---
जासु भजन बिनु जरमनि न जाहोीं।
श्र५ श्रीभमक्ति-चिन्तामणि
दरिभिजन-मभाव यह कि हरिभजनमें विशेषता है, क्योंकि
हरिकी भाँति प्रीतिरीति जाननेवाला कोई नहीं है, यथा--
जानत प्रीति-रीति रघुराई ।
नाते सब हांते करि राखत, प्रीति प्रतौोति सभाई।
नेष्ट निवाहि देह तजि दुसरथ, कीरति अचल चलाई ॥
ऐसेहु पितु ते अधिक गीधपर समता गुन शसुआई।
घर गुरु गृह प्रिय सदन सासुरे भइ जहँ-जहेँ पहुनाई॥
तह तएँ कट्दि सबरीके फलनकी रुचि साधुरों न पाई।
७७ ७७०३७ ७७ ५ ७४७ ७ ७७ ७ 9०००७ ७ ५२५०३ ७०७७७७५+१०००७० 8०३७७ ०७४०७ ०७७
हरिहु जोर औतार आपने राखी बेंद बढ़ाई।॥
ले चिउरा निधि दयउ सुदामहिं जद्यपि बारूमिताई।
झुगम खसुखदाई-भाव यह कि जिस क्रियाके करनेमें भी खाद
हो, सवोमिलाषाकी पूर्ति हों और फल सुखमय हो, ऐसी सुगम और
छखसदायिनी क्रिया या तो भोजन है, या भजन; यथा--
डसा रास खनाव जेहि जाना । ताहि भजन तजि भाव न आना ॥
को अख सूढ़-भाव यह कि जो मायाके बचमें होकर बुद्धिहीन
हो जाय, वही मृढ़ है, यथा--
साया विवस भये मुनि सूठा | ससुझी नहिं हरि गिरा निगूढा ॥
सो मृह्ोंकों भी हरिभजन अच्छा लगता है, यथा-
विषयिन कह घुनि हरियुन आसा। श्रवन सुखद अरु सन जभिरासा॥
न जञाहि खोहाई-भाव यह कि मूढ़ दोना भजनके न सोहानेमें
कारण नहीं है, बल्कि पापी होना कारण है, यथा--
ते जढ चेतन आतसमधाती | जिनहिं न रघुपति कथा सोहाती ॥
पापवंत कर सदज सुसाऊ | भजन मोर तेहि साव न काऊ।वगा
दो ०-सेवक सेज्य साव बिनु भवन तरिअ उरगारि।
भजिअ राम पद्पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥
शतपश्च चौपाई श्र
अर्थ-सेवक-सेव्यभावके बिना संसारसागर पार नहीं
किया जा खकता+ ऐसा सिद्धान्त विचारकर रामपद्कजञज-
का भजन करना चाहिये ।
भाव-छाक्षाकी भाँति चित्तकी भी दो अवस्थाएँ होती हैं--(१)
कठिन, और (२) द्रव । चित्त खमावसे ही कठिन है; पर छाक्षाकी भाँति
तापक द्रव्यके योंगसे कुछ देरके लिये द्रव हो जाता है; और उसके
अयोगसे पुनः कठिन हो जाता है। करुणा, भय, प्रेमादि उस चित्तके लिये
तापक हैं | भलीभाति द्रवीभूत चित्तमें जिस वस्त॒ुकी छाप पड़ जाती
है, वह कठिनावस्था प्राप्त होनेपर भी उसमें बनी रहती है। इसी छापको
संस्कार, वासना या भाव कहते हैं, यथा--
परम प्रेममय रूदु मसि कीन्ही । चारू चित्त भीती छिख लीन्ही ॥
यह भाव ही विभाव; अजुभाव, सद्वारीभावसे पुष्ट होकर रसत्व-
को प्राप्त होता है ।
सेवक सेब्य-तात्पय॑ं यह कि व्यवहारमें पड़े हुए. जीवको
स्वाभाविक भाव यही होता है कि भगवान् सेव्य हैं और मैं सेवक हूँ ।
भगवान् रामचन्द्रमें गुण ही ऐसे हैं कि उनके चित्तपर चढ़नेंसे चित्तकी
द्रवावस्था हो ही जाती है । अतः स्वाभाविक पहली छाप जो पड़ती है
बह सेवक-सेव्यभावकी होती है| रामसे सम्बन्ध जोड़नेका मूल सेवक-
सेव्य भाव है । इसीकों 'तदीय! कहते हैं । फिर सम्बन्धप्रागल्म्यसे
“बह मेरा द्वी है? ऐसा भाव उठता है और फिर प्रेममें विभोर होकर “मैं
वही हूँ? ऐसी स्थितिकी प्राप्ति# होती है। जबतक देहबुद्धि है, देहात्माध्यास
बना है तबतक “दासोडहम? यही माव ठीक है। ऐसा भजन करनेवालरा
# भक्तिमें तीन भाव क्रमशः होते हँ--तस्वैवाद ममैवासौ स एवाह-
मित्ति त्रिधा ।
बे त्तीन प्रकार ये हैं (१) मैं उसका हूँ (२) वद मेरा है और (३) मैं वह्दी हूँ ।
१५७ श्रीभ्क्ति-चिन्ता्माणि
ही 'सोहम?# पदको प्राप्त दोता दै और सोहम् पदकों आम्त होना और
भवसागर पार होना एक बात है । अतः सबका मूल सेवक-सेव्य-भाव
हुआ ) प्रथ्वीपर गिरे हुए प मल॒ष्यको जमीन थामकर ही उठना पढ़ता
है, देद्वाध्यासकों प्रात हुआ जीव ईश्वर कैसे है! बिना सेवक-सेल्य-माव-
से उपासना किये अन्तिम भावका उठना अखस्वामाविक है; भावाभास
है, बह स्थायी भावको कभी नहीं प्राप्त हो सकता, इसीलिये कहते
हैं कि---
भच न त्रिआ-भाव यह कि सेवक-सेव्य-भाव ही भवसनन््तरणका
असाधारण साधन है, क्योंकि हरिमाया अतिदुस्तर है; इसकी पार कर
जाना जीवके सामथ्यके बाहर है। क्रियासाध्य है ही नहीं, कृपासाध्य
है । अतएज़ जिसे अपने बलका भरोसा है वह अपने ही वलसे तरना
चादेगा; और उसीमें बहता फिरेगा, पार नहीं पहुँच सकेगा, यथा--
सवर्ध्षिषु अगाघ परे नर ते पदर्षकज् प्रेम न जे फरते।
और जो सेवक्र-सेब्य-मावसे मगवानकी शरण हैँ, वे उनके बलसे
अनायास पार पा जायेंगे; यथा---
जनहि भोर वऊ निज बल ताही । दौड़ कई काम क्रोध रिउ्ठु आद्दी ॥
अस बिचारि पंडित भोहि भजहीं । पाए ज्ञान मगति नहि तजहीं ॥
उरगारि-माव यह कि आप सॉपोके श्र हैं, उनका विष आपप-
के भक्तोपर भी काम नहीं करता, पर अलौकिक सर्पोका विष आपपर
मी काम कर जाता है । काम-क्रोधादि छः शन्रुआंकों सर्प कद्दा है; यथा---
आऔर सकल सुर ऊसुर ईस बस खाए उरग छहूँ ।
अस सिद्धांत चिचारि-भाव यह कि जीव सब्िदानन्द रामका
अंश है, मायाके साथ बंधकर संसारी हो दुःख भोगने लगा | चित्जड-
# दासोष्दमिति मे बुद्धि; पुरासीन्मधुसदने |
दाकारोध्पद्तस्तेन गोपीव्ापहारिण ॥
+ भूमी स्खलितपादानां भूमिरेव पर वरूमू।
शतपश्ल चौपाई १२८
ग्न्थि यद्यपि झड़ी है, पर छूटती नहीं; जब छूटे तव कल्याण हो । इसके
छूटनेका एकमात्र साक्षात् कारण ज्ञान है, यथा--शान मोच्छप्रद बेद
बखाना ।? उसके भी दो रास्ते हैं, एक तो ज्ञानपन्थकथित साधनौंसे
ज्ञानद्वारा मुक्तिताभ करना; और दूसरा भक्तिसे भगवानको प्रसन्न करके
मुक्तिकाम करना; यथा---
सोद् जाने जेहि देउ जनाई । जानत तुमहि तुमद्दि होइ जाई ॥
तुम्दरी कृपा तुमहिं रघुनंदन | जानहि भगत भगत उर चंदन ॥
सो पहला रास्ता विना उपासनाकी सहायताके अतीब दुष्कर है;
और सेन्य-सेवक-भाव अति खुगम और झुखद है, इससे ज्ञान तथा परा-
भक्ति दोनोंकी अनायास सिद्धि होती है; अतः यही अनुष्ठेय है; यही
सिद्धान्त है ।
भजहु राम पद्पंकज-भाव यह कि भवसागर पार करना है |
तुम क्षुद्र जीव ठहरे, अपने बलपर मत भूलों । कितना द्वी बल त॒म्द्ारे
क्यों न हो, पर इस महासमुद्रके सामने अकिश्वित्कर है| अतः रामके
चरणकमल पकड़ों, इस महासमुद्रके छिये यही नाव है; यथा--“यत्पाद-
छवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावताम् |? अब 'रामके चरणकी शरण ग्रहण
करनेसे अवश्य ही पार हो जायेंगे! इस विद्वासके लिये रामकी सामर्थ्य
कहते हैं--
दो०--जो चेतन कहूँ जड करइ,जडहिं करइ चैतन्य ।
अस समथ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते घन्य॥
अर्थ-जो चेतनको जड़ और जडकों चेतव वनाता है,
ऐसे समर्थ रघुनायककों जो जीव भजते हैं, थे घन्य हैं ।
चेतन कहें जड-भाव यह कि जीव तो खभावसे ही ईश्वरका अंश
होनेके कारण चेतन, अमल और सहज सुखकी राशि है) बह मायाके
वश होकर कौर मरकंठकी नाई बंघ-सा गया | मायाके रजोगुण तथा
१२०, श्रीभक्ति-विन्तामणि
तमोशुणकरे तारतम्यानुसार उसमें भो जरत्वका तारतम्य भासने लगा;
इसीको चेतनका जड होना कहते हैं ।
जो करइ-भाव यद्द कि जड भी तो खभावसे ही चेतन है, केवल
मायाका पर्दा पड़नेसे वह जड-सा बना हुआ है | उस पर्देके हटने मरकी
देर है, चेतन त्तो बह है ही, यथा---
सायावचस सतिमंद अभागी। हृदय जवनिका बहु विध छागी॥
वह माया ही पर्दे पछटकर कभी अपेक्षाकृत चेतन और कभी
जड़ ॒ बनाकर नचा रही है, और आप भी प्रभुके इशारेपर नाच रही
है | इस विधिसे वह मायापति जडकों चेतन और चेतनकी जड़ दिन-
रात बनाता रहता है, यथा--
जो साया सव जगहिं नचावा | जासु चरित ऊुखि काहु न पादा 0
सो प्रभु श्रुविकास खगराजा । नाच नदी हव सहित ससाजा ॥
अख समर्थ-भाव यद्द कि सब्र सामथ्योसे बड़ी चेतनकों जड और
जदको चेतन बनानेवाली सामथ्य है। अतः ऐसा सामर्थ्यवाल्य ही सबसे
अधिक समथ्थ है| चितशक्ति तो सवेच्न ही समानरूपसे अवस्थित है, पर
चैतनके अधिक विकाससे ही ब्रक्ददेव सबसे बड़े हैं, और संकोचसे ही
मशक छोटा है। अतः समर्थ वही है जो चेतनके संकोच-विकासका नियमन
करता हों; यथा--“मसकहिं करे विरंचि प्रभु, अजहि ससकते हीन ।!
रघुनायकद्दि-भाव यह कि भक्तोपर अनुप्रह करके भगवानते
अनेक अवतार घारण किये; पर जडको चेतन करनेकी सामर्थ्य जैसी
रामावतारमें दिखछायी बैसी अन्य अवतारोंमें नहीं दिखायी है; यथा--
जेंडि पद परसि त्तरी ऋषिनारी । दंढक कानन पावनकारी ह
सझ सेवककी भीति रुचि रखिहैँ राम कृपाछ |
उपछ किये जलजान जेद्दधि, सचिव सुमति कपि भालछु
९
झातपश्च चौपाई १३०
तथा--
भ्जे विन्नु वानरके चरवाहे।
रुनायक कहकर दानशीलता तथा करुणा दिखछायी, यथा--
“मंगन लहृ॒हिं न जिनके नाहीं !?
भजहिं जीव ते घन््य-भाव यह कि अप्राप्य वस्तुकी प्राप्तिके लिये
ही छोग प्रभुकों भजते हैं, अतः अभागा ही करुणाहीन तथा सामथ्ये-
हीनका भजन करेगा । जिसे स्॒र्य साभथ्यं नहीं, वह दूसरेका क्या उप-
कार कर सकता है ! अतः समर्थ और कृपाहका भजनेवाला हीं माग्य-
वान् है। अब रघुनाथ-सा समर्थ; करुणासागर और दानशीलकौन होगा *
यथा--
एकह दानिसिरोसनि साँचो |
जेद्धि जाचत पुनि जाचकता बस सो वहु नाच न नाच्यो ।
अतः जो जीव रघुनायकको भजते हैं वे दी धन्य हूँ, जिस कुलमें वे.
उत्पन्न हैं, वह कुछ धन्य है, यथा--
सो कुछ धन्य उम्रा सुनु जगतपूज्य सुपु्नीत
आ्ररघुनाथ परायन जेंहि कुछ उपज बिनीत ॥
धतस्वैचाइम! भावसे भजन, यथा--
इस सत्र सेवक अति बढ़भागी । संतत सगुन ब्रह्म अजुरागी॥
पभमैबासी' भावसे भजन) यथा--फिरें राम सीता मैं हारी
“स एवादम भावसे स्थिति, यथा--
दिसि अरु विदिसि पंथ नहिं सूझा। को से कौन कहाँ नहिं घूझा ॥
मुनि सग साँझ अचल छै वैसा । घुकक सरीर पनस फल जैसा ॥
ऐसी स्थितिमें भी सिद्धिभक्ति चाहनेवार्लका सेवकर्सेब्यमाव-
सम्बन्धी संस्कार वीजरूपेण रहता है, इसीसे प्रेम समाधिते छोटता है,
और जिनका सेवकसेव्यसंस्कार नष्ट हो जाता है; वे नहीं छौय्ते ।
१३१ अआीभमक्ति-चिन्तामणि
कहेजेँ ज्ञानसिडांत. बुझाई ।
सुनहु भगतिमनिकी प्रम्मताई ॥
अर्थ-शानसिद्धान्त तो मैने समझाकर कहा, अब भक्ति-
मणिकी प्रभुता खुनो १
शानसिद्धांत-माव यह कि रिद्धान्तमें कोई भेद नहीं है; शान
भर भक्तिका सिद्धान्त एक ही है, यथा--“भगतिदिं ज्ञानद्विं नहिं कछु
भेदा ।? इसील्यि भक्तिका सिद्धान्त एथक् नहीं लिखते, केवल प्रभुत्तामें
भेद है, उसीका कथन करते हूं । सिद्धान्तमें भेद होनेसे अभेदकथन
किसी प्रकारसे नहीं बन सकता । सो यहाँ ज्ञानका सिद्धान्तमात्र कहा;
विस्तार इसका वेदान्तश्ास्त्रमें है; यथा-वेदान्तवेय विभुम् ।? वादि-
प्रतिवादिभ्यां निर्णीतो5थः सिद्धान्तः । अतः यहाँ शञानका निर्गलितार्थ मात्र
कह्दा गया है |
चुझआई कहेंडें-भाव यह कि शानसिद्धान्त न कहते बने और न
समझते बने; वेखरी वाणीसे जो कुछ कद्दा जायगा; वह ठीक नहीं
ब्रैठेगा । अतः दृष्टान्त दें-देकर इस ज्ञानदीपप्रसज्धमें समझाकर कह दिया,
यथा--
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बने न जात बखानी ॥
धुझाई कहेउें? कहकर ज्ञानप्रकरणकी समाप्ति कहा |
खुनह-भाव यह है कि ज्ञान और भक्तिके सिद्धान्तमें तो कुछ भी
भैद नहीं है, पर उपाय और प्रभुताईमें भेद है, सो भक्तिकी ग्रभुत्ताका
प्रसज्ञ आरम्म करते हैं, अतः पुनः 'सुनह” कहा ।
भगतिमनिकी-माव यह कि ममताके तागोंके संसारसे
छूटकर भगवश्चरणोर्मे लग जानेसे मन खींचातानीसे बचकर स्थिर हो
जाता है; तव उसकी दशा अभिजात% मणिकी-सी हो जाती है । जिस
* स्वच्छ
इतपञ्च चौपाई १३२
भाँति स्फथ्किमणि अपने उपाश्रयके रंगसे रंग जाती है; जवाकुछुमके
सन्निघानसे छाल प्रतीत होने छगती है, इसी भाँति ग्रहीता पुरुषके
आलम्बनसे उसीके रंगरमें रंग जाती है, इसीकों तत्खतदअनता-
समार्पज्नि कहते हैं। मसमताकी डोरी भगवव-चरणोमें बंधनेसे मन भी
भगवानके रंगमें रैग जाता है, यथा---
परम प्रेमसय झूदु मसि कीन्द्रीं । चारु चित्त भीतो लिख लीन््द्टीं ॥
इसी लिये भक्तिकों मणि कद्दा ।
प्रशुताई-भाव यह कि यद्यपि दीप और मणि दोनों अन्धकारका
नाश करनेमें समर्थ हैँ, पर मणिकी प्रभुता अन्य प्रकारकी है। इसी भाँति
शान और भक्ति दोनों अविद्यान्धकारका नाश करनेमें समर्थ हैं । ज्ञानकी
प्रभुता तो कह चुके, अब भक्तिकी प्रभुताई कद्दते हैं | कर्तमकर्तसन्यथा-
कठे समर्थ: प्रभुः। अतः (१) करने (२) न करने और (३ )
अन्यथा करनेकी सामथ्यंको प्रभशुताई कहते हैं । सो करनेकी सामथ्यंका
वर्णन करते हुए, कद्दते हैं--
रामसगति चितामनि सुंदर ।
बसे गरु(ड जाके उर अंतर ॥१४॥
अर्थ-रामभक्ति झुन्दर चखिन्तामणि दै, दे गरुड़ ! यह
जिसके हृदयमें चसती है ।
शामभगति-भाव यह कि भक्ति व्यर्थ जानेवाली वस्तु नहीं,
चाहे वह किसी भाँति हो, यथा---
अपनो पेपन निज हथा तियगन पूजहिं. भीति ।
फले सकल मनकासना चुऊूसी रीति प्रतीतिग॥ा
प्रीति बड़ी प्रद्माददकी जिन पाहनते परमेसुर काढयों॥
बात इतनी है कि मजनीय उत्तम होना चाहिये | जो जिसे भजेगा
वह उसीकों प्रात्त होगा; भूर्तोकोी मजनेवाला भूतकों प्रात्त होगा, यक्ष-
श्र अआीभक्ति-चिन्तामणि
राक्षतकों भजनेयाह्य यक्ष-राक्षसकों औौर देवताओंकों भजनेवाला देचत्वको
प्रात होगा अर्थात् मजनसे इष्टकी प्राप्ति अवश्य होती है। बया---
यिधि हरि हर पद श्यागि जे मजहिं सूतगन घोर ।
तिनकी गति भोहिं देड विधि जो जननी सति मोर ॥
अतः मजनीयमें जितना शुणोत्कर्ष दोता है, भक्तिकी महिमा भी
उतनी ही बढ़ती है। सो राम तो ब्र्म हैं, अतः राममक्तिम उत्कर्मताकी
पराकाष्टा है, चया---
रास प्रह्म व्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ४
अथ जाना मैं श्रो चतुराई | भजिय तुम्हदर्हि सब देव बिहाई 0
सिंतामनि-भाव यह कि सणियोम सर्वोत्तृष्ठ होनेसे चिन्तामाणि
कट्टा | माणिके चार शुण हैं--(१ ) जाति, (२) शुचिता, (३)
अमूल्यता और (४) सुन्दरता | यथा--
सनिगन छुर नर नारि सुजाती ) छुचि अमोछ सुंदर सब भाँती ॥
यहाँ चिन्तामणि कहकर दिव्य जाति बतलायी । और मूल्य तो
इसका कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि सब कुछ चिन्तामणिमें बसता
हैं। जिसमें सब्र कुछ बसे; उसका मूल्य क्या * यथा--
अखने बसन सथ बस्तु दिविध ब्रिध सब मनि महँ बस जैसे ।
इससे त्तीसरा शुण अमृल्यता कद्दी । इसी भाँति राममक्ति-चिन्ता-
मणि है, इसमें सब शक्ति है, आतंके सक्ृत्को दरण करती है, अर्थार्यीको
अणिमादि सिद्धि देती है, जिशासुको ग्रूढ्गतिका ज्ञान ग्रदान करती है,
ओर शानीके ज्ञानकों अचल करती है । अन्य देवताओंकी मक्ति मी मणि है,
बढ़ी अमूल्य दे, यथा--आरोग्यं मास्करादिच्छेत् घनामच्छेत् हुताशनात?
पर राममक्ति सब कुछ देती है। इसलिये चिम्तामणि है | मूल्यके विषयमें
हम चर्चों नहीं करते, क्योंकि उसका सांसारिक मूल्य कुछ भी
नहीं दे )
झातयश्ञच चौपाई श्श्छ
खुंद्र-अब चौया गुण छुन्दरता कदते हैं| माव यद् कि शमभक्ति-
चिन्पामणि केवल छामग्रद ही नहीं है, सुन्दर भी है| जैसे सुन्दर
मणिके दृदयमें धारण करनेसे पुदुघकी ओंगमा होती है, उसी भाँति मक्ति-
चिन्तामणिके भी छुदयमें घारण करनेसे युदघकी शोमा होती है, वथा---
सोह सैंठ गिर्जा शुद्द जाये। जिसि जन रामसगतिके पाये ॥
चसौ-भाव यह कि च्वच्छन्दाचारिणी न हों; ऐसी मक्तिकों
अव्यभिचारिणी भी कहते हैँ | सो अव्यमिचारिणी भक्ति होनी चाहिये,
जो छदयमें निरन्तर वास करे ।
गरुड-माव यह कि आप स्वर्य भगवान् गदडइध्दवजकों पीठपर
बढ़ायें घूमते हैं, सों आपको भी मोह हो गया । अतः शारीरिक भजन
य्थेष्ट नहीं है; बथा---
राम राम सब कोठ कहें ठग ठाकुर झा चोर॥
बिना असम राौसे नहीं सुलसती संदक्िसोर
भक्तिकों छदयमें स्थान देनेसे फिर मोहका उदय नहीं होगा )
जाके उर अंतर-भाव यह कि वाह्य लछिज्घारण अकिश्वित्कर
है, बथा---
तुलसी देखि सुबवेप मूलहे भूठ न चतुर नर।
सुन्दर केकी पेखु बचन सुधा सम जसन जहि।॥
“जाके उर अंतरः कहकर अलौकिक सुन्दरता कही; और मणि तो
उरके ऊपर बसनेसे शोमा देती है; पर यह मक्ति-चिन्तामणि छुदयके
अंदर बसकर झोमा देती हैं |
परम प्रकासरूप. दिनराती ।
नहिं कछु चहिआ दिया घृत बाती ॥
अर्थ- ( बह चिन्तामणि ) परम प्रकादारूप दिनरात बनी
रहती है; दीया; चची, घीकी कुछ आवदच्चयकता नहीं ।
१३० श्रीभक्ति-चिन्तामणि
परम प्रकासरूप-भाव यद्द कि अन्य देवताओँकी भक्ति मणि
होनेसे प्रकादरूपा टै । मणिकव्प चित्तमें जेसा उपाभश्यक्रा प्रकाश दोता
है, बेसा ही प्रकाश आता है| यहाँ तो राम परमतत्व होनेके कारण
परम प्रकाशमय हूँ, यथा--
जोगिन परम तष्त्मय भासा । सांत खुद्ध हुव परम प्रकासा ॥
अत्एुव उनमें लगा हुआ चित्त भी परम प्रकाशरूप हो जाता है ।
इसीलिये राममक्तिकों परम श्रकाशमय कहां | इस भौंति मणिका
दूसरा गुण अलीकिक शुचिता मी कह दिया )
दिनराती-माव यद्द कि दीपका प्रकादय अँधेरी रातमें दी शोमित
द्ोता है; सवेशा होते ही धीमा पढ़ जाता टै। यथा--'जैसे द्विवस दीप
छब्रि छूटे ॥7 वैसे ही शानदीपका प्रकाश अविद्यान्धकारका नाश करता
हुआ दी शोमित दोता है; विज्ञान ब्रिद्यान (प्रातः) के समय अर्थात्
अभेदज्ञान ( साक्षात्कार )के समय सोडहमत्॒त्ति भी फीकी पड़ जाती हे;
परन्तु मणिदीप रातकों तो उजेला करता दी है। दिनकों सकी
किरणंकि पड़नेसे और भी चमकने लगता है, इसी भौंति राममक्ति
मोदराजिके तमका नाश करती हुई तो शोमित होती ही हैँ भगवत-
साक्षात्कारके समय और भी देदीप्यमान दो उठती है, क्योंकि वही
उसके अत्यन्त उत्कर्पषफा समय ऐ, यथा--
सुनि प्रश् बचन भगन सब भये । को हम कहाँ बिसरि तन गये ॥
दिया छूत बाती-भाव यद्द कि जिस भाँति |देवेकी बनाये रखनेके
लिये दीया, धी और बत्ती आवश्यक है; एकके अभावसे भी दीया
घुझ जायगा, उसी भाँति सोहमब्त्तिकों अखण्ड रखनेके लिये चित्तकी
समता, परम वेराग्य ( ज्ञान) और तुरीयावस्था तीनोंकी आवश्यकता है।
नहें कछु चद्धिअ-परन्तु भक्तिचिन्तामणिकों कायम रखनेके
लिये अन्य सामग्री (साघन) की अपेक्षा नहीं है, मगवत्-चरणॉंमे डोरी
ऊगी रहनी ही यथयेष्ट है, उसीसे सब कुछ हो जाता है, यथा-
शतपथ्च चौपाई श्३६
सो सुतंत्र अबवरूंच न आना। तेहि आधीन शान बिज्ञाना ॥
मोह दरिद्र निकट नहिं आवबा।
लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥३५॥
अर्थ-न तो इसके निकट मोहदरिद्र आया, और न
( फभी ) इसे छोमवायुने चुझाया ।
मोह द्रिद्ध-भाव यह कि मोह दरिद्र है, क्योंकि उसके भाग्यमें
सुनि-जन-घन ( राम ) नहीं है, यथा--सुनि जन घन सर्वस सिव प्राना?
इसीसे वह चोरी करता है) यथा-“मत्सर मान मोद्द मद चोरा# ।?
मदादि झलम होनेके कारण चोरीमें सद्यायक होते हैं, अतः इनकी मी
चोरोंमें गणना है; उँजेलेमें चोरी नहीं करते बनता, इसलिये दीपक घुझा
देते हैं) यही मोहदरिद्र डुःखोंका मूल है; यथा--नहिं दरिद्र सम
झुख जग माही ।?
निकट नहिं आवा-भाव यद्द कि जितनी ममताकी दृत्तियाँ रहीं
वे तों एकीभूत होकर भगवश्चरणोंमें छूय गर्यी, और ममताकी इत्तिकों
ही संसारमें लगाकर भोद अपना अधिकार जमाता है | अतः अब उसे
निकट जानेके लिये मार्ग ही नहीं रह गया, इसीलिये कहते हैं कि मोह
निकट नहीं आ सकता ।
लोस बात-से तात्पय॑ विषयसमीरसे है | यह झानदीपकका
प्रवछ शत्रु है। जहाँ सनोहर विषय---शब्द स्पर्श रूप रस गन्धका साक्षात्कार
हुआ वहीं बत्ति उस ओर दौड़ी, और 'सो5हमस्मि? 'चृत्ति गयी? क्योंकि
तत्यदके शोघनसे उसमें विधयका छेश नहीं रह जाता, अतः चत्ति दूसरी
ओर दौड़ जाती है; और यहाँ सणुण ब्रह्म श्रीराममें यावत् विषय दिव्या-
+ करों जो कछु धरों सचि पचि सुकृत सिंला बयेरि।
पैठि उर बरबस दयानिधि दंभ छेत अऑजोरि।!॥
+ पतंग।
श्र्७ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
तिदिन्य रूपमें वर्तमान हैँ, अतः उनमें लगी हुई जत्ति ठुब्छ विषयोकी
ओर नहीं दौड़ सकती, यथा--
देव देखि तसतव थालक दोझ | अब न जाँखतर जाये कोऊ ॥
तथा--
रास काम सत्तकोटि सुभग तजु। हुगों कोटि अमित अरिमरदनु ॥
सक्र कोटि सत बिभव बिछासा | नक्न सत कोटि अमित अवकासा ॥
मरत कोटि सत ब्रिपुल बर रत्रि सतकोटि भ्रकास।
ससि सतकोरि स्री सोत्तत, समन सकल भवत्नास ।॥।
काऊकू कोटि सत सरिस जत्ति दुस्तर दुर्ग दुरंत।
घूमफेतु सत्तकोटि. सम छुराधर्ष भगवंत ॥
प्रभुभगांध सतकोटि पताछा । समन कोटि सत सरिस कराछा ॥
त्तीरथ कोटि अमित सम पावन । नाम जखिक अघपुंज नसावन 0
द्विमिशिरि कोटि अचछ रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंसीरा ॥
कासधेनु सतकोटि समाना। सकल कामदायक भगवाना #
सारद कोटि अमित चतुराई | विधि सतकोटि सृष्टि निषुनाई।॥
चिप्नु कोटि सत पालनकरता | रुद्ध कोटि सत सम संहरता ॥
घनदु कोटि सत सम भनवाला। साया कोटि प्रपंचनिधाना॥
भार भरन सतकोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रछु जगदीसा ॥
निरुपम न उपमा झान राम समान रास निगम कहे ।
जिमि कोटि सत खथ्योत सम रबि कद्दत अति लघुता छह #
नहिं तादि चुझावा-भाव यद्द कि दीप घुझता है, मणिदीप नहीं
बुझता । भगवानके रंगमें रंगे हुए मनपर दूसरा रंग नहीं चढ़ता, यथा-
सूरस्थामकी कारी कमरिया चद़े न दूजो रंग ।
सुछु सठ भेद होह मन ताके | श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाके ॥
शतपश्च चौपाई श्३८
प्रबल अबिद्यातस मिटि जाईं।
हारहिं सकर सलूूम सखुदाई ॥
अर्थ-अविद्याका प्रबछ अन्धकार मिट जाता डै। और
शलभाँका समुदाय भी छदार जाता है ।
' प्रवछ अविदयातम-भाव यह कि तम तो नित्य ही मिटा करता
है, परन्तु यह अविद्याका तम बड़ा प्रबल है | अनादिकाब्से आजतक
चला आ रहा है, अगणित उपाय जन्मजन्मान्तरसे करते चले आये हैं,
पर सिटा नहीं ! यह अविद्यातम अमिमान है, यथा--०त्यागहु तम
अभिमान ।” इस प्रबल तमकों उनके चरणोंके आश्वित होनेसे भगवान्
मिटाते हैं, यथा--
संसति मुझ सूलछप्रद नाना । सकक सोकदायक अभिमाना ॥
ताते करइ कृपानिधि दूरी | सेचक पर ममता अति भूरी॥
मिटि जाई-माव यह कि मूलाविद्याका अन्धकार मिट जाता है
जिससे चित्जड़गन्थि स्पष्ट भासने लगती है। एक बार मिट जानेपर
फिर अन्घकार नहीं होता, क्योंकि मणिदीप बुझता ही नहीं । अब मक्त-
को अधिकार है कि या तो उस ग्रन्थिको छोड़कर वह कैवसल्यसुक्ति छे, और
चाहे उसे रहने दे, मोक्षके समीपवर्ती होकर भगवदनुभवरूप मोक्षसुख
छेता रहे | इस अवस्थामें मुछाविद्या तों मिट जाती है, पर लेशाविद्या
रहती है, और यह मक्तोंकों इष्ट है; यथा--
अस अभिसान जाह जनि भोरे । में सेवक सियपति पति मोरे ॥
सलऊभ सझ्भुदाई-यहाँपर उपमेय नहीं कहा, अतः उन्हें शानदीप-
प्रसज्षसे छाना पड़ेगा, यथा--“जरहिं मदादिक सलम सब )? सदादिक
शल्म हैं, प्रकाश देखते ही उसपर ट्टट पड़ते हैं, खयं मले ही जल जायें,
पर रोशनी बुझानेके उद्योगसे बाज नहीं आते । भाव यह कि ज्ञान होते
ही अपने उत्क्षका मद होता है, चाह्दे ज्ञानी अपने शानसे उसका नाश
श्श् श्रीभक्ति-चिन्तामणि
कर दें) पर होता है अवश्य | समुदाई! से मत्सर-मानका भी
ग्रहण है |
हारहिं-भाव यह कि मणिदीप शल्मकों जला नहीं सकता, पर
स्वयं चुझता भी नहीं, शल्मसमुदाय जोर लगाकर हार जाते हैं इसी
भाँति मक्तिचिन्तामणि मद-मानकों नष्ट नहीं कर सकती; क्योंकि उससें
लेशाविद्या रहती है, पर मद-मानादि उसका अपकार भी नहीं कर
सकते, यथा---
भत्सर भान सोह सद चोरा । इनकर हुनर न कौनिड ओरा ॥
खल कामादि निकट नहिं जाहीं ।
बसे भमगति जाके उरमाहीं ॥३२६॥
अर्थ-कामादिक खल भी निकट नहीं जाते । जिसके हृदय-
में भक्ति बसती है।
खक कामादि-काम-कोधको खल कहा, क्योंकि थे अकारण सबका
अपकार करते हैं, कल्याणपथके बटमार ( डाकू ) हैं | इन्हींके कारण
आजतक कल्याण नहीं हों सका; इच्छा न करनेपर भी पुरुषसे पाप करा
देते हैं, यथा---
खछ बिनु कारन पर अपकारी । अधि सूपक इव सुनु उरगारी॥
निकट नहिं जाहीं-माव यह कि विषयका ध्यान करनेसे उसका
संग होता है, और संग होनेसे काम होता है। भक्त अनवस्त अपने
प्रभुके ध्यानमें रहता है, उन्हींमे उसका चित्त रूगा रहता है, अन्य
विषयोंकी ओर उसका ध्यान ही नहीं आकर्षित होता, और बिना ध्यान
हुए संग नहीं होता, और बिना संगके कामकी उर्पात्ति ही नहीं होती है।
अतः काम रुदा दूर द्वी रहता है क्रोंधकी उत्पत्ति तो कामके भी बाद
होती है; अतः वह और भी दूर है, निकट नहीं जा सकते | यहाँतक
इातपशञ्च चौपाई शरण
भक्तिके करनेकी सामर्थ्य कही गयी । “बसे गरुड़ जाके उर अंतर कहकर
इस प्रसज्षका प्रारम्भ किया था ।
चले भगति-फिर उरमें वसनेकी उक्तिसे दूसरा प्रसज्ञ अन्यथा
करनेकी सामथ्यका वर्णन करते हैं | भक्तिके हृदयमें वस जानेसे जत्र
छडृदय भगवद्धावसे भावित होता है, भगवदाकार हो जाता है, तब्र उसे
सम्पूर्ण विश्व चराचर भगवद्गूप इृष्ट होने लगता है। इस भावनाके इढ़
होनेसे सब दिल्याएं उसके लिये लाभप्रद और सुखप्रद हो जाती हैँ, यथा-
बेर न विग्नह आस न त्रासा | सुखसय तादध्दि सदा सब जासा॥|
उरमाहीं-भाव यह कि भक्तिके दृदयमें वैठ जानेसे ऐसा द्ोता है;
केवल भक्तका वेध बनानेसे अथवा भक्तोचित वाणीका उच्चारण करनेसे
ऐसा नहीं होता; यथा--
रूखि सुवेप जग बंचक जेऊ | बेप भताप पूजिजत त्तेऊ हे
उघरदि अंत न होइ निवाहू । कालनेमि जिमि रावन राहु #
तथा--
कियेड कुबेप साधु सनसानू। जिसि जग जामवंत हनुमान ॥
भगवक्चक्तिके उरमें बसनेसे केवछ दारीरमान्र ही प्रभावित नहीं
होता; सम्पूर्ण जगतूपर उसका प्रभाव पढ़ता है, यथा-- “जग भल भले
पोच कहें पोचू ।?
होई
गरल सुधासम अरि हित होई ।
तेहि 4 कोई
तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥
अरथ-विष अम्ठतके समान हो जाता है, और शत्र हित हो
जाता है, उस मणिके बिना कोई झुख नहीं पाता ।
गरल छुवासम-भाव यह कि न्नक्षाके प्रपश्चमें गुण-अवगुण मिला
हुआ है; यहाँ विषमें अम्बत और अम्ृतर्में विष है| झुद्ध विष या शुद्ध
१४१ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
अमृत कोई पदार्थ नहीं है । अतः सुखबुद्धिसे प्रहण किये हुए पदार्थमें
भी दुःख मिलता हैं । यही जगत्का नियम है; वथा--
विधि अपंच गुन अवगुन साना ।
दुख सुख पाप पुन्य दिनराती । साधु जसाधु खुजाति कुजाती ॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिज इलाहल माहुर मीचू॥
परन्तु जिसके छृदयमें भक्ति बसी है, वहाँ यह नियम अन्यथा हो
जाता है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उसकी
भावना दृढ़ होनेके कारण बस्तुविद्ेप अपने हानिकारक श्ुणकोीं ग्रकट
करनेगें असमर्थ हो जाती है, यथा--
पापी है चाप बड़े परिताप ते आपनी ओर ते खोरि न लाई।
भूरि दई बिप झमूरि भई प्रह्मद सुधाई सुधाकी सछाई ॥
यहाँ “गरल सुधा सम” कहकर जडका गुण परिवर्तन कहा !
अरि हिल होई-शबत्रु भी मित्र हो जाता है। भाव यह कि चाहे वह
चुराई ही करे; पर उससे भक्तका उपकार ही होता है, यथा--
वालि परमहछ्ित जासु प्रसादा। मिलेड राम तुम समन बिपादा॥श।
अरि हित कहकर चेतनके गु्णोर्मे भी परिवर्तन कद्दा । भक्तकी दृढ़
भावनासे चेतनशक्ति जाग उठती है, उसके सामने जडक्क्तिकी कुछ नहीं
चलती, यथा---
काढ़ि कृपान कृपा न कहूँ, पितु काछकराल विछोकि न भागे १
राम कहाँ? सब ठाउँसें, खम्भर्मे ? हाँ, सुनि हक नुकेहरि जागे ॥
बेरि बिदारि भये बिकराऊ, कहे प्रह्मादहिंके अनुराग ।
गति प्रद्ीत्ति बढ़ी सुछप्ी तचते सब पाहन पूजन छागे ए
तेद्दि मनि विज्ु-भाव यह कि जिस भक्तिचिन्तामणिका इत्तना
प्रभाव है कि गरलकों सुघा और शच्रुकों मित्र बना देती है, उसके बिना
अन्य सुखसाधन अकिश्वित्कर हैं। राम दी आनन्दसिन्धु हैं, सुखकी राशि हैं,
उसी आनन्दरसिन्धुके छींटेसे तीनों लोकका सुपास होता है, उस आनन्द-
शतपशञ्च चौपाई १७२
सिन्धुकी ओर जिसकी चिततब्ृक्ति नहीं गयी, और विपयोकी ओर दौड़ी
उसे सुख कहाँ ? उसकी दशा उस मृगकी भाँति होती है, जो मगतृष्णाके
पीछे दौड़ते-दौड़ते प्यास और थकावटसे मर जाता है; यथा--
तुपित निरखि रबिकर भव बारी । फिरिहहिं झूग जिमि जीव हुखारी ॥
पाव न कोई-भाव यह कि चाहे वह छौकिक सुखसमृद्धिसे कैसा
ही सम्पन्न हों, पर उस सुखसमद्धिसे उसे सुख नहीं मिल सकता | क्योंकि
वहाँ सुख है ही नहीं, यथा--
ऐसी मूढ़ता या मनकी ।
परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, जास करत ओसकनकी॥
धूभ-समूह् निरखि चातक ज्यों, तुृपित जानि सत्ति घनकी।
नहि तहँ सीतलता न वारि, पुनि हानि होति छोचनकी ॥
ज्यों गच-कॉँच विलोकि सेन जड़ छाँह जापने तनकी।
हदृटत अति आतुर अहार बस, छति विसारि आननकी ॥
व्यापहिं मानसरोग न भारी ।
जिनके बस सब जीव दुखारी ॥१ण।
जर्थ-डसे भारी मानसरोंग नहीं व्यापते, जिनके बस
होकर सब जीव दुखारी हैं।
भारी मानसरोग-भाव यह कि जिस भाँति स्थूछ शरीरमें
शारीरिक रोग होते हैं, उसी भाँति सूझ्ष्म शरीरमें मानसरोग होते हैं ।
गरुडजीके अन्तिम सप्प्रश्नमें एक प्रश्न मानसरोगके विधयमें है, उसके
उत्तरमें मानसरोंगप्रसज्ञ ही अलग कहा गया है | यहाँपर इतना दी
लिखना यथेष्ट है कि जिस भाँति इस स्थूल शरीरमें बात-पित्त-कफके
प्रकोपसे शारीरिक रोग होते हैं, उसी भाँति काम-क्रोध-छोमके प्रकोपसे
अनेक मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। ये भारी रोग हैं, क्योंकि ये-
१७३ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
असाध्य हैं; चिकित्सासे मी नहीं जाते, और सदा-सर्वदा सत्र जीवॉकों
कष्ट दिया करते हैं, यथा---
एक व्याधिवस नर मरहिं, ए असाध्य वहु व्याधि |
संतत पीड्हिं जीव कहँँ, सो किमि लहे समाधि ॥
न व्यापद्धि-भाव यह कि मानसिक रोगका मूछ मोह है, यथा--:
सोह सकछ व्याधिन कर मूुला। तेद्दटि ते पुनि उपज बहु सूलछा ॥
--और मोह जीवमाज्रकों है, अतः व्याधिक्री जड़ बनी हुई है;
बीज तैयार है, जहाँ विषयरूपी कुपथ्य मिला, तहाँ ये मुनिलोगोके
दृदयमें अद्भूरित हो उठते हैं, मन॒ष्योंकी गिनती ही क्या है; यथा--
बिषय कुपण्य पाइ अंकरे। झुनिहु हृदय का नर बापुरे ॥
अतः$ ये मानसिक रोग सबको हैं, पर भक्तकों नहीं होते, भक्ति-
चिम्तामणिकी कछृपासे उसके निकथ मोह नहीं आता | अतः भक्तकों
समाधि सुलभ है, यथा--
सुमिरत हरिहिं साप गति याधी । सहज बिमछ सन छागि समाधी ॥
जिनके बस सब जीव-भाव यह कि जीव और ईश्वरमें यही
भेद है कि ईश्वर्का ज्ञान एकरस है, उसे मोहकी बाघा नहीं है, और
जीवको मोहकी वाधा आनेसे एकरस ज्ञान नहीं होने पाता; शान्ताबृत्ति
बार-बार घोरा और मृढा इत्तियोसे पराभूत हुआ करती है; यथा--
जौ सबके रह ज्ञान एकरस | ईंखर जीवहिं भेद कहहु कस ॥#
अतः मोहवश होनेसे जीव मानसिक रोगॉके वशमें सदा पड़ा
रहता है |
डुखारी-कहनेका भाव यह कि बाहरी सब सुखेसि घिरा हुआ
छष्ट-पुष्ट दिखायी पड़ता हुआ मनुष्य मी मानसिक रोंगोंके कारण कल नहीं
पाता; रसदान्सवंदा दुखी रहता है। अतः वाह्य चुखतामग्री केवल
ढकोंसला मात्र है, यथा--
शतपश्व चौपाई १७७
कासते रूप प्रताप दिनेसते सोमते स्ीरू गनेसते माने ॥
हरिचंदते साँचे बड़े बिघिते मघवाते सहीस विपय सुखसाने #
सुक सारद भनारदते बकता चिरजीवहु छोमसते अधिकाने
एसे भये तो कट्ठा तुलसी जो पे राजिवलोचन राम न जाने #
रामसमगतिमनि उर बस जाके ।
दुख लवलेस न सपनेहु ताके ॥
अर्थ-रामभक्तिमणि जिसके हृदयमें बसती दे, उसे सपने-
में भी दुखका ऊवलेश नहीं रहता ।
रामसगतिमनि-भाव यह कि “रामभगति चितामनि खझुंदर |
बसे गरुड़ जाके उर अंतर ॥? कहकर भक्तिमणिका कर्तृत्ववर्णन प्रारम्भ
किया; फिर “बसे भगति जाके उरमाहीं? कहकर भक्तिमणिकी अन्यथा-
कर्तृत्वदशक्तिका निरूपण आरम्म किया, अब 'रामभगतिमनि उर बस
जाके ? कहकर अकर्तृत्वशक्तिका वर्णन करते हैँ---
उर बस ज्ञाके-भाव यह कि करने अथवा अन्यथा करनेसे भक्ति
में कोई विकार नहीं आता; क्योंकि स्॒यं॑ भक्ति कुछ करने नहीं जाती,
उसके द्वदयमें अवस्थान करने मात्रसे सब कुछ होता है। सब कुछ
करके बे न करना यद्दी अलेपवाद है; भक्तिमें इसका निरूपण किया
जाता है।
दुख लवलेस न-भाव यह कि बीवमें कतेत्वाभिमान होनेसे ही
उसे कर्मफलछ भोगना पड़ता है, यथा--
करे जो के पाव फल सोई। निगम नीति जस कह सब कोई ॥
शानीकी कठंत्वबुद्धि खरूपसाक्षात्कार होनेसे जाती रहती है,
उससे कर्म नहीं होता; यथा--कर्म कि होंइ खरूपहिं चीन्हे! और
भक्तिमं लेशाविद्या रहती है, उसमें सेवकसेव्यमावरूपी अमिमान
रहता है, अतः उसमें कतृत्वचुद्धका अभाव नहीं होता; और जबतक
१४० श्रीमक्ति-चिन्तामणि
कतृत्व बुद्धि है तबतक फलरूप दुश्ख-सुखका मोग होंगा ही | दुःख-
मिश्रित छुख भी दुःख ही है। वैधयिक सुख कैसा भी हो उसमें दुःख-
का छव॒लेश बना ही रहता है । अतः कर्तत्व बुद्धिके नष्ट हुए बिना दुःख-
लबलेशका निराकरण नहीं हो सकता । सो लेशा विद्या रहते हुए भी)
भक्तिचिन्तामणिके प्रभावसे कर्तृत्वाभिमान निःशेष हो जाता है | क्योंकि
भक्त सर्वात्मना भगवानपर निर्भर है; उसने अपनी स्थितिकों परमेश्वरके
अर्पण कर रक्खा है, उसकी दृढ़ घारणा होती है कि मायी परसेश्वर ही
सबका प्रेरक है और जीव उसके हाथकी कठपुतली है; अतः भक्तकों भी
क॒तृस्वाभिमान नहीं रहता | यथा--
उमा दारू जोपितकी नाहँ। सबद्धिं नचावत रास गोसाईं ॥
नट मरकट एव सबहहिं नचाचत । राम खगेस बेंद अस गावत ॥
अतः भक्तिके छुदयमें अवस्थान करनेसे दुशखलूवलेशका न होना
सर्वथा युक्तिसिद्ध है ।
सपनेह ताके-माव यह कि जाप्रत॒के संस्कारानुसार ही खप्त होता
है, भक्तको उपयुक्त भावना ऐसी दृढ़ हों जाती है कि खप्ममें भी उसे
कर्तृत्वाभिमान नहीं होता | अतः खम्मावस्थामें भी उसके लिये दुशखके
लवलेशकी सम्भावना नहीं रह जाती ।
चतुरसिरोमनि ते जग साहीं ।
जे मनि लछागि सुजतन कराहीं ॥३८॥
अर्थ-संसाय्में वे दी चतुरशिरोमणि हैं, ज्ञो मणिके लिये
छुयल करते है।
चतुरखिरोमनि-माव यह कि जिसमें अल्पायाससे महान्
फल हो, ऐसा उपाय करनेवाले ही चतुर हैं। अतः आत्त, जिशासु,
अथार्थी और ज्ञानी भक्त चतुर उठहरे, जिन्होंने कष्टकर उपायोका
अवल्म्बन न करके मनोर्थसिद्धेके लिये सुगम उपाय साधनभक्तिका
१७०
शातपश्च चौपाई..' श्छ्द
आश्षय ग्रहण किया, यथा--चहु चठुरन कहें नाम अघारा |? परन्ठ
फलकी महत्तापर भी जिसका ध्यान गया हो; वह चठरशिरोमणि है ।
ते जग माहीं-भाव यह कि संसारमें ऐसे घाणी छुदुलभ हैं,
जिनके लिये भक्ति ही साधन है और वही फलूसिद्धि है, जो अन्य सिद्धि-
की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते । जो प्रेमसे प्रेमको दी चाहते
हैं, जिन्हें प्रेमके वदलेमें कुछ चाहनेसे चिढ़ है, यथा--
परों नरक फल चारि सिसु सीच ठाकिना खाड ।
चुरूसो राम सनेहकों जो फल सो जरि जाउ ॥
इस खार्थी जगतमें ऐसे प्रेमी महापुदघ परम छुलभ हैं, यथा--
धर्मशील विरक्त अरू ज्ञानी । जीवन मुकुत शत्मपर प्रानी ॥
सबते सो छुर्लूम सुरराया। राममगतिरत गत मद सायाव।
जे मनि कागि-भाव यह कि सोहान्धकारमें ही पड़े रहनेवाले
मूढ़ हैं, निवपास्ति ज्ञानी भी हठी हैं, साधनमक्तिके सहित सिद्धिलाम
करनेवाले चठुर हैं, और फलखरूपा भक्तिविन्तामणिके लिये यक्ष करने-
वाले चठुरशिरोमणि हैं । क्योंकि भगवद्धावनासे भावित अन्त+करणको
इन्द्रपद सूखा हाड़-सा प्रतीत होता है, यथा--
सूख हाड़ू ले भाग सठ स्वान निरखि झुगराज |
छीन लेइ जनु जानि जिम तिमसि सुरपतिहि न छाज ॥
झुजतन कराहीं-भाव यह कि दत्तचित्त होकर सावधानीके
साथ शास्त्रीय श्रयत्त करना ही उुयत्ष है, शास््रीय यक्षसे ही कार्यसिद्धि
होती है, जो मूढ़ अज्याजीय प्रयज्ञ करते हैं, उनको न सिद्धि होती है,
और न परायगतिकी प्राप्ति होती है, क्योंकि अल्पक्ष जीव अपने अशानसे
अपायको दी उपाय मान बैठता है, यथा--
शुतिसस्सत हरि भगतिपथ संजुत श्ान-विवेक |
सी न चलहिं नर मोहबस कहव्पहिं पंथ जनेक ॥
१छ७ ओमक्ति-चिन्तामणि
सो मनि जद॒पि प्रगट जग अहई।
रामकृपा बिनु नहिं कोउ लहई ॥
अर्थ-चह मणि यद्यपि जगतमें प्रकट है; ( तथापि ) बिना
रामकी रूपाके किसीकों नहीं मिलती ।
सो समि-भाव यह कि वही सुन्दर भक्ति-चिन्तामणि; जिसके
प्रकाशसे अविद्यान्धकार्का नाश होता है; जिसके सामने काम-क्रोध-छोम-
मद-मात्सये-मोहकी कछा नहीं चलती, जिसके प्रभावसे अनिष्ट भी इष्ट
हो जाता है, जो सुखका असाधारण कारण है, जो मानस शेगका
अव्यर्थ औषघ है, और जिसके साथ दुःखका सम्पर्क भी नहीं है ।
ज्द्पि-शब्द. यद्यपिका अपभ्रंश है, इसीके वलसे तथापि? का
अध्याहार किया गया |
प्रणट जग अददई-भाव यह कि उस शाश्वत जगद्गुरु रामने सष्टिके
प्रारम्भमें ही वेदशाओ्रोंका उपदेश कर रक्खा है, और उपदेद-परम्परासे
जगतूर्मे उसका प्रचार बराबर होता आ रहा है, यथा-जगदगुर च॑
शाश्वतम् । तुरीयमेव केवकस् | ( मारुतश्वास ) निसम निज बानी ।? उसी
वेदशास्त्र्मे भक्ति भरी पड़ी है
शमरूपर विज्ञु-भाव यह कि उस करुणासागर रासकी अहेतु॒की
ऋृपासे ही जीवको कमी मनुण्यशरीर मिल जाता है; और मनुष्यशरीर
ही मबसागर-सम्तरणके छिये नौकासख्रूप है| ऐसा शरीर पाकर उनका
अनुशासन मानना चाहिये। जो उनका अनुशासन मानता है, वही
उनको प्रिय है, उसीपर उनकी कृपा होती है; यथा-
सोइ सेवक प्रियतम भस होई | सम अनुसासन माने जोई ॥
और बेद-शात्र ही उनका अनुशासन है। अतः वेदशास्नानुगामी-
पर उनकी कृपा होती है, और बिना उनकी कृपाके खुले मेदानमें
पड़ी हुई चिन्तामणिकी प्राप्ति नहीं होती ।
इशतपशथ्च चौपाई श्छ८
नहिं कोड रूहई-भाव यह कि अशात्ीय पुरुषार्थते मक्तिचिन्ता-
मणिकी प्राप्ति नहीं होती; चाहे पुरुषार्थ करनेवाल्य कैसा ही पराक्रमी क्यों
न हो; यथा--
जो जेद्टि कला कुसलता कहँ सोइट सुखद सदा हितकारी
सफरी सनमझुख जलूप्रवाह सुरसरी वहे गज भारीए
जिमि सकेरा मिले सिकतामहँ घलते न कोउ विलयायै।
अति रसक्ष सृच्छम पिपीछिका चिह्लु श्रयास ही पाजे॥?
( विनय० )
शास्त्रीय पुरुषार्थंसे मगवत्-कृपा होती है, उससे भगवत्-प्रभुताका
ज्ञान होता है, प्रमाव-शामसे विश्वास होंता है, विश्वाससे प्रीति और
ग्रीतिसे डृढ़ मक्ति होती है, यथा--
राम कृपा विज" सुन्न खगराई | जानि न जाएं राम शअद्भुताई ॥
जाने बिनु न दोद् परतीती ॥ विना भर्ताति द्ोद नहिं प्रीतो 0
प्रीसि बिना नहिं सगति इृढाईं। जिसि खगेस जलके चिंकनाई ॥
सुगस उपाय पाहे केेे।
नर हतभाग्य देहिं भटसेरे ॥३२६॥
अर्थ-पानेका खुगम उपाय भी है; पर अभागे मनुष्य उसमें
रुकावट डालते हैं।
खुगम उपाय-भाव यह कि उपाय भी दुर्गम नहीं है | हरिमक्तिका
तो शान और भक्ति दोनोंमे समान उपयोग है | हरिक्वपासे ही सात्विकी
श्रद्धा होती है, जिससे जीव शानमार्गमें अग्रसर होता है, और भक्तिमणिकी
प्राप्ति भी दरिकृपासे होती है; पर शानमार्ग अगम है, यथा---
शजानक पंथ कृपानक धारा। ज्ञान अगम प्रत्यूह अनेका ।! और भक्ति-
प्राप्तिका उपाय सुगम है; पुरुषार्थ दोनोंमें अपेक्षित है, केवल सुगमता-
छुर्गमताका भेद है |
पाइवे केरे-भाव यह कि चेद-पुराणका सर्वत्र प्रचार है, उनके
मर्मी भी सुल्भ हैं, 'सबहिं सुछभ सब दिन सव देंसा ।? साधनमक्तिसे
१४९, श्रीभमक्ति-चिन्तामणि
( परोक्ष ) ज्ञान और पैराग्य हो ही जाता है, अतः हँढ़नेसे मक्ति-चिन्ता-
मणिके न प्रास होनेका कोई कारण नहीं है ।
नर हतभाग्य-जो नर भवमजझ्ञन भगवानके विमुख हैं, वे ही
इतमाग्य हूँ । सांसारिक सम्पत्ति होनेसे ही कोई माग्यवान् नहीं हो जाता,
यथा--
ते नर नरकरूप जीवत जग भवर्भंजन-पद-चिमुख अभागी।
निसिवासर रुचि पाप जसुचि मन खल सत्ति मल्िन निशामपथ त्यागी ॥
नहिं सतसेग भ्रजन नहिं हरिको स्रवन न रामकथाजजुरागी |
खुत बित दार भवन समता निसि सोवत अति च कबहूँ सत्ति जागी ॥
तुलुसिदास हरि नामसुधा तजि सझ्हढि पियत विपय-विप माँगी )
सूकर स्वान सुगाल सरिस जन जनमत जगत जननि छुख छांगी ॥
नरदारीरका उपक्षय जिसने विघय-सामग्री एकत्रित करनेमें ही
कर दिया; उसे भाग्यवान् कैसे कहा जाय ? नरशरीर सुलम हो गया;
चेद-पुराण और उनके मर्मी समी सुलूम हैं; पर इस बीचमें उसकी
कुमति उठ खड़ी हुई | साधन जुट जानेपर भी उसकी कुमतिके कारण
सिद्धि दुर्लभ हो गयी, इसीलिये हतभाग्य कहा |
देहिं भटमेरे-माव यह कि जो भवभञ्जन रामके चरणोंसे ही
विभुख है, वह उनके अनुशासन वेद-शास््रपर क्यों भद्धा करने छूगा ? अत्तर
वह कोई मनगढ़न्त पन््थकी कल्पना करेगा और अन्तमें सत्यमार्गसे परिश्रषट
होकर दुःख पावेगा । ऐसे छोंग अपनेकों ही द्वानि नहीं पहुँचाते वल्कि
दूसरोंकों भी पयश्रष्ट करते हैँ; यथा--
साखी शब्दी दोहरा कहि कहनी उपखान।
भगत्ति निरुपह्धिं भगत कलि, निंदहिं बेंद पुरात ॥
शतपश्च चौपाई ४ १७०
पावन परबत बेद पुराना।
रामकथा रुचिराकर नाना ॥
अर्थ-चेद-पुराण पापनाशक पर्वत हैं; ( जिनमें ) रामकथा-
रूपी नाना प्रकारकी हझुन्द्र खाने हैं ।
पावन परबत-मभाव यह कि पर्व॑तोंकी उपयोगिता विचार करनेसे
मातम पड़ती है । पव॑तोंसे ही एथ्वी ध्रत है, इसीसे इनका नाम भूघर है;
इन्हींके कारण जल वरसता है, इन्हीसे नदियाँ निकछू-निकलकर जग-
त्तीतछकों आष्ठटावित करती हैं, इन्हींसे अनेक उपयोगी वस्तुओंकी प्राप्ति
होती है, इन्हींमें अनेक प्रकारकी खाने हैं | जो पव॑त पावन माने गये हैं;
उनके दर्शन और यात्रासे पाप नष्ट होते हैं ।
वेद् पुराना-भाव यह कि वेद-पुराण पापनाशक पव॑त हैं।
विचार करनेसे ही इनकी उपयोगिताका पता चलता है। इन्हींके कारण .
संसार घूत है, क्योंकि प्रजाओंके धारण करनेवाले धर्मोके ये ही आध्
उपदेष्टा हैं | इन्हींसे रस छेकर साधुछोग भगवानके यशकी वर्षो किया
करते हैं, यहींसे जानकी नदियाँ निकल-निकलकर संसारभरमें ज्ञानका
सग्ार कर रही हैं । इन्हींसे अनेक ज्ञान-विज्ञान संसारकों प्रात हुआ
करते हैं । इन्हींमें अनेक प्रकारकी कथाओंकी खानें हैं | इन्हींके दर्शन
और पठन-पाठनसे पाप नष्ट होते हैं |
रामकथा-माव यह है कि वेद-पुराणमें त्रिवर्की भी अनेक
कथाएँ हैं, उन्हींके बीचमें राम-कथा भी है; वेद-पुराणका बड़ा भारी
विस्तार है, उनका सम्यक् अनुशीलन पहाड़ खोदनेकी माँति अशक्य है।
फिर भी राम-कथाके जिशासुओंके लिये वेद-युराण ही शरण हैं !
रूचिराकर समाना-यथ्पि पहाड़ोंमें अनेक वस्तुओँकी खार्ने हैं,
पर सुन्दर खान भणिकी ही समझी जाती हैं । इसी भाँति वेद-पुराणोंमें
श्ण्र् शीमक्ति-चिन्तामणि
राम-कथा ही श्रेष्ठ मानी जाती है । कथाओके भेदसे नाना प्रकारकी
खाने मानी गयी हैँ, यथा---
कल्प कह्प प्रति प्रशु जचतरहीं | चार चरित नाना विधि फरहीं ॥
तब तब कथा सुनीसन्द शाई। परम विशिन्न प्रवन्ध बनाई ॥
खामि कहनेका भाव यह कि जितनी मणियाँ संसारमें हैँ, वे सब
खानसे ही निकली हैँ, और जो संसारमें आवेंगी वे खानसे ही आवेंगी ।
इसी भाँति जितनी रामकथाएँ प्रचलित हूँ, वे वेद-पुराणसे ही निकली
हैँ, और जो प्रचलित होंगी, उनका भी उद्बमस्थान वेद-पुराण ही होगा;
जिस भाँति पत्थरोंसे खान ढकी रहती है, उसी भाँति निवर्गकी कथाओँ-
से राम-कथा छिपी हुई है |
मर्मी सजन सुमति कुदारी।
ज्ञान बिराग नयन उरगारी ॥9 ०॥
अर्थ-( उसके ) भेद जाननेचाले सजन हैं, खुमति छुदारी
है, और छे उरगारि | शान-विराग आँखे हैं ।
मर्सी सज्ञन-भाव यह कि भेद जाननेवाले वतछा देते हैँ कि
अमुक स्थानमें खान है; और वह इस भौति खोदनेसे मिलेगी | अतः
बिना भर्मके खान नहीं सिर सकती | इसी भाँति गुरुचरणोपासक
अनुभवी छोर ह्वी इसके मर्मी हैं; निवर्गकी कथाएँ उनकी इष्टिपर आवरण
नहीं कर सकतीं, वे खानको दिव्य दृष्टिसे देखते हैँ, वें कथाका स्थल भी
बतला देंते हँ और वह विधि भी बतला देते हैँ जिससे कथातक पहुँच
हो सके । श्रीयुरुवरणोंकी कृपासे उनकी शान-दृष्टि खुली रहती है; यथा-
आोगुरुपद-रज संजुऊ जंजन | नयन अमिलल दग दोप विभंजन ॥
उधरद्धिं बिसक विछोचन छिलके । सिट॒द्टं दोप छुख् भचरजनीके ॥
सूझहिं रामचरित सनि मानिक | गुप्त प्रकद जहँ जो जेट्टि खानिक ॥
शतपशञ्च चौपाई श्ष्र
यथा सुअंजन जाँजि डइग, साधक सिद्ध खुजान।
कौतुक देखहिं सेल वन, भूततल भूरि निधान ता
खुमति कुदारी-कुदारी कइनेसे द्वी यह बात निकलती दे कि
मर्मीने ऐसा ठीक पता बरतलछाया कि अकेला आदमी कुदालसे सोदकर
खानमेंसे मणि निकाल ले | छुमतिको कुदाछ इसलिये कद्दा कि सुमतिसे
ही रामकथा हँढ़ मिकाली जा सकती है, कुमति भिवर्गमें ही फेसकर
रह जायगी, भविवर्गके पत्थरोंकों दृदाना उसके सामर्थ्यके बाहरकी वात
है, उसे हित-अनद्वितकी पहचान नहीं दे |
शान विराग नयन-भाव यदद कि बिना झ्ान-पिरागके रामकथा
दिखायी नहीं पड़ती, उसे किसी साघारण राजकुमारकी इतिद्ृत्ति मालूम
पड़ती है; यथा--
एक राम अचधेस कुसारा।॥ तिनकर चरित बिदित संसारावा
नारिविरष्ठ हुख लह्देड अपारा । भयठ रोप रन रावन मारा ॥
शान-विरागरूपी आऑखें साधनमक्तिसे उत्पन्न हो जाती हैँ, यथा---
प्रथमहिं विप्रचरन अति भीती | निज-निज् धरम निरत श्रुत्ति रोती ॥
तैट्टिकर फल पुनि विषय विरागा | तव सम धर्म उपज अजुरागा॥
उरगारी-भाव यह कि आप उरगेंके शत्र हैं, उनके कीशलको
मलीभौॉति जानते हूं । अतः समझ सकते दूँ कि अन्धेसे सर्पवध
नहीं हों सकता, मणिकी पहचान वह क्या करेगा ?
भाव सहित खोजे जो पानी ।
पाव भगति मनि सब खुख खानी ॥
अर्थ-भावलसहित जो प्राणी खोजेगा, चद्द सब खुखखानि
भक्ति-मणिको पावेसा ।
३ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
जो परानी-भाव यह कि भक्तिन्पथर्मे अधिकारका तारतम्य नहीं
है, भक्तिके समी अधिकारी हैं; यथा--
पुरुष नपुंसक नारि नर जीव चराचर कोह।॥
भक्ति भाद भज कपट तजि भोहि परम ग्िय सोद्द ॥
भाव सहित खोले-कहनेका भाव यह कि खोजनेवालेकों मणि-
का संल्कार होना चाहिये, उसे इस बातका परिशान होना चाहिये कि
मणि कैसी होती है, ( फलरूपा ) भक्ति-चिन्तामणिके खोजनेवालेकों यह
संस्कार होना चाहिये कि भक्ति कैसी दोती है, साधन-भक्तिद्वारा चह
भगवत-चरणानुरागसे परिचित होना चाहिये ) साधन-भक्ति दो प्रकारकी
होती ऐ; वैघी और रागानुगा । शा्त्रोके उपदेश सुनकर जब मनुष्यकों
भगवश्चरणौम अनुराग होता है; तो उसे वैधी कहते हैं, यथा---
श्रुत्ति पुरान सब अन्य कहाही।) रघुपति भगति त्रिना सुख नाह्टी ॥
और स्वाभाविक अनुरागसे भजनमें प्रदत्त होनेकी रागानुगा कहते
हैं, बधा--
पौढ़ भये सोद्ि पिता पढ़ाया | समुझौं सुनीं गुनों नहि साथा ॥
सो दोनोंमेंसे किसी भक्तिके होनेंसे काम चल सकता है |
पाव भगति मनि-मभाव यह है कि वेद-पुराणोंमें मर्मीके बतलानेके
अनुसार राम-कथाकी प्राप्ति होनेपर उसमें भक्तिकों हँढ़े, तो वह निराझ
न होगा; अवश्य भक्ति-चिन्तामणिकी प्राप्ति होगी | यथा---
रामचरन रति जो चहेै, अथवा पद नियान।
भावसद्धित सो यह कथा, करें अवनपुट पान 7
सब खुख खानी-भाव यद्द कि रामभक्तिकों केवल मणिही न
समझे, यह खयं खान है; इसीमेंसे सव सुखोंकी उत्पत्ति होती है और
होगी। यथा---
सब सुखखानि भगति में माँगी | नहिं कोड तोहि' समान बड़ भार ए
शतपश्च चौपाई श्५ड
भग्तिद्दीन गुन सब सुख केसे | ऊवबन बिना यहु ब्यंजन जैसे गा
अगतिददीन सुख कौने काजा ४
इसीलिये फलरूपा भक्तिको चिन्तामणि कद्दा | अविरछ, अनपा-
यिनी; पुष्टि, सिद्धिरूपा इत्यादि-इत्यादि इसके नाम दे | 'सुनहु मगति-
मनिकी प्रभुताई । कहकर जिस ग्रसंगका उपक्रम किया था; अब “पाच
भगतिमनि सब सुखखानी? कहकर उसी प्रसंगका उपसंद्ार करते दँ ।
अब सत्संगकी महिमा कहेंगे | ४
सोरे मन प्रभ्"ु अस बिसवासा।
रामते अधिक रामकर दासा ॥9१॥
अरथ-हे प्रभो ! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास दे कि रामके
दास रामसे भी अधिक ( बढ़कर ) हैं।
भोरे मन-भाव यह कि श्रुतिसम्मत सर्वमान्य सिद्धान्त तो यही
है कि राम अमित गुर्णोके समुद्र हैं, किसीकों इनका थाह्व नहीं लगता;
यथा--
राम अमित शुन्न सागर, थाह कि पाघे कोट ।
इनके समान ही कोई नहीं है, बढ़कर कहाँसे होगा, यथा--:जेहि
समान अतिसय नहिं कोई ।? पर शाह्मसंस्कृत छुदय साधुका अनुभव
भी प्रमाण है। रामचरितमानसमें इसे बराबर प्रमाणख्पमें ग्रहण किया
है, यथा--“उमा कहां मैं अनुभव अपना? तथा--मोरे मत वड़ नाम
डुहूँते ।? इसी भाँति सुद्यण्डिजी भी अपने मनका विश्वास कहते हैं ।
पु--भाब यह कि आप भी रामके दास हैं, में आपको रामसे भी
अधिक समझता हूँ | अतः भ्रोता होनेपर भी आप हमारे अस्ु हैं ।
अस विखबासा-भाव यह कि महात्माओंका विश्वास अटल होता
है, उसकी उपमा अक्षयवट्से दी गयी है। जिस भाँति अक्षयवटका
श्णुण श्रीमक्ति-चिन्तामणि
प्रछयमें भी नाझ नहीं होता, प्रछयके जलके साथ-ही-साथ वह भी बढ़ता द्वी
जाता है, उसी माँति महात्माओँका विश्वास सदा अविक्ृत रहता है, जितना
ही संकट उपस्थित होता है, उतनी ही उसकी इद्धि होती है; यथा--
उर उ्मंगेड अंबुधि अछुरागू। सयेड भूप मन सनहु भयागू॥।
सिय सनेह बट बादत जोहा । सेहिपर रामप्रेम सिसु सोहा ॥
चिरजीवी झुनि ज्ञान विकल जनु । वूड़त छहैदः बाक अवलरूग्बनु ॥
बट चिश्रास खअचल निज घर्मों ।
सो महात्मा भ्ुशुण्डिजी अपना विश्वास कहते हैं--रामके दास
ल्वेंग रामसे भी अधिक हैं |
शामकर दासां-भाव यह है कि सेवक और दासमें कुछ भेद है |
सेवा करनेवाछा सेवक है, सेवाघर्म भी बड़ा कठिन है । इसमें खामीके
मनसें अपना मन मिल्ण देना पड़ता है। अपने धर्मके सामने चारों फलका
परित्याग करना पड़ता है, अपने हितके लिये खामीके चित्तमें क्षोम आ जाने-
मात्रसे सेवा-घर्म विगड़ता है, खामीके कार्यके लिये प्राण उत्सर्जन कर
देनेमें सैबकका भाग्य है, फिर भी यदि चाहे तो वह सेचा छोड़ सकता
है, यथा---
सेचक सो जो करे सेवकाई । अरि करनी करि करें छराईं ॥
पर दास ऐसा नहीं कर सकता; वह अपनेकों खामीके हाथ बेंप्च
देता है, खामीका उसपर कृपा; कोंप, वध और बन्धका अधिकार होता
है, उसे खामीकी ही गति है दूसरेकी आशा भी नहीं है; यथा---जेहि
गतिमोरि न दूसर आसा ।” सो यहाँ रामसेवक न कहकर रामकर दासा कहा ।
रामते अधिक-भाव यह कि रामकों अति प्रिय हैं,
यथा--
सबके प्रिय सेचक यह रीती । भोरे अधिक दासपर पौती ॥
अधिक होनेका दूसरा कारण यह है कि राम यद्यपि हेतुरहित उपकारी
हैं तथापि स्वयं अपने यशकी ख्याति नहीं करते और दास लोगोंद्वारा
शतपसश्च चौपाई श्ष्द
ही उनका यश जगतूमें फैलता है, इस प्रकार दास छोंग रामग्रातिके
द्वारभूत हो जाते हैं ।॥ अतः कृतश दृदयके लिये वे रामसे भी अधिक हैं ।
राम सिघु घन सज्जन धीरा।
चंदन तरु हरि संत समीरा॥
अर्थ-रामजी समुद्र ओर पण्डित सज्जन चादल हैं; हरि
चन्द्नके तरु हैं और संत समीर हैं ।
रास सिंघु-भाव यह कि ( सगुण ब्रह्म ) राम गुणणोके समुद्र हें,
आनन्दके सागर है | पर समुद्र खयं कुछ नहीं करता, और न उसका
जल ही सर्वसाघारणके लिये उपयोगी होता है; सबकी पहुँच भी समुद्र-
तक नहीं हो सकती, और न समुद्र सबके पास जा सकता है; समुद्रके
किनारे भी मनुष्य प्यासा मर सकता है। इसी भाँति राम सिंघु भी
निष्क्रिय हैं, जिस भाँति यह कोटिशत बिप्णुके समान पालनकतों ई;
उसी भाँति कोटिशत रुद्रके समान संहर्तों भी हैं, शतकोटि कामके
समान सुन्दर भी हैं और कोटिशत शमनकी भाँति कराछ हैं; अतः
इनका विरुद्ध धर्माअयत्व सर्ववाधघारणके लिये उपयोगी नहीं है, यह
इुस्तरदुर्गडुरन्त हैं; उनके सम्मुख दुष्टद्ददय प्राणी जा भी नहीं सकते,
और न योगज्ञानभक्तिरहित आणी उन्हें पा सकते हैं, विमूढ़ प्राणीको
उनके गुणोंसे और भी मोह हो जाता है, यथा---
उस्रा रास ग्रुन ग्रढ़ पंडित झुनि पावहिं बिरति ।
पावहिं मोह विमसूढ़ जे हरि विसुख न घमं रति ॥
घन सज्जन घधीरा-भाव यह कि वादलॉमें ही यह सामथ्य है कि
समुद्रके जलसे क्षारका त्याग कर जीवोपयोंगी मधुर जलको ग्रहण करें;
और उसे ले जाकर देद्ा-देशमे वरसावें । जगत््में जो कुछ सरसता है,
नदी, ताछाब, कूपादि जितने जलाशय हैं, उनके साक्षात् था परम्परासे
बादल ही कारण हैं | ऐसा करनेमें बादलका कोई खार्थ नहीं है; पर
शुण्७ श्रीमक्ति-चिन्तामणि
जगत्का कल्याण वादलोंसे ही होता है।इसी भांति परहितचिन्तक
विद्वान सजरनोंमें ही यह सामथ्य है कि उस गुणसिंधुके दुराधर्ष गुर्णसें-
से लोकोपयोगी अंशकों प्रथक् करके जगतकों प्रेमानन्दसे आए्लावित कर
दें, यथा--
घबरखहिं रास सुजस घरवारी | सघुर मनोहर मंगलकारी ॥
लीला सगुन जो कट्टहें बानी | सोह स्वच्छता करें मऊ द्वानी ॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोह्ट मधुरता झुर्सीतछत्ताई ॥
सोइ जल सुकृत सालि हित होई । राम सगत जन जीवन सोई ॥
जगतमें जो कुछ गुण या आनन्दका छेश है, वह इन्हीं मद्दात्माओके
साक्षात् वा परम्पराकृत कृपाका फल है | ऐसा करनेमें इन महात्माआका
कोई स्वार्थ नहीं है, ये पूर्णकाम हैं, पर जड़ जीवोंका कल्याण इन्हीसे
होता है; वधा--
हेतुरहित जग झुग उपकारी । तुम तुग्हार सेवक असुरारी
चंदन तरू दरि-भाव यद्द कि जब एक दृष्टान्तसे पूरा काम नहीं
चलता), तब दूसरा दृष्टान्त दिया जाता है। संत बादलूकी माँति हरि-
छुयशकी वर्षा करके जगतकों दराभरा कर देते हूँ, प्रेमका विरवा इन्हीं-
की कृपासे व्घित होकर उक्षरूपमें परिणत होता है, गुणप्रामके स्मरणसे
ही अनुराग बढ़ता है; यथा--“छुमिरि सुमिरि गुनग्राम रामके उर अनुराग
ब्रढ़ाठ ।? पर बादल अपना ग्रुण अथवा समुद्रका गुण किसीकों नहीं दे
सकते, और संत ऐसा कर सकते हैँ । इसलिये दूसरा दृष्ठान्त देना पड़ा ।
कविसम्प्रदाय एक ही चन्दनइक्ष मानता है। उसका होना
के 2] . ् 9०.
अत्यन्त दुगम वनमें कहा जाता हे और उसमें सॉपोंके लिपटे रहनेके
कारण वहाँतक मनुष्योंकी गति नहीं हैं। परन्तु उसकी हवा जिधरसे मिक॒छ
जाती है, उधरके दृक्षोकों चन्दनका-सा सुगन्धित बना देती है| चन्दन-
का गन्ध हवाद्वारा जाकर दुक्षोक्के सारको बेघ देता है, और उसे सदाके
लिये सुगन्धित कर देता है, वही हम छोगोंका परिचित चन्दन दक्ष है|
इतपञ्च चौपारदे._ श्ण्८ट
कहना नहीं होंगा कि ऐसा चन्दनका दक्ष साक्षात् हरिको छोड़कर
दूसरा नहीं हो सकता !
संत समीरा-भाव यह कि चन्दन इक्षतक किसीकी गति नहीं
है, पर हवाकी सव जगह गति है, यह सामर्थ्य गन्धवाहमें ही है कि
चन्दमके गन्धकों लेकर अन्य छक्षोंके सारमें वसा दे । इसी भाँति यह
शक्ति संतोंमें ही है कि हरिका भाव लेकर मनुष्योके अन्तःकरणकों सदा-
के लिये मगवद्धावसे भावित कर दे, अर्थात् फलरूपा भक्ति प्रदान कर
सकें। संत ही बादल होकर साधनमक्तिको परिपुष्ट करते हैं और संत
ही उस भक्तिकों सिद्धिभक्ति वा फलरूपा भक्तिके रूपमें हवा होकर
परिणत करते हैं। यदि पापियोंके छदयमें संतकी वाणी काम नहीं
करती तो इसमें संतोंका कोई अपराध नहीं है, चन्दनकी वायु भी बाँस-
को सुगन्धित करनेमें असमर्थ होती है, यथा--“बेघत नहि भीखंड बेनु
इंच सारहीन मन पापी ।?
यहाँ संत और हरिकी उपमा जड़ पदार्थोंस देकर यही दिखलाया
कि ये जड़की भाँति परोपकारका कार्य खार्थद्दीन तथा डुःख-सुखसे
रहित होकर करते हैं ।
सबकर फल हरिसिगति सोहाई ।
सो बिच संत न काहू पाई ॥४२॥
अर्थ-सवका फल खझुन्द्र हरिभक्ति है; उसे सिंचा संतके
किसीने नहीं पाया ।
खब कर फरछ-भाव यह कि सब साधनोंका फल विधय नहीं हो
सकता; क्योंकि जितने संस्पशेज मोग हैं वे सब दुःखके कारण हैं । खर्म
भी कुछ कालके लिये ही होता है । जिस भाँति कृषिकर्मसे उत्पन्न हुआ
अन्न खाते-खाते कुछ दिनोंमें बिना समाप्त हुए. नहीं रहता; उसी माँति
साधनेसि उपाजिंत पुण्य एक-न-एक दिन निः्शेष हो ही जाता है, और
श्ष्ष्प् शओीमक्ति-चिन्तामणि
पुण्यके निःशेष होते ही खर्गसे पतन दोता है और जीव फिर मृत्युलोकर्मे
आ जाता है, यथा--
ए्टि ललुकर फल विपय न भाई । ख्वर्गहु खब्प अंत घुखदाई॥ा
यह नरदारीर ही साधनका घाम है, मोक्षका द्वार दे, इसे पाकर
जिसने भगवदमजन नहीं क्रिया और विपयमें मन दिया, बद्दी पीछेसे
दुःख पाता है, पछताता है, और ज्ययं अपने भाग्यकों कोसता है । सब
साधनोंकी एकमात्र सिद्धि यही है कि विषयसे मन हटे और ईश्वरमें
छगें। यथा--
तीर्यायन साधन समुदाई | जोग विराग क्वान निपुसाई ॥
जनाना कर्म भर्म ब्रत्त दाना । सस जम दस तप अभत मर नाना ॥
भूत्तदया गुरु द्विज सेघकाई | विद्या विनय विवेक बढ़ाई ॥
जहँर॒ुगि साधन बेंद बखानी। सयकर फल हरिभगत्ति भवानी ॥
दरिभिगति सोद्दाई-भाव यह कि निष्काम भक्ति | कामना-
का रहना भक्तिकी शोभा नहीं है | कामनासह्वित सक्ति भी एक प्रकारका
व्यापार है| प्रेममें कामनाको खान देना कप् है प्रेम प्रेमके लिये ही
किया जाता है, यथा--
जेद्दि जोनि जनमों कर्मत्स तईँ रामपद अज्ञुरागहँ ।
सो विज्ञु संत-भाव यह कि सुमति संतके हिस्सेकी वस्तु है,
सुमतिर्मे रमण करनेवाले संत ही द्ोोते हैँ, इसीलिये सुमतिकों संतकी सी
कहा) यथा--“सुमति संततिय ( सुभग सिंगारू )! और सुमतिके। बिना
भक्तिकी ग्रास्ति नहीं होती । इसीलिये संत ही भक्ति प्राप्त कर सकते हैं ।
न काह पाई-जिन्दें कुमति है अथवा जो सदा सुमतिम रत
नहीं रहते, वे भक्तिके पाच् नहीं हैं । ऐसे छोगोंकों कमी भक्तिका लाभ
नहीं हुआ | कुमतिमें हित अनहित मालूम पड़ता है; और शन्र॒में मिन्र-
बुद्धि होती है। अत्तः ऐसी अवस्ामें भक्तिकी ओर चित्त नहीं जा सकता
आतपश्च चौपाई १६०
और जहाँ सुमति-कुमति दोनोंकी चलती है; वहाँ शान्ताक्त्ति स्थिर नहीं
हों सकती ।
अस बिचारि जो कर सतसंगा ।
राममगति तेहि. छुलम बिहंगा ॥०#!
अर्थ-ऐसा विचार करके जो खत्संग करता दै; उसे हे.
विहंग छोग ! रामभक्ति खुल्म है ।
जो-भाव यह कि साधारण मनुष्य न संत ही हैं न असंत ही
हैं, उनमें कुछ गुण तो संतके होते हैं और कुछ असंतके होते हैं;
उन््हींके लिये यह उपदेश है, क्योंकि असन्त असाध्य हैं, और संत तो
सिद्ध ही हैं, उनके लिये साधनका उपदेश नहीं हो सकता |
अस बिचारि-सब साधनोंकी उपेक्षा करके सत्संगर्मँ लग जाते
हैं। क्योंकि रामसे अधिक संत लोग हैं, इन्हें छोड़ दूसरेको भक्ति मिल
नहीं सकती, सुमति इन्हींकी सम्पदा है, और सुमति कुदारीके बिना बेद-
पुराण पर्वतका खोदना सम्मव नहीं। अतः सत्संग ही भक्तिग्रासिके
लिये सुल्म साधन है ।
खतसंगा कर-संत छोग तो बिना प्रार्थना किये ही घूम-घूमकर
रामभक्तिका ग्रचार करनेके लिये उद्योग किया करते हैं; अपना संग
करनेवालेकी भक्ति देनेमें वे कपणता क्यों करेंगे, और अपनी त्रुटि भी
उन्हींके संगसे सुधर जावेगी; यथा---
सठ छझुधरहिं सतसंगति पाएु | पारस परसि कुधाठु सोहाए ॥
अतः सत्संग करना चाहिये ।
विहंगा-भाव यह कि यहाँ भुझुण्डिजी अपने सब ओंताओंका
ध्यान आकर्षित करते हैं, इसलिये सम्बोधनमें एकवचन *“िहंगू” का
प्रयोग न करके बहुवचन “बिहंगा? शब्दका प्रयोग करते हैं। क्योंकि
२६१ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
विदंग-बोनिमें कोई साधन नदी हों सकता; पर सत्संग तो पक्षी भी कर
सकते हैँ, यथा--
खआावें सुनें अनेक ब्िदंगा ]०५९००००००००००००००० 9+००००७०७+
साधु जसाधु सदन सुक सारो | सुमिरहिं नास देहिं गति गारो ॥
अथवा विहंगमार्गी ज्ञानियोंका सम्बोधन है, बथा--
सुनहिं सकलछ भति विमरू भराऊा। बसहिं निरंत्तर जे तेद्दि ताछा ॥
रामभगति-भावष यह कि रामभक्ति अति दुर्लम है, यथा--
नरसएल्रमई सुनहु पुरारी । कोड एक पहोह 'घ्मश्नतघारी॥/
घर्मससीलू कौटिक महँ कोई । विपय चिमुस्र व्रिराग रत होई ॥
कौटि बिरक्त मध्य श्रुति कई । सम्यकू कान सकृत कोउ छहई ॥
ज्ञानचंत कोटिक भें. कोऊ | जीवन्मुक्त सकृत जग सोऊ ॥
लिन सहस्तमईँ सब सुस्बखानी । दुलम प्रह्मलीन चिज्ञानी ॥
सबते सो छुकूम सुर राया। रामभगत्ति-रत गत सद्र साया॥।
तेहि छुछभ-सत्संगसे ऐसी दुलंभ वस्तु भी सुन्ठम हो जाती है ।
पहले सुगम उपाय कद्दा था; पर वह भी सुमति-छुदारीबाछे संतसे ही
डाक्य है ! अतः उपाय सुगम होनेपर भी सुलम नहीं है, दुलूमवा बनी
ही रह गयी | अतः वह भक्ति सत्संगसे ही सुलूम है |
दो०-ब्रह्म पयोनिधि मंदर, ज्ञान संत झुर आहि।
४2५ काद॒हिं 4५ घु हज
कथा सुधा मथि काढ॒हि, मगति मघुरता जाहि ॥
अर्थ-चेद छ्वीरसागर दै। पान मन्द्र है, संत देवता हैं।
(ये ) मथकर कथास्त निकालते हैं, जिसकी मिठास भक्ति है।
श्रह्म पयोनिशध्ि-यदापर “ब्रह्म! शब्द वेदका बाचक है| एकरस
ब्रह्म रामका मन््यन, और उसमेंसे अम्ृतका प्रथककरण नहीं हो सकता,
यथा--सदा एकरस अज अबिनासी ।? अतः यहाँ प्रसद्धानुकूछ अर्थ
५१
झातपश्च चौपाई श्द्र
बेदका अहण किया गया | अब इस बातकों दिखछाते हूँ कि गुणसिन्धु
शामके गु्णेमेिंसे लोकोपयोंगी गुण ( अम्गत ) का पथकूकरण संतलोंग
कैसे करते हँ। वेदोंमें रामके सुयशका वर्णन है, यथा--“जिनहिं न
सपनेहु खेद, वरभमत रघुवर विसद जस |? वेद रक्ाकर है, न जाने
कितने रल इसमें पड़े हैं, इसमेंसे अम्दृत ( रत्न ) निकालना सुकर व्यापार
नहीं है । पूर्वकालमें अम्ृतके लिये देवता और असुर्रोने समुद्रकों मथना
चाहा) परन्तु उसके लिये उपयुक्त मथनी नहीं थी | फिर मन्दराचलकों
मथनी बनाकर अम्गृत प्रास किया गया । परन्ठु इस सामग्रीसे वेद समुद्र-
का मन्थन नहीं हो सकता । अतः कहते हैं---
मंद्र ज्ञान-भाव यह कि जिस भाँति समुद्रका मन््थन मन्दरा-
चलसे ही सम्भव था; उसी भाँति वेद-समुद्रका मन्थन शानसे ही हो
सकता है। जिन्होंने अपनी असंस्क्ृत घुद्धिसे ही मन्थन किया, उन्हें तो
वेद गँवारोंका गीत ही माछूम हुआ |
संत ख़ुर आहि-भाव यह कि समुद्रके मथनेमें देव और भसुर
दोनों छगे थे; पर वेद-समुद्रके मन्थनमें केवल देवस्थानीय संत ही
समर्थ हैं, अठुरस्थानीय खलोंका इसमें उपयोग नहीं होता, क्योंकि
शानमन्दरको घुमानेकी शक्ति केवल संतोमें है, खछ तो उसे स्पर्श भी नहीं
कर सकते ।
कथा खुथआा-भाव यह् कि रामकथा वेदोंका सार है। जिस
भाँति ब्रह्मका रामरूपर्म अवतार हुआ, उसी भाँति ब्रक्मयञ्य वेदका
रामायणरूपमें अवतार हुआ, यथा--
जेट्टि महँ जादि मध्य जवसाना। प्रभ्न॒ भतिपाध्य राम भगवाना ॥
मथि काढुद्धि-भाव यद्द है कि संतोंका खभाव ही पराये दितके
लिये कष्ट उठाना है; यथा--(संत सहहिं दुख परहित छागी |? वें
परहितके लिये कष्॒ट उठाकर वेद-समुद्रकों मथते हैं, और अमृत निकाल-
निकालकर वर्षा किया करते हैं, यथा--
तब तब कथा सुनीसन्द्र गाईं। परम श्रबंध बिचिन्न बनाईंए
श्द्३् श्रीभक्ति-चिस्तामणि
भगति मधुरता जाहि-रामकथयार्मे रामखभाव वर्णित होता
है, और रामस्वमावक्ते परिश्ञानमें ही सिठास है; उसी मिठासका नाम
भक्ति है; यथा--
उसा राम सुभाव जेहि जाना | ताहि भजन तजि भाव न जाना ॥
राम झुजस जे सुनत अधादी | रस विशेष जाना तिन नाहीं॥ए॥।
दो०-बिरति चमे असि ज्ञान मद, लोभ मोह रिपु मारि
जय पाइअ सो हरिभगति, देखु खगेस बिचारि।
अर्थ-घेराग्यकी ढाल और घानकी तलचारसे, मद-लोभ-
मोहादि शज्रुकों मारकर जो विजय मिलती है वह दरिमिक्ति है,
है खगेश । घिचारकर देख की ।
विरति चर्म अखि शान-भाव यह कि छाच्र॒वधकी सिद्धिके लिये
दो बातोंकी आवश्यकता पड़ती है, पहले अपनी रक्षाकी और दूसरे
शत्रपर प्रद्दार करनेकी । जवतक शन्रके प्रहारको रोकनेका साधन अपने
पास न हो, तबतक युद्धकी चर्चा चलाना ही व्यर्थ है; और वधका
असाधारण कारण शज्त्र है, जिसके ब्रिना दात्रका नाश हो ही नहीं
सकता | संक्षेपर्म ढदालनतलवारसे दोनों काम निकलता है | ढालसे शत्र॒ुका
प्रहार रोका जाता है और तलवारसे शन्रकों मारा जाता है । यहाँ बैराग्य
ढाल है और शान तलवार है। विधयमें रति होनेसे ही काम-क्रोधादिका
बल चलता है और वे कल्याणका नाश करनेमें समर्थ होते हैं, और
विषयमें यदि रति न हो तो काम-क्रोधादिका कुछ बल नहीं चल सकता
इसलिये घिरति अर्थात् बेशग्यकी ढाल कह्य | और सबमें ब्रह्यकों समान
देखनेसे शत्रु-मित्र-बुद्धि ही नहीं रह जाती, अतः साध्यामावसे साधनरूप
काम-क्रोधादि मर जाते हैं | इसलिये ज्ञानको तलवार कहा |
भद् छोभ सोह रिपु-रिपु कहकर शेष तीन कास-करेघ-मात्सयंकों
भी ग्रहण किया । अकारण अपकार करनेसे, कल्याण-मार्गके बाधक होनेसे
झशातपश्च चौपाई श्द्छ
ये सव आन्तर शन्रु माने गये हैं, ये अनेक प्रकारसे सबको दुश्ख दिया
'करते हैं, यथा--
मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेंही ॥
अभ्रिजा केदट्टि न कीन्ह बोराहा | केहिकर हृदय क्रोध नहिं दाह्ा ॥
ज्ञानी तापस सूर कवि, कोविंद शुन आगार |
फ्रेह्ेोकिर छोभ चिर्टबना, कीन्द्द न एहि संसार ॥
श्रीमद् वक्त न कीन्ह केहि, प्रश्ुता वधिर न काहि ।
सगलोचनिके नयन सर, को अस छाग न जाहि ॥
गजुन कृत सन्निपात नहिं फेही। कोउ नसान मद तजेंउ निवेही ॥
जोवन ज्वर केहि नहि वरहुकावा । काहि' न सोक समीर डोलावा ॥
मत्सर काहि' कल्ूंक न छाघथा | ममता केद्विकर जस न नसावा 0
इत्यादि |
मारि-भाव यह कि कथासतका पान करनेसे ऐसा बल ( परम
वैरशग्य ) बढ़ता है कि मनुष्य अकेले ही सब्र शत्नुओंका वध करनेमें
समर्थ ह्वोता है| शत्रओंकों मित्र बनानेके चारों उपाय साम, दान; मय;
भेदमेंसे एक भी इनपर नहीं चलता, ओर इनके रहते हुए; ज्ञान; वराग्य,
योग; भक्ति ही क्यों, किसी भी कल्याणपथसे सिद्धि नहीं मिल सकती ।
अतः इनके बधके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं ।
जय पाइअ-भाव यद्द कि यह शरीर दो राजाओँका देश है; अपने
अधिकारके लिये दोनोंमें नित्य छड़ाई रहती है । एक ओर मोह राजा
है, और कामादि उसके सहायक हैं, और दूसरी ओर विवेक राजा है;
और वेराग्य आदि उनके सहायक हैं । यह छड़ाईं अनादिकाछसे वी
आती है। कभी एक बीस पड़ जाता है तो कभी दूसरा; इसी इन्द्रमें
'पड़कर यहाँकी प्रजा ज्ञानेन्द्रिय, कर्मन्द्रिय, प्राणादि अति पीड़ित हों रहे
हैं। जब कथामृतपानसे विवेक्रादिका बल बढ़ जाता है, तब सोंहादि
श्द्ज श्रीमक्ति-चिस्तामणि
मार डाले जाते हैँ | विवेक राजाकी जीत होती है, उनका अकण्टक
राज्य स्थापित हो जाता हैं और फिर राजा साहब रामचरणाध्रित होकर
आनन्दसे राज्य करते हैँ, यथो--
जीति सोहद महिपारऊदक सद्दित विबेंक भुआल ।॥
फरत अकंटक राज्य पुर सुख संपदा सुकाऊूआ॥
सचिव चिराग बिवेक नरेसू । विपिन सोद्ानन पावन देखू॥
भट जम नियम सैल रजघानी । सांति सुमति झुचि झुंदरि रानी॥
सकछक अंग संपन्न सुराऊ | रासचरन आश्रित चित चाऊ ॥
सो दहरिभगति-भाव यह कि काम-क्रोधादिके मारे जानेपर जो
जीत मिली, जिस उत्तकर्षकी प्रात्ति हुई, वही भक्ति है | इतनी बड़ी
लड़ाईके बाद फल यह हुआ कि संसारकी ओरसे मन हटकर राममें लगा,
विवेकका साम्राज्य स्थिर हो गया, वैराग्य मन्त्री हुए, समेहवन साम्राज्य
हुआ; यम-नियम सुभट हुए, चित्त राजधानी हुआ । शान्ति-सुमति
रानियाँ हुई, अब सांसारिक राज्य, मनन््नी, सत्री आदिसे सम्बन्ध नहीं रह
गया; भक्तिसाम्राज्यका समाज ही कुछ दूसरा है|
खगेस-कहनेका भाव यह कि आपकी अव्याहत गति है, सभी
साम्राज्य आपके देखे हुए हूँ, पर कोई भी इस भक्तिसाम्राज्यके अंदाकी
भी छठुलना नहीं कर सकता ।
विचारि देखु-भाव यद्द कि केवल मेरे कदनेपर ही न रह जाओ;
स्वयं विचारकर देख छो । बिना संसारते मन हृटे और रामपदमे लगे
सुख नहीं, और यही भक्ति है। अब चाहे कोई अमेदभक्ति
करें; चाहे भेदभक्ति सेवकसेव्यमाव दृढ करे; पर दे सब भक्ति ही ।
इसीलिये चार प्रकारके भक्तोंमे शानी भी भक्त ही माने गये हैं ।
--+>कै0:---
चतुर्थ पसज्भ
सप्त प्रश्न
<८छ७४८९३०
पुनि सप्रेम बोलेड खगराऊ।
जो कृपाल मोहि, ऊपर भाऊ॥
अर्थ-फिर प्रेमके सहित पक्षिराज वोले कि हे कूपाछ !
यदि आपका मेरे ऊपर ( कृपा ) भाव है।
घुनि-शब्दसे भक्ति-चिन्तामणि-प्रसद्धकी समाप्ति अथवा “भगतिहिं
ज्ञानहिं अंतर केता? इस प्रश्न उत्तरक्ती समाप्ति दिखलाकर, गिरिजाके
अन्तिस प्रश्न--
जो प्रस्ु में पूछा नहिं होईं। सो दयाल्ु राखहु जनि गोई॥
--के उत्तरका सन्नपात करते हैं।
खगराऊ-भाव यह कि खगेशकों विचारपूर्वक देखनेको कहा
था; यथा--“जय पाइअ सो हरिमगति देखु खगेस बिचारि! । सो विचार
करनेपर सात शझ्लाएं और खड़ी हो गयीं। खगराऊ हैं, युद्ध तथा
श्द्ज सप्त स्श्ष
जयकी क्रियासे भलीभाँति परिचित हैं, युद्धमें सिद्धि निश्चित नहीं रहती;
तनिक-सा छिद्र होनेसे महान अनर्थ हों जाता है, अतः अत््युत्तम साधन
अश्नान्त जानकारीके लिये प्रश्न करते हैं ।
सप्रेम बोलेउ-भाव यह कि पहले मदु वाणी बोले थे, यथा--
“ब्रोलेड गरड हराखि मदु वानी! फिर अब सप्रेम बोले । भुझुण्डिजीके
अम्ृतमय उपदेशसे प्रेम बढ़ता द्वी जाता है ।
कृपाछ-भाव यह कि गुरुकुपा बिना कुछ नहीं हो सकता,
यथा---
गुरु विच्ु भवनिधि तर कि कोई । जो बिरंचि संकर सम होई॥
सो छृपाल गुरू भाग्यसे मिल गये हूँ, अतः प्रश्न करते समय
6 १ सम्बोधन करते हैं --५सक
क्ृपाल' शब्दद्वारा ही सम्बोधन करते हैं, यथा--'सकल कहहु प्रभु
कपानिकेता? “जी कृपाल मोहि ऊपर भाऊ! ।
जौ मोदधि ऊपर भाऊ-भाव यह कि जिशासामे आंत होकर
जिज्ञासु शुरुके प्रेमपर विश्वास दिखलाता हुआ प्रश्न करता है, यथा--
'जानिअ सत्य मोदि निज दासी? । 'ती प्रभु हरहु मोर अज्ञाना' । यहाँ
भावसे कृपाभाव अभिप्रेत है, इसीलिये कृपाल सम्बोधन किया |
नाथ सोहि निज सेवक जानी ।
सप्त प्रश्न मम कहहु बखानी ॥४४॥
अर्थ-( तो ) सुझे अपना सेवक जानकर मेंरे सात पक्ष
चखानकर कहिये। हे नाथ !
लाथ-मभाव यह कि परस्पर विनयसे वर्णनातीत सुखका अनुभव
होता है, यथा--
स॒नि रघुबीर परस्पर नवहीं । बचन अगोचर सुख अनुभवहीं ॥।
शतपशञ्च चौपाई - श्द्८
यहाँ गरडजी और भुझण्डिजी परस्पर एक दूसरेकीं नाथ कहकर
सम्न्रोंघन करते हैं, यथा--
नाथ मझुनीस कहहिं कछु अंतर । (नाथ भमोद्दि निज सेवक जानी |
निज लेचक-भाव यह कि बड़े छोगोंकों सेवकों और दासियोंका
घादा नहीं रहता; इतनी संख्या अधिक रहती है कि उन्हें याद भी नहीं
रहता | पर जो खास खिदमतमें रहते हैं उन्हें नहीं भूलते, उनपर
विशेष कृपा रहती है, वे निज सेवक कहलाते हैं, यथा--जानिय सत्य
मोहिं निज दासी” अथवा यह मान लेनेकी वात नहीं है कि मैं सेवक हूँ;
वच्तु॒तः मैं सेवक ही हूँ।
मोहिं ज्ञानी-भाव यह कि सम्पूर्ण भ्रोतामण्डलको सेवक जानिये,
सब आपके आशज्ञाकारी हैं। यथा--'आशा सम न सुसाह्विव सेवा? पर मुझे
तो पादसंवाहनादि क्रिया करनेवाला सेवक समझिये ।
मम सप्त प्रश्ष-भाव यह कि (१ ) भोगायतन) ( २ ) अनुकूछ
वेदनीय भोग; ( ३ ) प्रतिकूल वेदनीय भोग, ( ४ ) भोक्ता, ( ५ )
अनुकूल भोगका कारण; (६ ) प्रतिकूल भोंगका कारण; ( ७ ) भोक्ता-
की अख़स्थताके कारणविषयक य्रश्न हैं, इन्हीं सात प्रश्नोमिं साध्य,
साधन और साधकविषयक सब बातें आ गयीं ।
कद वखानो-भाव यह कि मेरे प्रश्नोंका उत्तर केवछ वस्त॒-
निर्देशमात्रसे समास न कर दीजियेगा, उपपच्ि और परिणामके साथ
कहिये ।
प्रथमहि कह॒हु नाथ मति घीरा ।
सबते दुल्म कवन सरीरा ॥
अर्थ-हे मतिथीर नाथ |! पहले तो थद्द बतलाइये कि सबसे
डुलेस कौन शरीर है?
श्ध्् खत्त प्रश्त
मति चीरा नाथ-भाव यह कि मेरे प्रश्रका वही उत्तर दे सकता
है जो प्रमुकी प्रसुताकों जानता हो । मैं तो इस बत्रह्माण्डका गरड़ ठहरा३
इसके बाहरक्रा हाल जानता ही नहीं, इसीके आकाशका थाह नहीं
मिलता, यथा--
जोव चराचर जन्तु समाना | भीतर बसहि न जानहि जाना ॥
तचुमहि जादि खरा ससक प्रयंता। नभ उद्दाहँ नहिं पावहिं अंता ॥
और आप करोड़ों ब्रक्माण्डोंकी भलीमाँति सैर कर चुके हैं । बधा---
उदर मांझ सुन अंडजराया | देखेडे बहु प्रद्मांड निकाया ॥
अति बिचिन्न तह छोक अमेका | रचना अमित एक ते एका ॥
कोटिन चतुरानन. गौरीसा । अझगनित उठगन रवि रजनीसा ॥
छोक-लोक अति सिज्न बिधाता । भिन्न विष्णु सिच मलु दिसि त्राता ॥
एक-एक ब्रह्माण्ड मद्द रहेडें वर्ष सत एक |
णुट्दि च्रिधि देखत फिरेडें सें अंडकटाद अनेक ॥
अमत भोद्दधि ब्रह्मांड जनेका | बीते मनहु कलप सत घुका ॥
देखि चरित यह सो प्रश्चुताई। सुमिरत देह दसा बिसराई॥ा
सो प्रभुके प्रभावका आपसे बढ़कर जानकार कौन होगा ? और
जो प्रभुके प्रभावको जाने वहीं मतिधीर है; यथा--“प्रभ्नु प्रभाव
जानत मतिधीरा | इसीलिये नाथ मतिधीरा” कद्दा ।
प्रथमद्धिं कहहु-भाव यह कि पहले भोगायतन ( शरीर ) का
ही वर्णन होना चाहिये | देहाध्याससे ही संसार है । अतः जिस देहसें
संसारदुःखसे निन्वत्त होनेका साधन जितना ही अधिक हो उतना ही बहू
उत्तम है; सो पहले उसीको कहना चाहिये ।
कवन सरीरा-भाव यह कि आपने असंण्य त्रह्माण्डोंके जीवॉके
शरीर देखे हूँ; और १०१ बर्ष रह-रहकर सबसे मलीभौाति परिचित
हैं, यथा---
शतपश्च चौपाई १७०
नर गन्धर्न भूत वबेंसाला। किन्नर निसिचर पसु खग व्याला ॥
देव दच्ुुज गन नाना जाती। सकरू जीव तहँ आनहि भाँती ॥
सवते दुरूम-भाव यह कि यद्यपि नगरवासियोंकों उपदेश देते
हुए भगवानके मुखसे सुन जुके हैं कि बढ़े भाग मानुध तनु पावा।
सुरदुर्लभ सब मंथनि गावा ॥ साधन धाम मोच्छकर द्वारा ।? फिर भी
यह सन्देह होता है कि सम्भव है कि मानुषघतनसे भी दुर्लभ कोई शरीर
हो जो और भी बड़े भाग्यवान् जीवोंकों मिलता हो; अतः सबसे दुर्लम
शरीरके विषयमें प्रश्न करते हैं | यह पहला प्रश्न है।
बड़ दुख कवन कबन सुख भारी ।
सोउ संछेपहि. कहहु बिचारी ॥४प॥
अर्थ-कौन डुःख़ वड़ा है और कौन खुख सारी है; इसे भी
खंक्षेपमें बिजारकर कहिये ।
वड़ दुख कवन-भाव यह कि भगवानके मुखसे सुन चुके हैं कि
जो भनुष्य उन्हें नहीं भजता और विषयरत होकर दिन-पर-दिन मन्द
होता चला जाता है, वह परलोकमें दुःख उठाता है, यथा--
सो परत्र हुख पावई सिर घुनि छुनि पछिताय।
कालहिं कर्महि इश्वरहिं सिथ्या दोप छगाय ॥।
सो दुःख तो कहा) पर बड़ा दुशख कोन हे, यह नहीं कहा ।
उसका विस्तार होता है, पार पाना कठिन हो जाता है, इसलिये बड़ा
दुःख पूछते हैं, यह दूसरा प्रदन है ।
कचन खुख भारी-भाव यह कि सुखके लिये भी भगवानने कहा
कि 'जों परलछोक इहों सुख चइहू! पर सबसे भारी सुख कौन है; इसे न
उन्होंने कहा, और न उनसे किसीने पूछा । अतः यह बात जाननी रह
गयी | झुख-दुःख तो सबने उठाया है, पर किसीको पूर्वजन्मका स्मरण
२७१ सप्त प्रश्म
नहीं है, और आपकों यू्॑जन्मोंका स्सरण है; आपको अनुभूत दुश्ख-
छुखका स्मरण है, अतः आप बतछाइये, यथा--“बहुत जनमकी सुधि मोदि
आईं” | यह तीसरा प्रश्न है ।
सोंड दिच्वारी कहहु-भाव यह कि सो अनेक जन्मके अनुभूत
सुख-दुश्खोका मिलाम करके सनमें ठीक कर लीजिये, जो सुख सबसे
भारी ठहरे उसे कहिये।
संछेपदि-भाव यह कि छुःख-सुख सबके अनुभूत पदाश्थ हैं,
इनको विस्तारके साथ कइनेकी कोई आवश्यकता नहीं है; केवल बड़े
डुशख और भारी सुखके निर्देशमात्रसे काम चल जायगा।
संत असंत मरम तुम जानहु।
तिन्हकर सहज सुभाव बखानहु॥
अर्थ-तुम खंत अखंतके मर्मको जानते दो, सो उनके
सहज ( पैदाइशी ) खमावका चर्णन करो।
संत असंत मरम-भाव यह कि खय॑ भमगवानते नारदजीसे
कहा कि---
सुन्न सुनि साधुनके गुन जेते । कट्टि न सकहिं सारद श्रुति लेते ॥
सो केवल संतोंके गुण कहे । भरतजीसे संत-असंत दोनेंके गुण
कहे) यथा---
संत अर्ततनके ग्रुभ भाखे | से न परहिं भव जे लखि राखे ॥
सो संत और असंत दोनोंके ग॒र्णोका पारावार नहीं है; यथा--
खल अघ अगुन साधु गुनगाहा | उभय अपार उदधि अबगाहा ॥
अतः इनका मर्म जाननेसे काम चलेगा | क्योंकि साधारण जीव
अपेक्षाकृत संत भी हैं असंत भी हैं, मर्म जान लेनेसे दोनोंक्रि शुणोंकी
शतपश् चौपाई ग श्जर्
पहचान हो जावेगी। अतः कल्याणार्थीकों उनके त्याग और-अहणमें
बड़ा सुभीता होगा; यथा--संग्रह त्याग न बिच पहिचाने ॥*
तुम जानहु-भाव यह कि ठम असंत भी रह चुके हो और
संत तो अब हुईं हों, दोनों अवस्थाएँ तुम्हारी आँखके सामने हैं, यथा-
मैं खल सलझ संकुछ भत्ति, नौच जाति धस मोह ।
हरिजन ट्विज देखे जरों, करों बिष्णुकर ब्रोह्द 0
तथा--
द्वारथों करि सब कर्म गोसाईँ । सुखी न भय अवहिकी नाहँ ॥॥
तिन्हकर सहज खुभाव-भाव यह कि झुभ गुण और इुगुंण,
छुसज्ञ और कुसज्ञके कारण, आया जाया करते हैं, स्थायी नहीं होते,
यथा---उपजहिं विनसहिं ज्ञान जिमि पाइ सुसंग कुसंग ॥? परन्तु सहज
खभाव जा नहीं सकता, यथा--
विधि वस॒ खुजन कु्संगति परहीं । फनि भनि सम निज गुन अजुसरहीं ॥
खलहु करदिं भक पाइ सुसंगू। सिट॒ह्ट न सलिन सुभाव अभंगू।॥
अतः--
चखानहछु-भाव यह कि खल और साधु दोनों बखान करनेयोग्य'
हैं, 'छुधा सराहिय अमरता गरलर सराहिय मौीच ॥!? इन्हींके वखानमें
सम्पूर्ण वेद-शालके सारका बखान है, जितने उपादेय गुण हैं वे सब
संतरे हैं और जितने हेय गुण हैं वे सब असंतसे हैं; अतः इनके लिये
बखान करनेकी ग्रार्थना है। चौथा प्रश्न हुआ ।
कवन पुन्य श्रुतिबिदित बिसाछा ।
कहहु कवबन अघ परम करालढा ॥ 8६ ॥
जथे-वेद्विदिति विद्याल पुण्य कौन-सा है ! और कौन
परम करार पाप है।
१७३ स्त प्ष
श्रुतिविदित-भाव यह कि सब साधरनोंका मूछ पुण्य है। बिना
पुण्यके न ज्ञान सम्भव है और न भक्ति । शानपन्थमे सर्वप्रथम श्रद्धा-
रूपी गीके चरनेके लिये जप, तप, जत, वम, नियमरूपी घास चाहिये;
यथा--
जप तप धत जम नियस जअपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्स जचारा ॥
सो ठून हरित चरे जब गाई ॥
भ्रद्धाके पुण्यक्मांसे बिना तृत हुए. कुछ हो दी नहीं सकता;
इसी भाँति भक्तिसार्गमैं---
प्रयमह्धिं ब्रिश्नवरन अति प्रीती । निञ्र निज धर्म निरत श्रुत्ति रीती ॥
--का उपदेश है। सो दोनों मार्गो्म वेदबविदित पुण्योपाजन
समान है । अतः श्रुतिविदित विशाल पुण्यके लिये पॉँचवोँ पहन किया |
कबचन पुन्य विसाछ-भाव यह कि दोनों मागोर्मे भक्तिकी
सुल्मता दिखलछायी, फिर भक्तिकी प्राप्ति सुलभता सत्सद्भधद्वारा कही,
घर संतका सज्ञ बिना पुण्य-पुझके होता नहीं, अतः पुण्यपुस्तोपा्जनके
लिये विशाल पुण्य पूछते है
कहहु कवन अघ-भाव यह कि पाप करनेवालेकों धर्मचुद्धि ही
नहीं होती, अतः वह पुण्य करेगा ही नहीं; श्रद्धा गौके लिये चारा ही न
मिलेसा, अतः पापीका ज्ञानसागमें प्रवेश ही नहीं हो सकता, वथा--
ध्याप करत निसि बासर जाहीं | नद्दि कि पठ नहि पेट अधाईी ॥ दमरे
धर्म बुद्धि कस काऊ ।* इसी भाँति पापीका मजनमें मन ही नहीं रगता,
यथा--पापवंत कर सहज सुमाऊ । भजन मोर तेदि भाव न काऊ ॥ अतः
चापसे बचनेंके लिये परम कराल पापकों जान लेना चाहिवे।
परम कराछा-भाव यह कि ऐसा भयानक पाप जिससे बचना
डुर्घट हो; यथा---ठुमहि न व्यापत काछ) अति कराल कारन कबन !!
जिससे कोई न बच सके; वद्दी अति कराल है। इसीलिये तद्दिपयक
छठों प्रश्ष किया गया ।
दतपश्च चौपाई १७७
सानस रोग कहहु समुझाई ।
तुम सबंक्ष कृपा अधिकाई॥
अर्ग-तुम स्वेश छ्वो, और तुम्हें कृपा भी अधिक है, (खो)
मानस रोग समझाकर कहो ।
छुम सर्वज्-भाव यह कि मगवानकी कृपासे तुम सब बातौंका
भेद अनायास जानते हो; तुम्हें इस वातके लिये मगवानसे वर मिला
हुआ है, यथा--
भक्ति ज्ञान विज्ञान विरागा । जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥
जानव दें सब ही कर भेदा । मस प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥
इसीलिये तुम्हें सव वातोंका अआन्त शान है; तुम्ददारे कहे हुएमें
भ्रान्तिकों स्थान नहीं है ।
कृपा अधिकाई-भाव यह कि संसारमें क्ृपाके लिये कारण होता
है, यथा--“अवसि काज मैं करिहर्जे तोरा। मन तन वचन भगत ते मोरा ॥?
परन्तु कारणरहित कृपा दो को ही होती है, भगवत्कों या उनके सेवक
भागवत॒को; यथा--हेठरहित जग जुग उपकारी । ठुम तुम्हार सेवक
असुरारी ॥!! इसीलिये (कृपा अधिकाई” कहा ।
मानस रोग-माव यह कि आपने भक्तिमणिप्रसंगमें कहा कि
ध्यापहिं मानस रोग न भारी । जेहिक्रे बस सव ह्मेंस दुखारी॥? सो यदद
सारलदूम नहीं हुआ कि वे मानस रोग क्या हैं, और कौन-से हैं जो सभीकों
दुःख दिया करते हैं। रोग तो एक दो कभी-कभी किसीको होते हैं,
और सब रोग सबकों सदा रहें, यह अद्भुत वात है ।
कहह्ठु सम्ुझाई-भाव यह कि वात समझमें नहीं आती । मल-
का कुपित होना दी. सब रोगोंका कारण है। शरीरमें जो वात, पित्त, कफ
हैं, ये ही विकृत होकर अनेक विकार उत्पन्न करते हैं | वे ही जब एक
4 सप्त प्रदश्ध
साथ होते हैं, तब सन्निपात हो जाता ऐँं, रोगी दुर्वाद बकने छगता है |
शारीरिक रोगका कारण बात-पित्तका प्रकोप, कुपथ्यसे होता है । रोगेके
लिये चिकित्साशास्त्र बना है| वैद्य दवा देते हैं, रोग उपशमित द्वोता है;
शेगी खास्थ्यछाम करके फिर बलवान हो जाता है | ये सब बातें मनमें
कैसे होती हैँ ? यह बात समझमें नहीं आती, सो समझाकर कहिये ।
यह सातवाँ घक्ष हुआ ]
तात सुनहु सादर अति प्रीती ।
में संछेप कहों यह नीती ॥ ४७॥
अर्थ-हे तात | आदर और पीतिके साथ खुनो, में संद्षेप-
में यद्द नीति कहता हैँ ।
तात खुनहु-“तात झब्द बड़े प्यारका है; यह बड़े, छोटे और
बराबर सबके लिये आता है | भुशण्डिजीने तात सम्बोधन करके शिष्यके
प्रति आदर और प्रीति दिखलायी | प्रश्न हुआ था; 'जी कृपाल मोदहि ऊपर
माऊ' ऐसा कददकर | अतः तात? शब्दद्वारा सम्बोधन करके उत्तर
दिया जा रहा है।
सादर अति प्रीती-भाव यह कि अति प्रीतिसे सुननेसे ही गभीर
विपयके निरूपणका घारण हो सकता है, यथा--सुनहु ताव मन मत्ति
चित लाई ॥? और आदरके साथ सुननेंसे दही सिद्धिकी प्राप्ति होती है;
यथा-- सादर सुनहिं ते तरहिं भवसिन्धु बिना जलजान ।? अपनी कथा
कहते समय भी भ्ुशुण्डिजीने कहा था कि 'तात सुनहु सादर मन छाई!
जहाँ कार्यप्रणाली कह्दी जाती है, वहाँ सादर सुननेके लिये अनुरोध
किया जाता है । सादर सुननेका मतलब उसी शिक्षाकों कार्यमें परिणत
करनेका है। यथा--“तात बचन मम सुनु अति आदर ।? और जहाँ केवल
समझानेके लिये विषयनिरूपण किया जाता है, चहाँ सावधान होकर
सुननेको कहते हैं । यथा--“सुनहु सो सावधान दरिजाना ।*
झआतपश्च चौपाई १७६
यह नीती-भाव यह्द कि तुम्हारे ये प्रश्न कार्यप्रणाली जाननेके
लिये हूँ, अतः इनके उत्तरकों नीति कद्दा | मद्दात्मा छोग नीतिसे कभी
विचलित नहीं होते, यथा--'संयम निवम नीति नहिं डोलहिं। अतः
कार्यसिद्धिके लिये मीति स्थिर करनेमें ही पण्डिताई दे, इसलिये राम-
भक्तिके छदयमें छा लेनेकी नीतिकी ओर इद्धित करते दे ।
में संछेप कहाँ-भाव यह कि यद्द विस्तारमें कददने योग्य विषय है,
सो में त॒म्हारे कथनानुसार संक्षेपमें कद्ठता हूँ | इसे आदर और प्रीति
साथ सुननेसे दी यथावत् धारण कर सकोंगे ।
नरतन सम नहि कवनिउें देही ।
जीव चराचर जाचत जेही ॥
अर्थ-नरदेहके समान कोई देह नहीं है, जिसे जीच-
चराचर भाँगा करते हैं ।
कवचनिडें देद्दी-भाव यह कि चार खानिके जीव द्ोते हैं-( १ )
उद्धिज़, ( २) ऊप्मज; ( हे ) अण्डज और (४ ) पिण्डज । इन्हींके
अवान्तर भेद चौरासी छाख योनियाँ हं । मायाकी प्रेरणासे, काल, कर्म;
गुण ओर खमावसे घिरा हुआ जीव इन्हीं योनियोमें मर-मरकर जन््मा
करता है । यही इसका नाच है, वथा--
आकर चारि छाख चीरासी | जोनि अमत यह जिय अविनासी ॥
फिरत सदा मायाकर प्रेरा । काछ कर्म खुमभाव गुन घेरा ॥
परन्तु ये सब देह कर्मभोगके लियें हूं, मनुष्यदेह धारण करके
? दि. पु न पु न] 2 | ० मी 5.
जीवने जो-जो कम किये है, उन्हींकों इन योनियोमें जन्म ले-छेकर भोगता
है। फिर भी वे कमी समात्त नहीं होते, सखितका पहाड़ छगा हुआ है ।
सरतन सम-भाव यह कि सश्ित कमोंका पहाड़ भोगनेके लिये
च्े कई ० सेंड
मौजूद ही है, फिर भी करुणाकर कभी मन॒ष्यशरीर दे ही देते हैं | यह
श्छ्छ . सप्त पक्ष
निष्कारण स्नेह करनेवाले भगवानकी महान् अनुकम्पा है। नरदशरीरके किये
हुए कममसे तो अन्य द्ारीर मिलते हूँ, उन भोगद्नरीरेंसि कोई कर्म ऐसा
नहीं हो सकता जिससे मनुष्यशरीर मिले | अतः इसका मिलना ईश्वस््की
कृपापर निर्मर है। सो सब दरीरोंसे मरदारीर दुर्लभ है। यददी दरीर
साधन-धाम है, यथा--
जेद्टि पाष्ट पंडित परम पद पात्रत पुरारि मुरारि को |
(विनय० )
जीव चराचर-भाव यद कि जीवके दो भेद हैं, स्थाचर और
जज्षम । जो शरीर चल-फिर नहीं सकता; उसे स्थावर कहते हैं, जैसे
चृक्ष-पर्वतादि, और जो चल-फिर सकता है वह जन्नम कहलाता है;
जैसे पक्षी, पद्च आदि ।
जाचत जेही-भाव यद् कि नरतनकों खावर-जद्मम सभी जोच
चादते हैँ । सो चाइना जद्धममें तो बनता है, स्वावरमें नहीं बनता । पर
दास कहता हू कि खावर भी अन्तःसंश होते हैँ, भीतरसे उन्हें शान
रहता है; पर वाणीकी कृपा नहीं होनेसे प्रकाशित नहीं कर सकते, यथा---
सीताकर बिलाप सुनि भारी | भये चराचर जीव दुखारो ॥
नरक खर्ग अपवर्ग निसेनी ।
ज्ञान विराग भगति सुभ देनी ॥ ७८॥
अर्थ-( नरदेही ) ज्ञान, विराग ओर शुभ भक्तिकों देने-
घाली नरक; खर्ग और मोक्षकी सीढ़ी दै।
नरक-लोकोत्तर पाप भोगनेके लिये जो छोक ई, उन्हें नरक कहते
हैं। सबसे विश्वेप अधोगति झड़ोंकी दोती है। उनके छिये सबसे नीचे
अवीधि नामका नरक है। उसके ऊपर क्रमसे महाकाछ;, अम्बरीष, रौरव,
१२
इातपश्च चौपाई श्ज्ट
महारौरव, कालूवूत्न और अन्धतामिस्ध नामक नरक हैं | ये महा नरक
हैं |इनके अतिरिक्त अनेक उपनरक भी हैं ।
खग--लोकोत्तर पुण्य मोगनेके लिये जो लोक हैं उन्हें स्वर्ग कद्दते
हैं | नरकोंके ऊपर सात पाताल हैं, आठवीं ए्थ्वी है। इसके ऊपर श्रुव-
तक ग्रह-नक्षत्रोंसे युक्त अन्तरिक्षकोक है । इसके ऊपर स्वर्ग है। इसके
पॉँच भेद हैं-( १ ) माहेख्धलोक, ( २ ) आरजापत्य जिसे महर्लोक कहते
हैं, (३) जन, ( ४ ) तप और (५ ) सत्य ! पिछले तीन ज्ह्मलोकके
अन्तगत हैं | यहातक सम्प्रशातसमाधिवार्लोक्ी गति है |
सपचर्ग-साय यह कि असम्प्रशातसमाधिवाले अर्थात् चिदेहरूय
और प्रकृतिछय मोक्षपदमें स्थित हैं । अपवर्गका अर्थ है सोक्ष | मुख्य
मोंक्षसे अभिप्राय सायुज्यसे है ।
निख्ेसी-भाव यह कि नरदेह नरक, ख्र्ग और मोक्षकी सीढ़ी
है| जिस भाँति सीढ़ी ऊगाकर छोग ऊँचे चढ़ जाते हैं और नीचे भी
उत्तर जाते हैं, उसी भाँति नरदेहसे चाहे नरकर्मे उतर जाय, चाहे स्वर्ग-
पर चढ़ जाय और चाहे मोक्षकों प्राप्त हो इसके लिये प्रारब्ध नहीं है;
प्रारू्ध सांसारिक सुख-दुःखेंके लिये है | सीढ़ी पाकर भी यदि कोई
इच्छापूवंक नरकमें उतरना चाद्दे तों शाख और गुरु उसकों मना तो
करते हूँ पर उसके साथ बल्तत्कार नहीं कर सकते |
शान विराग भगति झुभ-भाव यह कि कर्मकाण्डसे ही वैराग्यों-
दय होता है, यथा--घर्म ते विरति (योग ते ज्ञाना )“वैराग्यमें अमय
सुख है, इसीसे वैराग्यकीं ढठाछ कहा है--ज्ञानसे आत्मसुख मिलता है ।
यथा--आतम अनुसव सुख सुप्रकाशा | और भक्तिसे परमात्मसुख प्राप्त
होता है ।
देनी-भाव यह कि जीतेजी वैराग्य, ज्ञान और झुम भक्तिको देने
वाली और पीछेके लिये नरक, स्वर्ग और मोशक्षकी सीढ़ी है |
श्ज्य् ... सप्त प्रदन
सो तनु घरि हरि भजहि न जे नर |
होंहि. बिषयरत मंद मंदतर॥
अर्थ-उस शरीरको घारण करके जो मनुष्य विपयरत
होकर मन्द् द्वोते जाते हैं, हरिको नहीं भजते ।
सो तनु धरि-भाव यद्द कि ईश्वरक्ृपा, गुरुकृपा, शांखकृपा
और आत्मकृपापर ही सब कल्याणोंका होना निर्मर है। इनमें ईश्वर-
कृपा तो तभी हो चुकी जब नरदेह मिली, शोप दो कृपाएँ भी आत्म-
कृपापर ही निर्भर है | सो यदि अपनेपर ही कोई कृपा न करना चाहे तो
बात दूसरी है; नहीं तो नरदेहसे कौन-सा साधन नहीं हो सकता !
जे नए दरि न भजदि-भाव यह फि जब सीढ़ी दाथ छगी तो
डसे सब दुःखोंके दरण करनेवाले भगवान् हरिक्री ओर लगानी चाहिये ।
यही चत॒राई है, यही पण्डिताई है, यही पुरुषार्थ है | जिस अभागे मति-
मन्दने उधर सीढ़ी न लगायी अर्थात् हरिको न भजा, उसकी मूर्खताका
अन्त क्या है !
हॉंडि विपयरत-भाव यह कि विषयसुखकी ओर सीढ़ी छूगा
दी, वह प्रति पर्व ( डंडा ) नीचे उतरता ही चछा जायगा) यथा---
'सैवत त्रिपय त्रिवर्ध जिमि नित नित नूतन मार! | विषयकी ओर जाने-
बालेको कभी सुझ नहीं मिलता; कभी-कभी सुखाभास मिलता है,
उसीकों सुख समझकर वह उसीकी ओर अप्रसर होता चला जाता है।
मंद् मंदतर-भाव यद्ध कि वह तो सुखप्राप्तिकी उत्कण्ठासे
सुखामासके पीछे महान् कष्ट शेलता हुआ, और भी घोर बिपत्तिमें
उलझता हुआ चला जाता है | विषयसेवनसे उसकी बुद्धि और भी
दिन-दिन मलीन होती चली जाती है; उसका छौठना असठुम्मव होता
चला जाता है | अन्तमें उतरते-उतरते वह कदाँतक जायगा इसका
शतपश्च चौपाई १८७
ठिकाना नहीं; बहुत सम्भव है कि वह रौरव-मद्दारौरव पार करता हुआ
अवीचितक पहुंच जाय !
कॉचु किरिच बदले ते हछेहीं।
करते डारि परसमनि देहीं ॥४था।
सर्थ-वे हाथसे स्पर्शमणि ( पारस ) फेककर, उसके
बदलेमें कॉचका छुकड़ा लेते हैं ।
परसमनि-भाव यह कि स्पर्शमणिके सम्पर्कसे छोहा सोना
होता है, यया--“पारस परस कुधात सोहाए! सो राममजन पारस है,
इसके स्पर्शसे खल भी तर जाते हैँ । लोहा बिना पारसके सोना हों नहीं
सकता। इसी भाँति खल बिना मजनके तर नहीं सकता | अतः न पारस-
का मूल्य है न भजनका मूल्य है दोनों अमूल्य हैं, यथा--
महाराज रामादरधों धन्य सोई।
गरुअ,गुनरासि,सरवज्ष, सुकृती, सूर, सीऊ-निधि, साधु तेहि सम न कोड ॥
डपल-केवट-कीस-भालु-निशस्चिचर-सवरि-गीघ सम-दम-दया-दान-हीने |
नाम लिये राम किये परम पावन सकर, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥
ज्याध झपराधकी साथ राखी कहा, पिंगले कौन मत्ति भयति भेई।
कौन धौं सोसमनाजी अजामिझ अधम, कौन गजराज थों बाजपेई ॥
पांड-सुत, गोपिका, बिदुर, कुबरी, सबरि सुद्ध किये सुछ्दता केस कैसो ।
प्रेम लखि कृष्ण किये आपने तिनहुँको, सुजस संसार दरिहरकों मैसो ॥
कोर, खस, भीक, जवनादि खलू राम कट्ठि, नीच छ्वे ऊँच पद के हि न पायी ।
दीन-दुख-दुवन श्रीरचन करुना-भवन, पतित-पावन बिरद बेद यायो॥
( विनय ० )
श्टर् सत्त प्रदन
करते डारि देद्दीं-भाव यह कि जिन्हें पारसका प्रभाव कुछ नहीं
मालूम है जो उसका कुछ मूल्य ही नहीं समझते, वे कोई भो वस्तु बदलेमें
मिलनेकी आशासे उसे पहले ही फेक देते हेँ | उन्हें यह डर बना रहता
है कि कहीं ऐसा न हो कि देर होनेसे सौदा बिगड़ जाय | इस तरह
उनके दाथमें आया हुआ पारस व्यर्थ द्ायसे मनिक्र जाता है। इसी
भाँति भजन अपने द्वाथकी चीज है, इसके लिये कहीं बाहर दीड़-धूप
नहीं करनी है | भजनके लिय्रे केवल अन्तर्मुख होनेकी आवश्यकता है,
इसीलिये 'हाथमें? कहद्दा ।
कॉँसु किरिय-भाव यद्द कि एक तो कौँच खर्य अल्प मूल्यवाला
पदार्थ है; उसके ठुकड़ेका तो कुछ भी मूल्य नहीं है। बड़ी सावधानीसे
उठाकर उसे घरके बाहर फेंका जाता है कि कहीं गड़ जायगा तो महीनों
दुःख भोगना पड़ेगा । गंवारोंके लिये उसमें मण-सी चमकमात्र होती
है | इसी भाँति विषय सुखके सदश सुख्ाभासमात्र होता है, सुख
उसमें है ही नहीं, और यदि वह गड़ गया तो महान् दुःखका कारण
दोता है ।
ते लेह्वीं-माव यह कि ऐसे लेनेवाले महामूर्ख वे द्वी हैं, जिन्होंने
इरिमजनके बदले विषयका भजन किया | और थे भी वैसे ही मुर्ख हैं
जो सांसारिक काम आ पड़नेपर माला पेककर दौड़ते हैँ। लोकमें ऐसे
मूर्खकी एँसी होती है, यथा--
तादि कबहुँ सछ कह कि कोई । गुंजा गहे परसमनि खोई ॥
पर ऐसे हंसनेवाले यह नहीं जानते कि भजन छोड़ विपयमे लूग-
कर हम भी वैसी ही मृखंता कर रहे हैं ।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं ।
संत मिलन सम झुख कछु नाहीं॥
दतपञ्च चोपाई १८९
अर्थ-संसारमें न तो द्रिद्रके समान दुःख है; न संतके
मिलने-सा कोई छुस्र है|
द्रिद्र सम रुख-भाव यद्द कि प्रतिकूल वेदनीयको दुःख कदते
हैं। संसारमें छोटी-सी-छोटी सुविधाके लिये कीमत है | खानेके लिये, पीनेके
लिये; पहननेके लिये; सोनेके लिये, सुखके लिये, अध्ययनके लिये, प्रतिष्ठाके
लिये, रक्षाके लिये, सभी कामके लिये कीमत (मूल्य ) चाहिये | दरिद्रकों
अर्थामाव है; अतः जीवनधारणानुकूछ व्यापार चलानेक्रे लिये उसे
साधन नहीं है । अतः उससे बढ़कर दुखी कोई नहीं है। परन्तु ऐसे
दरिद्र भी परम सुखी देखे गये हैं, त्रतापद और शिवपद लेनेवाले ऐसे
ही दरिद्र रहे हैं, यथा--
- झुम सस जअधन भिखारि अगेहा । होत चिरंखि सिवद्दि संदेहा ॥
दरिद्रमें और उनमें भेद इतना दी है कि दरिद्र विषयरत हैं. और
वे विषय-विमुख विरागरत हैँ, मोहके दाथके वाहर &ँ । अतः वास्तवर्म
तो दरिद्र मोह है, यथा--मोह दरिद्र निकट नहिं आवा” मोहयुक्त धनी
भी कौड़ी-कोड़ी के लिये तड़फड़ाते देखे गये हैँ और नैराग्यचान, तो
घनधघान्यसे मरे घरको सदासे छात मारते आये हैं, यथा---
श्माचिकास राम अनुराधी । सजत श्रसन इव नर चब॒भागी ॥
जग भाद्दी-भाव यह कि जग्रका विस्तार बहुत बड़ा है, अचीचि
नरकसे लेकर ब्रह्मछोकतक सब जगत् € परिवर्तनशील ) ही है। सो
इसमें जहाँ जिस परिमाणमें मोह है वहाँ उस परिमाणमें दुःख है । यह
दूसरे प्रश्नका उत्तर हुआ ।
संत मिऊून सम-भाव यह कि संसार सुखके लिये पागल है;
पर संसारमें पूर्ण कुछ भी नहीं; सब कुछ आपेक्षिक है; परिच्छिन्न है,
यहाँ सुस्त भी परिच्छिन्न है। परिच्छिन्नसे तृसि नहीं होती । अतः जाने
था बिना जाने. संसार-अपरिच्छिज्न, सुखकों दूँढ़ रहा है |. सुखसागर
श्र सप्त प्रदन
राम ही सबके छद॒याराम देँ।वे ही सबके अमीश्तम हूँ। संतौका
मिलना रामके मिलनेका नियतपूर्वरूप है, यथा--
जौ रघुब्ीर भनुअ्रह कीन्द्दा | तो तुम मोदिं दरस इढि दीनदा ॥
परिच्छित् सुख तो संतेंके मिलनेका अवान्तर फल है। बिना
संतके मिले कोई कल्याण द्वो नद्दीं सकता; यथा--
मति कोरत्ति गतति भरूत्ति भलाई | जो जैद्टि जतन जहाँ जब पाई ॥
सो जानय सतसंग ग्रभाऊ । छोकहु ग्रेद्द न जान उपाऊ #
संद भगवानके प्रिय हैँ, अतः भगवानके समान हैं । अतः उनका
मिलना दृदयाराम रामके मिलनेके समान है; यथा--
फंचनको स्वतिका करि मानत । कामिनि काष्ट सिछा पद्धिचानत ॥
तुझसी भूछि गयो रस एटा | ते ज्ञन प्रणशट रामकी देहावा
( बै० सं०
खुख कछु नाहीं-अत्पमें सुख नहीं, जो भूमा है उसीमें सुख
है | संसारके परिच्छिन्न सुखोमें कोई ऐसा नहीं दे जो संतसमागमके
सुखके समान हो, क्योंकि यह सुख भूमा ह। संतके समागमके|
सुखमें मनुष्य संसार भूल जाता है; और वद्दी सुख भगवत्-प्राप्तिका
कारण होकर नित्य हो जाता ऐ । इसीलिये कहा कि 'संत मिलन सम सुख
कछु नाहीं? | संतमिलन नरदरीरमें ही ठीक तौरसे होता है । अतएव
नरशरीर दी ऐसा है जिसमें अति उच्च कोंब्कि दुःख और सुखका
# मुख देखत पातक एरें, परत्त कर्म बिलाएि।
बचन सुनत मन मोहगत, पूरव भाग मिलाएि ॥ ( वैं० सं० )
॥ सनुभव सुख उत्पति करत, भव अम धरे उठाइ।
रेसो बानी संतको, जौ उर मेंदे आइ॥(जै०सं०)
शतपशथ्च चौपाई १८४
अनुभव हो सकता है । अब ऐसे सुख देनेवाले सं्तोका मर्म क्या है!
अतः कहते हैं--
पर उपकार बचन सन काया।
संत सहज सुभाठ खगराया ॥ ५०॥
अर्थ-है खगराया | मनसा धाचा कर्मणा परोपकार
9 ३ ५ ह्छै
करना; संतॉका सहज ( पेंदाइशी ) खभागय है।
खगराया-भाव यह कि आप पक्षियोंके राजा हैं, उड़नेवालमिं
सर्वश्रेष्ठ हैं, सो उड़नेका गुण आपमें सद्दज है, किसीसे सीखना न
पड़ा । इसी भाँति किसीमें कोई शुण खाभाविक ( पेंदाइशी )
होता है । सीखा हुआ शुण सहज गुण ( खमाव » का सामना नहीं
कर सकता ।
पर उपकार-भाव यह कि जो अपना उपकार न कर सका; वह
पराया उपकार नहीं कर सकता । सत्र किसीमें परोपकार करनेकी पाचता
नहीं हो सकती । जिन्हें अपना कोई स्वार्थ नहीं है, जो पूर्णकाम हैं, वे
ही परोपकार कर सकते हैं | परोपकार ही सत्र धर्मोंसे बड़ा है ।
चचन सन काया-भाव यह कि मन, वाणी और कमका एक
रंग होना संतका लक्षण है | मन; वाणी और कर्ममें भेद पड़ना कुटिल्ता
है, यथा--
सरकू चशन भाषा सरल सरल अरथमय वानि।॥
चुलसी सररे संतजन ताहि परी पहिचानि ॥
तनकरि भनकरे वचनकरि काहू दूपत नाहिं।
तुऊकसी ऐसे संतजन शमरूप जगमाहिं ॥
( बैं० सं० )
श्ट५ सप्त प्ररत
संत सदज्ञ खुभाउ-भाव यह कि संत पैदा होते हूँ, संत
बनाये नहीं जाते । जो गर्भज्ञानी हैं, जो पूर्णकाम# हैं, किसी प्रारब्धके
दोष रहनेके कारण जिनका जन्म हुआ है, वे ही मनसा वाचा कर्मणा-
परोपकार करनेकी योग्यता रखते हैँ और वे ही संत हैँ, उन्हींके लिये
भगवानको अबतार घारण करना पड़ता है, यथा--
तुम सारिखे संत प्रिय मोरे। घरों देह नहिं जान निष्ठोरे ॥
जो पहले द्रोही रह चुके हूँ, ओर पीछेसे सत्सज्ञद्वारा जिनकी
बुद्धि सुधर गयी और परोपकाररत हुए, वे 'संत समान? हैं, संत
नहीं हैं, यथा--
जो नर होट्ट चराचर द्वोह्दी। आये समय सरन तकि मोदी ॥
तजि मद मोद्द कपट छल नाना । करों सद्य तेद्दि साधु समाना ४
वे संतजन अनायास उपकार ही नहीं करते, व्कि उसके लिये
कष्ट भी उठाते हैं, यथा--
संत सहहि दुख पर हित लागी ।
पर दुख हेतु अपंत अमागी ॥
अर्थ-सखंत पराये द्वितके किये डुःख सहते हैं, और अभागे
असंत पराये दुःखके लिये दुशख सहते हैं।
संत सहृद्धि छुख-भाव यह कि जो इस जगतूर्मे आया है, उसे
*ख भोगना ही पड़ता है, प्रारब्ध किसीके हटाये नहीं हृटता। यथा--
# जाके मनते उठि गई तिल-तिर तृष्णा चाहि।
मनसा वाचा कर्मना घछुल्सी बंदत ताहि॥ (वैं० सं० )
शतपश्च चौपाई १८६
कह झुनीस द्विभवंत सुनु जो विधि लिखा छिलकार |
' ' देव दनुज्न झुनि नाग नर कोड न सेटनदार ह
दुशन-सुख जो छिला लिकार हमरे जाव जहाँ पाउब तहीं ।
अतः दुःख संतको भी भोगना पड़ता है और असंतको भी भोगना
पड़ता है ।
पर द्वित छागी-भाव यद्द कि संत और असंतके ददयमें भेद
है | संतका हृदय इतना कोमल होता है कि वह पराया दुःख देख नहीं
सकता; अतः दुःख उठाकर बद्द उसका प्रतिकार करता है, यथा--
संत्त हृदय नवनीत समाना | कद्दा कविन पर कहैं न जाना ॥
निज परिताप अब नवनोता। पर छुख द्रवें सुसंत पुनीता ॥
अतः दूसरेंके लिये दुःख उठानेमें उनके दुःखका भोग पूरा हो
जाता है | उधर दुः्खका भोग भी पूरा हुआ और इघर परोपकारसे
परम धर्मंका उपाजन भी चलता रहा ।
अलंत अभागी-भाव यह कि असंत अभागी इसल्यि है कि
इनके भाग्यमें सुख हई नहीं है | जब्रतक जीते रहे तवतक इेपोमें जलते
रहे, क्योंकि वे किसीका हित देख नहीं सकते, और द्वित किसी-न-किसीका
होता ही रहेगा, यथा---
उदासीन अरि भीत छित सुनत जरें खल रोति।
'परहित घत जिनके मन माखी ॥? पर अकाज भट सदसबाहुते ॥?
और जब मरे तो परपीड़ककों नरक छोड़कर और स्थान ही कद्दों
है ! अतः इनके भाग्यमें सुख ही नहीं । इसलिये 'अमागी? कहा ।
पर दुख द्वेतु-भाव यह कि असं्तों ( ख्जं ) का छदय इतना
कठोर होता है कि उन्हें दूसरेके ढुःखमें आनन्दानुभव होता है, अतः वे
परायेको दुःख देनेमें ढुःख उठाते हैं। इस माँति उनके दुःखसुखका भोग
श्ट्ज सप्त प्रदन
हो जाता है, और परलोकके लिये दुःखभार भी खूब छद॒ जाता है ! अपने
स्वार्थकी ओर देखनेवाले संत-असंत दोनों नहीं होते, और अपने-अपने
क॒र्तव्यपालनरमे दोनों ऐसे दृढ़ होते हैं कि लोकमें उसकी उपमा नहीं है;
यथा-- चर
खल जघ उदधि साधु गुनगाह्दा। उमय अपार उदृधि ऊजवगाहा
अपने-अपने कर्तव्यपथपर आरूढ़ होनेपर दोनों ही साधारण कष्ट
नहीं उठाते; अतः कद्ते हैं--
(३ बढ
भूजतरू सम संत छुपाछा ।
पर हित नित सह बिपति बिसाला ॥५१॥
जरथ-कृपाल संत भोजदुक्षके समान है। पराये हितके
लिये नित्य विशाल विपत्तियाँ भोगा करते हैं ।
संत कृपाला-कोमल चित्त होनेसे कृपा कद्दा | संत लोग ऐसे
कृपाछ होते हैं कि इनका शत्रु-मित्र कोई भी नहीं, सवपर इनकी समान
दया रहती है, यथा--
बंदों संत समान चित द्वित जनद्वित नहिं फोठ।॥
संजलिंगत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोठ ॥
कृपाल कहकर संतेमें स्वामाविक परम घर्म दिखलाया, यथा---
धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥?
भूजतरू सम-भाव यह कि--
संत विटप सरिता गिरि धरनी। पर द्वित हेतु सबनिकी करनी ॥
यहाँ चार अचेतन पदार्थोके साथ संतोंका उलेख यह बात
दिखलछानेके लिये है कि परद्ितका कार्य करनेके लिये इनका भी व्यवहार
इतपजश्च चौपाई १८८
अचेतनवत् ही है, ये सुख-दुःखको नहीं गिनते | विटपर्मे फल दूसरोंके लिये
लगते हैं, चक्ष खयय एक फल भी नहीं खाता, नदी अम्ृत-सा जल लेकर
दूसरोंके लिये बहती है, स्वयं एक घूँट भी नहीं पीती, पर्व॑तकी जो
सम्पत्ति है, सो भी दूसरोंके लिये है, पर्वतकों उसका उपभोग कुछ भी
नहीं है | भुशुण्डिजी कहते हैं कि इन सबोर्मे भी भोजबक्ष दानवीर है,
उसकी छाल छोगोंके काम आती है| उसीपर पुस्तकें लिखी जाती हैं,
यन्त्र लिखे जाते हैं, पुड़िया बॉधनेके काम आती है। इसकी समता
संतोंसे दी जा सकती है ।
पर द्ित नित सह-भाव यह कि संत छोग पराये हितके लिये
नित्य विपत्ति सहाय करते हैं, कमी दुःखसे ऊवबते नहीं | उनका शरीर सर्व-
साधारणकी सम्पत्ति हो जाती है ।
विपति विसारा-भाव यह कि जिस भाँति मनुष्योंके शरीरमें
चमड़ी ( खाल ) है, उसी भाँति बृक्षद्रीरमें छाल है। सो खाल
कढ़ाना सब विपत्तियोंसे भारी है, जिसे मोजबक्ष नित्य सहा करते हैं ।
इसी भाँति संत छोंग भी भारी-से-भारी विपत्ति परद्दितके लिये नित्य
सहते हैं ।
सन इव खल परबंधन करहई ।
खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ॥
अर्थ-सनकी भाँति खलू दूसरोंको बाँघता है, और अपनी
खाल कढ़ाऋर विपत्ति सहकर मर जाता है ।
सन इच खल-भाव यह कि खल भी पराये अपकारके लिये
- जड़ीभूत रहते हैं, अपने सुख-दुःखका ध्यान उन्हें भी नहीं रहता, उन्हें
भी शजु-मित्रका विभेद नहीं रहता, यथा---
उदास्तीन जरि मीत ट्वित सुनत जरहिं खल रीति ॥
१८०९, सत्त प्रचन
शच्रु, मित्र उऊदासीनका हिंत सुनते ही खल जल उठते हैं | उनकी
उपमा सनके साथ दी गयी है ।
परवंघन करई-भाव यह कि सनकी रस्सी बटी जाती है, और
उसीसे जीवगण बाँघे जाते हैँ और सन किसी काममें नहीं आता | पहुए-
की भी रस्सी बनती है पर वह कमजोर होती है, ओर पठुआ अन्य काममें
भी आता है अतः पडुएसे कुछ उपकार भी है, इसलिये पठुआ न
कहकर सन कहा | जितने दुःख हैं, उन सबका मूल परबन्धन
(परवशता) है, यदि परवन्धन न हो तो कोई दुल् ही नहीं दो सकता ।
इसलिये और कोई दुश्ख देना न लिखकर परवन्धन लिखा ।
खाल कढ़ाइ विपति सहि-भाव यह कि सन पानीमें
डुबोया जाता है, जब सड़ जाता है, तब निकालकर उसकी
छाल अलग करते हैं, और तब कूवकर और बटकर रस्सी बनाते
हैं। इसी मॉति खलकों कोई जलमें डुबोये, खाल खींचे; मारे और उसकी
खाल खींचकर प्राण छे, पर उस खालसे भी यदि किसीकों दुःख पहुँच
सके तो उसे इस दुर्गतके साथ मरना भी स्वीकार होता है ।
मरई-भाव यह कि परायेके सुख-दुःखके लिये कष्ट सदनेमें संत
और असंतर्म समानता है । पर खल दूसरेको दुःख देनेमें द्वी मर जाते
हैं और संत परोपकारमें मरते नहीं, उनकी रक्षा परमेश्वरकी ओरसे हों
जाती दे, परोपकारमें मृत्यु उन्हें भी दुलेमभ है, यथा--
परद्दित लछागि ते जे देद्दी | संतत संत प्रसंसहिं तेही॥।
मरे सकल मरिहेँ मरहिं आज काछके बोच।
तुलसी काहू नहिं. ऊहीी गांधराजकी भीच ॥
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी ।
अहि सूषक इव सुनु उरगारी ॥प१र॥
शतपशञ् चौपाई हैं००
अर्थ-है उरगारि ! खुनो; सपं और चूहेके समांन खल
'निशस्वार्थभावसे दूसरेका अपकार करता है।
खुल उरगारी-भाव यह्द कि आप उरगों ( सर्पों ) के शन्नु हैं,
आप उनकी खलताकों खूब जानते हैं |
खल पर अपकारी-माव यद कि परायेक्ी हानि करनेवाले खल
हैं । हानि दो प्रकारकी होती है--( १ ) अर्थदानि और ( २ ) जीवन-
हानि । सों खछ यथावसर दोनों प्रकारकी हानि करते हैं, यह उनका
स्वभाव है । यह बात नहीं है कि वे किसी प्रयोजनसे ऐसा करते हों ।
उनका भी मित्र, शत्रु और उदासीनके साथ समान व्यवहार है |
बिछ्ठु खारथ-माव यह कि संसारसें छोंग स्वार्थके लिये परस्पर
उपकार-अपकार किया करते हैं, परन्तु खल स्वार्थरहित अपकार करते
हैं, क्योंकि उनका स्वभाव हानि पहुँचानेका है । स्वभावके लिये कारण
नहीं खोजना पड़ता । निष्कारण उपकार-अपकारका उदाहरण भोजतरु
और सनसे दे आये । भोजतर और सन अचेतन हैं, सचेतन तो किसी
स्वार्थके लिये ही उपकार या अपकारसें प्रदत्त होता है । पर साधु और
खलके उपकार-अपकारमें प्रदत्त होनेका कारण स्वार्थ नहीं है, स्वभाव है।
अहि सूघक इच-विना स्वार्थक उपकार करनेका उदाहरण
चैतन जीवोंमें नहीं मिला, इसलिये उसका उदाहरण गोसाईजी नहीं
दे सके । पर बिना स्वार्थके अपकार करनेवालैका उदाहरण है; इसलिये
कहते हैं कि (अहि मूषक इच” । सर्प किसीकों काट खाता है, इसमें
उसका कोई स्वार्थ नहीं है, पर जिसे काटा उसकी तो जीवनहानि हो
जाती है । मृषक छुशाला काट डालता है, इसमें मूघकका कोई स्वार्थ
नहीं है। पर दुशालावालेका बहुमूल्य द्रव्य नष्ट हो जाता है। सर्प और
मूषक तो हानि करके बच जाते हैं, पर सबकी हानि करनेवाला खल तो
जच नहीं सकता, इसलिये कहते हैं कि---
श्०्१् सप्त.प्रशन
पर संपदा बिनासि नसाहीं ।
जिमि ससि हति हिमि उपल बिलाहीं॥
अर्थ--( खछ ) दूसरोंकी सम्पत्तिका नाश करके ख्य॑
नष्ट हो जाते हैं, जेसे ओछा खेतीका नाश करके खय॑ं भी गल
जाता है।
पर संपदा-भाव यह कि अपना अर्थ कुछ न भी हो, फिर भी
खलॉमें ईंघां और कपट अधिक होता है, वें परायी सम्पदा देख नहीं
सकते, यथा--- *
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुस्हरे हर्पा कपट बिसेखी ॥
अतः चाहे मरें चादे जीयें, पर उसका नाश बिना किये चैन नहीं ।
विनासि नखाहीं-भाव यह कि दूसरेकी सम्पत्ति तो ले ही बैठेंगे,
पीछेसे स्वयं भी मर जाये तो कोई इज नहीं | इतनी चोट उन्हें दूसरेकी
सम्पत्ति देखकर होती है | जो दूसरेकी सम्पत्ति नष्ट करता है, वह स्वयं
गर जाता है|
जिमि ससि दसि-भाव यह कि घनघमण्डसे आकाद आइत हो
जाता है, तड़पनेसे दिशाएँ नादित हो उठती हैं और चमकसे संसार
भयभीत हो जाता है, तब ओंछे पड़ने छगते हैं, और खेतीका नाश हो
जाता है| इसी भांति परसग्पदा देखनेसे खलोंकों बड़ा दर्प होता है, खूब
गरजते ईं, तड़पते हैं, चमकते हैं, और परसम्पदाका नाश करते हैं ।
हिमि उपलछ विलाहीं-भाव यह कि खेतीका नादा करनेके लिये
स्वरगंसे पृथ्वी पर गिर पढ़ते हैं और स्वयं गल जाते है | ठीक इसी तौरपर
परसम्पदाका नाश करनेवार्क्लका नाश करनेके समयमें ही अधःश्पतन
होता है; और पीछेसे वे गल-गछकर मर जाते हैं ।
झशतपञ् चौपाई श्ष्श्
दुष्ट उदय जग अनरथ हेतू।
जथा असिद्ध अधम ग्रह केतू ॥११॥
अर्थ--हुएका उदय संसारमें अनर्थका कारण है, जैसे
अह्योर्मे अधम केतुका उदय होता है।
डुष्ठ उदय-भाव यह कि ऊपर जितनी बातें कही हैं, वे तो
साधारण अवस्थाकी वातें हैं| पर जब दुष्टका उदय द्वोता है तो संसारपर
बड़ी मुसीबत आ जाती है | जबत्र-जब संसारपर मुसीबत आयी है, तब्र-तब
उसका कारण दुष्टका उदय ही छुआ है । दुश्की जब उन्नति होगी;
तब वह अपनी प्रश्ताका उपयोग संसारभरकों दुःख देंनेमें करेगा,
यथा--
देखत भीसरूप सब पापी | निसिचर निकर देव परितापी ॥
करह्िं उपद्रव असुर निकाया | नाना रूप धरहिं कारे माया ॥
जेद्टि विधि होड़ धरम निरमूछा | सो सब करहिं वेद प्रतिकूला ॥
जेह्ि जेंद्वि देस धेनु द्विज पाव६हिं | नगर गाँव पुर आगि लुगावहिं ॥
सुभ खाचरन कतहुँ नहिं होई। चेद विश्र गुरुसान न कोई ॥
नहिं हरि भगति जज्ञ तप दाना । सपनेहुँ सुनिय न येंद पुराना ॥
जप जोग विरागा तप समख भागा श्रवन सुनें दससीसा ।
जाधुन उठि धाचे रहे न पाचे घरि सब घाले खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा घसस सुनिय नदिं काना ।
सेद्दि बहुविधि त्रासै देख निकासे जो कह चेदु घुराना ॥
वरनि न जाए अनीति, घोर निसाचर जो करहिं।
हिसापर अति बीति, तिनके पापहधिं कवन मिति 7
जग अनरथ देतू-विना कारण कार्य नहीं होता । अतः जब
१०३ ” सप्त प्रश्त
संसारके कर्म खोटे आते हैँ; संसार्कों दुःख भोगना रहता है तभी दुष्टका
उदय होता है | दुष्टका उदय होते ही संसारमें त्राहि-च्रादि मच जाती है;
यथा--
मह्म सृष्टि जहँ ऊगि तनुधारी | दुसमुख घसवर्ती नरनारीत॥
आयसु करदहिं सकर भयभीता । नवहिं आह नित् चरन बिनोता ॥
अतिसय देखि धर्मके हवानी। परम सभोत्त घरा अकुछानी॥
गिरि सर सिंधु सार नहिं मोहों । जस मोद्ि गरुअ एक परदह्वरोंही ॥
सकल धर्म देखे बिपरीता। कटष्टि न सके रावन सयभीता ॥
घेजुरूप भरि हृदय बिचारों। गई तदाँ जहँ सुरझुनि झारी ॥
मिज संत्ताप सुनाएसि रोई। काइ्ट ते कछु काज न होई॥
अधम अद्दकेतु-भाव यह कि पीड़ा करनेवालेको ही ग्रह कहते
हैं । जो पिण्ड आकाझमें घूमते दिखायी पड़ते हूँ, वे सभी ग्रह हैं, वे
सभी पीड़ा देनेवाले हैं पर व्यक्तिविशेषकों, समयविशेपमें ही पीड़ा
देते हैं, और लोगेंकि लिये सुखकर भी होते हैँ । इनमें केतु विचित्र हैँ ।
सब्र ग्रह पूर्वमें उदय होते हैं, पर केतु पश्चिममें उदय होते हैं । इनकी
संख्या भी बहुत है । आचार्योने आकाशमण्डलकों २७ भागोंमें विभक्त
किया है, और प्रत्येक विभागकों तत्रस्थित नक्षत्रोके नामसे अभिद्दित
किया है; यथा--अश्िनी, भरणी, कृत्तिका आदि । अतः भ्रहोंका उदय
किसी-न-किसी नश्षत्रपर दी होता है, और तदनुसार उनका झुभाशुभ फल
भी होता है पर केतु चाहे जिस नक्षत्रपर उदय हों, खोटा ही फल देंगे-]
देशविशेषके पालकपर ही नक्षत्रविशेषमें उदित होकर चोट करते हैं;
अतः देश-के-देशपर आफत दह्ते हैँ, इसलिये केठुकों अधम अह्द कद्दा |
“ जथा प्रसिद्ध-भाव यह कि दुनिया जानती है। इनकी चालू
सब गहोंसे निराली है, ये उठा ही चलते हैं, इसीलिये इनकी उपभा
दुशेंसे दी गयी है । दुष्टोकी मी उलटी चाल होती है, यथा--: . -
श्र
शतपशञ्य चौपाई १९७
चछहिं कुपंथ बेदमग छोड़े । कपटकलेचर कलिमलक भोादे #
चंचक भक्त कहाद्ट रामके। किकर कंचन कौह कामके ॥
केतु जिस भाँति व्यक्तियोंकों कष्ट दिया द्वी करते दईँ, पर जब
उनका उदय द्वोता है, तब देश-का-देश पीड़ार्मे पड़ जाता है, उसी
भाँति दुष्ट भी यो दी हुःख दिया करते हैं, और यदि कहीं इनका उदय
हि
हो गया तब तो देश्न-के-देशाकों विपत्तिमें डाल देते हूँ
संत उदय संतत हितकारी-।
विश्वस्ुखद जिमि इंदु तमारी ॥
अर्थ-संतका उदय सदा हितकारी होता है, जैसे चन्द्र
और सूर्य संखारकों खुल देनेवालें हे |
संत उद्बय-भाव यद्द कि यहाँपर “उदय! शब्दमें हहेष है, संत
और असंत्तके पक्षम इसका अर्थ सुखसमृद्धि है और ग्रहके पक्षमें इसका
अर्थ क्षितिजमें प्रकट होना है | इस संसार-चक्रम॑सरलता नहीं है, क्षण-
क्षणमें गतिमें परिवर्तन होता है, अतः उदय-असत, हास-वृद्धि, जन्म-मरण
यहाँ लगा ह्वी रहता है । जिस समय उदय नहीं रद्दता उस समय मी
संत छोंग प्राण देंकर परोपकार किया करते हैं, पर उदय होनेपर तो
परोपकारकी मात्रा बहुत द्वी बढ़ जाती है ।
संतत द्वितकारी-भाव यह कि संतेसि ही संसार घृत है, अतः
जबतक संसारकों बना रहना है, तबतक संतोंका उदय सदा बना ही
रहेगा । दुश:्के उदयके समय भी संतका उदय रहता है, और
डुश्ेंके अस्तके समय भी संतोंका उदय रहता है। दुष्टका उदय कभी
कदाचित् होता हैं | दुश्का उदय संसारके लिये रोग है। ज्यादा दिन
ठहर जाय तो संसारका नाश हो जाय | इसीलिये प्रबल दुष्टफे उदय
होनेपर उसके नाशके लिये अवतार होता है, यथा--
दससीस बिनासन बीस झ्ुजा। कृत दूरि मदामहिभूरिरुजा ।-
श्य्५् सप्त पस्म
इसीलिये संत-उदयकों सनन््तत ह्ितकारी कह्दा ।
इंदु तमारी-भाव यह कि जिस भाँति सूरत और चन्द्रमाके उदय-
से विश्वका घना सम्बन्ध है, उसी भाँति संत्तोके उदवसे भी सम्बन्ध है |
सूर्य और चन्द्रमासे द्वी संसारकों प्रकाश मिलता है; ताप तथा ठंडक मिलती
है, दर्य और चन्द्रमासे ही समयका विभाग होता है; सूर्य और चन्द्रमा
द्वारा ही संसार चल रहा है, यथा--“जग द्ित हेतु त्रिमल ब्रिधु पूषन”
जिमि खुखद-भाव यह कि संत लोगेंति भी उसी भाँति संसार-
को दिव्य प्रकाश मिलता है, संतेसे द्वी विधि-निषेषकी प्रद्मक्ति मिलती
है, संत्तोके ही उदयास्तके तारतम्यसे सत्य, जता, द्वापरादि युरगोका
विभाग होता ऐ, संतोद्वारा ही संसार चल रहा है | संसारमें जो कुछ
थोड़ा-बहुत सुख मिल जाता हैं सो सं्तोंकी द्वी कृपाका फल है। संतोके
उदयसे ही 'नेता भद सतजुगक्ी करनी! युगपरिवर्तन हो जाता है|
इसीलिये कट्टा कि सूर्य-चन्द्रकी भाँति संत सुखद हँ | इन्दु त्मारी
कहकर यदह्द भी दिखलाया कि संतोंकी संख्या दुष्ठोकी अपेक्षा बहुत कम
शेती है; पर उनके बिना संसारका काम नहीं चलता । दु्शोक्नी संख्या
तो बहुत बढ़ी है; पर उनका उदय बहुत दिनोपर संसासके घोर कर्मोके
उदय होनेपर कुछ दिनेंक्े लिये कभी दो जाता है। साधुओंका दी
प्रकाश तीनों लोकमें फैछा हुआ है; यथा--/जग द्विंत द्वेतु ब्रिमल बिघु
पूघन! । सूर्य और चन्द्र दो्नोसि उपमा देनेसे तात्पर्य यद है कि सूर्यसे
दिनकों जगतका द्वित होता है, और चन्द्रमासे रातको, पर संतसे जगत-
का दिनरात छ्वित हुआ करता है, अतः एके साथ उपमित करनेसे
काम नहीं चलता । अथवा देखनेमें चन्द्रके समान प्रियदर्शन होते हैं, -
उनके दशशनमात्रसे पापताप दूर होता है, पर उनमें शान-सूर्यका
प्रकाश अहर्निश बना रदता है, जिनके वचनरूपी किरणोंसे मोदान्ध-
कारका नाश द्वोता है । +
शतपझ् चौपाई श्थ्ध्े
परम घंरम श्रुति बिदित अहिसा। |
पर निंदा (सम अघ न गिरीसा ॥५४॥
_. अर्थ-श्रतिचिदित परम धर्म अहिसा है, और परनिन्दोा-
के समान सुमेरसा पाप नहीं दे । |
परम घरम-भाव यद्द कि सात्तविकी श्रद्धायुक्त दृढ़ विश्वासके साथ
तथा निर्मल मनसे वेदोदित झुभ घमाचरण करनेसे जिस घमंका उदय
सांधकके हृदयमें होता है, उसे परम धर्म कहते हैँ। इसका सबविस्तर
बर्णन ज्ञानदीपक्रप्रकरणमें दो चुका है ।
अ्रति बिदित-भाव यह कि श्रतिविदित विद्याल धर्मके,लिये
प्रश्न हुआ था; यथा-- कौन धर्म श्रुति विदित विशाला? अतः उसीका
अनुवाद करते हुए, उत्तर देते हैँ | धर्मकी जिज्ञासा करनेवार्लक्रे लिये
श्रति ही परम प्रमाण है | सो परम धर्मके जिज्ञासुके लिये परम प्रमाण
देना ही उचित है |
अहिंसा-सर्वथा-सर्वदा प्राणीमात्रसे द्वोह् न करनेकों अर्टिसा
कहते हैं । अहिंसा ही सब यम-नियमोंका मूल है | जाति, देश, काल और
समयमें मी यदि इसमें व्यभिचार न हो तो यह महाजत हो जाता है।
जैसे मछवाहेका मछली छोड़कर और कहीं हिंसा न करना जातिकृत
व्यमिचार है | तीयंमें न मारना देशकत व्यमिचार है | चतुदंशी आदि
पुण्य'तिथिकों न मारना कालकृत व्यमिचार है । उपयुक्त तीनों प्रकारंसे
हिंसा यदि छूटे गयी फिर भी देव-आरह्मण-अतिरिक्त और किसीके लिये
हिंसा न करना समयक्ृत व्यभिचार है | सत्र भूमिमें सबे विधर्यो्म सर्वथा
व्यमिचार न होना ही सावंभौम अहिंसा है | यही महाजंत है। हिंसा
तीन ग्रकारकी होती है-- (१) कइता, (२ ) कार्रिता और (१):
अनुमोदिता | खर्य करना कृता, दूसरेसे करवाना कारिता और करते हुएका '
अनुमोदन करना अनुमोदिता हिंसा कहल्तती है | इनमेंसे एक-एकके
:१९७ . सप्त धन्ष
तीन-तीन भेद हैं। इनमेंसे-एक"एकके-त्तीन-ततीन-भेद-हैं। चमे-मांसके
लोभसे की हुईं छोमपूर्वक, अपकारीके साथ की हुई क्रोधपूर्वक, घरमड्टसि
की हुई मोहपूर्वक दिंसा है| इनमेंसे भी एक-एकके महु। मध्य, तीघ-
भेदसे त्तीन-तीन भेद हैं | इस प्रकार हिंसाके सत्ताईस भेद हुए। ये स्थूछ
भेद हैँ । सूध्ष्म भेदकी संख्या नहीं है। यह पॉँचव प्रश्नफा उत्तर है |
पर निंदा सम-भाव यह कि सच्चे दोपषकथनकों परिचाद। और
झूठे दोपकथनकों निन््दा कहते हैँ | पराये दोपका कहना ही बड़ा भारी
पाप है, ऐसे पापीको ही चुगुल्खोर कहते हैं, यथा--पिश्चुन पराय पाप
कहि देहीं' छठ बोलना सब पारपोंसे बड़ा माना गया है । अवीचि माम-
का सबसे नीचेका नरक झठोंके ही लिये है | अतः निन्दार्मे दोनों ही
आ गये । निन््दा करनेसे फिसीकी कीतिमयी देहका भेदन होगा, यदि
वह सम्मावित्त हुआ तो उससे उसको कोटि मरणकरे तुल्थ दारण दाह
होगा, अतः तीज्र हिंसा भी हुई परनिन्दाक्े जोड़का दूसरा पाप नहीं;
इसौलिये कद्ते हैं---
अघ न गिरीसा-भाव यह कि असत्य पर्वतकी भाँति भारी पाप
है, दूसरे पाप इसके सामने घुर्मुचीके तुल्य हैँ । यथा--नहिं असत्य सम
पातकपुंजा । गिरि सम दोई कि कोटिक गुंजा ॥! वही असत्य जब पर-,
दोषकथनसे अगुणीकृत हुआ तो वह्द पर्वतराज ( सुमेर ) के तुल्य हो
गया। अतः परनिन्दा पार्पो.मे सुमेद है, कोई महापाप अतिपाप इसके
तुल्य नहीं है । यद छठे प्रश्षका उत्तर है |
हरि गुर निदक दादुर होई।
जन्म सहस््र पाव तन्नु सोई ॥
अर्थ-हरि और शुरुकी निन्दा करनेवाला मेढक होता है.
और सहस्त जन्मतऋ चद्दी रागैर पाता खला जाता है।
इरि शुर निदक-पयहाँपर गुरु शब्दसे हरा का भी ग्रहण है;
शतपश्च चौपाई श्ण्८
क्योंकि हरिहरनिन्दाका समान पाप कहां गया है। हरि और दर सर्व-
देवमय हैं, अतः इनकी निन््दा सुननेका पाप गोघातके समान कहा गया
है । गौके शरीरमें सब देवॉका निवास दै। इसीलिये गोघातके समान
कहा, यथा---
इरि हर निंदा सुनें जो काना। होय पाप ग्रोधघात समाना ॥
शहर ही विश्वुवनके गुर हैं, यथा--
तुम बत्रिभुवन्न शुरू बंद बखाना | शान जीव पासर का जाना ॥
जीव जीवका शुरु नहीं हों सकता । शद्भर ह्वी किसी संतकी
जिह्ापर अवस्थान करके दूसरेको उपदेश करते हैं, अतः यथार्थ गुरु वे
ही हैं । उस शरीरमें अवस्थान करके शद्भुरने कल्याण किया था) इसलिये
उस शरीरका अत्यन्त आदर दे । सो गुद शब्दसे दक्ुुर और गुरु दोनों-
का अहण हुआ । फतः “हरि गुरू! कथनसे श्रीपति, शम्भु और संत
तीनोंका अहण हुआ, यथा--
संत संसु श्रीपत्ति अपवादा | सुनिश जदाँ तहँ जसि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो वसाई । श्रवन मझूँद्ि न त चलिआ पराई ॥
संत; शम्मु ओर श्रीपतिकी कीतिका गान करना चाहिये, सो
जिसने इसके विपरीताचरण किया; उनके मिथ्या दोषका गान आरम्म
किया; उसके लिये कहते हैं कि--
दाहुर होई-भाव यह कि मनुष्यशरीर पाकर उसने कोई
मनुष्योचित कार्य नहीं किया, उसकी निन्दासे हरि, हर तथा संतकी तो
कोई क्षति नहीं हुईं, पर वह व्यथेका दर्र-ठर करता रह गया, इसलिये
दूसरे जन्ममें मनुष्ययोनि छीन छी गयी और व्यर्थंकी टर्र-टरं करनेवाली
मेंढकयोंनि उसे मिली !
झन्म सहस्मत पाच-यहाँ 'सहस्त! शब्द अनन्तताका झ्योतक है ।
उसने अनन्तकी निन्दा की है, यथा “जानेसि संत अनंत समाना? |
अतः उसे अनन्त कारूतक मनुष्ययोनिकी प्राप्ति नहीं होगी। मनुष्य-
१९, सप्त प्रश्न
योनिकी पे
योनिसे ही मगवश्चरितगान हो सकता है, यही इस विशेषता
है, इस विशेषताका इतना बड़ा दुरुपयोग करनेका यह फल है कि सहर्खों
सनन््मके लिये मनुष्ययोंनिसे वह वश्चित कर दिया गया |
पाव तनु सोई-भाव यह कि वही मेंढकका शरीर पाता जायगा |
मेंदकम्म यह विशेषता है कि उसे वही शरीर पुन+-पुनः सिलता रहता है ।
गरमीके दिनमें ये सूखकर मिट्टीमें मिले रहते हैं, जहाँ वर्षाका पहछा जरू
गिरा कि ये उसी सखी देहसे फिर पेदा हो जाते हैं | कह करते हैं कि
वाजीगर छोग मेंढकौंकों खुखाकर उनकी देहका चूर्ण वनाकर रक््खे रहते
हैं, और बरसातका जल भी सुरक्षित रखते हैं | तमाशा दिखानेके समय
उस जलमें जहाँ चूर्ण छोड़ा कि मेंढक पैदा होकर टररने लगता है |
इसीलिये 'पाव तनु सोई” कहा । !
ह्िंजनिदक बहु नरक भोग करि।
जग जनमे बायस सरीर धरि॥ ५५॥
अर्थ-प्राह्मणकी निन्दा करनेचाले चहुत नरक भोग करके
संसारमे कौचेका शरीर धारण फरके जन्म लेते हैं ।
छ्विज्ञनिदक-भाव यह कि पूर्व जन्मके कर्मोके विपाकसे जाति;
आयु और भोग प्राप्त होता है | श॒माशुम कर्मोंके उत्कर्ष और अपकर्षके
तारतम्यानुसार जाति, आयु और - मोगमें तास्तम्य होता है। अपने
उल्कर्षके लिये प्रयल न करके, द्विजशरीर प्राप्त करनेकी चेश्ठ न करके, जो
इब्यावश हिजकी निन््दा किया करते हैं, वे द्विजनिन्दक हैं। कर्ममार्ग-
के दो साधन हैं--ब्रात्षण और गो। ब्राह्मणमें मन्त्र ओर गौमें गव्य निद्वितत
है | मैंस-बकरीमें मी दूध होता है, क्षत्रिय-वैदयमें भी सत्र है; पर वे
यज्ञ-्यांगादिके कामके नहीं हैं | अतः गौ-आह्मणकी निन्दा प्रकारास्तरसे
वेदमार्गकी द्वी निन्दा हुई |
चड्ड नरक भोग करि-ऐसे द्विजनिन्दर्कोंकी बहुत प्रकारके
इतपश्च चौपाई २०७
नरक भोंगने पड़ते हैं; वर्योकि उन्हींने अपने पूज्योक्री निनदा की । उनकी
कीर्ति$मीयी देहका नाश चाहा । उनके परृण्योपाजित उत्कर्षकों न सहकर
गालके बछसे उनके. अपकर्षकी चर्चा फैछाकर ल्ोगोौकों भी वेदमागसे
परिश्रष्ट करना चाह्दा | मदसे प्रेरित होकर कर्ममार्गके उच्छेदर्म दत्तचित्त
हुए । अतः उन्होंने नरकके चारों रास्ते--काम, क्रोघ। मद और लछोभकों
अपना लिया; यथा--कास क्रोध मद छोभ सब नाथ नरकके पंथ ।*
अतः उनक्रों बहु नरक भोग मिलना न्यायोचित है ।
जग जनमै-माव यह कि नरक मोगनेके लिये यातनाशरीर
मिल्ता है, जो छोकोत्तर पीड़ासइनके समय टिक सके, यथा--'जानत
हों बिधिने दयो यह जातना-सरीर! | नरकमोंग समाप्त होनेपर बह
यातनाशरीर नष्ट हो जाता है, और उसी नरकभोगके संघ्कारानुकूछ
उसे संसारमें जन्म लेना पड़ता है। जिठ माँति पात्रमेसे थी निकाल लेने-
पर भी उस पाज्में घीका संस्कार रहता है, उसी भाँति पुण्यपाप-
का भोग समाप्त होनेपर भी उनका संस्कार रह जाता है। उसी संस्कारो-
चित योनिमें फिर जन्म होता है ।
चायस सरीर चरि-भाव यह कि द्विजनिन्दर्कॉंकी अपना बड़ा
भारी पक्ष रहता है, उसके आगे वे वेदशासत्रका अनादर करते हैं, और
खय॑ नवीन घमशाजकर्त्ता बननेका दावा कर बैठते हैं, जातिपाति तोड़
डालनेकी अनेक चेश्लाएं करते हैं, यथा--
सठ स्वपच्छ तब हृदय बिसाला । सपदि होहु पच्छी चेडाला ॥
सत्य चचनपर विश्वास नहीं करते, कोएकी तरह डरा करते हैं
कि कहीं ऋषियोंने वेदशास्त्र ्राह्षणोंके लामके लिये तो नहीं बनाया,
यथा---
सत्य बचन विस्वास न करई-। बायस इच सबहीते डर ॥
वे अपनी कार्यसिद्धिके लिये अनेक प्रकोरका' छल करते हैं;
उत्कट रागद्वेंषसे उन्तकां हृदय मल्न रहता है, विद्वान ब्राह्मपोपर तथा
२०१ ” ' ख् अच्च
खय्य अपने प्रच॑पुरुणोपर भी उन्हें प्रतीति नहीं होती, यथा--छली
भछीन न कतहु प्रतीती' | चाबसगुणरुम्पन्न होनेसे उन्हें वही छरीर
मिलता है।
सुर श्रुति निदक जे अभिमानी ।
रोरबव नरक परहिं ते प्रानी ॥
अर्थ-ज्ञो अभिमानी प्राणी देवता और चेदके निन््दक हैं,
थे रौरव नरकमें पड़ते हैं ।
सुर श्रुत्ति निंद्क-वेद दी आदिशाश््र है; वेदके शानसे .ही
संसारमें प्रकाश ऐ, जितने प्रचलित मत हूँ उनमेंसे यदि बेदोदित धर्म
निकाल लिया जाय तो उनमें कुछ भी नहीं रह जाता, अतः वे सब वेदो
पजीची दूँ । उस परमेश्वरके आदि उपदेशकी जो निन्दा करता है, वह
श्रुतिनिन्दक है। वेदप्रतिपाग् देवता छोग ही इस संसारके अधिकांरी
( ई४रसे नियुक्त अफसर ) हूँ, चारों ओरसे विश्वकी रक्षा किया करते हैं,
यथा--
शराब सास पवन चरुन 'धनथारी । अशिन कार जम॑ सब अधिकारी |
जे अभिमानी प्रानी-भाव यह कि ऐसे वेद और देवोंकी
निन्दा अधम अभिमानी दी कर सकता है। जिस सूर्यके अनुग्रहसे चह
देखता है, जिस चन्द्रके अनुग्हसे मनन करता है, जिस पवनके अनुप्रहं-
से उसके शरीरमें श्वास चलता है, जिस कुबेरकी कृपासे उसे धन प्राप्त
है, जिस अभिक्री कृपासे उसे वाणी मिली है, जिस कालीकी #पासे
उसका जीवन है, जिस यमके अनुप्रहसे अवाघित जीवन ब्यत्तीत कर रहा
है, उन्हीं देवताओंकी मिन््दा करनेवाले, और जिस शानसूर्यससे उसे
ज्ञानप्रकाश मिल रहा है, उसकी भी निन््दा करमेवालेक़ो सिवा सैर
नरकके और स्थान कहाँ है १
ते सैरव नरक परद्धि-यहाँ रौरव शब्द उपलक्षण है, रौरव;
शतपथ्व चौपाई २०५
महारौरव; काल्यूत्, अन्चतामिसश तथा अवीचि सबका बोघक है!
अवीचि अन्तिम नरक झर्ठोंके लिये है, वहाँतक उसे जाना ही है; अतः
सैरवसे आरम्म करके अवीचिमें स्थिर होता है; वहँसे निकलनेकी
अवधि भ्रन्थकार नहीं देते ।
होहि उल्रूक संत निदारत।
मोह निसा प्रिय ज्ञान भानुगत ॥५६॥
अर्थ-संतकी निनन््दार्मं छगे हुए उत्ल्यू (घूक ) द्वोते हैं,
उन्हें शानभानुके अस्त दोनेपर जो मोहनिशा होती है, वही
प्यारी है।
संत निदारत-जो इतने बढ़े उपकारी हैं, जिनके रामचरिता-
भृतकी वर्षा करनेसे जगत् छावित हो रहा है, जिनके सदगुणोंसे संसास्में
मज्ञक है, उनकी निन््दामें जो खछ छगे हुए हैं वे संतनिन्दारत हैं ।
भाव यह कि संतोंका यश क्रिसीके रोके नहीं रुकता; पर वे उसके
रोकनेमें भी कुछ उठा नहीं रखते, दिनरात यत्ञशील रहते हैं ।
शान भाजुगत-भाव यह कि झ्ञान सूर्य हैं, इनके रहते अविद्या-
निशा आ नहीं सकती । सो यद अभागा संतोंके विरुद्ध हों गया ।
संतका ही ज्ञान भाठु है और उन्हींके वचनप्रकाशसे दृदयकली
विकसित होती है, यथा ६ जासु ) ज्ञान रवि भव निसि नासा ।| बचन
किरिन मुनि कमछ विकासा ॥)? इसे संतोंके वचन नहीं रुचते, इसीलिये
च्ञान भानुगत' कहा |
मोह-निसा-प्रिय-यह अविद्यान्धकारमें ही रहना चाइंता है;
यही इसे प्रिय है, और संत उसके नाशक हैं, इसीसे उसे संतोसे द्रोह
है । संतोंका कुछ कर तो सकता नहीं, अतः निन्दा ही करता फिरता है;
छोकमतकी उनके विरुद्ध खड़ा करनेका प्रयत्ष करता है ।
२०३ . सप्त प्रश्न
द्ोहि उल्धक-भाव यह कि जो जैसा चाहता है; पैसा ही बह हो
जाता है; यथा--'जाकर जापर सत्य सनेहू | सो तेदि मिले न कछु
संदेहू ॥? संतनिन्दक प्रकाश नहीं चाहता, अन्धकार चाहता है। इसी-
लिये उसे उल्डक्की योनि मिलती है । मानसिक जगतूमें जिसे शान और
अशान कद्दते हैं, वही स्थूठ जगतमें यथासंख्य प्रकाश और अन्धकार
है। इस भाँति उल्दयोनि-प्राप्िकों दण्ड भी कद्दा जाता ऐ। पर वस्तुत+
यह्द संतनिन्दकके चाह्दे हुए कर्मका चास्तविक परिणाम है | इसी भाँति
मनुष्ययोनि पाकर जिसने वस्तुतः थुरी चस्तु चाह्दी वह अपने द्वाथ
नस्कमें सीढ़ी लगाकर उत्तर गया | यह्ट उसके कर्मका वास्तविक परिणाम
है, कोई दूसरा उसे दण्ड देने नहीं गया ।
सबकर निंदा जे जड़ करहीं ।
तेन्ह चमगादुर होइ अबतरहीं ॥
अर्थ-जो अशानी सबकी निन्दा करते हैँ, थे चमगीदड़
दोकर नीचे गिरते हें ।
सवकर निदा-भाव यद्द कि हरि, गुर, दिज, सुर, श्रुति और
संत इनमेंसे एक-एकक्री निन्दा करनेवालेकी गति प्ृथक्-प्रथक् कहकर,
अब सबकी निन््दा करनेवालेकी गति कहते हूँ । सबकी निन््दा करनेवाहछेमें
उपर्युक्त चार्े प्रकारके निन््दर्कोके दोष मौजूद हैँ ।
जे अड़ करदी-माव यद्द कि उसे चेतनोंपयोगी शरीरमात्र किसी
भँति मिल गया है; पर है यह बड़ा भारी जड़, उसकी सोलहों आने
प्रवृत्ति जड़ताकी ओर है, वद्द आत्मघाती है, यथा--
ते जद जीव निज्रातमधाती | जिनहिं न रघुपति कथा सोहाती ॥
तेन्द्र अवतरहीं-उनका पतन होता है, अथवा वे मनुष्यदेहकी
सीढ़ी लगाकर खय॑ अधम पक्षीयोनिमें उतरते हूँ | जब किसोकों निन्दा
'शतपश्च चौपाई र०छ
करते देखो तब इन चौपाइयोंसे ठीक कर को कि ऐसा निनन््दक किस
योनि उत्तरनेके लिये सीढ़ी लगाये है |
“*' खमगाडुर दोइ-भाव यह कि चमगाइुर देहमें ही उपर्युक्त चारों
'निन्दकोकी ग्रवृत्ति चरितार्थ हो सकती है। चमगादुर मेंढककी भाँति
सदा व्यर्थ शब्द किया करता है; कोएकी भोति छली, मल्ति और
अविश्वासी होता है; मुखसे ही सल्त्याग करता है; उलदा छथका रहता
है, इस भाँति जीते ही नरक भोंगता है, उल्दकी माँति उसे अन्धकार ही
पप्रिय है, अतः सबकी निन््दा करनेवालेकों चमगादड़की योनि मिलती
है | पापियोंके मुकुटसाण होनेसे उनके जन्मकों अवतार कह्दा। छटे
प्रश्षका उत्तर समाप्त हुआ ।
सुनहु तात अब मानस रोगा |
जिन्हते दुख पावहिं सब लछोगा ॥५०।
शर्थ-हे तात | अब मानस रोगोंकी झखुनो। जिनसे सब
छोग दुःख पाते हैं ।
खुनडु ताल-भाव यह कि 'सानस रोग कहहु समझाई” इस
अत्यन्त आवश्यक खातवें प्रभका, जिसका भवसागरसन्तरणसे सम्बन्ध
है, उत्तर दे रहे हैं; इसलिये शोताकों पुनः सावधान कर रहे हैं ।
अब मानस रोगा-भाव यह कि सूक्ष्म शरीरके रोगोंको अब
कहता हूँ । थोड़ेगें समझानेके लिये शारीरिक रोगेसि उनकी तुलना करता
9०.4 हे गरनभक्तिमेद सातों
जाऊंगा । पूर्त संवाद शानमक्तिमेदप्रकरणमें ही इन सातों प्रभोके वीज हैं ।
खात्विक श्रद्धा घेु सोहाई । जी हरि कृपा छृदय वस आह ॥
छुननेपर यह प्रश्न चित्तमें उठा कि दुर्लम गतिके साधनके उपयुक्त
कोन शरीर है !
तब फिर जीव विविध बिभि पावै संस्ति झछेस ॥
मरे०५- खसप्त प्रश्ध
सननेसे यह दूरुरा प्रश्न उठा कि बड़ा दुःख कौन हैं। गरुड़जी'
पक्षियोक्कि राजा हैँ, राजाओंका सीमापर बहुत ध्यान रहता है; अतः सातों;
प्रश्न सीमासम्बन्धी दी किये | (तथा मोंच्छसुख सुनु खगराई” से यह.
तीसरा प्रश्न उठा कि 'कीन सुख भारी है !! 'सो बिनु संत न काहू पाई?
से चौथा प्रश्न उठा कि संत-असंतका स्वभाव कैसा होता है! “परम
घर्ममय पय दुष्टि भाई! से पाँचवाँ प्रभु उठा कि परमधर्म क्या है !-
उसीके सम्बन्धसे छठा प्रश्ष उठा कि कौन अघ परम कराल हैँ; और
“्यापदिं मानस रोग न भारी' कहनेसे यद्ट प्रश्न उठा कि मानस रोग
क्या दूँ ! यह प्रश्न श्रोताके मनमें पहले ही उठा था, पर प्रभ्षके ऋमके
अनुसार अब उत्तर देते हूँ ।
जिन्ददते दुख पावहदिं-भाव यद कि कोई एक शारीरिक रोग
किसीको ऐता है पर सभी मानस रोग न्यूनाधिक मात्ना्में सबको होते हूँ ।
अतएव सब रोग मिलकर सबको दुःख देते दूँ ।
सब छोगा-भाव यह है कि सबके सानसिक्र शरीरकी दक्शा बड़ी
भयावद्व है। शूल अल्ग उठा हुआ एै, दाद और खुजली अलग खुजा
रहे है, ग्रदोंद्वारा उन्माद हो रहा है, क्षयीकी खाँसी अलग जोर बाँघे
हुए है, कुछसे शरीरकी घोर दुर्गति है, उडमखआ और नहरुआने अलूग
पर पसार रक््खा है, पेट अलग बढ़ा चछा जा रहा ऐँ। यहद्द दशा
न्यूनाधिक सभीकी हू । -
मोह सकल व्याधिनकर मूला।
तेहिते पुनि उपजे बहु सूला ॥
अर्थ-सखव व्याधियोंका मूल मोद्द है; उसीसे अनेक प्रकार-
के शूल उठते हैं ।
सकल ब्याघिनकर मुला-भाव यह कि व्याधियों 'ती ,अनेक
हैं, पर मूल सबका एक है | यहाँ (सब व्याधियोंसि तात्पर्य” दारीरिक
शतपशथ्च चौपाई घ०६
और मानसिक दोनों प्रकारकी व्याधियोंसे है। रोगविशान (१) निदान,
(२) पूर्वरूप, (३ ) रूप, (४) उपशय और (५) सम्परासिसे
होता है | यहाँपर यथासाध्य निदान, रूप और उपशय कहा जायग्रा;
पूर्वरूप और सम्पातिका अनुमान कर लेना पड़ेगा |
मोद्द-भाव यह कि सम्पूर्ण मानसिक रोगेंका मूल अज्ञान है; और
सम्पूर्ण शारीरिक रोगोंका मूल म्रशापराघ है, सो प्रशापराघ मी अक्ानके
ही अन्तर्गत है, अतः सत्र व्याधिययोंका मूल मोह! ही हुआ ।
पुनि तेद्दिति-माव यह कि ग्रशापराघते मिथ्याद्वार-विहारका सेवन
होता है, और उससे आठ प्रकारके शल होते हैं । इसी मोॉति अज्ञानसे
विषथर्म प्रहत्ति होती है, ओर उस य्रवृत्तिसे मानसिक झूछ उत्पन्न होते हैं।
उपजे बहु सूछा-भाव यह कि शारीरिक झूलकी तो गिनती
कर ली गयी कि आठ प्रकारके होते है पर मानसिक झूलोंकी गिनती
नहीं हो सकती |
काम बात कफ लोस अपारा।
क्रीध पित्त नित छाती जारा ॥ष<॥
अर्थ-काम चात है और अपार छोम कफ है और क्रोच
नित्य छाती जलानेवाला पिच है।
काम बात-भाष यह कि यद्द स्थूछ शरीर वात, पिच और
कफसे दी धृत है, परन्तु ये ही वात, पिच, कफ जब साम्यावस्था छोड़कर
कुपित हो जाते हैं, तो शरोरमें रोग उत्पन्न करते हैं; इसी माँति यह
मानसिक शरीर भी काम ( राग )) क्रोध ( द्वेंप ») और छोम ( तृष्णा )
से घृत है, परन्त ये ही काम, क्रोष, छोम जब उचित बर्तीवकों त्यायकर
दुष्ट होते हैं, तो अमेक मानसिक रोगके कारण होते हैं| इनमें कामकी
उपमा वातसे दी गयी है । पिच पहु है, कफ पह्ु है, वातमात्र गति-
गीछ है। यह जदाँ-जहाँ पित्त-कफको ले जाता है, वहीं ये बादलकी भाँति
२०७ सत्त प्रश्च
जाकर चर्षा करने रूगते हैँ | इसी भाँति मानसिक द्ारीसरमें काम है; यही
क्रोध और छोभका नेता हैं !
कफ लकोस अपारा-कफकों अपार कहट्दा, क्योंकि इसका पार देही-
को नहीं लगता, अन्तर्म कफ दी प्राणवियोगका देतु होता है, मरणासन्न
अवस्थामें कफ घेर लेता है, और फिर उसे मनुष्य नहीं उछंघन कर
सकता । इसी भाँति मानसिक दरीरमें छोभ है, ठोमका भी पार नहीं है;
अनेक ब्रद्माण्डका प्रभुत्वत भी मिल जाय तो भी तृत्त नहीं होता | छोभसे
ही मनका पतन दोता दे । छोभ पापका बाप कहा गया है ।
ऋोषघ-सुखप्राप्तिम बाधा पड़नेसे क्रोध द्ोता है। क्रोचकों अमि
कद्दा गया है । सचमुच क्रोधी आगवधूठा हो उठता है, शरीर जहने
डगता है, भ्रम द्योता है; मूर्छा होती है, बहुत बड़े-बढ़े उपद्रव क्रोधमें
दोते हैं ।
पिच नित छाती जञारा-पित्त भी अप्नि है। यद्द कुपित होकर
कलेजेमें दाह उत्पन्न करता है, शरीर जलने छगता है, भ्रम होता है;
मृछा दोती है, जब्रतक पित्तका वेग है तवतक छाती जलती ही रहेगी।
अत्तः डे भाँति स्थल शरीरमें पिच है, उसी भाँति मानसिक शरीरमें
क्रोध दे |
प्रीति करहिं जो तीनिड भाई |
उपज. सन्निपाता दुखदाई॥
शर्थ-यदि तीनों भाई प्रीति करें, तो दुखदायी सन्निपात
उत्पन्न होता है ।
सीमिठ भाई-भाव यह कि ये तीनों चात, पित्त, कफ भाई हैं,
उसी दारीरमें रहते हैं; पर तीनों प्रीति नहीं करते। अकेले ही रोग
उत्पन्न करनेमें समर्थ हैं, या दो-दो मिलकर रोग उत्पन्न करते हैं अर्थात्
बातपित्तप्रघान; कफपित्तप्रधान, वातकफप्रधान होकर रोग उत्पन्न करते हैं |
शतपशथ्व चौपाई श्ण०्८
प्रीति करहि-भाव यह कि यदि आपसमें प्रीति करके तीनों प्रधान
हो जायें तो मनुष्य कालवश हो जाता है। इसी भाँति कोई कामी, कोई
कॉंधी और कोई छोमी होता है | किसीमें काम-क्रोंघ दोनों बढ़ जाते हैं,
किसीमें क्रोध-छोम; किसीमें काम-छोम हो जाता है । यदि काम-क्रोध-छोम
तीनों बढ़ें तों मानसिक शरीरका पतन अभिवाय है ।
: छुखदाई सन्निपात उपजै-तीनोंके प्रीति करनेपर अभिन्यास
सन्निपात पैंदा होता है । यह महा दुःखदायी है; प्राण छेकर ही छोड़ता है;
किसी एक दोपके न्यून रहनेपर बचनेकी आशा रहती है । सन्निपातमे
प्रताप भी होता है | ठीक यही गति मानसिक सन्निपातका भी है, यथा-
संन्निपात जब्पसि दुर्वाद्ा। भएसि कालबस सठ भमज्जुजादा ।
बिषय मसनोरथ दुर्गोंभ नाना।
ते सब सूल नाम का जाना।॥ ५६ ॥
., भर्थ-विपयके अनेक डुर्गम मनोरथ ही शूल हैं, उनके नाम
कौन ज्ञान सकता है ?
नाना विषय मनोरथ-यत्पि विषय पॉच माने गये हैं---
(१ ) शब्द, ( २) स्पर्श, (३) रूप (४) रसऔर ( ५ ) गन्ध, पर
एक-एकके सहस्तों भेद है। विषय-भेदसे मनोरथके भी असंख्य भेद हों
गये हैं |
: ।/'छुर्गम-भाव यह कि एक विधयकी ग्राप्तिसे सन््तोंष नहीं होता;
मनोरथ बना ही रहता है, तिसपर ऐसे-ऐसे अप्राप्य विषयोंका मनोस्थ
उठतह है, जो सर्वथा असाध्य हैं। ये मनोरथ ही झूल हैं | तृप्ति होती
नहीं; चाह बढ़ती जाती है; वाघाओंकी कमी नहीं रहती ।
ते खब खूल-भाव यह कि . एक भी सनोरथ सुखदायी नहीं ।
सक्के संत. दुःखदायी हैं | प्रनोरथ ही दुःखरूपमें परिणत ह्वो जाते.हैं.।.
२०९, सप्त प्रश्ष
यद्यपि वातकृत झूछ, कफकृत झल) पित्तकृत झूलके एयर प्रथक् लक्षण
है, पर सर्बोका प्रभु वात ही है । इसी भाँति यूक्ष्म शरीरमें भी कामकृत
मनोर॒थ) क्रोषकृत मनोरथ, छोभकूत मनोरथ प्रथकू-पृथक् हैं, फिर भी
सबका प्रभु काम ही है |
नाम को ज्ञाना-भाव यह कि संख्यामें इतने अधिक हैं किन
इनका प्रथक् माम कोई रख सका, और न कोई स्मरण ही कर सकता
है। जब नाम ही नहीं रवखे गये तो कोई कैसे जान सकता है !
ममता दादु कंड इरपाई ।
हरष बिषाद गरह बहुताई॥
अर्थ-मम्तता दाद और ईरपा खुजली दे, हपे और विषाद
चहुत-से अद्द हैं |
ममता दाइु-ममताकों दद्गुरोग (दाद ) कहा है। दद्वु-
मण्डछ% छाल द्वोता दे भौर उसमें खाज होती है | इसकी गिनती श्षुद्र
कुएमें है । इसके खुजानेमें बड़ा सुख मिलता ऐ) जितना खुजाया जाय
उतनी ही खुजानेकी इच्छा बढ़ती जाती है| पीछेसे बड़ा कष्ट होता है ।
शरीरके मलसे उत्पन्न जूं, लीख आदिसे यह दद्गुमण्डलवाली फुनसी
होती है ।
ममताकी भी यही दद्शा है । ममता भी मनकी छ्ुद्र दुष्टता है।
ममताके संघर्षमं बड़ा सुख मिलता है; और बढ़ता ही जाता है पर अन्त-
भें बड़ा कष्ट होता है | शरीरसे उत्पन्न बार-बच्चे तथा सम्बन्धियोंमें
ममता द्वोती दै इसीलिये ममताको दद्गुरोग कहा ।
कंडु इरपाई-कण्ड्में। छोटी-छोटी बहुत-ली फुनसियाँ होती हैं,
# सकण्ड्रायपिटिक ददुमण्डरुमुद्ृतम् । ( माधवनिदान )
+ नामतो विंशतिविधाः बाह्यास्तत्र मलेद्धवाः ।
तिलप्रमाणसंखानवर्णा:... केशाम्बराअबाः ॥
श्छ
शतपश् चौपाई - २१०
उनसे स्व मी होता है, खुजली होती है; दाह होता है । यद्द भी क्षुद्र
कुष्ठ है; जूँ और लीख इसके भी कारण हैं। दाद और ख़ुजलीमें भेद
यह है कि खुजछीमें छोटी फ़ुनसियोाँ बहुत होती हैं | पर उनका कोई
भण्डल नहीं होता, दादमें मण्डल होंता है। खुजलीमें दाह होता है,
दादमें नहीं होता #। २
दूसरेके उत्कर्षकों न सहना ही ईर्षा है। ईषांके विषयोकी कमी नहीं
इसीसे छोटी-छोटी फुनसियोंकी माँति मानसिक शरीरमें विकार होता
है, और उन विकृत स्थलोंसे मल्खाय होंता है। ममतावाली वस्तुएं
अपने गोंछ ( मण्डल ) की हैं, ईर्षावाली नहीं हैं इसलिये ईर्षा (कण्डु)
में सण्डल नहीं होता । ईपामें दाह होना तो स्वाभाविक ही है| इस
लिये ईर्षाकों कण्डु कहा |
हरपष विषाद गरह बहुताई-इष्प्राप्ति या इष्प्राप्तिकी आशासे
हर और इश्टके वियोंग तथा वियोगके भयसे विघाद होता है । हष-विषाद
भी मनोविकारविश्ेप हैं | हर्ष और विधादमें मनुष्य उन््मत्त हों जाता
है | इसीलिये इनको उपमा अहकी बहुताईसे दी है।
वैद्यकर्में देव, असुर, गन्धव, यक्ष, पिशाच, राक्षसादि बहुत-से
अह कहे हैं|; जो उन्माद उत्पन्न करते हैं, क्रिसी ग्हमें मनुष्य हर्षित होता
है और किसीमें विषघादयुक्त होता है, पर है उन््माद ही । जिस माँति
उन्मादमें मनुष्य उत्तम; मध्यम, निक्ृष्ट चेष्टाएँ प्रहोंकी प्रकृतिके अनुसार
बहुपादाश्व सूक्ष्माश्थ यूका लिक्षाश्व नामतः।
द्विवा ते कोठपिडिकाः कण्डूगण्डान् अकुवंते ॥ ( माधवनिंदान )
# सूक्ष्मा वहयः पीडकाः ज्लाववत्यः वामेत्युक्ताः कण्डुमत्यः सदाहाः ।
( माधवनिदान )
+ देवथदा:. पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि ।
गन्धवां: प्रायशोष्टम्यां यक्षाश्प्रतिषथ्रथ ॥ इत्यादि
(साधवनिदान )
२११ ४ सप्त परश्ष
करता है, पर वे सत्र चेष्टाएं उन्मत्तचेश ही हैं। इसी माँति उत्तम;
सध्यस, अधम इशनुसार हर्ष-वषादकी अनेक चेशएँ होती हैं, पर वे
सब चेष्टाएं उनन््मचचेष्टाकी भाँति परिणाम दुःख देनेवाली हैं । इसी-
लिये इर्ष-विधादकों भ्रहकी वहुतायत कह्ा |
परसुख देखि जरनि सोइ छई।
कुष्ट दुष्तता मन कुटिलई ॥६०॥
अपं-पराये खुखको देखकर जो जलन द्ोती है, उसे क्षयी
रोग ( समझिये ) और दुश्ता तथा भनकी कुढिलता कुछ
रोग है।
परखुख देखि जरनि-भाव यह कि जिससे पराया सुख देखा
न जाय, देखते ही जिसे जलन पैदा हो, उसे समझिये कि बड़े दुःखर्मे
फँस गया; क्योंकि यह तो संसार है, किसीकों रुख किसीकों दुःख बना
ही रहता है, और वह सुख देखकर जज करता है, इसलिये ऐसा कोई
समय दी नहीं हो सकता जब कि उसे जलन न रहे | इस जलनसे उसके
सदगुणणोंक्री दिन-रात हानि होनी आरम्म हो जाती है और अस्तमें समी
सदगुणंसि रहित हो जानेपर उसका घोर पतन हो जाता है।
खोइ छई्द-ऐसे जलनेवालेकों समक्ष लीजिये कि राजयक्ष्मा ( क्षयी )
की बीमारी हो गयी, उसे सदा ज्वर बना रहता है, अनेक उपद्रव उठ
खड़े होते हैं, और अन्तर्म प्राण लेकर ही छोड़ती है। इसीलिये पर-
सुख देखि जरनिको श्षयी कहा । क्षयी छः प्रकारकी होती है । शत्रु भी
छः दी माने गये ई इसलिये क्षयीका छः प्रकार होना युक्तियुक्त है |
कुए-यह रोग सब रोगोंसे विशेष छुणित है। इससे शरीर ही
विगड़ जाता है | कुष्ठीकों कोई शरस नहीं बैठने देवा, उसके शरीरसे
डुर्गन्धि आती है ।
शतपच्च चौपाई २१२
डुएता मन कुटिलई-मनका दोधप्रयुक्त होकर सरल्ताका त्याग
करना; अर्थात् मनमें दूसरी बात और वाणी तथा कमंसे दूसरी बात
प्रकाशित करना कुछिल्ता है। भाव यह कि कुण्लिता ही छुछ्ठ है !
कुटिलका दुर्नाम हो जाता है, कोई उसके साथ व्यवहार नहीं चाहता;
उसका पतन बड़े दुःख और दु्नामके साथ होता है | इसलिये कुटिल्ता-
को कुष्ठ रोग कहा । कुछ्ठीका संसर्ग करमेसे दुसरोंकों भी यह बीमारी हो
जाती है
अहंकार अति दुखद डमरुआ |
दंस कपट मंद मान नहरुआ ॥
अर्थ-अति छुश्ख देनेवाला अहंकार डमरुआ रोग है (कर)
दुग्स, कपट, मद और मान नहरुआ है ।
अहंकार अति दुखदू-भाव यह कि अहंकारसे बड़ा दुशख होता
है। उसका रूप बेठंगा हो जाता है । उसकी शक्तल देखमेसे लोगोंको
चिढ़ होती है । रोग बढ़ जानेसे प्रत्येक व्यवह्यस्म उसे बड़े-बड़े कष्ट
होते हैं ।
डमरूआ-पं० भगवतीप्रसादमिश्नजी भदेनी काशीनिवासी एक
अनुमवी इद्ध वैद्य हैं। उनका मत है कि डमरुआ गलूगण्ड रोग है।
(निवद्धश्वयथुय्य स्व मुष्कवक्लम्बते गले! यह गलगण्डका लक्षण है । बंघा
छुआ शोथ जो गलेमें मुष्ककी भाँति लूटकता है, उसे गछगण्ड कहते
हैं | मुष्का साधदइय डमरूसे है; उसकी माँति होनेसे इस रोगकों
डमरुआ कहे जानेकी बहुत सम्मायना है। छक्षण भी मिछता है।
गलछगण्डके रोगीको सूई चुमानेकी भाँति पीड़ा होती है, उसका रूप
अभिमानी-सा दो जाता है, उसको देखनेसे छोगोको चिढ़-सी मादूम होती
है । रोग ब्रढ़ जानेसे श्वास लेनेमें पीड़ा होती है । इसलिये अहंकारकों
“डमझुजा' कहा ।
श्श्छे ' सप्त प्रश्न
धंभ कपट मद सान-ढकोसछा, छछ, गरमी; एंठ ये सेब
परस्पर सम्बंद्ध होकर एक सूज़में परिणत हो जाते हैं । रोगीकी प्रगतिसे
इनका प्रकाश हो जाता है | ये बढ़ते ही जाते हैं, बड़े यजसे इनकी
रक्षा करनी पड़ती है; यदि भज्ञ हुआ तो बड़ा भारी दुःख होता है।
नदरूआए-यद रोश राजपूतानेकी ओर द्वोता है । इसे स्नायुज
कहते हैं । दोष कुषित होकर शोथपूर्वक पैरमें घाव करते हैँ | उस
घावमेंसे अनेक कीट एकन्नित होकर सुन्नाकारमें बाहर निकलते
हैं और बंढ़ते जाते हैं, बड़े यक्षसे उस सूत्रकी रक्षा की जाती है। यदि
किसी प्रकार द्वव जाय तो बढ़ा अनर्थ करता है। इसीलिये 'दंभ कपट
मद मान नहरुआ! कहा ।
तृस्ना उदरचृद्धि अति भारी।
त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी ॥६१॥
अर्थ-अति भारी उद्रबृद्धि द्वी रृष्णा है, और तीनों
पपणाएँ तिजारी हैं ।
तस्ना-विषय-प्राप्तिकी प्यासको तृष्णा कहते हैं। यह प्यास मिटती
नहीं, दिमपर दिन बढ़ती जाती है। शरीर घटता जाता है, बल क्षीण
हुआ जाता है; पर तृप्णाकी चद्धि नहीं रुकती | इसी भाँति जिसको
उदररोग हो जाता है, उसका शरीर घटने लगता है, बल क्षीण होने
लगता ऐ, पर उदर बढ़ता ही जाता है| उदरकी अति इद्धि हो जामेपंर
इतिश्री दोती हे ।
जिविध ईपना-भाव यह कि एपणा तीन हैं, यथा--
सुत्र बित छकोक इपना तीनी । किनकर मति इन्द्र कृत न मलीनी ॥
तखून तलिज्ञारी-भाव यह कि शुरूनशुरूमें जब तिजारी आती है
तो बड़े वेगसे बड़ा जाड़ा देकर आती है; पीछे उसका वेग क्रमश) कम
होने लगता है | इसलिये तरथ तिजारी कहा | तिजारी जल्दो छूटती
शातपश्च चौपाई २१४
नहीं; एक दिन अन्तर देकर आती है। इसके तीन भेद शाख््रकारोंने
माने हैं । इसी भाँति सूक्ष्म झरीरमें एपणा बड़े वेगसे आती है, और
बड़ी जड़ता उत्पन्न करती है। इसका छूटना मद्दा कठिन है | बीच-
बीचमें शान्त भी हो जाती है; पर फिर आ जाती है | सुत; वित और
लोकभेदसे इसके भी तीन प्रकार हैं |
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका |
कहँ लगि कहों कुरोग अनेका ॥६५२॥
अर्थ-मत्सखर और अविवेक दोनों प्रकारके ज्वर हैं, कद्दाँतक
कहूँ अनेक कुरोग हैं ।
झुग विधि ज्वर४#--भाव यह कि ज्वरके दो भेद हैं--( १ ) माहेश्वर
और (२) वैष्णव । इन दोनोंके अवान्तरभेद बहुत हैं, यथा--
मद्देश्वर ज्वर्के आठ भेद हैं--( १) वातज्वर, (२ ) पित्तज्वर, (३ )
कफज्वर। (४) वातपित्तज्वर, (५) वातकफज्वर, (६ ) पित्तकफ-
ज्वर; ( ७ ) सन्निपात और (८ ) आगन्त॒ज ।
वेष्णव ज्वस्के पाँच भेद हैं--( १) सतत; (२) संतत, (३ )
अन्येयु, (४) ठृतीयक और (५) चठर्थक | इन भेदोंके भी उपभेद
हैं । वेष्णव ज्वर्कों विधम ज्वर कद्दते हैं | पहिले माहेश्वर ज्यर रुद्रकोंप-
से उत्पन्न हुआ | फिर उससे भी बली पीछेसे वैष्णव ज्वर भ्रीकष्णसे
उत्पन्न हुआ | यह ज्वर घाठुगत होता है ।
मत्सर अविवेका-भाव यह कि जिस भाँति स्थूल शरीरमें ज्वर
और विषम ज्वर होता है, उसी माँति सूक्ष्म शरीरमें अविधेक और
# देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वेरोगाअनो.. बली ।
ज्वरः प्रधानं॑ रोगाणामुक्तो भगवता पुरा॥
+ दोषोल्पो5हिंतसम्भूतो ज्वरोत्सटस्स वा पुनः ।
धाठुमन्यतर्म॑ प्रापष्य करोति विपमज्वरम् ॥
रश५ सप्त पश्ष
मात्सयं# है। जिस माँति ज्वर देहेग्दियमनस्तापी सर्वरोगाग्रज और बली
, उसी भाँति अधिवेकसे भी देऐन्द्रिय-मनकों ताप पहुँचता है, यथा-पर
मत्सर| स्वमावगत होकर संतत ताप पहुँचाया करता है, इसीसे इसकी
उपमा विषम ज्वरसे दी गयी | इसी भाँति यदि विचार किया जाय तो
सम्पूर्ण मेदोपभेद, अवान्तरभेदोंके साथ जिस भाँति शारीरिक ज्यर्का
पिस्तार वैयकशान्न्म है पैसे पी विस्तार्फे साथ मानसिक ज्वरोंके भेद
कहें जा सकते है ।
फ्ँ लमि कहों-भाव यद्द कि समझनेके लिये इतना बहुत है |
निदान सब रोगोंका एक ही है, और उपदशय भी मुझे एक ही कहना
है, दिग्दशनके लिये न्यारद् रोगेंका परिचय भी दे दिया। अब इस
विययको वूल देना व्यर्थ ऐ ।
कुरोय अनेक्ता-साव यद कि सुरोग तो मैंने कद्ा नदी, क्योंकि
उन्हें भागे चछकर कहना एँ, केवल कुरोग कहना था, वे भी बहुत है ।
जिसकी दवा न हो बही कुरोग ऐ, यथा--
एद्वि करोगकर सोपध भाद्धी।
दो०-एक व्याधिवस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीडहिं संतत जीव कहूँ सो किमि छहे समाधि॥
सर्थ-एक व्याधिके घहामें पड़ जानेसे आदमी मर जाता
है, ये तो असाध्य व्याधियाँ हैं, और भनेक हैं। ये खदा जीवों-
को पीढ़ा दिया करती हैं फिर जीव समाधिको केले प्राप्त हो ?
एक घब्याधियस-भाव यद्द कि व्याधिकी तीन दशाएँ होती हैं---
सुसाध्य, कष्टसाध्य और असाध्य | सो मनुष्य तमीतक जीता है, जबतक
ब्याधिके वशमें नहीं आ गया। व्याधिक्रे यशर्मे आ जानेपर फिर नहीं
# सब प्राणियोंमें मस्टिष्णुताको मात्सय कएते ईं ।
+ परोत्कर्पासद्विष्णुत्ता ।
इातपन्च चौपाई श्श्द्
बचता; इसलिये सुसाध्य व्याधिकों भी छोटी न माननेके लिये आदेश
है, यथा---
रिए्ठु रुक पावक पाप प्रस्सु अष्ठि गंनिज्ष न छोट करि |
इसी भाँति एक भी मानस व्याधि उपेक्षणीय नहीं है ।
नर सरहिं-भाव यह कि एक शारीरिक रोगके वशर्मे पड़ जानेसे
रोगी जिस भाँति मर जाता है, उसी भाँति एक मानसिक रोग भी
अमादके लिये यथेष्ट है, क्योंकि सच्ची मृत्यु तो प्रमाद है )
घ. असांधि बहु ब्याधि-भाव यह कि सन्निपात, शूछ, उदर,
क्षयादि उत्पत्तिसे ही असाध्य हैं और स्थूछ शरीरमें तो इन सबोकां
साथ ही समागम दुर्घट है, पर मानसिक शरीरमें ये सब एक साथ ही
होते हैं ।
खसंतत पीडहिं जीव कहँ-जीवोंकों सदा पीड़ा दिया करते हैं,
आर्थात् उदारावस्थारमें सदा बने रहते हैं। कहना नहीं होगा कि भिन्न-
मिन्न रोगोंकी पीड़ाओंमें भी विचिचता है ।
सो किमि रूहे समाधि-समाधि निर्विकार चित्तसे ही साध्य
है। समाधि ही मनकी खख्थता है। जो मन संतत अनेक प्रकारकी
पीडाओंसे विकल है; उसे खस्थता कहाँ १
दो०-नेम घर्म आचार तप ज्ञान जज्ञ जप दान !
मेषज पुनि कोटिन नहीं रोग जाहिं हरिजान ॥
अथ-नियम, घर्म, आचार, तप, शान यज्ञ, जप, दान
( इत्यादि ) करोड़ों दवाएँ हैं, पर दे दृरियान | रोग नहीं ज्ञाते ५
नेस घर्म आचार तप-शान;, यश) जप; दान; शौच) सन्तोष,
त्तप; स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिघधानकों नियम कहते हैं । अति, स्मृति;
सदाचारके अनुकूल बतांचको आचार कहते हैं। खधघर्मानष्ठानकों तप
२१७ सप्त प्रश्ध
कहते दें | समदर्शित्यको ज्ञान कहते हैं | देवताओंके लिये द्वव्यदानकों
यश कहते हूँ । सनन््त्रके वास्वार पाठकों जप कहते हैं | अपना खत्व
हटाकर दूसरेक्े खत्वके स्थापनकों दान कहते हैं | ये सब मानसिक रोगके
औपध हैं | झौचसे स्वाज्नजुगुप्सा और दूसरेसे असंसगे होता है । सनन््तीष-
से अनुतम सुख छाम होता है। तपसे अशुद्धिका क्षय दोता है.!
स्वाध्यायसे हृ्ट देवताका दर्शन होता है | ईश्व्रेस से समाधिकी सिद्धि
होती है | घर्मसे अभ्युदय निःश्रेयस होता है। आचारसे अन्तःकरण
शुद्ध होता है। ज्ञानसे मोक्ष होता है। यशसे ख्वर्ग मिलता है । जपसे
सिद्धि देती है। दानसे दुर्गतिका ना होता है |
भेषज पुमि फोटिन-भाव यह कि इतने ही औषध नहीं,
सम्पूर्ण वेद, शात्र; पुराण; इतिहास, तन््न, दर्शन सब इन्हीं औषधोसे
भरे पड़े हैं | दुःखकी निन्चच्ि और परमानन्दकी प्राप्ति सबेका ध्येय है |
इस ध्येयर्में महा नास्तिककों भी ब्रोलनेका कोई अवसर नहीं दे ।
इदरिजिन-भाव यह कि आप साक्षात् दरिके यान हैं, आपको
खयं यह रोंग हुआ तो औरोंकी गणना ही क्या है!
रोग नहीं ज्ञाहिं-भाव यह कि दवा करनेसे सम्मबतः दब जाते
हैं। पर निर्मूल नहीं होते, फिर उभड़ आते हैं और जब रोग ही नहीं
गये तब दवा कैसी ! अतः वे औषघ अकिश्वित्कर हैं !
एहि बिघि सकल जीव जग रोगी ।
सोक हषे भय प्रीति बियोगी॥
अर्थ-हस विधिसे संसारके सच जीव रोगी हैं, ( सबकों )
झोक, द्॒ष, भय प्रीति और वियोग दै।
सकल जीव जेम-भाव यह कि ये रोग केवल मनुष्यों ही
नहीं हैं, जितने पञ्-पक्षी-कीट-पतज्ञ हैं; सभी इन रोगोसे दुखी हैं।'
इतपशथ्च चौपाई २१८
भेद इतना ही है कि वे रोगकी चिकित्साका यज्ञ भी नहीं कर सकते
और सनुष्यशरीर तो इस यत्षक्के लिये मिलता ही है |
पएद्दि विधि रोगी-भाव यह कि सन्निपातमें दु्वाद भी कर रहे
हैं, चल भी हो रहा है, खाज भी उठ रही है, उन््माद भी है; क्षयीकी
खाँसी अलग चल रही है, कुष्ठ अछग दुश्ख दें रहा है; नहरुआ अलग
हुआ है, गलगण्डसे सिर तना जा रहा है, उदरहद्धिसे हिलना कठिन
है, ज्वरका वेग ऊपरसे है, चैन किसे कहते हैं, जानता ही नहीं ।
हर्ष सोक भय प्रीति वियोगी-भाव यह कि इस दुर्दशामें भी
एकरसता नहीं; कभी इ॒र्षसे छछछ पड़ता है; कभी शोकसागरमें डूब
जाता है, कभी मयमीत हो उठता है, कभी प्रेमर्मे आ जाता है और कभी
वियोगमे हाय हाय करता है, यथा--
दीनबंधु खुखलिधु कृपाकर कारुनीक रघुराई।
सुनहु नाथ मन जरत त्रिविध ज्वर करत फिरत बौराई ॥
कब्रहुूँ जोगरत भोगनिरत सठ हुड वियोग बस होईं।
कबहूँ मोहबस प्रोष्ट करत बहु कत्रहुँ दुया अति सोईं ॥
कबहुँ दीन मतिध्दीन रंकतर कबहुँ भूप अभिमानी ।
फबहुँ मूठ पंडित विडम्बरत कबहझुँ घरमरत जवानी ॥
कबहूँ देख जग घनमय रिपुमय कबहूँ नारिसय भासे ।
संसति सन्नषिपात दारुन दुख विनु दरिकृपा न नासे ॥
संजम जप तप नेस धरम ब्त यहु भेपज समुदाई |
तुलसिदास भवरोग शामपद प्रेमहीन नहि जाई॥ए
( विनय० )
मानसरोग कछुक में गाए।
हिं सबके छूखि बिरलेन्ह पाए ॥ ६१२॥
अर्थ-कुछ ( तो ) मानसरोग मैने गाकर कहे, ( ये ) है तो
सबको ( पर ) विरलोंडीने देख पाया है।
२१० सप्त प्रश्न
कछुक मैं गाए-भाव यद्द कि वर्णन तो मैंने थोड़े ही रोगोका
किया; परन्तु विस्तारके साथ किया) संक्षेपर्मं विस्तास्से वर्णन करनेकी
विद्या शायद गोखामीजीकों ही आती थी । बहुत बड़े-बढ़े विपयोको
इन्होंने रूपकर्मे ऐसा बाघ दिया है कि विस्तृत वर्णनके साथ वे उन्हीं
रूपकोंमें बचे पड़े है | जितना ही उपमा उपभेयके गुण, क्रिया, खभाव और
सम्बन्धकरा विचार करते जाइये उत्तना ही उस विषयका विस्तार होता
चला जाता है ।
मानसरोणश-भाव यद्ट कि 'सुनहु तात अब मानस रोगा' से जिस
विपयका उपक्रम किया था; अब “मानस रोग कछुक मैं गाए! कहकर
उसौका उपसंद्यार कर रहे दें ।
हहिं खथके-भाव यह कि “जिनते दुख पावें सब छोगा? का यह
संक्षित अनुवाद है । रोगके अस्तित्वका प्रमाण दुख पाना ही है, और
सत्र लोग दुःख पा रहे हैँ; इसलिये सबको हैं ।
रूखि विरलेन्द्रि पाए-माव यह कि मानसरोगम ही यह
विद्येषता ऐ कि रोगीको यह पता भी नहीं चछता कि इम रोगसे दुखी
हो रहे हैं, वह ढुःखके कारणकों वाइर खोजता है, यथा--
अनविचार संसार महा रमणीय भर्यकर भारी।
ऐसा कोई बिरला ही होगा जिसने लख पाया हो कि इमको रोग
है, इसीसे दुखी हो रहे हैं ।
जाने ते छीजहिं कछु पापी |
नास न पावहिं जन परितापी ॥
अर्थ-जञान जानेसे (ये ) पापी कुछ छीजते हैं, पर (ये )
जन परितापी नाशकों नहीं प्राप्त होते ।
जन परितापी पापी-भाव यह कि जिनका हिंसापर अतिप्रेम
है, जो जन परितापी हैं, वे ही पापी हैं, यया--
इआतपश्च चौपाई २२०
द्विंसापर अति प्रीत्ति तिनके पापदिं कबन मित्ति ॥
काम; क्रोधादिकी हिंसापर अत्यन्त ग्रीति है, ये सबकी पीड़ित किया
करते हैं, न चाहनेपर भी ज़वरदस्ती पाप करा ही देते हैं । इसीलिये
इन्हें खल भी कह्ा है
जाने ते कछु छीजहिं-माव यद्द कि ये मिन्रके रूपमे आकर
सद्गुणोंका हरण करते हैं । इन्हें लोग शत्रुरूपसे नहीं जामते, इसीसे इन्हें
चोर मी कहा है, यथा--“मत्सर मान मोह मद चोरा? सो इनके स्वरूपकी
पहचान हों जानेपर चोरी कम हो जाती है । ये अद्भुत रोगरूप हैं, जो
दयासे तत्काल्के लिये दबमात्र जाते हैं, पर जाते नहीं, और पहचाने
जानेपर दुर्बल हो जाते हैं। जब मनुष्य जान लेता है कि काम; क्रोधादि
व्याधि हैं, तव काम; क्रोधादिके बलात् आ जानेपर भी उनपर अहितकर
भावना होनेसे उनका वेग क्षीण दो जाता है, तनु अवस्थाको प्राप्त होते हैं।
नास न पावहिं-भाव यह कि अस्मिता (अमिमान ), राग
( काम )) देष (क्रोध )) अमिनिवेशकी चार अवस्थाएँ होती हैं--
(१) प्रसुत्त, (२) तन, (३) विच्छिन्न और (४) उदार | जब
चेतमें ये शक्तिमाचसे रहते हैं अर्थात् बीजमावसे अवस्थान करते हैं. तव
असुध्॒ कहलाते हैं, यथा--'मनहु वीररस सोवत जाया !? प्रतिपक्ष
भावनाके भारे हुए तनु अवस्थाको प्राप्त होते हैं, यथा--
बाकि परमहित जासु प्रसादा | मिलेड राम तुम समन विषपादा
ग़ायव दो-होकर फिर-फिर अक होनेकों विच्छिन्न अवस्था कहते
हैं, यधा--
रास बचलु सुनि कछुक जुड़ाने। कद्दि कछु ऊखन बहुरि सुखुकाने ॥
विषयमें रूव्धद्त्तिकको उदार कहते हैं, यथा---
परम क्रोध मीजदहिं सब द्वाथा ॥
सो ये नेम, घमं, आचार, तपसे विव्छिन्र हो जाते हैं, पढचाने
जानेसे तन हो जाते हैं, योगावस्थामें प्रसुत हो जाते हैं, पर प्रक्षीण नहीं
ररर् सप्त प्रप्त
होते | यह पौचवी अवस्था है। जब बीज जल जाय और विषयवारि
पामेपर भी अद्भुरित न द्वों; तब उनको प्रक्षीण कहते हैं ।
बिपय. कुपथ्य पाय अंकुर ।
सुनिहु हृदय का नर बापुरे ॥६४॥
- कषर्य-मुनिकफे हृदयमें भी (ये) विषय कुपथ्य पाकर
अंकुरित द्वो उठे, महुष्य वेचारे फ्या हैं ?
मुनिहु हृदय-भाव यह कि मुनि शाननिधान हैँ । उनकी
शानामिसे छलेश दग्घवीज-से दो गये दे, और मुनिका छुदय भी चिपयरससे
रूखा ट्वोनेके कारण ऊसर-सा है; यथा---
अद्गचग्रमतरत मतिघीरा | तुमद्दि कि करें मनोभव पीरा ॥
विपय कुपथ्य-भाव यह कि जिस भाँति कुपध्यसेवनसे व्याधि
उत्पन्न होती है और कुपध्यसे ही बढ़ती है, उसी भाँति मानसरोयके
लिये विषय ही कुपथ्य है; इसीसे मानसरोग बढ़ते हे ।
पाय अंकुरे-भाव यह कि जो श्ञाननिधान मुनि हैँ, उनके लिये
समझा गया था कि छेद यक्षीण दो गये हैँ | पर इस बातके उदाइरण
सौ-पचास नहीं, बल्कि अनेक हैं कि जहाँ प्रक्षण तमझे गये ये
वहाँ भी वे असुस्मात्र ये। विषयकुफ्ध्यकों पाते ही वे अछ्लुरित दो
उठे। अब उन्हें प्रक्षीण कैसे समझे ! यथा--
देखि रूप मुनि विरति बिसारी। यढ़ी बार छगि रहे निहारी ॥
राम कृपा नासहिं सब रोगा।
जौ इहि भाँति बने संजोगा॥
थर्थ-यदि इस भाँति संयोग जुट जाय (तो) रामकृपासे
सब.रोग नष्ट हो जाते हैं ।
शतपञ् चौपाई २२२
जौ बनै-माव यह कि तब सिद्धि निश्चित है, शानमार्गकी भाँति
संयोग वन जानेपर भी सिद्धि अनिश्चित नहीं है, यथा---
अपछ संजोग ईंस जो करई। तबहु कद्राचित सो निरुषरई ॥
क्योंकि शानमार्गम विधय वाधक हैं, कामकोधादि केवल प्रसुत्
रहते हैं, विषय पाते ही जाय उठते हैं, यथा--
जाग्यीँ सनोसव सुएड सन। >
इहि भाँति संजोंगा-माव यह कि रोगनिड्त्तिके साधन--( १ )
बैच, ( २) अधिकारी रोगी; ( ३) संयम, ( ४) औषध और (५)
अनुपान--यदि इकट्ठे हो जाय । पहले सह्दैद्य नहीं मिलते, मिले तो
रोगी मनस्वी मिला । दोनों ठीक होनेपर संयमका ठिकाना न हो सका |
संयम भी किया तो पहाड़से संजीवनी मूलि कौन छाये ! सब ठीक हुआ
तो अनुपान न जुटा । और किसी एक़के भज्ञ होनेसे सिद्धि अनिश्चित
हो जाती है, परन्तु यदि बन जाय तो सब रोग नष्ट हो जायें ।
रामकृपा-भाव यह कि रामकृपा होनेपर भी तीन कृपाकी
और आवश्यकता है--(१) गुरुकपा, सो यहाँ सद्रेच सदगुु
है; ( २) शाल्कृपा--वेद-पुराण पावन पव॑त हैं, इन््हींमें सज्लीवन मूरि
मिलती है, सो शाखत्रक॒पासे सं जीवन मूरिकी आरास्ति होंती है यहाँ वही
औषध है, और (३) आत्मकृपा--इसके बिना कुछ हो ही नहीं
सकता । वैद्यके वचनपर विश्वास, संयम और अनुपान तो आत्मक्ृपापर
दी निर्भर है | यद्द सब होनेपर रामकृपाकी पात्रता आती है। नहीं तो
रामझपामें तो घादा नहीं है। रामकृपासे ही नरदेह मिली है, और
रामकृपाकी अनुकूल वायु बराबर चल रही है, आत्मकृपा बिना उससे
कोई लाभ उठानेवाल्य नहीं है ।
नासदिं खब रोगा-भाव यह कि सूर्यनारायणकी कृपा वरावर
होती चली जाती है, पर रूईका गह् न जला। सूर्यका न्तसणि और
जलानेवाछा दोनों इकट्ठे हो जायें तो गह्य जला जलाया ही है ( इसी
श्श्३े सह्त प्रश्
भाँति सूर्यनारायणकी भाँति रामकझृषा बराबर होती चली जाती है, कोई
आत्मकृपाचाला सूर्थकान्तमणि लेकर अवस डालकर जलाने जावे तो ये
कैश जले जलाये ही हैं ।
सब रोगोंकी जड़ मोह है। इसके नाश होनेपर सब रोग आपसे
आप नष्ट हो जाते हैं । अतएव उपयुक्त तीन कृपाओंक्रे साथ रामकृपा
होनेसे मोह नष्ट हो जाता है छ्लेश प्रक्षीण हो जाते हैं |
सदशुरु बैद बचन बिखासा।
संजम यह न बिषयके आसा॥« ५
अर्थ-सद्गुरु वैधके वचनपर विश्वास हो और संयम यह
है कि विषयकी आशा न हो।
सदशुद-भाव यह कि जिसके चचनसे मोहका नाश हो वही
सदगुरु हैं; यथा--महा मोह तमपुंज जासु बचन रबिकर निकर!।
अथाौत् धोनिय ब्रद्मनिष्ठ ही सदगुरु है | केवल त्द्वानिष्ठ होनेसे चह अपना
काम चला सकता है, गुरु होनेकी योग्यता है, फिर भी भोत्रिय न होनेसे
चह संशयक्रा नादा नहीं कर सकता, यथा--
बंदों प्रथम भहदीसुर चरना। भोह ज॑नित संसय संय हरना ॥
बिना गुरके अशानका नाझ नहीं हो सकता, और बिना उसके
नाशके भवसिन्धुकोी पार करना असम्मव है, यथा---
शुरु विनु सवमिधि तरे कि कोई । जो विरंचि संकर सम होई ॥
शुरु बिनु होह कि श्ञान क्ञान कि होह विराग बिल्चु )
चैंद-माव यह कि जिस भौँति वैध रोगीके रोगकों पहचानकर
उसकी अवस्थाके अनुसार औपघका विधान करता है; उसी भाँति
सदयुरु शिष्यके मानसिक रोगोंका तारतम्य समझकर तदलुसार भन्त्र।
ध्यानादिकी व्यवस्था करता है। वैथके यदि निदानमें चूक हुईंतो
शतपश्चव चौपाई २२७
उपयुक्त औषध नहीं दे सकेगा । अतः सद्वैधकी दी चिकित्सा करनी
चाहिये । यहाँ सदगुरु दी सद्देध्य है। सो सद्गुदके पास जाकर प्रार्थना
करें। यथा---
तथ मैं कहछ्ोों कृपानिधि तुम सर्यज्ष सुजान।
खंग़ुन॒ ब्रह्म अवराधन, मोदहि. कहो भगवान ४
बचन विखासा-भाव यद्द कि ग़ुरुका छक्षण कहकर अधिकारी
रिष्यके विषयमें कहते हैं ! शिष्यको गुरुके वचनपर विश्वास हो ना चाहिये;
क्योंकि 'कौमिहु सिद्धि न बिनु विसवास/” ब्रिना विश्वासके कोई सिद्धि हो
ही नहीं सकती । यदि विश्वास न हुआ तो गुर करना ही व्यर्थ है ।
खंजम यद्द-भाव यह कि रोगके अनुसार वैद्य संयमका विधान
करते हैं | रोगी निबंल है तो उसका ज्ञान रोंक दिया जाता हैं, किसी
रोगीका नियत समयके लिये भोजन रोक दिया जाता है, अनेक प्रकारसे
पथ्य कराया जाता है । सो मानसिक रोगीके लिये यही संयस है कि वह
विध्रयकी आशा न करे | क्योंकि विषय ही कुपथ्य है; उसकी आशा
रखनेवाला आरोग्यताके सुखसे वश्चित रहेगा | रोगी विषयकी आज्ञा
छोड़कर भगवानकी आशा करे, यथा--
है तुल्सीके एक गुन अवगुननिधि कह छोग
पक भरोसखो रावरों रास संक्षिये जोग ॥
(दोहावली )
न विषयकै आखा-विधयकी आशा रखनेसे चित्तज्ञत्ति विषय-
की ओर रहेगी, रामकी ओर नहीं हो सकेगी | अतः कोई दवा काम
नहीं कर सकेगी | विषयकी आशा त्यागते ही चित्त सिसिटकर भगवान:
की ओर आ जावेगा । अतः विषयकी आशा त्यागना ही यहाँ संयस
है। फिर तो दवा देनेकी देर है, असर होते देर नहीं लगेगी ।
शरण *. खसप्त धन्ष
रघुपति भगति सजीवनि 'मूरी ।
अनूपान श्रद्धा. -अति रूरी॥
अर्थ-रघुपतिभक्ति ही संजीवनी बूटी है, और अति
सुन्दर भ्रद्धा ही अछुपान है ।
सजीचनि मूरी-भाव यह कि सजीवनि मूरि पावन पर्वतपर मिलती
है; उसे सब बैच नहीं पहचानते, सद्बैध ही पहचानते हैं। यह मूरि
असाध्य रोगोका प्रशमन करनेमें समर्थ है। रोगंके लिये अवधि है,
जिसका उल्लंघन कर जानेपर रोग असाध्य हो जाते हैं। सो ये मानसिक
रोग न जाने कितने जन्मके हैं | ये सब-के-सब असाध्यरूपसे ही मनमें
अवस्थित हैं। सिवा सजीवनि मूरिके अन्य कोई औषघ इनको दूर करनेमें
समर नहीं है । इस मूरिके भी सजातीय और खगत भेद हैं । किस
रोगीपर किसका प्रयोग किया जायगा। इस बातका निर्णय सद्देध ही
करेगा हे उसीके पास सब प्रक्रारकी संजीवनी चूटीका संग्रह होना
सम्मव है |
रघुपति भगति-भाव यह कि सगुण ब्रह्म रामकी संजीवनी भक्ति
बेद-पुराणरूपी पावन पर्व तोपर मिलती है। सद्दैध सदगुरु द्वी जानते हैं ।
रामरहस्य उपनिषदर्म विस्तारके साथ वर्णन है। अनेक प्रकारके मन्त्र हैँ
और पत्येक मन्त्रके ध्यान पृथक-प्रथक् कथित हैं | और भी उपनिषरदों
तथा पुराणोंमें मन्त्र तथा ध्यानोंका वर्णन है, अनुष्ठान-विधि कथित हैं,
उन्दींके पास इन सबका संग्रह है ।' वे दी जानते हैं कि कौन-सा मन्त्र
किस प्रकृतिक्े पुरुषके लिये अनुकूंछ होगा | सिवा संजीवनि मूरि रंधुपंति-
भक्तिके और कोई उपाय ऐसे मानसिक रोगीके दृदेयमें- मरी-सी पड़ी
हुई भक्तिकों जीवनदान करनेमें समर्थ नहीं है । काम-क्रोधारदि रोगेसि
अस्त भनुष्यकों मन्दामि होती है, उसे ऩवधा भक्तिकी ओर रुचि ही नहीं
होती, भक्ति:चिन्तामणिकी ओर वह कब जाने छगा १अत$ पहले उसे
श््ण
झतपश्च चौपाई श्र्द
नीरोग करके उसकी अम्नि बढ़ानी चाहिये, जिसमें वह भोजनरूपी नवधा
भक्तिका सेवन करने छगे | तब कुछ दिनोमें साधु-सद्भति करते-करते
रामकथाश्रवण करते-करते उसे भक्ति-चिन्तामणिकी भी -प्राप्ति हो
जायगी | इस समय उसे संजीवनी भक्ति राममन्बरदीक्षाकी आवश्यकता#
है, यथा--
राम मंत्र मोहि द्विज चर दीन्हा। छुम उपदेस विविध विधि कीन्हा ।
सो मन्त्रदीक्षा तथा शुम उपदेश गुरुकृपा है, उन उपदेशोपर
विश्वास करनेसे शाल्रकृ॒पा भी हो जाती है, नीरोंग होनेके लिये तन-मन-
घनसे प्रयल करना द्वी आत्मकृपा है। मन्त्रजप करने तथा रामपर
दृढ़ विश्वास रखनेसे रामकृपा भी हो जायगी; तब रोग नष्ट हो जायेंगे ।
अनूपान अ्रद्धा अति रूरी-अति रूरी भद्धाका अर्थ है झुदद
साच्विकी भ्रद्ध/ । शुद्ध सात्विकी श्रद्धाके साथ दीक्षाग्रहण तथा अनुष्ठान
ही अनुपान है। अनुपान ही औषधके प्रमावकों यथेप्सित कार्य करनेगें
प्रदत्त करता है !
एहि बिधि भले ही रोग नसाहीं ।
नाहि त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥६६॥
अर्थ-इस विधिसे खुभीतेके साथ रोग नष्ट होते हैं, नहीं
तो कोटि यत्नसे भी नहीं जाते ।
एट्टि विधि-भाव यह कि असाभ्य रोगोंसे असित मन भक्ति
करनेमें सर्वथा असमर्थ है । अतः रोगंकि दूर करनेके लिये उसे सदगुरू-
द्वारा राममन्त्रकी दीक्षा लेनी चाहिये, गुरुके उपदेशपर विश्वास करके
घलना चाहिये, विषयकी आझा त्याग देनी चाहिये, सातक््विकी भ्रद्धाके
- साथ अनुष्ठान करना चाहिये, यही विधि है !
# नेगि विलंब न कौजिये, लोजिय उपदेस |
': मंहा मंत्र सोइ - जपिये, जेहि जयतः महेस॥ (वि० प०).
मर सप्त प्रश्च
भले ही रोग नसाहीं-भाव यद कि यह सुकर साधन है; इससे
भलीमाति रोग नए हो जाते एँ । 'भछे दी! देहली-दीपक न्यायसे रोगके
साथ रहकर साधनसौकयंका अर्थ देगा; और नसाइके साथ रहकर
निर्मूल माशका अर्थ देगा । अन्य साधन दुष्कर हैं, और उनसे रोग
निमूल भी नहीं होते ।
नादि त जतन कोटि नहि जाहीं-भाव यदद कि ओत्िय ब्रद्म-
निएकी दी हुई दीक्षा अमोघ है | उसका प्रमाव पड़े बिना नहीं रहता
भगवान् दह्दुर्से दीक्षा पाकर द्वी काशीमें जीवकी मुक्ति दोती है; यथा--
कासी मरत जन्तु अवछोकों । जासु मामबर करों असोकी ॥
सात्विक्री श्रद्धाके साथ दीक्षानुसार अनुष्ठान करनेसे काम-
क्रोधादि नष्ट होते हैं, भक्ति जाग उठती है ) भक्तिके जाग उठनेपर फिर
काम-क्रोधादिसे भय नहीं रह जाता । भक्तके सामने सदा सगुण त्रह्मकी
दिव्यातिदिव्य कल्याणमयी मूर्ति रहती ऐ, रथूछ विषय उसे नहीं ज॑चते ।
अतः विपयद्धारा काम-क्रीघका बल चल जाता है |
जानिअ तब मन बिरुज गोसाई।
जब उर बल बिराग अधिकाई ॥
अर्थ-तव मनको नीरोंग समझना जब छदुयमें विराग-
का बल बढ़े, दे गोसाईँ !
गोसाई-भाव यह कि आप स्वामी हैं; आपके मनका नीरोग
होना सेवकोको इष्ट है। अतः में मनके नीरोग होनेकी पहचान आपको
बतलाये देता हूँ | इसीसे आप अनयंसे बच सकेंगे, नहीं तो मनके रोगी
होनेका पता क्रिसीकों नहीं चलता |
तब मन घिरुज जानिअ-माव यह कि जबतक रोग है तभीतक
शतपञ्च चौपाई २२८
मिबंलता है; रोगके हृटनेपर बल आनेमें देर नहीं लगेगी । सो बल्का
बढ़ना ही रोग हटनेका असाधारण रक्षण है ।
चछ विराग-भाव यह कि शरीरका बछ और दुदयका बल ये दो
पृथक् बस्त॒एँ हैं । बड़े भारी चलवानका हृदय निर्बल हो सकता है;
और बड़े निरबंछका भी हृदय सबछ हों सकता है | हृदयका बल पैराग्य
है | यही परमबल है । अकेले मैराग्य मोहका नाश करनेमें समय है, यथा-
प्रचलत बेराग्य दारुन प्रभंजन तनय विपय वन दृह्दनसिव धूसकेतू ।
( विनयपत्रिका )
, उर अधिकाई-भाव यह कि साधारण वैशग्यके बिना तो
मानसिक रोगी रोगसे छूटना ही नहीं चाहेगा ) वह दीक्षा लेनेके लिये क्यों
पह्त होगा १ सो वह पारम्मिक वैराग्य खधर्माचरणसे होता है उसके
दोनेपर मनुष्यको भगवत्-धर्मम अनुराग होता है | तब दीक्षादि प्रक्रिया
चलती है | यथा---
प्रथमद्धिं विभ्चरन भति आती । निज निज धसे निरत श्षुत्तिरीती ॥
तेहिकर फल पुनि बिपय बिरागा । तब सम धर्म उपज अजुराग्रा #
सो खधर्माचरणके बिना तो न शान ही हो सकता है न भक्ति ही |
अतः यहाँपर “अधिकाई? का अर्थ यह है कि वह प्राथमिक चैराग्य जब
पुष्ट हो तब समझना चाहिये कि रोग नष्ट हो रहा है। यदि दीक्षापूर्यक
अनुष्ठानसे वैराग्य नहीं बढ़ा तो समझ लेना चाहिये कि अभी रोग बना
है, अनुष्ठान ठीक नहीं हो रहा है ।
सुमति छुपा बाढ़े नित नहं।
बिषय. आस दुबलता गईं ॥६७०।
अर्थे-खुमतिरूपी भूख नित्य नयी चढ़ने छगी और
विषयाशारूपी छुर्वेंछता चक्की गयी !
२२०, सप्त प्रश्न
छुमति छुघा-माव यह कि जिस भौंति भौतिक शरीरमें भूख है,
उसी माँति मानसिक शरीरमें सुमति है | यही भजनके लिये जलन पैदा करती
है, और यद्दी मजनका परिपाक करके विरागरूपी बल बढ़ाती है।
सज्लीचनी भक्ति कुमतिका माश करके सुमति बढ़ाती है, और ज्यों-ज्यों
सुमति बढ़ती है लॉ-त्यों भजनके लिये अधिक जलन पैदा शोती है;
और मजनका पाक दोकर वेराग्य-चल बढ़ता है ।
बाढ़े नित नई-रोगीके रोगविनिर्मुक्त होनेपर भूख बड़ी जोरसे
लगती है, नित्य प्रति उसका भोजन बढ़ता चछा जाता है, और जब-
तक उसका खास्थ्य ठीक नहीं हो जाता तबतक यही दक्षा रहती है|
इसी भाँति मानसिक रोग नष्ट होनेपर भमजनकी ओर सम दौड़ता
है, विषयसे मन हटता चला जाता है, जब्रतक कि मन सिर होकर राम-
चरणमें नहीं लग जाता |
त्रिपय आस डुवेलता-भाव यह कि 'विषयक्री आशा? तो
संयमक्रे समयसे ही छोड रकखी थी, पर वह गयी नहीं थी, उसे हृटानेके
लिये प्रयक्ष करना पड़ता था । अब वेराग्य बल बढ़नेसे वह आप-से-आप
चली गयी | मनका बल वेशाग्य दै। और दुर्बलता विषयकी आशा है।
यही दुर्बछता सब रोगोंका घर है । हे
बिसल ज्ञान जल जब सो नहाई |
तब रह रामसगति उर छाई ॥
अर्थ-मिर्तल शान जलूसे जब चह ( रोगी ) नहाता है;
तब रामभक्ति उसके दृदयमें छा जाती है।
विभल शान जरू-भाव यह कि संशयरहित श्ञान ही शुरुके
उपदेशका फल है, यथा---
होई न विमर विवेक उर शुरुसन किये दुराव ।
शतपशञ् चौपाई २३०
यह निर्मछ शान संतके छदयमें रहता है; यथा--'संत्त छुृदय जस
निर्मल बारी ।*
जव स्रो नद्दाई-भाव यह कि जब्रतक भजन फरते-करते मनमें
प्रवछ वैराग्य न हो जाय तबतक निर्मल ज्ञानका बह अधिकारी ही नहीं
है। वह! से अमिप्राय यहाँ रोगी जीवसे है, यथा--
घृष्दि विधि सकरू जीव जग रोगी। सोक हर्ष सय प्रीति वियोगी ॥
रोगीके लिये नहाना अपध्य है; इसी भाँति विधयी जीवके लिये
ज्ञान द्वानिकारक है | पहले वह कुछ अच्छा होनेपर गरम जलमें अंगोछा
मिगोकर शरीर पोँछ लेता था, पर अब भलीमाँति रोगविनिर्मुक्त तथा
पुष्ट देखकर वेयमे उसे रोगविनिमुक्त स्नान कराया; अर्थात् गुरुजीने
शानोपदेश किया । ज्ञानोपदेशसे उसका मल, शोक, हु, भय; प्रीति;
वियोंग सब मिट गया। यथा--
सोक निवारेड सबन्दकर, निज विज्ञान प्रकास |
शानका कथन, श्रवण, आनन्दपुरलूक यही नहाना है, यथा--
कट्दहिं सुनहिं ह॒र्पहिं घुछकाद्दी । ते सुकृती मन मुद्दित नहाहीं ॥
तब रद्द राममगति उर छाई-तब्र सिद्धिमक्ति छदयमें छा
जाती है | छा जानेका अर्थ है बसना। यथा--'रहिहाँ निकट सैलपर
छाई !? अर्थात् तब रामभक्ति हृदयमें घर कर लेती है | और जब भक्ति
बस गयी तत्र मायाकी प्रभुतां नहीं चछती । शानीके द्ृदयमें ही भक्तिका
निवास रहता है । सल्लीर्ण दृदयमें भक्ति नहीं रहती । भक्ति होनेमें ही
परमानन्द है, यथा--
सेवत साथु द्ेत भय भागे | भोरघुत्रीर-चरन ऊछय छागे॥
अनुराग सो निज रूप जो जगते बिलूच्छन देखिये ।
संतोष, सम, सीतल, सदा दम, चेहवचंत न छेखिये ॥
निरमछ, निरामय, एकरस, तेद्टि हरप-सोक न व्यापई ।
तैकोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी, भई ॥
श्२१ सप्त प्रश्न
जो तेदि पंथ चढै मन छाई | तो इरि काहे न दहोहिं सहाई॥
पाये सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहें ।
सपनेहँ नहीं दुख द्वेत-दरसन, बात कोटिक को कह ॥
द्विज, देव, शुरु) हरि, संत विन्ु संसार-पार न पाइये ।
यह जानि तुलसीदास प्रासदरन रमापति गाशये ॥
( विनय० )
सिंव अज सुक सनकादिक नारद ।
जे भुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥६८॥
भर्य--हशिव, श्रह्मा, झुक सनकादि ( और ) नारद,
जितने मुनि मह्मचिचारमें चिशारद् हैं ।
सिच अज्ञ-भाव यद कि वेदप्रतिपादित देवता शिव, सबके
शुरु) आदि शानदाता, यथा---
छुम वरिभुवन गुरु बेदर बखाना। आन जीव पामर का जाना ॥
ब्रहदेव, भवसागरके स्वयिता, जिनका लिखा किसीके मेटे नहीं
मिठता, यथा--+
यंदौ विधि पद रेनु भवसागर जेट्टि कीन्द् जहँ।
संत सुधा ससि घेनु अग्रठे खह विप बारुनी ॥
8०००७०००००००७५७०००००० न्न्न्जो विष लिखा लिछार ॥
देव दनुज नर नाग झ्रुनि कोड ने मेटनिहार #
सुक सनकादिक-शकदेवजी व्यासजीक्रे गर्भजानी पुत्र थे;
लिमके आनेपर उनके पिता व्यास, पितामह पराशर, चुद्ध प्रपितामह
बसिष्ठ भी ज्ञानण्येप्ठ होनेके कारण उनका सम्मान करते थे | सनकादिसे
सनक, सननन््दन। सनातन, समनस्कुमार चार्यो भाइयोंसे अमिप्राय है।
शुक, सनकादि) सिद्ध, मुनि, योगी तथा जीवन्मुक्त थे; यथा---
सुक् सनकादि सिद्ध सुनि जोगी | नाम भ्साद अद्यसुख भोगी ॥
शतपथ्च चौपाई श्श्श्
नारद-ब्रद्मदेवके पुत्र, जिनका वचन कभी अन्यथा नहीं हो
सकता था, यथा--
बरु पावक प्रगटै ससि साहीं | नारद बचन अन्यथा नाहीं #
जे मुनि ब्रह्म विचार विसारद-भाव यह कि (शिव अज झुक
सनकादिक नारद! असिद्ध ब्ह्मविचारधिशारद हैं। यदि इतना ही
कहकर रहने दिया जाता तो सन्देह उठता कि सम्मव है, अन्य ब्रह्म-
विचारविज्ञारदोंसे इनका मत-भेद हो, अतः कहा कि ये ही नहीं
जितने मुनि ब्रह्मविचारसें पण्डित हैं, वे सब | अर्थात् इस विधयमें कहीं
मतभेद नहीं है।
सबकर मत खगनायक पएहा।
करिअ॒ राम-पद-पंकज नेहा ॥
अर्थ-हे खगनायक सबका यही मत है (कवि) रामके
चरणकमलछाॉमे भेम करना चाहिये |
पद्दा सवकर मत-भाव यह कि शह्ढर, ब्रह्मदेव, शुकदेव;
समकादि, नारदादि जितने ब्रह्मविशारद मुनि हैं, उन सभीका यह मत
शद्भुरमत--यथा--
बहुरोग वियोगन्दि छोग हुए । भवर्दृप्ति निरादरके फल ए ॥
एछिते तव सेवक दोत झुदा | मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥
बह्यदेवमत--यथा---
घिग जीवन देव सरोर हरे | तव भक्ति बिना भव सूलि परे ॥
सर्चे मत--यथा---
सुक सनकादि पह्ाद नारदादि कहे, रामकी भगति बड़ी बिरत मिरत ॥
( विनय»
खगनायऋ-सम्बोधनसे भाव यह कि आप पक्षियेंक्रि राजा हैं,
राजांओंके यहाँ सबके मतका विद्येप आदर होता है ।
शबडे .. सप्त पन्ष
राम-पद्-पंकज-भाव यह कि राम आनन्दसिस्धु हैं, राम सुखकी
राशि हैँ। उसी आनन्द-सिन्धुक्रे बिन्दुसे शहर तथा ब्रद्मदेवकी प्रभुंता
है, यथा-+-
जेहि सुख सुधासिध्ठ सीकरते, सित्र विरंचि प्रभुताईं |
( विनय० )
है
सगुण निर्मुणमें कोई भेद नहीं है, यथा--
जो गुनरद्धित सगुन सो कैसे | जल दविंम उपर बिरलूग नहि जैसे ॥
एक दारुगत देखिय एक । पावक झुग सम ब्ह्ष बिवेकू ॥
नेहा फरिअ-भाव यह कि उनके चरणकमलोमें प्रेम करनेसे सन
छुख ठुस्नत सुलभ दोते हैं।अतः उन्हींके चरणोंमे प्रेम करना
चादिये, यथा-- ा
राम चरन अमिरास कामगप्रद ततीरथराज बिराजै !
संकर छदय भयति भूतरूपर प्रेम अछयबट आजे ॥
स्थास बरन पद पीठ अरुन तऊ, छससि बिसद् नखश्रेनी ।
जनु रचिसुता सारदा सुरसरि मिक्ि चली छलित त्रिवेनी ॥
अंकुस कुलिस कमल धघुज सुन्दर भेवरतरंग बिछासा । *
समजहिं सुर सजन म्ुनिजन सन भुदित सनोद्वर बासा ॥
त्रिजु बिराग जप जाग जोग बत बिज्ञु तप बिनु तनु त्यागे ।
सब सुख सुछभ सथ तुछसी प्रभु पद प्रयाग अनुरागे ॥
( गीतावेली )
भक्तिकों सुखका असाधारण कारण अन्वय मुखसे कष्टकर, अब
उसी बातकों व्यतिरेक मुखसे कहते हँ---
श्रुति पुरान सब अ्ंथ कहाहीं। “.
रघुपति भगति बिना छुख -नाहीं ॥ ६०:॥
इातपञ् चौपाई २३७
अर्थ-बेद्, पुराण ( और ) सच अन्ध कट्दते हैं कि रघुपति-
की भक्तिके बिना सुख नहों है|
श्रुति पुरान सब अंथ-भाव यह कि श्रुति स्वतः प्रमाण है, पुराण
आर्षमन्थ होनेसे परतः प्रमाण है, और भी ग्रन्थ काव्यादि जो पाखण्ड-
वादी नहीं हैं, वे सब सद्प्रन्थ हैं, यथा--
जिमि पाखंड बविबादते छुप द्योहि सदंथ |
सो यहाँ सब प्रन्थसे सब सद्ग्रन्थ ही अभिप्रेत हैं ।
कहाहीं-भाव यह कि सब एक स्वरसे कहते हैं | पहले कद्द
आये हैं कि सभी आसोंका मत है कि रामपदर्षकजर्मं प्रेम करना
चाहिये, और अब कह रहे हैं कि सब 'आसवाक्या का भी यही
अमिप्राय है कि विना दरिभक्ति सुख नहीं ।
रघुपति भगति विना-भाव यद्द कि बिना सग्रुण ब्रह्मकी आरा-
धनाके अन्तःकरणकी शुद्धि नहीं होंती। कर्मकाण्डसे स्थूछ मलकी
निजृत्ति होती है। पर सूक्ष्म मल ध्यानसे नष्ट होता है। ध्यान सशुण
ब्रह्मका ही होता है; अतः बिना सगुण ब्रद्मयकी उपासनाके सूक्ष्म मल
नहीं जा सकता; और जबतक चित्त मलिन है; तबंतक आनन्दका प्रतिविम्ब
ठीक नहीं पड़ सकता; और न शान्त होकर अपनेमें स्थित हो सकता
है। अतः योगानन्द नहीं मिल सकता ।
खुखकनाही-भाव यह कि आनन्दके पौँच भेद हैं--( १)
योगानन्द, ( २) आत्मानन्द, ( ३ ) अद्वेतानन्द, (४) विद्यानन्द
% थहाँ पॉल वार सुखका निषेष किया है, यथा--( १ ) सुख नाहों, ( २ )
जीव न लदद सुख, ( ३ ) न जीव सुख पावै, ( ४ ) सुख पाव न कोई और
(५ ) न भव तरि। दूसरेमें त्तीन दृृष्टान्त, फिर तीसरेमेँ तीन दृष्टान्त,
चोयेमें एक और पॉचर्वेमें दो दृष्यन्त दिये हैँ। यहाँपर वेदान्तकथित पाँचों
आनन्द बिना माने अर्थ नहीं बनता ।
श्रेण " सप्त प्रश्न
और ( ५ ) विषयानन्द । सो योगानन्द बिना रघुपतिकी भक्तिके नहीं
हो सकता |
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा।
बन्ध्यासयुत बरू काहुहि. मारा ॥
जर्थ-( चाहे ) कछुएकी पीटमें बाल जमे ( चाहे ) बॉझका
चेटा किसीको मारे ।
कमठ पीठ-भाव यह कि कछुएकी पीठमें दृड्डी-ही-हड्डी होती है,
उसमें बाल नहीं जम सकता | जिस जीवकों कछुआ कहते हैं, उसकी
पीठ देह होनेसे मिथ्या आत्मा है। जिसमें भेद हो ओर मादूम न पड़े
( दिखायी न दे ) वह मिथ्या आत्मा है । यहाँ शरीरौंमें और आत्मामें
भेद है, परन्तु दिखायी नहीं पड़ता, इसलिये शरीर मिथ्या आत्मा है।
जञामद्धिं वरू वारा-बाल चमड़ेमेंसे निकलता है, हड्डीसे मही--
कछुएकी पीठ इड्डी है; उसमेंसे ब्रा चाहे निकल पड़े, अर्थात् इस
प्रकारकी अनहोनी हो जाय। भाव यह कि कछुएको यों ही बाल
नहीं होता फिर पीठपर केसे हों सकता है | इसी माँति मिथ्या आत्मासे
सुख्॒ नहीं हो सकता |
चन्ध्याछुत-भाव यह कि पुत्र गौण आत्मा है। जिसमें भेद स्पष्ट
हो और गुण मिले उसे गौण आत्मा कहते हैं। जैसे (यह बाछूक सिंह
है! यहाँपर बालक और सिंहका भेद स्पष्ट है; परन्तु क्रौ्य-शौर्यादे गुण
मिलते हूँ | इसी भाँति पुत्र गौण आत्मा है । सो पुत्र होनेसे फिर स्त्री
बन्ध्या नहीं कददला सकती; अतः वन्ध्याकों पुत्र ही नहीं हुआ ।
चरु काइुहि भारा-भाव यह कि जब पुत्र नहीं हुआ तो उसने
मारा कैसे ! उसका मारना महा असम्मव है। इसी भाँति गौणात्मासे
भी सुख पाना महा असम्भव है, यथा---
डतपश्च चौपाई श्श्द्
छुत बनितादि जानि स्वारथरत, न करु नेद्द सबदाते।
(विनय० )
फ़ूलहिं नभ बरु बहुबिधि फ़ूला ।
जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥७१०॥
अर्थ-( चाहे ) आकाशमे अनेक प्रकारके फूल फ़ूे; पर
जीव दरिके प्रतिकूल खुख नहीं पाता।
नस कण माप यह कि अब मुख्यात्मा कह्दते हैं, इसी लिये
नभसे उपमा छवि | नभ और मुख्यात्मा ( साक्षी ) में निलंपता साधारण
धर्म है। विषय प्रिय है और वह (आत्मा ) प्रियतम है। पुत्र, मिन्न;
कलूच; घनादि प्रिय हैं, पर साक्षी आत्मा सबसे प्रिय है; उसके लिये होने-
से ये भी प्रिय होते हैं। उसमें परिणाम होना आकाझर्मे फूछ फूलनेके
समान असम्भव है ।
चरु बहुविधि फ़ूछा-माव यह कि अन््तः्साक्षी राम दी हे)
यथा--प्रगठ कीन्द चह अन्तर साखी । उसका एक परिणाम भी
असम्भव है; अनेक प्रकारके परिणाम क्या होंगे ?
हरि प्रतिकूछा-भाव यह कि संसारके अधिष्ठानकों हरि कहते हैं,
यथा--'एहि बिधि जग हरि आश्रित रदहई ।? उसके प्रतिकूल होनेका
तात्पर्य यह है कि उसकी ओर मन न छगाकर दूसरी ओर लगाना अर्थात्
वहिर्मुख होना ।
जीव न रूह खुख-भाव यह कि तीनों आत्मा जीवके रूप हैं---
(१) मिथ्यात्मा, (२) गौणात्मा और (३ ) मुख्यात्मा । मिथ्यात्मा
कभी सुखद नहीं होता और न गौणात्मा सुख दे सकता है; सो ये भी
चाहे सुखद हो जायें, पर हरिके विमुख होनेसे जीबको सुख' नहीं होता ।
क्योंकि बहिमुंखको तो मुख्यात्मासे मेंट ही नहीं होती, उसे खुख हो तो
श्रे७ सप्त प्रश्ष
कहोँसे हो ! इससे यह कट्टा कि भक्तिविद्दीनकों आत्मानन्द भी नहीं
मिलता !
तृषा जाइ चरु म्गजलपाना |
बरू जामहि सससीस बिपषाना ॥
अर्थ-( चाद्दे ) मसुगजलूपानसे ठ॒पा (प्यास ) चली जाय
(और चाहे ) खरगोशफे लिरमें सींग जम जाय ।
सुगलरछू-भाव यह कि मस्भूमिमें जब दुपहरिया चमकती है,
तो वह्दों तरंग-प्रवाइके सहित नदीका भान होता है | जहाँ तीन कालमें
जल नहीं, वहाँ पानी-द्वी-पानी नजर आता है। प्यासे मृंग तो जल पीने-
के लिये उधर दौड़ते हैं; और आशापाश्म वचे हुए थकावट और प्यास-
से मर जाते हैँ । इसोछिये इस मस्मरीचिकाकों झुगजल कहते हैं |
मायाकी उपमा इसी झुगजलसे दी जाती है। मायामें भी इसी भाँति
आनन्दकी मिथ्या प्रतीति होती है, वस्तुतः इसमें आनन्द नहीं, यद्द
दुःखरूपा है, आनन्दामिलापी इसीम आनन्दप्राप्तिका प्रयक्ष करते-करतें'
दुःख पा-पाकर मर जाते हैं, कभी सुख नहीं मिलता | इस दृष्टान्तसे
मायाकों दुःखरूपा, सिथ्या और जड कहा ! सस्मरीचिकामम जलकी माँति
अद्यमें मायाके भ्रमकों विवर्त्वाद कहते हैं, बथा---
तईँ मरन सज्सि पान करिं भ्रयकारू जल नाहीं जहाँ
निज सद्दज अनुभव रूप खल तू भूलि थीं जायो कहां ॥
पाना ठपा जाइ-भाव यद्द कि मिथ्या जलके पानसे प्यास नहीं
जाती । एक तो मरु्मरीचिकाम्में जल नहीं, फ़िर पीना बन नहीं सकता,
और उसपर उससे तृप्ति कहना मद्दा असम्मवकों सम्भव मानना है।
ससखीख विपाना-भाव यह कि बड़े बड़े पाँच नखवालॉकों
तो सींग, होती ही नहीं; खरगोशकों कहाँसें होने छगी ! खरगोशकों न
सींग है और म होंगी और न प्रतीत होती है, अतः खरगोशकी सौंग ;
दइातपश्च चोपाई श्च्ट
होना मिस्या दी नहीं, बल्कि असत् है। यही अजातबाद है | ब्रहालीन
विशानीके लिये जगत् तीन कालमें शदयिषाणकी भाँति हुआ ही नहीं
और न प्रतीत होता दे ।
चदू जामदिि-भाव यद कि जिसमें जो यह्तु स्वभावसे प्राप्त नहीं
है उसमें वह वस्तु नहीं होती | अतः खरगोशकों सींग होना नित्तान्त
असम्भव है । इससे मायाकी असत् कहकर अजातवाद कदा ।
अंधकार बरु रबिहि नसाबें।
रामबिमुख न जीव सुख पावे ॥७१॥
अर्थ-( चाहे ) अन्धकार स्ूयका नाश ऋर दे, पर रामके
विश्ुल द्ोकर ज्ञीच खुख नद्ीीं पाता ।
अन्धकार रविद्वि-भाव यह कि अन्धकार कोई चस्तु नहीं है;
प्रकाशाभावकों द्वी अन्धकार कदते हैं । इसी भाँति अज्ञान कोई वस्त नहीं
है, ज्ञानाभावक्रों ही अज्ञान कद्दते देँ। पर व्यवद्यास्में अन्धकार भी भाव
पदार्थ है, वास्तव है | परन्तु यह बात निविवाद है कि प्रकाश आनेपर
अन्पकारका ऐसा नाञ होता है कि कीं उसका लेश भी नहीं रह जाता |
अन्धकारका नाश करनेमें दीप और चन्द्र भी समर्थ हैं, पर इन्हें ऐसा
करनेमें आयास होता है । सू्यको अन्धकारका नाश करनेमें आयास नहीं
होता; यथा--“'ऊदय भानु विचु श्रम तमनाशा ।* जहाँ सूर्य है चहाँ
राज्िका लबलेश भी नहीं है, अन्धकार कमी यूयके सामने जानेमें भी
समर्थ नहीं है ।
चर नसाचै-भाव यह कि नियम यह है कि यर्थ अन्धकारका
नाश अनायास करते दूँ | सो अन्धकारका सूर्थको नष्ट करमा असम्भवसे
भी असम्मव है ।
# लोकद्ृष्टिसे माया वास्तवी है, शासइप्टिसे भसत् है, और युक्तिसे मिथ्या
(अनिवेचनीया ) है । चाहदे निस्त इश्सि मायाकी उपासना करे, सुख नहीं
मिल सक्कता।
श््८, सप्त प्रश्न
राम विप्ुख जीव-भाव यह कि राम सबिदानन्द सूर्य हैं, और
मोद्द ( अविया ) अन्धकार ऐै। अतः रामके विमुख द्वोकर जीव असत्,
अचित् और निरानन्द मायामें जा पड़ेगा । जो मिथ्या ऐ। असत् है)
उसकी गिनती नहीं, गिनती सच्ची बस्तुओंकी होती है। अतः राम
अद्वेत हैं; यथा---
अमल लनवय अद्वत निगुंन सगुन ब्रह्म सुमिरासि नरभूप रुप ।
अतः रामसे विमुख जीव द्वैतरूपी दुःखमें आ पड़ता है, यथा--
द्वेतरूप तमकूप परों नद्दि अस कछु जतन बिचारो ।
न खुख पावें-भाव यह कि मृगजछ, शशश्यज्ञ तथा गोहान्धकारमें
पड़े हुए जीवकी सुख मिलना मद्दा असम्भव है । तिसपर भी यदि बह
शामके विमुख हुआ तब तो कभी भी सुखक्ली आशज्या नहीं की जा
सकती ! उसे अध्वेतानन्द कभी नहीं मिल सकता ।
हिमेते अनछ प्रकट बरू होई।
बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥७रश॥।
अभग-( खाद्दे ) पाछासे अज्नि प्रकट हो (पर ) रामचिझ्ठुख
कोई खुख्व नहीं पाता ।
हिमि ते अनऊछ-भाव यह कि पाछाका खभाव टठण्डा है; और
अमिका खमाव गरम है| अभिका खमाव पाछेसे बिलक्षण है। अतः
पाछ अम्िक्ते समीप नहीं जाता, यथा--
तात जनककर सहज सुभाऊ | हिमि तेट्टि निकट जाए नहि काऊ |
अनलसे जलकी उत्पत्ति हुई है, और जलकी जड़ी-भूतावस्था ही
हिम है | सो हिमसे अमि नहीं प्रकट दो सकती |
प्रकट चर द्ोई-भाव यह कि चाहे ऐसी असम्भव घटना भी
भट जाय | हिमका खमाव जड़ है, यथा 'जड़ता जाड विषम उर
दशतपश् चौपाई २७४०
छागा,।? अतः यह्०ाँ जड़ मायाकी उपमा हिमसे दी है। इससे
विलक्षण स्माववाली अग्मिकी उपमा चेतनसे दी गयी है। चेतन
सुखरूप है, माया दुःखरूपा हे । सो दुश्खरूपा मायासे चाहे सुख
मिल जाय | का
परमात्मा और आत्माके बीचमें पड़कर मायाने ही दोनोंफों अछग
कर रब्खा है; अर्थात् शरीर चितयात्मक होकर इसने आत्माकों जीव;
ओऔर नामख्यपात्मिका होकर निगुणक्रों सशुण बना रखा है, यथा--
ब्रह्म जीव त्रिच माया जैसी | सो योगसे माया और आत्माका विवेक हो
जानेसे देतमय भाग जाता है, और दुश्खाभाव; कामाप्ति, कृतकृत्यता
तथा ऊताथ्थता होती है; यददी विद्यानन्द है। सो मायासे विधानन्द-
सुखका उत्पन्न होना असम्भव है ।
' बिम्लुख राम-भाव यद्द कि रामके सम्मुख होनेपर ( योगसे ) ही
विद्यानन्दकी आशा हो सकती है। जो रामसे भी विमुख हो गया,
उसके किये तो योग होगा ही नहीं, बद्द माया- ब्ह्मका प्रिवेक ही नहीं
कर सकता ।
झखुख पाव न कोई-भाव यह कि उसका विद्यानन्द सुख पाना
और भी अधिक असम्भव है। 'कोई” कहनेका भाव यह कि उसे
योगानन्द, आत्मानन्द, अद्वेतानन्द, अथवा विद्यानन्दमसे कोई भी नहीं
मिलता । अथवा 'सुख' का विश्येपण न मानकर पाव” का कर्त्ता माना
जाय॑ तो यह अर्थ होगा कि चाहे कोई कैसा ही समर्थ हो, कैसा ही
साधक हो; वह सुख नहीं पा सकता ।
दो०-बारि मथे घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल ।
बिन्नु हरि सजन न भव तरिअ,यह सिद्धान्त अपेल
अर्थ-जरूका मन्थन करनेपर चाद्दे घी निकले, वालूसे
चाहे तेल निकले, परए विना हरिभज़न खंसार-तरण नहीं हो
खकता, यह अटल सिद्धान्त है ।
रछ१् सप्त प्रश्न
बारि मथे-भाव यह कि अब यिपयानन्द शेष रहा, उसीके बारेमें
कहते हैं। सात्विक; राजन और तामस तृत्तियोँ दी सुख-दुश्ख-मोदात्मिका
शोकर द्वान्ता, घोरा और मूंठा नामसे अभिद्दित द्वोती हैँ। वेराग्य)
क्षान्ति, औदार्यादि शान्त चृत्तियाँ हैं; तृष्णा, स्नेह, राग, लोभादि घोर
वृत्तियाँ हैं, ओर सम्मोह) भयादि मूढ़ बृत्तियोँ हैँ। इनमेंसे निर्मेलताके
फारण शान्तामें ब्रद्ठाका सुखांश भी प्रतिविम्बित होता है, और घोरा-
मूढामें केवल सत्तांश और चिदंद दी प्रतिविम्बित होता है । अतः घोरा-
मूढामें सुख नहीं | यहाँ जलकी उपमा धोरा बृत्तिसे दी गयी है, क्योंकि
जलका प्रच्यवनज्ील स्रभाव होता है ।
बरु होइ घृत-भाव यद्द कि घोराइचिसे चादे जेसा काम लिया
जाय) उसका मन्थन कर दिया जाय पर उससे सुख नहीं निकल सकता,
क्योंकि जो जिसमें रहता है, उद्योग करनेपर मी बद्दी निकलता है । घोरा-
वृक्तिमे सुखांशकी झलक भी नहीं है, अतः उससे सुख होना असम्भव है ।
सिक्रता ते वरु तेछ-भाव यद्द क्रि सिक्रताक्े स्थूलतर होनेके
कारण उसे मूठा बक्तिसे उपमित किया । तिलम तेल पहलेसे रहता है,
अतः उसे पेरनेसे तेल निकलता है, बादइमें नहीं होता है, इसीलिये उसे
पेरनेसे तेल नहीं निकलता । इसी माँति घोरा चृक्षिसे भी सुख मिलना
असम्भव है। सो घोरा और मूढ़ा इत्तियेसि यों ही सुख मिलनेवाला नहीं,
बिना भजनके तो और भी असम्भव है ।
विज्ञु दरि भजन न भव तरिअ-भाव यह कि शान्ता घृत्तिसे
मिस्सन्देद श्षणिक सुख मिल जाता है, ओर वह भी इसी कारणसे कि
उसमें सब्विदानन्द रामकी एक झलक ( प्रतिविम्ब ) पड़,जाती है, पंर
उस सुखसे कोई उपकार नहीं द्ोता, पूर्ण सुख अथवा भूमा सुख तो
भवसन्तरण करनेपर ही मिलेगा । सो यह क्षणक सुख ही तो जीवको
संसारमें बल्चाये हुए. है, इससे भवसन्तरण नहीं हो सकता । अतः
शान््ता इत्तिकों स्थिर करनेके लिये हरिभजन करना होगा, इसके अतिरिक्त
कोई उपाय नहीं |
श्द
शततपश्च चौपाई श्छर
' ' यद्द सिद्धान्त अपेछ-भाव यह कि ज्ञानकी सिद्धिमे भी व्यभिचार
है, साधनभक्तिसे छुल्मताके साथ झानसिद्धि हो सकती है | अतः उंस
सिद्धान्तकों (अपेलः नहीं कहा, यथा--कह्मौं ज्ञान सिद्धांत बुझाई” |
पर भक्ति नहीं हठायी जा सकती है, उसे हृटानेपर सब साधन ही ज्यर्थ
पड़ जाते हैं, इसीलिये कहते हैं कि 'यह सिद्धान्त अपेल' | न्
दो ०-मसकहिं करे बिरंचि प्रसु, अजहि मसक ते हीन।
अस बिचारि तजि संसय रामहि सजहिं प्रबीन ॥
अर्थ-प्रभु मच्छरको त्रह्मा वनाता है, और ब्रह्माकी मच्छर-
से भी छोटा कर देता है, ऐसा चिचारकर संशयरदित हो
जानकार छोग रामको भजते हैं ।
मसकहददि बिरंचि-भाव यह कि चेतन जीवॉमें ब््मदेवकी अपेक्षा
कोई बड़ा नहीं है ये ही सबके सष्टा हैं और जड़ जीवोमें सत्रसे छोटा मच्छर
समझा जाता है | गूछरके भीतर रहनेवाले जन्तुकों भी मच्छर कहते
हैं, और गूछर्के फलकी उपमा बक्काण्डसे दी गयी है, यथा---
ऊसमरितरु बिसालू तव भाया | फल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥
इस भाँति अ्क्मदेवके सष्ट जीव मच्छर कहे गये हैं |
प्रभु करें-भाव यह कि प्रभु 'कर्ठुमकर्दुमन्यथाकर्ते समर्थ! हैं ।
ऐसे समय हैं कि मच्छरकों तब्रह्मदेव बनाते हैं । जीव ही उन्नति करता-
करता ब्रह्मदेवपदकों म्रात्त करता है | इसमें सन्देह नहीं कि जों इस समय
ब्रद्मदेव हैं, वह किसी समय मच्छर अवश्य थे, प्रभुने रीक्षकर उन्हें
ब्रह्मपद दिया, यथा---
बिधिद्दे बिधिता हरिहिं हरिता, हरहिं हरता जिन दुई ।
सो जानकीपति मधुर सूरति मोदसय संगरलूमई॥
यह उदाहरण. 'करठे समर्थ» का हुआ ।
अजईहि मसक ते हीन-भाव यह कि सच्छरसे बहुत छोटे-छोटे
२७३ | सप्त प्रश्न
जीव हैँ जो दिखायी नहीं पड़ते, इससे उनका नाम न देकर 'मसक ते
हीन! कहद्दा | सम्मव है कि आज जो मच्छर है वह किसी समय ब्रह्मा
रह चुका दो | क्योंकि श्क्मपददसे भी पतन शाम सुना गया है!
'आन्नक्ममुवनाछोकाः पुनरावर्तिनो््जुनः “ते पाइ सुरदुर्लंभ पदादपि
परत हम देखत हरी !? यह 'अकर्ते समर्थ: का उदाहरण है ।
अस विचारि-भाव यदू कि अनन्त काहूसे इस संसारमें पड़े
दुर्गति सह रहे हैं, दुशःखनिद्ृत्तिका उपाय करते द्वी मर रहे हैं, पर
आजतक न मुक्ति द्वी हुई न भक्ति द्वी मिली । अतः समर्थका आशभ्रय-
प्रदहण ही अब एकमात्र उपाय है। और श्रीरखुनाथजी-सा समर्थ कोई
नहीं, उन्हींके आश्रयग्रहणसे बेड़ा पार है । यथा--
कौन जोनि जनस्यों जेद्धि नाहीं । में खगेस अमि अमिजग साहीँ॥
हारपीं करि सब कर्म मोसाएँ | सुखी न मयउऊं जबदविकी नाई ॥
तज्जि संसय-भाव यद्द क्रि संशय छोड़नेकी वस्तु है। सब
प्रकारका समाधान कर देनेपर मी यदि मनुष्य खयं संशय न हटावे तो
चह बना ही रहता है | इसीलिये दाहुर भगवानते कहा, “त्जि संसय
भजु राम पद ।!
प्रबीन रामद्दि भजहि-भाव यद्द कि प्रवीणता रामकों भजनेमें
है | यदि चतुर प्रवीण होकर भी किसीने संसारकों ही भजा तो उसकी
चतुराई और जानकारी कहाँ रही ! यथा--
झूठ है झड़ो है झूठो सदा सब संत्त कहंत जे अंत छट्टा है।
ठाको सहँ सठ संकट कोटिक काइत दंत करंत इद्दा है ॥
जानपनीको गुमान वढ़ो, तुलझ्सीके चिचार रवार महा है।
जानकोजीवन जाम न जान्यों तौ जान कट्ठावत जान्यी कहा है ।
विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ।
हरि नरा मजन्ति येषतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥
शतपश्च चौपाई र४8
आस
अर्थ-मैं तुमसे निश्चित वात कहता हैं।मेरी बातें अन्यथा नहीं
दोतीं | ज्ञो नर दरिको भजते है, थे अति दुस्तरको तर जाते हैं ।
तें घिनिश्चितं चदामि-पूर्वके दोहेमे जिस बातकों व्यतरेक
मुखसे कहा था; उसीको अब अन्वय मुखसे कहते हैं । पहिले दोहेंमे
कहा था कि 'बिनु हरि मजन न मव तरिओआँ, इसमें कहते हैं कि निश्चय
तर जाते हैं । 'में निश्चित बात कहता हूँ? यह कहकर अपना विश्वास
इस सिद्धान्तपर दिखल्ाया ।
न अन्यथा वर्चांसि मे-यह सन्देह न हो कि कह्दी हुई और बातें
निश्चित नहीं थीं; इसलिये कहते हैं कि मेरे बचन अन्यथा होते ही नहीं,
अर्थात् सब कहा हुआ यथार्थ है; पर निरूपण करनेमें तक तथा प्रमाणसे
काम लेना पड़ता है, इस समय निर्णीत अर्थ कहता हूँ । यहाँ सुशुण्डिजी
अभिमान नहीं करते हैं, शिष्यमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये यथातथ्य
कह रहे हैं | सब हिन्दीमें कहकर सिद्धान्त संस्क्ृतमें कर रहे हैं ।
ये नरा हरि सजन्ति-साव यह कि नरशरीर भवसागरसके
लिये बेड़ा है, यथा---नर तन मबसागर कह बेरो! । सो सब बेड़े पार
नहीं छुगते बोचमें ही ड्डबते हैं; जो हरिको भजते हैं वे ही बुद्धिमान हैं )
तेडतिडुस्तर्र तरान्ति-माव यह कि उन्हींका बेड़ा पार है।
दे सब मदासिंधु बिनु तरनी | पैरि पार चाइत जड करनी ॥
--कहकर जिस प्रसंगको उठाया था, उसीकी समाप्ति यह कहकर
करते हैं कि “जो हरिकों भजते हैं वे ही दुस्तर समुद्रकों पार करते हैं ।*
पत्चम असज्ध
| ७.
पाराशष्ट
पल 22०22
कहेउं नाथ हरि चरित अनूपा ।
व्यास समास ख्मति अनुरूपा ॥
अर्थ-दे नाथ ( मैंने ) अनूप दरिचरित अपनी मतिके
अश्नुलार विस्तार और संश्षेपले कहा ।
कह्देडें नाथ-से उत्तरकी समासि दिखायी | हरि-चरित कहनेके बाद
भगवानका माहात्म्य, भगवत्-रहस्थ, खकीय चरित, शानभक्तिरहस्य
तथा अखिल संशयनिरसनके बाद कहते हूँ कि 'हरिचरित्र' कह्दा।
भाव यह कि हरिचरिच्रके अन्तर्गत ही ये सब वातें हैँ। दरिचिरित्र
वेदमार्गसंथ्थापनके लिये दोता है; अतः वेदोदित सम्पूर्ण बातें खयं करके
उपदेशद्वारा जगतके सामने जीते-जागते रूपमें रख दी जाती हैं, यथा--
जेद्दटि कहत गावत सुनत समुझत परम पद नर पावई ।
' शातपञ्च चौपाई २७६
माग्रवतचरितमें भी भगवदूगुणालवाद ही रहता है | अतः
भरुश्लण्डिजीका चरित मी भगवत्-चरितके अन्तर्गत है। श्रीरामचरित-
मानसमें एक भगवत्-चरित्र और पाँच भागवत-चरित्र ईँ--यथा--
(१ ) उमाचरित, ( २) आंग्रुचरित, ( ३) भरतचरित, ( ४) हनुमत्-
चरित और ( ५ ) भुझण्डिचरित । अतः इन सबके अन्त कहते हैं कि
“कह्देज नाथ! ।
हरिचरित अनूपा-भाव यह कि जगतसे विलक्षण रामका
नाम) रूप, लीला और घाम सभी अनूप हैं ।
( १ ) नाम) यथा--
विधिहरिद्रमय बेंद प्रान सो । अगुन जनूधम श॒ुन निधान सो ॥
( २ ) रूप, यथा--
निरखत सादर रूप अनूपा । तृप्ति न मानत सन सतरूपा ॥
(३ ) लीला--कहेडें नाथ हरिचरित अनूपा ।
( ४ ) धाम, यथा--
साधु सभा अनुपम अवध सकल सुसंगल मूल ।
,. हरिने रामावतारमें जो चरित किया सो वस्त॒तः अनूप है; कहीं
किसी अवत्ारमें ये बातें नहीं पायी जाती | यथा--
तीयसिरोसनि सीय तजो जेहि पावककी कछपाई दही है ।
घघुरंघर बंधु तज्यो, पुरकोगनिको बिधि बोलि कही है ॥
कीस निधाचरकी करनी न सुनी न बिछोकी न चित्त रही है ।
राम सदा सरनागतकी अनखौही अनैसी सुभाय सही है ॥
कोौंसिक बिप्रवधू मिथिकछाधिपक्रे सत सोच दले पछ माहे।
बाकछि दसानन बन्छ कथा सुनि सन्त खुसाहिब सील सराहैं ॥
ऐसी अनूप कहे तुछसी रघुनायकक्की अगुनों गुन गाहैं।
जआारत दीन जनाथनको रघुनाथ करें निज हाथकी छहेँ ॥
२९७ परिक्षिष्ठ
ब्यास समास-चरितमे कहीं-कई्दी विस्तारते कहा है, और कहीं- .
कहीं संक्षेपसे कहा है। विस्तारसे, यथा--
पुनि सिसु चरित कद्देसि मन लाई ।
चालूचरित कहि धिविधि शिधि मन सह परम उछाह ॥
संक्षेपसे, यथा---
तेहि देतु में छपमेस सुतकर चरित्र संछेपहिं कट्ा ॥
एूष्टि छानि घुझुतीदास इनकी कथा कछु एुक है कहो ॥
समति अलुरूपा-भाव यह फि हरिचरित ही ऐसा है कि वह
खमति-अनुसार ही कह्ाय जा सकता है, सर्वतोभावसे कहनेमें सभी
असमय हैं, चथा--
जख रघुपत्ति छोछा अवगाद्दा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाद्या #
चारों घायके वक्ताओंने अन्तर्में यही स्वीकार किया है। पश्चिम
घाटके चक्ता खयं द्ाज्लरजी कहते ई। 'मते अनुरूप कथा मैं भाषी?
दक्षिण धाठके वक्ता याशचल्क्वजी ऋहते हैं, 'रछुपति कृपा जथा मति गावा?
उत्तर घायके वक्ता भुशुण्डिजो कहते हूँ, 'ब्यास समास सख्मति अनुरूपा'
पूर्वधाय्के चक्ता गोखामीजी तो पहले ही कह आये कि--
कह रघुपतिके चरित अपारा। कई मति मोर निरत संसारा॥
सति अनुहारि सुवारि गुनगन, सन जन्द्दवाह ।
झुमिरि भवानी संकरहिं कह कवि कथा सुहाए ४
श्षुति सिछांत इहे उरगारी।
राम सजिय सब कास बिसारी ॥७३॥
अर्थ-हे उरगारि | चेदोंका यदी सिद्धान्त है कि सव काम
झुछाकर रामको भजे ।
शतपशथ्च चौपाई २७८
सब काम बिसारी-भाव यद्द कि कामका अर्थ सुख है और
हिन्दीमें काम कार्यको भी कद्दते हैं, अतः छेष मानकर यहाँ दोनों अर्थ
अहण क्रिया जाता है | जबतक दूसरे-दूसरे सुख याद हैं, तबतक भजन
नहीं हो सकता । दूसरे सुख सीठे लूगें तब राम मीठे लगते हैं । जबतक
दूसरे कार्यकी ओर चित्त लगा हुआ है तबतक रामभजन क्या होगा !
मन तो उस कामसें छगा रहेगा, तब भजन कौन करेगा १ भजनके लिये
अन्य सुख और कार्यकों जान-बूझकर मुलाना चाहिये । भूलना चाहें तो
अवश्य भूछ जाते हैं; और यदि याद रखना चाहें तो नहीं भूल सकते ।
अतः भुलाना अपने द्ाथकी बात है !
राम सजिय-भाव यह कि विषयसे मन फेरकर ऐसा भगवानमें
लगावे कि सचमुच विषय और कार्य सब विस्मृत हो जाबें, यथा--
प्रगट बखानत रास सुभाऊ । अति सम्रेस गा बिसरि दुराऊ ॥
घुछपी भूलछि गये रस एट्टा ।
ऐसे भूलनेवालेका कामकाज भगवानको याद रहता है, यथा--
करों सदा तिनकर रखचारी | जिसि बारूकहिं' राख सहतारी ॥
डरगारी-भाव यह कि आप सपोके शत्रु हैं, संशयसर्पसे भी
वेदोदित सिद्धान्तद्वारा अपनी रक्षा कीजिये । वेदोंके सिद्धान्त सुननेपर
वेदानुयायीके छृदयसे शह्ला दूर होकर इृढ़ निश्चय हो जाना ही ग्रास है|
इहे श्रुति सिद्धांत-साव यद्द कि वेदोंका यही निर्णय है।
पहले ज्ञानसिद्धान्त्से भजनकी उपादेयता दिखलायी, यथा--'कह्मों
ज्ञान सिद्धांत बुझाईं !? तत्श्चात् भक्तिसिद्धान्तसे दिखलायी, यथा--
बिनु हरिभजन न भव तरिय, यह सिद्धांत अपेलरू 7
अब अ्ुतिसिद्धान्तवसे भी वही दिखल्ते हैं। भगवानके सिंह्यासना-
रूढ़ होनेंपर प्रथक्-प्थक वेदने स्त॒ति की, तत्पश्चात् सबने एक खरसे
नित्य समुण रूपका मनसा वाचा कर्मणा भजन करनेका ही इतचान्त
कहा, यथा--
२७८, परिशिष्ट
जे बहा अजमद्वैत्तमचुमचगम्य सनपर ध्यावषहीं।
से कहवहु जानहु नाथ हम तो सगुन जस नित्त शावहीं ॥
करुना दया प्रभु सदगुनाफर देव यह चर समाँयदीं ।
सन बचन कम त्रिकार तजि तव चरन एस अनुर/गहीं ४
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही ।
सोहिसे सठपर मसता जाही ॥
अर्थ-रघु पति (ऐसे ) परभुको छोड़कर किसकी सेवा करें,
जिसकी मुझ-जैसे दाठपर ममता दै | ह
खठपर ममता जाह्दी-भाव यद्द कि शठ सेवक महद्दादुःखदायी है,
उसपर ममता नहीं हो सकती । वह तो मालिकके लिये साक्षात् झूलसम
है, यथा--
सेचक सठ न्प कृपिन कुनारी | कपरटी मित्र सूल सम चारी ॥
जिसपर ममता होती है उसके दोषपर मनुप्य दृष्टि नहीं डालता,
उसकी रुचि रखकर काम करता है । यददी गति रामचन्द्रकी शठ सेवकों-
पर है, यथा---
सठ सेवककी प्रीति रुचि रखिएँ रास कृपारु।
उपछ किये जलूजान जेहि सचिव घुमट कपि भालु ॥
मोहिसे-माव यद्द कि सुग्न॒ुण्डिजी अपनेकों सब शर्ठोंसे बड़ा मानते
हैं, यह भुशझुण्डिजीका कार्पण्य है | इस कार्पण्यकी भक्तिशास््रमं बड़ाई
है, यथा---
गुन छुस्हार समक्षद्धिं निज दोसा । जेहि सब भाँति तुम्दाार भरोसा ॥
घञ्रु रघुपति-भाव यह कि सेवन करनेयोग्य प्रभु॒राम ही हैं,
राममें ही स्वामीके सब गुर्णोका उत्कर्ष है, यथा--
शतपञ्ञ चौपाई २७५०:
सेहये सुसाद्विरर रामसो |
सुखद सुसीक सुजान सूर झुचि, सुंदर कोटिक काम सो ॥
सारद सेस साधु महिमा कहें, गुनगन-गायक साम सो |
०९७ क१०००३क कक
जाके भजे तिछोक-तिलक भये, न्रिजग जोनि तनु ताम सो ।
तुलसी ऐसे प्रभुद्टि मजे जो न तादि बिधाता वाम सो ॥
( विनय ० )
तज्ञि सेहभ काह्दी-भाव यह कि उनके ऐसा भी कोई दूसरा
प्रभु होता तो उन्हें छोड़कर उसीकों भजते । यहाँ तो उनके समान ही
कोई नहीं बढ़कर कहोँसे मिलेगा ? यथा---
तो सो प्र जो पै कहूँ कोड हो तो ।
तौसहि निपट निरादर निसिद्विन, रटि छटि ऐसी घटि को तो ॥
कृपा-सुधा-जलदान माँगिद्रो कहों सो साँच निसोतो ।
*००००७०००००
जितो दहुराव दासतुलसी उर क्यों कट्टि जावत ओतो।
तेरे राज राय दसरथके, छयोी बगो बिच्च जोतो॥
नहिं ( विनय ० )
तुम्ह बिज्ञानरूप नहिं मोहा।
नाथ कीन्हि मीपर अति छोहा ॥ ७४ ॥
अथे-तुम विज्ञानरूप हो (तुम्दें ) मोह नहीं है। नाथने
मुझपर वड़ा छोद्द किया !
तुम्ह विज्ञानरूप-सुम वेद#मय हों, महाज्ञानी हों; यथा--
शररुड भहा क्लानों गुनरासी । हरि सेवक जति निकट निवासी ॥
शानीके ही सम्मुख मोह नहीं ठहरता, यथा- (जाडु) ज्ञानरवि
भव निसि नासा !” तो विज्ञानरूप महाशानीके सम्मुख कैसे ठहरेगा !
क सामध्वनिशरीरस्त्वं वाइनः परमेष्ठिनः ( मात्स्ये ) कर
श्ण्र् ; ... परिशिष्ठ
नहिं मोहा-मोंद्य' बहुबचन कश्नेसे संशय मायादिका भी
ग्रहण दोगा, यथा---
तुमहि न संपघय मोह न साया | मोपर नाथ कीन्ह सुम्द दाया॥
गयड़जीके उपदेशके प्रारम्भ यह चोपाई कद्दी गयी थी। अब
उपदेशकी समाप्तिमे फिर भी वही बात कद्दते हैं ।
नाथ कीन्हि मोपर अति छोद्दा-भाव यह कि भुगझुण्डिजीका
इतना उपदेद्ा देनेपर भी यही भाव बना हुआ है कि गरुढ़जीने मोंहके
बहाने, यद्दों आकर मेरे ऊपर बढ़ी दया की, मुझे वड़ाई दी । यही
संतका लक्षण है; यथा--
कोमछ यानी संतकी लगे अमृत्तमय जाट ।
तुलसी ताहि कठोर मन सुनत सैंन होइ जाए ॥
पूछेह रामकथा अति पाबनि |
खुक सनकादि संझु मसनभावनि ॥
अर्थ-( तुमने ) अति पावनि रामकथा पूछी, जो शुकः
सनकादि और शम्भुकी मनभावनी दै।
पुछेह रामकथा-भाव यद्द कि दुम समझते थे कि मुझे मोह था,
पर मेरी समझमें वद्द मोह नहीं था, वह विद्या थी, यथा---
प्रभुसेवक्टिं न व्याप अविया । प्रभुप्रेरित ज्यापे तेष्टि बिय्या।
क्योंकि जिसे रामकथाकी पूछ है; उसे मोह कहाँ। इसील्ये मैं
कद्दता हूँ कि--
तुम विज्ञानरूप नहिं मोहदा ।
अति पायनि-माव यह कि जिसे मोह होता है वह अपावन बात
पूछता है, यथा--
इातपश्च चौपाई श्प्शे
होहिं विप्रवस कवनि विधि कह्दिय कृपा करि सोइ ।
तुम तजि दौनदयार प्रश्न हित्ू न देखों कोट ॥
और ठमने अति पावन बात पूछी, जिससे चैलोक्यका मज्भछ हो;
अतः तुम्हें मोह नहीं था यथा---
चैलोक्य पावन सुजस खुर झुनि नारदादि बख्ानि हैं ।
झुक सनकादि खंसु मनभावनि-भाव यह कि जो बात
शुक-सनकादि-शम्भुको अच्छी रूगती है, वही तुम्हें भी अच्छी हुगी |
इतने बड़े महापुरुषोंकी रुचिसे तुम्हारी रुचि एक थी; कैसे कर कि ठम्हें
मोह था । निसे मोह होता है, उसकी रुचि बिगड़ जाती है; उसे कठु
वस्तु कठ्ठ नहीं मादूस होती, वथा---
काम-भुजंग डसत जब जेही | विपय-निंव कु ऊगत न तेही।
यहाँतक गरुड़के मोह न होनेका समर्थन करके, अपने ऊपर दया
करनेका प्रमाण देते हैं--
सतसंगति दुर्लम संसारा |
निमिषि दंड भरि एको बारा ॥७पा।
अर्थ-संसारमें निमिष, दण्डभर, एक वार भी खत्लंगति
डुलेभ है।
सतसंगति-भाव यद्द कि संतका सह्न भोक्षका राखा है। संत-
का सक्ञ होते ही सोक्षका रास्ता पकड़में आ जाता है । इसीलिये कहद्दा
है कि--
संत संग अपवर्ग कर कासोी भ्रवकर पंथ ]
कहदृद्ि नाथ कम कोबिद श्रुत्ति पुरान सदभ्ंथ ॥
डुलेभ संसारा-भाव यह कि छुःखमय संसार दुखियोसे भरा
पड़ा है, यहाँ सुखरूप संत्तोंका मिलना दुलंभ है, यथा--
श्ण३् परिशिष्ट
सबिरझे विररझे पाहये . साथास्यागी संत)
ठुलमती कामी कुटिल कलि फेंकी काक अनंत ॥
तथा--
पुन्यपुज विन्नु मिलहिं न संत्ता । सत्तसंगति संसतिकर जंता॥
नि्तिप दंडभरि एकौ बारा-माव यह कि भगवहज्नकी
भाँति भागवतदर्शन भी अमोघ है, कभी व्यथ नहीं जाता | चाहे उनका
संग एक दण्डक्रे लिये अथवा एक निम्मिषक्रे लिये ही जीवनमें एक बार
हो जाय, यथा---
झुख देखत पातक हरें, परसत कर्म बिछाई।
वचन सुनत मन मोद्दगत प्रचभाग मिलाई ॥
मलयाचल हैं संतजन तुछसी दोप बिहन।
निज संगी निज सम करत, छुर्नेन सन दुख दून॥ा
अतः आप-जसे संतका इतने समयक्रे लिये आकर मुझे दर्शन देना
कितनी बढ़ी दया है ।
देखु गरुड निज हृदय बिचारी ।
में रघुबीर भजन अधिकारी १॥
अर्थ-हे गरुड़जी, हृदयमें विचारकर देखो, (फ्या) में
रघुवीर-भजनका अधिकारी हैं
गरुड-सम्बोधनका भाव यह कि आप भगवानकी विभूति# हैं,
पक्षियेक्रि राजा हैं, और में पक्षियोर्मे चाण्डाल हूँ | भजनका प्रताप है
कि आपने स्रयं आकर मुझे दर्शन दिया ।
मैं रघुवीर भजन अधिकारी ?-भाव यह कि भजन करना
+* बैनतेयश्व पक्षिणाम् ।---( गीता )
दातपश्च चौंपाई श्ष्ष्छ
मुखसे कह देना सुगम है, करना वड़ा कठिन है; योगीक ही यथार्थ
भजन कर सकता है, यथा--
रघुपति-भगति करत कठिनाई ।
कहत सुगम करनी अपार जाने सोदह जेंहि वनि आईं ॥
जो जेहि कछा कुसछ ताकई सोद्ट सुलभ सदा सुखकारी ।
सफरी सनसुख जकप्रबाद सुरसरी बह गज भारी॥
सकऊ इस्य निज जउदर मेछि सोचै निद्रा तज्ि जौणों |
स्रोह दइरिपद अनुभवे परम सुख अतिशय द्वेतवियोगी ॥
सोक मोह भय हरप दिवस-निसि देस-काल तह नाहीं |
सतुझुसिदास यहद्धि दसाहीन संसय भनिरप्तूछ न जादीं ॥
निज हृदय विचारी देखु-माव यह कि क्षिसत मूढ़, विश्षित्त,
एकाग्र और निरुद्ध ये पाँच भूमिकाएँ चित्तकी हैं | इनमेंसे मूढ़ तो
तमोंगुणके समुद्रेकसे निद्राइत्तिवाले द्ोोते हैं । क्षिप्तमं रजोग्रुण बहुत होता
है, इससे वे बहुत चश्वल होते हैं । विश्षि्तमें मी विक्षेप होनेसे भक्तिकी
योग्यता नहीं होती | रह गये एकाग्न और निरुद्ध। इन्हींमं भक्तिकी
योग्यता है । सबसे भयभीत रहनेवाले मन्दमति कागकों वह अधिकार
कैसे हो सकता है; जो मनुष्यकों भी छुलूम है |
सकुनाधम सब भाँति अपाबन |
प्रभु मोहिं कीन्ह बिदित जगपावन ॥ ७६ ॥
अर्थं-( मैं ) मद्दा असगुन, सब भाँतिसे अपविज्न ( हैँ)
(स्रो ) प्रभुने सुझे प्रस्यात जगपावन बना दिया |
सकुनाधम-जिस बुक्षके ऊपर काग हो, उसके नीचेसे लोग
नहीं जाते। अपने घरपर उसे बैठने नहीं देते। कागका बोलना
# निरोधरूपा च ।--( नारदभक्तियृज्ञ ) “भक्ति निरोध ( योग ) रूप है?
श्ष्् . परिदिष्ठ
अश्मम समझा जाता है । कागको कोई छूता नहीं, कागका मैथुन देखना
बड़ा भारी अनिष्टका द्योतक है ।
सब भाँति अपाचन-माव यह कि जाति अपावन, यथा--
(( सपदि होउ ) पक्षी चंडाला,' आहार अपावन यथा--
बायस पलिश्ृद्धि ऊति अनुरागा। होह निरामिष कबहुँ कि कार ॥
बुद्धि अपावन, यथा--महामंदसति कारन काग्रा ।! खमभाव
अपावन; यथा 'छली मछीन न कतहुँ प्रतीती ।! रुचि अपावन, यथा--
हहाँ न विषय कथा रस नासा |
तेहि कारन जावत हिय हारे। कामी काक वछकाक विचारे ॥
करणी अपावन; यथा--
तुलसी. देवलदेवको छागे छाख करोर |
काग असागे हरि भग्यों सहिसा भई कि थोर ॥
विद्त ज़गपावन-भाव यह कि सचे भावसे छछ छोड़कर जो
भगवानका होकर रहता है; यही जगपावन है, यथा---
सो सुकृती झुचिमंत सुसंत, सुजान सुसीऊसिरोमनि स्वे।.
सुर तीरथ तासु सनावत आवत, पावन द्वोत है ता तन छबे ए
शुनगेह सनेहकों साजन सो, सबहीं सो उठाइ कहाँ झुज है ।
सतिभाय सदा छल छाड़ि सये तुछसी जो रहे रघुबीरको है ॥
(कविता० )
उन जगपावनोंमं मैंविदित हुआ। कहाँ मैं सुमेदके नीलशैलका
रहनेवाला और कहाँ दूर दक्षिणमें भारतवर्धका कैलास पवेत, वहाँतक
मेरी प्रसिद्धि हुईं, यथा--
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नीकू सछ हुक सुंदर भूरी ॥
पश्चु मोहिं कीन्द्र-भाव यह कि मुझे तो भजनका अधिकार नहीं;
पर प्रभुने मुझे अपना लिया, उनके अपनानेका यह महत्त्व है; यथा--
शतपश्च चौपाई रण्द
तबसे मोद्धि न च्यापी साया। जब से रघुनायक अपनाया ॥
क्षे--आजु धन्य मैं धन्य अति जयपि सब बिधि हीन ।
७ हु ५ [न]
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥
अर्थ-आज में चन्य हूँ, अति धन्य हैँ, गोकि सब भाँति द्वीन
हँ (क्योंकि) अपना जन जानकर रामने संतसमागम दिया |
आज्ु-भाव यह कि एक ही दिनमें सब कथा हुई, और रामचरित-
मानस पूरा हुआ, क्योंकि भुझुण्डिजी कथाकी समासिपर “आज! कह रहे
हैं अर्थात् संतसमागमक्रा काछ उसी एक दिनकों माना | सो इतनी
बड़ी कथाका सविधि श्रवण और कथन एक दिनमें कैसे समाप्त हुआ !
सो एक दिन भी नहीं, दिनके चौथे भागमें ! क्योंकि भुश्ुुण्डिजीने तीन
पहरका कृत्य करके चौथे पहरमें ज्यों ही कथा प्रारम्भ की कि गरुड़जीका
आगमन हुआ, और रात्रि होनेसे पहले कथा समाप्त करके समागमकाछ
“आज निर्धारित कर रहे हैं | सो अर्थापत्ति# प्रमाणसे यह मालूम होंता है
कि एक महायुग ( कृत+त्रेता+द्वापर+कलि ) का भुशण्डिजीका एक दिन
होता था, क्योंकि युगधर्मानुसार ही वे प्रत्येक प्रहरमें कृत्य करते देखे
जाते हैं | कृतयुगर्मे ध्यान-घर्म है, यथा--
कृतजुग सब क्ञामी विज्ञानो | करि हरिध्यान तरें भव प्रानी ।
सो भुझुण्डिजी उस समय ध्यान करते थे, यथा--पीपर तर तर
ध्यान सो घरई! । ज्रेतामें यज्ञ-धर्म है, यथा--
बेता बिविधि जकू नर करहीं। प्रभुद्धि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥
! सो भुशुण्डिजी भी उस समय यज्ञ करते थे, यथा--५“जाप जश
पाकर तर करई? । द्वापरमें पूजा-धर्म है, यथा---
* # पीनोथ्य देवदत्तो दिवा न भुछ्क्ते। देवदत्त मोटा हे दिनकों नही
खाता । अतः बल्से श्स अथेकी प्राप्ति छुईं कि रातकों खूब खाता है, यद्दी
अर्थापत्ति प्रमाण है ।
शश्७ परिशिष्ठ
द्वापर करि रघुपतिपद् पूजा | नर भव तरहिं उपाठ न दूजा ॥
सो भुश्युण्डिजी उस समय पूजा करते थे, यथा--
आम छाँदट कर मानस पूजा | तजि दरिभिजन काज्ञ नहिं दूजा ॥
और कलियुगर्म हरियुणगान धर्म है; यथा--
कलिजुग केवल दरियुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा |
सो भ्रुशुण्डिजी उस समय हरिंगुण गान करते थे, यथा--
बट तर सो कट कथाप्रसंगा । जावें सुनें अनेक विहंगा ॥
भगवान् आदित्यके आने-जानेसे कालछका निर्धारण होता है।
जिसकी जितनी बड़ी आयु है; उसका दिन भी अपेक्षाकृत उतना हीं
बड़ा होता है | मनुष्यका दिन २४ घंटेका होता है और पितरोंका दिन
मनुष्यमानसे एक महीनेका होता है; देवताओंका दिन छः महीनेका होता
है । ब्रेह्नदेवका दिन १४ मन्वतरोंका होता है | और भुशुण्डिजीका
कब्पान्तमें नाश नहीं होता, यथा--जासु नास कब्पान्त न होई! ।
नीलूगिरिपर कथा कद्दते-कहृठते जिसे सत्ताईस कल्प हुए, उसका दिन
२४ घंटेका मानवमानसे नहीं हों सकता । अतः यही सिद्ध होता है
कि भुझुण्डिजीका दिन एक चतुयुंगीका होता था । इस हिसावसे भुशुण्डि-
जीकी आयु उस समय ( ३६६“>८२७ )5७५ वर्षसे ऊपर थी। एक
हजार चत॒युगीका कल्प होता है, और सत्ताईस कल्प भुशुण्डिजीकों कथा
कहते बीता था | सो एक कल्प भुझुण्डिजीके ३६३ वर्षके तुल्य होता
है | अतः सत्ताईस कल्प ७५ वर्षके बराबर होगा | अब यह बात
निस्सन्देह है कि गरुढ़जीकों कथा सुनानेके समय भुद्युण्डिजीकी अपने
मानसे कम-से-कम ७६ व्षंकी आयु थी |
इसीसे यह भी अनुमित होता है कि गरुड़जी पूरे द्वापरभर मोहमें
पड़े थे | क्योंकि जरेताके अन्तमें रामावतार द्वोंता है, सो युद्धकें समय
व्याल्पाशमें बंधे देखकर गरुड़जीकों मोह हुआ, वहाँसे नारदके
श्छ
शतपश्च चौपाई २८
यहाँ गये, उन्होंने तह्मलोक ४ भेजा, वहाँसे केलास आये | केल्यससे
नींलगिरि गये । इसीमें द्वापर बीत गया । कलियुगके प्रारम्भमें श्ुशुष्डि-
जीसे समागम हुआ | यथा--
कथा अरंभ करे सोइ चाहा । ताही समय गयउ खगनाहा ॥
अतः भुद्ण्डिजीके एक प्रहरमें कथा होना मलीमाँति सम्मव है ।
धन्य में घन््य अति-भाव यद्द कि एक तो सत्सज्ञमें समय
व्यतीत होनेसे घन्य हुआ, यथा “धन्य घरी सोइ जेहि सतसंगा दूसरे
रामका दिया हुआ सत्सज्ञ मिला, इससे अति धन्य हुआ, यथा--
संत विशुद्ध, मिलहिं परि तेह्ठी । चितव्दि रामकृपा करि जेह्दी ॥
ज्द्यपि सब विधि द्दीन-मभाव यह कि लोक-वेद सब विधिसे
नीच हूँ, यथा--
छोक बेद् सबह्दी विधि नीचा | जसु छाँद छुइ्ट लेइअर्सीचा ॥
राम कीन्ह आपन जबहीते । भयेडें भुवन-भूपन तब ही ते ॥
निज जन जानि-भाव यह कि रामने मुझे मनसा वाचा
कर्मणा अपना दास समझा । ऐसेको ही 'हरिजन' कहा जाता है; यथा--
“जाना मन क्रम वचन यह कृपासिन्धुके दास! | हरिजन जानि प्रीति
अति बाढ़ी ।”
राम मोहि खंत समागम दौन-माव यह कि घुशुण्डिजी
समझ गये थे कि गरुड़जीकों मोह नहीं हुआ है, रामसे प्रेरित विद्या
+ रेवतराजा बद्घालोकमें कन््याके लिये उपयुक्त वरकों जिज्ञासताके लिये
गये, वहाँ गान होता था, क्षणभर ठहरे, तबसे मत्यंछोकमें युगपरिवर्तन हो
गया; जिन वरोंकों मनमें रखकर गये थे, उनके वंशमें कोई न रद्द गया, अतः
उस कन्याका वलरामजीसे ब्याह हुआ |
श्ण्थ, परिशिष्ट
व्यापी हुई है, कभी अमिसान किया था; उसीकों दूर करनेके लिये
कृपानिधिने मेरे पास भेजा है, यथा--
होहृहि कीन्द कबहुँ अभिमाना | सो खोबे चह कृपानिधाना पे
और मुझे इनके समागमसे अल्म्य छाभ हुआ; यथा--
गिरिजा संत्सम्रागम सम न छाभ कछु जान ।
सब साधनकर सुफल सुद्दावा | रास छपन सिय दरसन पावा ॥
तेद्दि फलठकर फकछ द्रस तुम्हारा । सद्दिस प्रयाग खुसाग हमारा #
दो ०-नाथ जथामति भाखेडें राखेउ नहिं कछु गोय ।
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पाबे कोय ॥
अर्थ-द्वे नाथ ! मैंने अपनी मतिके अचुसार कद्दा, कुछ
छिपाया नहीं | स्घुनायकके चरित-सिन्धघुका कौन पार पा
सकता है !
नाथ जथामति भाखेडें-भाव यह कि तुम यह न समझना कि
इतना ही रामचरित है | राम अनन्त हैं, उनके शुण अनन्त हैं, अतः
उनकी कथाके विस्तारका भी अन्त नहीं है, यथा--राम अनंत अनंत
ग़ुन अमित कथा बिखार ॥? अतः यही रीति है कि अपनी बुद्धिके अनुसार
भगवानके गुणोंका गान किया जाय; यथा--
मिज निज मति सत्र हरिगुन ग्रावहिं । निगम सेष सिघ पार न पावहिं ॥
राखेडें नदधि कछु गोय-भाव यह कि मह्दात्मा छोग गूढ़-तत्त्वका
वर्णन नहीं करते; परन्तु आते अधिकारीसे छिपाते भी नहीं, यथा---
गूढी तरव न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं ॥
सो कही आपको यह न सन्देह हो कि कुछ गूढ़ तत्त्व भुश्चण्डिजीने
दतंपश्च चौपाई रद
छिपा रवखा इसलिये कद दिया कि 'राखेड नहिं कछु गोय” अर्थात्
मेरी इतनी ही जानकारी है ।
/ चरित सिंधु रघुनायक-भाव यह कि कोटि कल्पमें भी गाये
नहीं जा सकते; इसका वारपार है ही नहीं, यथा--
हरि अनंत दरिकथा अनंता। कद्दहिं सुनहिं बहु बिधि सब संता ॥
रामचंद्रके चरित सोहाये | कदप कोटि छगि जाईि न गाये ॥
थाह कि पावे कोय-भाव यह कि न तो पारावार है, और न
थाह है, अर्थात् अपार विस्तार है, और गहिराई भी अथाह है | नीति,
प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ, चार्रो रामचरिषर्से पाये जाते हैं, और चार्से-
का इतना अधिक उत्कष है कि वहाँतक किसीकी बुद्धि पहुँच नहीं
सकती, इसीसे अथाह कहा, यथा---
नीति भ्रीति परमारथ स्वारथ | कोड न राम सम जान जथारथ ॥
सुमिरि रामके शुनगन नाना।
पुनि पुनि हरख भुछुंंडि सुजाना ॥
अर्थें-रामके नाना ग्ुणगर्णोका स्मरण करके वार-बार
ख़ुजान भुशुण्डिजी हषित हुपए ।
रासके नाना शुनगन-भाव यह कि चाहे जछराशिकी दूँदें
गिनी जा सकें, और प्रथिवीके रजकण गिने जा सकें, पर रामके गुणगण
नहीं गिने जा सकते | वे असंख्य हैं और अनुपम हैं, यथा--
बैरिहु राम बढ़ाई करहीं । जादुर विनय मिऊलनि सन हरहों ॥
जर-सीकर महिरज गनि जाहँ । रघुपतिगुन नहि बरनि सिराहीं ॥
झखुमिरि-भाव यह कि प्रभुके गुणगणण ही ऐसे हैं कि उनका
स्मरण होनेपर सद्दृदय बिना हृर्षित हुए, रह नहीं सकते, यथा--
श्द्१् परिशिष्ट
रामहि सुमिरत रन सिरत देत परत गुरुपाय ।
तुलसी जादहि थ घुलक तन सो जय जोवत जाय ॥
भ्रुखुंडि खुजाना-माव यह कि भुशण्डिजी शुणग्राइक हैं,
वाणी, भक्ति; भणिति, मति और गतिकी उन्हें पहचान है, यथा--'मैं
गुणग्राइक परम सुजाना !?
पुनि पुनि हरख-भाव यह कि भुझुण्डिजीकों यह समझकर कि--
निज जन जानि राम भोहि खंतसमागम दीन्ह।
शमके गुणगण स्मरण आ गये, और उनके हृदयमें आनेसे अति
सुख हुआ, यथा--
घले जात सिच्र सती समेता । घुनि पुनि पुछकत कृपानिकेता ॥
महिमा निगम नेति करि गाई ।
अतुल्िित बरू प्रताप प्रझ्भुताई ॥ ७७॥
अर्थ-निगम (वेद ) ने न इति कहकर महिमा गायी है,
( रघुराईका ) वल प्रताप घभुताई अतुलित है|
महिमा-माव यह कि ऐसी महिमा ( बड़ाई ) है कि जो कोई
बड़ा होता है वह उन्हीं रामकी बड़ाईसे बड़ा होता है, यथा---
ञ्ो बढ होत सो राम चढ़ाई ुशन>न० तह बुल बेड «8० ००० ३:०००:००:०:००१०:७ढ ४ ७
जासु अंस उपजें विधि नाना | संभ्रु विरंचि विष्णु भगवाना॥।
निगम नेति करि गाई-भाव यह कि रामकी महिमाका गान
वेद करता है; और नेति कहकर गान करता है । नेति नेतिका अर्थ है
न स्थूछ न सूक्ष्म | अर्थात् ऐसी अपूर्व महिमा है कि वेद भी निषेध
मुखसे वर्णन करता है, इृदमित्थं कहकर “टंगरिग्नाही न््यायसे कुछ नहीं
कह सकता |
शतपच् चौपाई श्ध्रे
अतुछित वकू-भाव यह कि जिस भाँति रामकी सहिमाका अन्त
नहीं, उसी भाँति उनके वछकी भी नाप-जोख नहीं, क्योंकि जिसे जो
कुछ बल है, वह उन्दींके वल॒का लवछेश है, यथा--
सुचु रावन अह्योॉडनिकाया | पाइ जाखु बरू विरचति जाया 0
जाके बल बिरंखि हर ईसा | पाऊत राणत दरत दससीसा ॥
ज्ञा बठ सीघ धरत सहसानन | अंडझोप समेत गिरि कानन ॥
अरे जो विविध देद्द सुरक्नाता। चुमसे सठन सिखावन दाता ॥
इदरकोईंठ कठिन जेहि संजा | तेषि समेत नृप दुर सद् गंजा ॥
खरदूपन च्रिसिरा अर बाली । दते सकरक अतुछित वलछप्ताकों ॥
जाके बल लऊवलेसत्ते, जितेड चराचर झारि।
तासु दूत मैं जाकर हरि जानेड प्रिय नारि॥
अतुलित प्रवाप प्रभुताई-भाव यह कि सामर्थ्य द्ोनेसे ही
अताप होता है | पर प्रताप बछसे अलग काम करता है; समर्थ बलका
अ्योग कहाॉ-कहीं किया करता है; परन्ठु उसका प्रताप रातदिन जहाँ वह
नहीं है वहाँ भी काम करता रहता है, यथा--
काहू बैठत कहा न ओहदी । राखि को सके रामकर द्वोद्दी #
सब जग त्ाहि जनरूहु ते ताता । जो रघुबीर विम्रुख सुनु आता ॥
अतुलित बल जतुल्ति अभ्लुत्ाई । मैं मतिसंद जानि नहिं पाई ॥
सिव अज पूज्य चरन रघुराई |
मोपर कृपा परम खदुलाई ॥
अरथ-रघुराईके चरण शिव-बह्यसले पूज्य हैं, (फिर भी )
सुझपर परम कृपा और परम रहंदुता दै |
रघुराई चरन-भाव यह कि इन चरणोंमने सदा भक्तोंके लिये
कष्ट उठाया है, जिन चरणॉमें चक्रवर्तीके चिह्न हैं, उन चरणोंमें भक्तोंके
श्ध्रे परिशिष्ट
लिये वन-बनमें घूमते हुए कॉटे गढ़े; ऐसी रूपा किसीके चरणॉमें नहीं,
यथा--
ध्चज कुलिस अंकुस कंजयुत चन सद्ृत कंटक किन लहे ॥
पदर्कंज दंद्र मुकुद राम रसेस निध्य भज़ामहें॥
सिव अज्ञ पूज्य-भाव यद्द कि दोनों चरणोंक्री एक देव पूजा
नहीं कर सकते, एककी शंकर पूजा करते हैं और एककी ब्रद्मदेव । दोरनों-
की पूजा तो केवल जनकनन्दिनी करती हैं| बथा--
कौशलेन्द्रपएकअ्मझुलो.._ कोमलावजमहेशवन्दितौ
जानकी करसरोजलालितो चिन्तकस्प मनस्प्सझ्औिनौ ।
भोपर कृपा परम मस्वदुछाई-भाव वह कि महिमा ऐसी, बल
ऐसा, प्रताप ऐसा, पूजा ऐसी और कोमलता ऐसी कि मुझ कागपर
इतनी कृपा की कि मोहमिससे अपने पार्षद पक्षिगाद् गयड़कों भेजकर
मुझे बड़ाई दी, बथा--
एट्टि दरबार दोनको सादर रीति सदा चलि जाई ।
( विनयपत्रिका )
मुझे सत्संग दिया यह प्रभुकी परम कृपा हैं और मोहके मिससे
संतकों ही मेरे यहाँ कथा सुननेकी भेज दिया; यह झूदुता है, जिसमें मुझे
माछ्म भी न हो कि मेरे ऊपर कृपा द्वो रही है ।
अस सुभाउ कहें छुनों न देखों।
केहि खगेस रघुपति सम छेखों॥ ७८ ॥
णर्थ-ऐसा खभाव न कहों खुना जाता है न देखा जाता
है; दे खगेश ! किसे रघुपतिके समान माना जाय *
अस ख़ुभाड-भाव यह कि ऐसे बड़े खामी होकर ऐसा शील-
संकोच केवल भ्रीराममें ही दिखायी पड़ता है; यथा--
दातपश्ष चौपाई श्ध्छ
प्रश्भु त्तरु त्त कपि दारपर ते किय खाएु समान
सतुझसी कहूँ न रामसे साहिब सीछर निधान ॥
कहूँ खुनों न देखों-भाव यद्द कि पुराण, इतिहास छुना, उनमें
भी कहीं ऐसे स्वमावका पता नहीं चलता, यथा-+-
निरुपम न उपसा आन राम समान रास निगम कहे।
और न देखनेमे द्वी कद्दीं ऐसा खमाव आता दे, यथा--
सिशुपन ते,पितु सातु बंधु गुरु सेचक सचिव सखाड |
कद्दत राम -विधु -बदन रिसौह सपनेहुँ छस्यो न काउ ॥
७ ०३७+ ५१ ७ ७५॥ ०» ०१ ३ १० ७ ०$ ७५ ७०० ७ ७++ ७ ०9 ७ १० ७ ७७१०५ ]
सिला पाप संताप बिगत भष्ट परसत्त पावन पाउ प्न
दहई सुगति सो न देरि हरख हिय चरन छुएको पछिताउ ।
भवधलनु भंजि निद्रि मूपति शुंगुनाथ खाइ्ट गये ताउ ॥
छसि अपराध छम्ताइ पाए्ठ परि इतौ न जनत समाउ
कक्षौ राज बन दियो भारि बस, गरि रछानि गये राउ।
ता कुमातु को मन जोगवत्त ज्यों निज तन मरम कुधाद ॥
निज करना करतूति भगतपर चपत चलत चरचाउ।
सक्ृत प्रनाम प्रनत जस वरनत सुनत कहत फिरि गाउ ॥
( विनयपत्रिका )
खशगेश-भाव यह कि आप भी राजा हूँ ) सेवकका धर्म ही है कि
राजाकी सेवा करे, राजाके लिये प्राण दें, पर राजा सेवकका ऋणी किसी
दशामें नहीं होता, और इधरका द्वाछ छुनिये--
कपिसेवा बस भये कनोडे कह्लो पचनलुत ऊझाड
देवेको न कछू रिनियाँ हों घनिक तू पत्र लिखाड श
रघुपति सम लेखाँ-भाव यद्द कि दूसरा कोई ऐसा दीनदयाल
है दी नहीं, अतः उनके समानके लिये जिज्ञासा ही रह गयी, यथा---
र्च्५ परिशिष्ट
देव फौन दूसरो दीनको दया ।
सोछनिधान सुजान-सिरोमनि सरनागत-प्रिय प्रनत-पाछु ॥
को समर्थ स्ंध सकल प्रभ्चु सिव-सनेह-मानस मरालु ।
को साहिब किये सीत प्रीतिबस खग निसिचर कपि भील भालु ॥
साधक सिद्ध बिरक्त उदासी।
कबि कोबिंद छृतज्ञ रुन््यासी ॥
भर्थ-साथक, सिद्ध, पेराग्यवान्, उदासीन, कवि, शार्तश,
रूतम्न और संन्यासी |
साधक सिद्ध-भाव यद कि जों अणिमादि सिद्धिके लिये यत्ष-
शील एूँ और जिन्हें सिद्धि प्रात्त हो चुकी है, यथा--
यथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान ।
कोॉतुक देखहिं सेल वन भूतऊू भूरि निधान ॥
साधक -सिद्धके ग्रदणसे विपयी जीवोंका भी ग्रहण हो चुका, सिद्धि
भी दिव्य भोग होनेसे विषय ही है, अतः ये तो मवसन्तरणके लिये
प्रयक्ष करनेवाले ही नहीं हूं ।
विरक्त उदासी-भाव यह कि सुख ही जीवमातन्नका ध्येय है;
संसारसुखकों तभी मनुष्य छोड़ सकता है, जब उससे बड़ा सुख दृष्टि-
गोचर हो, यथा--जेहि छागि बिरागी अति अनुरागी” और जिसने वल-
पूर्वक विपर्योका त्याग किया और कोई सुख सामने नहीं है, उसका
वेराग्य टिक नहीं सकता | जिसने घरबारकी ममता छोड़ दी हो उसे
उदासीन कहते हैँ । रावणादि तपस्री थे, पर उदासीन नहीं थे । किसी-
को शत्रुमिच न माननेवाले उदासीनका सन निरवल्म्व हो जाता है;
अतः उसे सिवा भगवचरणोंमें चित्त लगानेके कोई चारा नहीं है | यदि
उसने न लगाया तो उसकी भी उदासीनता टिक नहीं सकती, उसकी
मनः्पदृत्ति शीघ्र ही यिपयकी ओर हो जायगी ।
शतपशञ्च चौपाई रद्द
कवि कोबिंद-भाव यह कि कचि और विवेकियोंक्री एक ही
दशा है| इनकी चित्तद्ृत्ति यदि भगवचरणंमे न छगी, तो उनकी
कवित्त्व-शक्ति और विवेकका प्रयोग सांसारिक विषयों दी होता रहेगा | ,
कृतक्ष खेन््यासी-भमाव यह कि कृतज्ञता और संन्यासका भक्तिसे
बड़ा गाढ़ा सम्बन्ध है । पहले अपने ऊपर राम देखनेसे जो प्रेम होता है
उसे अनुराग कहते हूँ | भगवानके कृत देखनेसे भमगयानके प्रति अनुराग
होगा, यथा---
उर आनंद रघुपति छृत जेंते। सेचहिं ते जें अपनपो चेते॥
और यथार्थ संनन््यासी तो रामानुरागी द्वी दो सकता है; यथा--
रमाविछास राम जनुरागी | तजत बमन हव नर बढ़सागी ॥
जोगी सूर सुतापस ज्ञानी ।
धर्मनित पंडित. बिज्ञानी॥ ७६ ॥
अर्थ-योगी, शुरु, अच्छे तपरुधी, र्मात्मा और विज्ञानी
पण्डित ।
जोगी सख्र-योगी अर्थात् अविद्यारात्रिमं जागनेवाले- अविद्या-
राचिमें शानसूर्य छिपा छुआ है, पर वे सोते नहीं, वेखबर नहीं होते ।
विधयमें छिपटे रहना ही सोना है, और उससे वैराग्य होना जागना है,
यथा--
जानिश् तबै जीच जग जागा | जब सब विपय ब्रिछास विराशा ॥
सो मन कहीं न लगनेसे निद्रा आती है, अतः जागनेके छिये काम
चाहिये, यथा--“/नाम जीह जपि जागहिं जोगी? इधर भजन बंद
हुआ उधर निद्रा आयी ।
मरणकों तृण समझनेवाले ऋर हैं। इमके दोनों हाथ मोदक रहता
है, जीवें तो राज्य भोग, मरें तो सर्भ लें, यथा--“सनमुख मरन बीरके
२६७ परिशिष्ट
सोभा? । परन्तु खर्गसे निश्चय पतन होता है। अतः प्राण देनेपर भी
संसारी ही रह गये । यही झइरता यदि भगवानके लिये हो तो जीने और
मरने दोनों अवस्थाओंम मुक्ति करत है, यथा--
तजों प्रान रघुनाथ निषह्ठोरे | दुष्ट हाथ झुद मौदक मोरे॥
खुतापस ज्ञानी-उपवासादि जत करनेको तप कहते हैं, यथा--
ध्वारि अद्दार मूल्फल त्थागे ।? यही तप यदि भगवत-प्रीत्यर्थ न हुआ
तो विषय-प्रीत्यर्थ होगा, यथा--हम काहूके मरहिं न मारे |? ज्ञानीका
तो भक्ति प्राण ही है, वे तो राम ब्रह्मकी ही सबमें समान देखा करते हैं ।
चघर्मनिरत-अपने-अपने वर्णाअमघर्ममे निरत वेदपथपर चलने-
वाले ही धर्मनिरत हैं; यथा--
वरनाश्रम निज लिज घरम निरत बेद पथ छोग |
चर सदा सुस्त पायें नहिं भव सोग न रोगाण
पंडित विज्ञानी-भाव यह कि परमार्थ जाननेवालेको पण्डित कददते
हैं वधा---तुम पण्डित परमारथ ज्ञाता? ऐसे पण्डितोमें जो ब्रह्मलीन हो
उसे विज्ञानी पण्डित कहते हैं, और (राम ब्रह्म परमारथ रूपा? सो पण्डित
विज्ञानी तो राम ब्ह्ममें लीन रहते हैं, अतः वे तो एक क्षण अलग रह
ही नहीं सकते | धर्मनिरत तो प्रभुके अनुशासन चेदके माननेसे अभुक्े
सेवक ही ठहरे, यथा--
सोष्ट सेवक प्रियतम मस सोई । मस अनुसासन साने जोई ॥
तरें न बिचु सेए मस खामी।
राम नसामि नमासि नमासी ॥
अर्थ-मेरे स्वामीकी बिना सेवा किये नहीं तर सकते
( अतः ) रामको चारंबार नमस्कार है|
विज्वु सेप भम् स्वामी-भाव यद कि भजन करनेसे भगवान्
शतपश्च चौपाई श्ध्ट
प्रसन्न होते हैं, यथा--/भजत कृपा करिहेँं रघुराई!, और बिना उनकी
कृपाके माया नहीं छूठती, यथा---
ज्ञानी तापस सूर कबि कोबिंद ग्रुन आगार ।
केद्ििकर लोभ विडंब्रना कौन्ह न एडि संसार ॥
७. ००» १०३ ०+१०७००७०००+०००००+७०+७+०७७१३४७० ००० ०० ० »
ब्यापि रहेउ' खंसारसहँ साथाकटक प्रचंड |
सेनापति कामादि भद दंभ कपट पाखंडता
स्री दासी रघुथीरके समुझे सिथ्या सोपि।॥
छुट न रासकृपा विज्षु नाथ कहों पन रोपि #
तरें ल-भाव यह कि साधकसे लेकर विशानीतक चौदहोंकी सिद्धि
रामभक्तिपर निर्मर है। बिना राममक्तिके मवसागर नहीं तर सकते, मायाके
वशमें आ ही जाते हैं | अत्तः ईश्वरक्ृपाके लिये भक्ति परमावद्यक है ।
वैसे उनके कर्मोका पुण्यफल तो भगवान् देश[ ही; पर उस फछ्से
भवसन्तरण तो नहीं हो सकता । अत३+---
राम नमासि नमामि समासी-बार-बार प्रणाम करनेका भाव
यह कि ईश्वर और ग़ुरुको एक बार प्रणाम नहीं करना होता, इसलिये
वारंबार प्रणाम करते हैं, अथवा सुशुण्डिजी कृतज्ञ हैं, परमेश्वरका प्रत्युपकार
किया नहीं जा सकता, अतः बार-बार नमस्कार करते हैं । यथा--
सो सन होहि न अत्युपकारा । बन्दों तब पद बारंबारा॥
अथवा मनसा याचा कर्मणा प्रणामके लिये तीन बार प्रणाम
करते हैं)
सरन गयें मोसे अघरासी ।
होहि सुछ नमामि अबिनासी ॥<८ ना
अर्थ-( जिसके ) शरण जानेपर मुझ-से पापपुख (भी ) शुद्ध
होते हैं, (ऐले ) अविनाशीको नमस्कार है ।
र६० परिशिष्ट
सरन गयये-भाव यह कि संसारसे भयभीत होकर, मद-मोंह-कपट
छोड़कर जो भगवत-शरण ग्रहण करता है; उसको उनकी ऋपासे बहुत
शीमर पराशान्तिकी प्राप्ति होती है, उसके सब पाप कट जाते हैं, उसके
स्वभावमें भी परिवर्तन हो जाता है; उसका खमाव साघुनसा हो जाता है ।
मीसे अघरासी-भाव यह कि केसा भी पापी हो | पापी कमी
ऐसा न समझे कि मेरा पाप क्षमा नहीं क्रिया जा सकता। पापीका पाप
उस फकरुणाकरकी करुणासे बढ़ा नहीं हो सकता । ब्रह्मदत्यासे बड़ा पाप
नहीं है; प्राणिमात्रके द्ोहते बढ़कर और बढ़ा अघ कौन-सा होगा ! ऐसॉ-
का पाप भी शरण जानेसे कट जाता है ।
होईि शुद्धनभाव यह कि पाप कट जामनेसे श॒द्ध हो जाता है,
यथा--
जो नर होंह्ट चराचर द्रोही। झावे समय सरन त़कि मोही ॥
तजि भद्र मोह कपट छछ नाना । करों सच तेद्दि साधु समाना 0
सनमुख द्वोय जीव सोहि जब्हीं । जन्म कोटि अघ नासीं तबहीं ॥
कोटि बिशत्र वध लाते जाहू। भाग सरन तजों नहि ताह ॥
लसमामि अविनासी-भाव यह फि जो खयं विनाशी है, वह
दूसरेकी क्या रक्षा कर सकता दे ! उस अविनाशझीके प्रणामकी मह्दा
महिमा है; अतः उसीको प्रणाम करते हैं, यथा--
रास प्रनाम महा संहिमाखनि सकक सुसंगरू मनि जनी ।
टद्टोय भलों ऐसेद्दी जजहूँ गये रामसरन परिहरि सनो ॥
भ्ुज्ञा उठा. साखि संकरकरि कसम खाई तुछसी भनी ।
संगछमूछ प्रभाम जासु जग मु जमंगलकों खनो ॥
(गीतावली )
दो०-जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रयसूछ ।
सो कछृपाल मोपर सदा रहहु राम अनुकूल ॥
शत्तपश्च चौपाई २७०
अथे-जिसका नाम संसार (रोग ) के लिये औषध है,
वह रूपाछु राम मेरे ऊपर सदा अनुकूल रहे |
जाखु नाम-भाव यह कि जिसके नामको अचिन्त्य शक्ति है|
जिसके नामसे ही श्ञान होना वेदप्रतिपादित है, जिसके नामबलसे काशीमें
बाछुर भगवान् मुक्ति वितरण करते हैं, यथा---
नाम प्रताप सही जो कहै कहु सिछा सरोरुद्द जाम्यौ ।
भव सेषज-भाव यह कि जबसे जीव हुआ तमीसे संसाररोगसे
अस्त है | इस रोगकी दवा जिसका नाम है। पहले कहा था कि उसका
यश ओऔषध है, यथा--
भव सेपज रघुनाथ जप सुनदहिं जे नर अरु भारि।
इस भाँति नाम और छीछा दोनोंकों भवभेषज बतलछाया | दवासे
पीड़ाकी निइत्ति होती है । अतः कहते हैं---
हरन घोर त्रयखूछ-भाव यह कि आध्यात्मिक, आधिदेविक और
आधिभौतिक तापको ही यहाँ झूल कहा है। तामसिक और राजसिक
चक्तियों ही क्रमशः मूढ़ा और घोरा कहलाती हैं। त्ताप तो तामसिक
चनच्तिमं भी होता है, पर झूछका कारण धोरा चृत्ति ही है, इसीलिये 'घोर
तयसूछ' कहा । भवभेषज कंहकर मूढ़ा ब्त्तिका नाश कहा, और अब
घोरा बच्तिका नाश कदते हैं। भगवज्ञाम मूलसहित घोर च्रयतापका नाशक
है। तमोंगुण, अज्ञान या मोह ही सब व्याधियोंका मूछ है |
सो कृपाल राम-भाव यद्द कि जिसके नामके ऐसे गुण हैं, वह
नामी भी बड़ा कृपाछ है। उसकी कृपा कृपा करनेसे अघाती ही नहीं,
यथा--जाछु कृपा नहिं कृपा अधाती |? नामीकों राम कहकर उपर्युक्त
शुण भी रामनामका ही होना सूचित किया |
मोपर सदा अलुक़ूछ रद्दहु-माव यह कि तुमपर तो अनुकूल
हुई हैं, यथा--“इृपापात्र रघुनायक केरे ।? त॒म्हारे आगमनसे मुझे
अभिमान न उत्पन्न हो, इसलिये प्रा्थेना करता हूँ कि सदा अनुकूल रहें ।
२७१ परिशिष्ठ
दो०-सुनि झुरंंडिके बचन सुभ, देखि रामपद नेह ।
बोलेउ प्रेमसहित गिरा, गरुड़ बिगत संदेह ॥
अर्य-भुझुण्डिके शुभ चचन सुनकर और रामपदमें स्नेह
देखकर गरुड़जी प्रेमसे सन्देहरद्दित हो बोले ।
झखुनि भुरुंडिके चचन खुभ-भाव यह कि--
अनुभव सुख उतपति करे, भव अम धरे उठाप्ट।
ऐसी बानी संतकी, जौ ट्विय ब्रेथे आहू॥
(बैं० सं० )
भुशुण्डिजीफे वचनसे भवश्रम छूट गया, आनन्दका अनुभव
हुआ | इससे शुभ बचन कहा !
देखि रामपद नेद्द-भाव यह कि स्नेहके चिए पुलक, गद्गद
देखकर, वथा--पुनि पुनि दरप भुशुण्डि सुजाना ।? प्रमाणोंमें देखना-
सुनना दही बड़ा प्रमाण मिना जाता है। सो दोनसे भुशझुण्डिजीकी
भक्तिका दी पता चछा । यहोँसे भ्रुशुण्डिजीका कथन समाप्त हो गया ।
गरुड़ विगत सन्देहद-भाव यह कि “विगत सन्देह”ः कहकर
शिष्यकी कृतकृत्यता दिखलायी | गरड़ कट्कर राजमदशून्यता दिखलायी।
वोलेडउ प्रेमलट्टित गिरा-भाव यह कि गरुड़जीको गुरुचरणोंमें
बड़ा प्रेम हो गया है, सो पैमके साथ बोलते हैं, यथा--“पुनि स्पेस बोलेड
खगराऊ' यहाँ भी 'बोलछेउ प्रेमसद्दित गिरा |” दूसरी बात यह कि
सवादकी समाप्तिपर कृतशता प्रकट करमा कतंव्य है। सो सची
ऋतशता बिना प्रेमके नहीं होती |
में कृतकृत्य भयेडेँ तब बानी।
सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥
इातपश्च चौपाई २७२
शतपन्च चांपाए
अर्थ-मैं रघुवीरके भक्तिरससे सनी हुई तुम्हारी चाणी
( छुनने ) से कृतछृत्य हुआ ।
रघुवीर भगति रख खानी तव बानी-भाव यह कि बिना
मक्तिस्ससानी बानीके विश्वास नहीं होता। मगवती जनकनन्दिनीकों
मुद्रिका पानेपर भी विश्वास नहीं हुआ, पर हनुमानजीकी संग्रेम वाणी
झुननेपर विश्वास हुआ; यथा-:
कपिके वचन सप्रेम सुनि, उपजा सन बिख़वास ।
ख़ुनि में कृवकृत्य भयडँ-भाव यह कि संशय निर्मूल होनेपर
इढ़ विश्वास हुआ । वक्ता कहते हैं कि “आजु धन्य मैं घनन््य अति! और
श्रोता कहते है कि 'मैं कृतकृत्य भयझँ ।? रामकथा ही ऐसी है कि
इससे वक्ता धन्य और भ्रोता कृतक्ृत्य होता है। दूसरी बात यह कि
नारदकी वाणी सुनी; श्रह्माकी सुनी, शज्लरकी सुनी; पर मैं कृतक॒त्य न
हो सका । कृतकृत्य तो तुम्हारी वाणीसे हुआ |
राम चरन नूतन रति भईढ।
समायाजनित बिपति सब गई ॥<८ !१॥
अर्थ-रामचरणोंमें नयी रति हुई, और मायासे पेंदा हुई
सब विपत्तियाँ जाती रहीं ।
राम चरन नूतन रति भई-भाव यह कि इसके पहले जो
भक्ति थी, वह दूसरे अकारकी थी; यह नयी भक्ति ( जिसे मैं नहीं जानता
था ) हुईं । यह अनुपम खुखमूछा भक्ति आपके आशीर्वाद देते ही मेरे
छुदयमें प्रकट हुईं, यथा--
रास भगति अन्ञपम सुखमूकछा । मिले जो संत दोहिं जनुकूछा॥
मायाजनित विपतति सब गई-माव यह कि अविद्यासे उत्पन्न
अस्मिता; राय, द्रेष और अमभिनिवेश, ये चारों कक्लेंश चले गये | भक्ति-
न्जक
३ परिशिष्ठ
चिन्तामणिकी प्राप्तिके पश्चात् मोह-दरिद्र उसके निकट नहीं आता;
लोभमकी कला नहीं चलती, कामादि दूर मागते हैं, मानसरोग व्यापते
ही नद्ों, अतः विपत्ति सब चली गयी ।
मोह जलरूधि बोहित तुम भये ।
मो कहूँ नाथ विबिध सुख दये ॥
जर्थ-मोहसमुद्रके लिये भाप जद्दाज दो गये मौर मुठ
अनेक प्रकारके सुख दिये ।
मोह जलधि वबोहित तुम भये-भाव यह कि सदगुर,कर्णघार-
मात्र होता है; जहाज तो अपने शरीरको, मोहसमुद्रकों पार करनेके लिये
बनाना पद्ता हैं। सदगुरुके कथनानुसार प्रुरुषार्थ करना पढ़ता है; यथा-
नर तलु भय बारिधभ कह बेरो | सनसुख सरुत जनुअद् मेरो॥
कर्णधार सदगुर ृ॒ृद नाथा | दुर्लभ साज खुझम करि पाया ॥
जो न तरे भवसागर, नरसमाज अस पाय ।
सो कृतनिन्दक मन्दसमति, जातमहन गति जाय ॥।
पर आप तो स्वयं मेरे लिये जद्दाज हो गये, मुझे कुछ करना दी
न पढ़ा, आपके उपदेशमात्रसे मोह दूर हो गया ।
मो कहेँ नाथ विविध खुख दये-भाव यह कि शान, विवेक,
विरति, विज्ञान तथा मुनिदुलंभ गुण ये दी सुख# है, वेषयिक क्षुद्र
उुखोकी सुख गिनती द्वी नहीं, बस्त॒तः वे दुःखक्े अन्तर्भूत्त है । सो
इन पॉचों सुर्खोको भी आपने दिया, यथा--
शान विवेक विरति चिज्ञाना । सुरदुर्लभ शुन जे जग जाना॥गा
3३७ *॥5 *** |] प्रभु कद देन सकल सुख सही ॥
# शानसे योगानन्द, विवेकसे आत्मानन्द, विरतिसे अद्गैतानन्द, विशानसते
विधानन्द, मुनिदुलंभ गुणसे शान्तादृत्तिजन्य सुख अभिद्दित है ।
श्८
शतपश्न चौपाई २७8
मोपहि होइ न गतिडउपकारा |
बंदों तव पद बारहि बारा॥<शा।
अर्थ-मुझसे पत्युपकार नहीं होता, ( अतः ) तुम्हारे चरण-
का वार-वार चन्दन करता हूँ ।
मोपद्धि होइ न प्रतिउडपकारा-भाव यह कि उपकारीका
प्रत्युपकार करना सनातन घम्म है। बदलेमें समान मूल्यका द्रव्य देना
चाहिये, अल्प मूल्यका द्वव्य देना ठगना है । सो इस भक्ति-चिन्तामणि-
जैसी अमूल्य मणिके बदलेमें देनेयोग्य वस्तु नहीं, अतः मैं प्रत्युपकार
नहीं कर सकता ।
चंदों तब पद वाराहिं वारा-कऋणीका ऋण चुकाना यदि असाध्य
हो, तो उचित है कि घनीसे प्रार्थना करके क्षमा मॉगे और खयं उसका
दास होंकर रहे । अतः गरुडजी स्पष्ट कह रहे हैं कि त॒म्हारा ऋण मैं
नहीं चुका सक्रता, अतः बार-बार तुम्हारे पैर पढ़ता हूँ ।
पूरनकाम रास अनुरागी ।
ठुम सम तातन कोउ बड़भागी ॥
अर्थ-तुम पूर्णकाम हो, रामाज्ठरागी हो, तुम्हारे समान
कोई भी भाग्यवान् नहीं है ।
पूरनकाम राम अलनुरागी-भाव यह कि रामानुरागी पूर्णकाम
होते हैं, उन्हें कोई कामना रहती ही नहीं । यदि किसीकों विषयकी
कामना है; तो वह विषयानुरागी है, रामानुरागी नहीं |
सुमिरत रासहिं तजहिं जन, तृनसभ बिषय बिझास॥
पहले भक्तिमणिके बदलेमें कुछ न देनेका कारण यह कहा कि
श्ज्ण् परिशिष्ट
उसके समान मूल्यवान् दूसरा पदार्थ ही नहीं है। अब कहते दे कि
पूर्णामकों यदि कोई देना भी चादे तो क्या दे ! यथा--
५ फहा तुम्ह पूरनकामा |
तुम सम तात न कोउ बड़भागी-भाव यह कि जिसका भगवत्-
चअरणेंसि सम्बन्ध हुआ, वे ही बड़भागी है; यथा--
अतिसय बड़भागी चरमने छोगी।?
बिड़्मागी सन अवध अभागी।!
बंद़भागी अंगद हनुसाना । चरन कसछ चापत विधि नाना ॥
परन्तु तुग्हारे समान कोई नहीं । क्योंकि--
घुर नर मुनिकर याहाँ रीती । स्थारथ लोगि करहिं सब औती ॥
सो भगवानमें ख्ार्थफे लिये प्रीति करनेवाले भी बड़मागी दूँ ।
परन्तु तुम तो निःख्वार्थ प्रीति करमेयाले दो, इसलिये सबसे बढ़कर दो |
संत ब्रिटप सरिता गिरि धरनी ।
2
परहित हेतु सबन्हके करनी ॥८३॥।
अर्थ-संत, चुक्ष, नदी; पर्चतत और पृथ्वी, इन सबकी करणी'
परायेके द्वितके लिये दे ।
संत विटप सरिता गिरि घधरनी-भाव यह कि विटप, सरिता;
गिरि, धरणीकी जद करणी है, ये खुख-दुःख, भलेनबुरेका बिना विचार
किये सबके काम आते एूँ | यहीं गति सं्तोंफी भी है। इनकी भी जड
करणी है। यथा---
कार्टे परसु मरूय सुदु भाई । निजगुन देह सुगंध बसाई॥
इस प्रकार दूसरेक्रे द्वितफें लिये हुःख सहनेबाला सिवा संतके कोई
चेतन पदार्थ नहीं हो सकता।
दतपशञ्च चौपाई रच
परद्वित हेतु खबन्दके करनी-अपने लिये ये कुछ नहीं करते।
इनकी सम्पत्ति. ही दूसरोंके लिये है, इनके काम कभी नहीं आती | भाव
यह कि आपको प्रत्युपकारकी न इच्छा है, और न कोई आपका
प्रत्युपकार कर सकता है। घिटप, गिरि; धरनीके सब कोई उपकझत हैं;
पर कोई प्रत्युपकार इनका करना चाहे तो सिवा प्रणाम करनेके और
क्या कर सकता है ? अब इन पॉचोंमें भी संतके प्रथम उल्लेखका
कारण कहते हैं--
संत हृदय नवनीत समाना ।
कहा कबिन पर कहे न जाना ॥
अर्थ-संतका हृदय कवियोंने मकक््खन-सा कहा, पर उनसे
कदहते न बना १
संत हृदय-भाव यह कि विटप, सरिता, गिरि, धरनी जड होनेसे
छृदयह्दीन हैं, सुख-हुःखका अनुभव भी इन्हें जडताके तारतम्यानुसार
न्यून होता है, परन्ठु संत जो कुछ करते हैं; सो द्वृदयकी कोमछताके
कारण करते हैं) अतः ये सबसे बड़े हैं ।
नवनीत समाना-भाव यह कि इतना कोमछ दृदय होता है कि
तनिक-से तापसे द्रवीभूत हो उठता है, जिस भाँति मक्खन तनिक-से तापसे
पिघल जाता है ।
कहा कबिन पर कहे न जाना-भाव यह कि संतके हृदयकी
कोमलताकी उपमा देने चले । उन्होंने यह न जाना कि यह विषय
वर्णनातीत है, यथा-'कद्दि सक न सारद सेध नारद सुनत पदपंकज
गह्े ।! कही वह वस्तु जाती है जिसके समान कोई दूसरी वस्ठु भी हो ।
उपमा-उपमेयमें समान घमम होना चाहिये, सो यहाँ घर्ममें समानता ही
' नहीं है ।
र्छ्छ परिशिष्ट
निज परिताप द्ववें नवनीता |
पर दुख द्रवहिं संत झखुपुनीता ॥८४॥
मर्थ-अपने परितापसे मक्खन द्रधीभूत होता है। पर
पुनीत संत परदुःखले द्रवीभृत होते है ।
निज परिताप दये नवनीता-भाव यह कि मक्खनमें फोमलता
अपने छिये है। जबतका अपनेको ताप न पहुँचे, तबतक दुसरेक्े
परितापसे मक्खनमें कोई विकार नहीं उत्पन्न होता ऐ। अतः 'खदुःखसे
द्रवीभूत रोना” यह मर्खनका धर्म है | परन्तु संत खद्दःखसे द्ववीभूत
नहीं देते, बथा--“खलके वचन संत सद्द जैसे ।! 'जो सद्दि दुख पर छिद्ध
दुरावा ।' संत सद्॒दिं दुख परह्ित लागी ।? इत्यादि ।
पर दुख द्ववहिं संत खुपुनीता-भाव यह क्रि पुनीत संत्त
दूसरौंके दुःखसे छुखी शोते हँ । अतः पर-दुःखसे ढुसी होना संतका धर्म
है। सो “स्व” 'पर! के भेदसे संत ( उपमेय ) और मक्खन ( उपमान) में
समान घमका दी अभाव है | अतः उपमा देनेवाले कविसे भूछ हुईं |
जीवन जन्म सफरू मम भयऊ ।
तब प्रसाद सब संसय गयऊ ॥
अर्य-मैरा तो जीवच और जन्म सफल दो गया (फ्योंकि)
तुम्हारे प्रसादले सब संशय चला गया ।
जीवन जन्म सफर मम भयऊ-भाव यह कि भक्ति दृदयमें न
नेसे जीना अक्ारथ ऐ) उसके शरीरका ढाँचा मुर्देकी भाँति बना हुआ
है, बह अमझलरूप है, यथा---
जो दरि भगति हुदय नर्दिं जानी । जीवचत सब समान सो प्रानी 0
उसका जन्म भी निष्फछ है, तथा--
दशातपञ्च चौपाई २७८
पुश्नतती जुवती जग सोई । रघुपति भगत जासु घुत होई #॥
नतरु बाँझ भलि वादि वियानी । राम बरिस्रुख् सुतते द्वित हानी॥
तथा--
ते नर नरकरूप जीवत जग भवर्भजन पद बिमुख जगमागी।॥
मुझे आपसे भक्ति मिली; अतः जीवन-जन्म दोनों सफल हुए।
- सब प्रसाद खब संसय शयऊ-भाव यह कि रामविपयक
संशय मिटानेके लिये तो मैं आया था पर आपने ऐसी कृपा की कि जितने
संशय ये वे सब निर्मूल हो गये; अब में विगतसन्देह हो गया । आप
ही मेरे सदगुरु हैं; यथा---
सद्गुरु मिले जाहिं जिमि संसय अ्रम समुदाय ।
जानेहु सदा मोहि निज किंकर |
पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर ॥८प५॥
अर्थ-मुझे सदा अपना आज्ञाकायी समझना, हे उम्रा !
ऐसा वार-वार गरुड़जीने कहा।
जानेह सदा मीद्चि निज किंकर-भाव यह कि ऋण (गुरुदक्षिणा )
न चुका सकनेके कारण सदाके लिये दासत्व खीकार करते हैं, अथवा-
नप्य सोहिं निज सेचक जानी । सप्त प्रक्ष मम कहहु चखानी॥
>कंहकर प्रभ किया था; अब उत्तर पानेपर सदाके लिये सेवक
होनेकी ५७, 4 का ऑड पूर्णकासको हर
होनेकी प्रतिज्ञा करते हैं । सेवाकी भी इच्छा नहीं; अतः सेवक
जाननेके लिये प्रार्थना करते हैं !
उमा-उमा सम्बोधनसे भाव यह कि भुझुण्डि-रारड़-संचाद समाप्त
हुआ, उत्तरघाद पूरा हों गया, अब कथा महादेवजी कह रहे हैं, अत्तः
उमाकों सम्बोधन करके गरुड़जीकी विदाई कहते हुए अपने संवादका
भी उपसंहार करेंगे ।
२७२, परिशिष्ठ
पुनि युनि कहद विहंगवर-भाव यहद्द कि वाक्यकों यथार्थ रूपमें
ग्रहण करनेके लिये बार-बार कहते हैँ, जिसमें उनका वाक्य विनयप्रदर्शन-
रूपसें णहीत न हो | इस वाक्यसे गझंडजीका अभिमानरहित होना
सूचित किया, यथा--
होहहिं. कीन्ह कबरहुँ अभिमाना । सो खोचे चद्द कृपानिधाना ॥
दो०-तासु चरन सिर नाइ करि प्रमसहित मतिधीर।
गरुड़ गयेउ बेकुंठ तब हृदय राखि रघुबीर ॥
अर्थ-डसके चरणोंम प्रेमसद्ित सिर नवाकर मतिधीर
गरुडजी रघुचीरकों छृद्यमें रखकर चेकुण्ठ गये ।
प्रेमसद्दित ताखु चरन सिर नाइ करि-भाव यह कि “पुनि पुनि
उमा कहद बिहंगबर' से वाचा, 'प्रेमसहितः से मनसा और “चरन
सिर नाइ! से कर्मणा प्रणाम कहा | जब्र गुरुजी आये, तब अणाम नहीं
लिखा, पक्षिराठक्रे भावसे आये थे, इसलियि कागजीने पूजा की; यथा--
झऊावत देखि सकछ खग राजा | ........ ..----००-०.--००० |
अति आदर खगपति कर कीन्हा. .-करि पूजा समेत अनुरागा ।
अब सत्संगसे राजमाव जाता रहा; अतः सिर नवाते हैं;
मुझण्डिजी मी प्रणाम स्वीकार करते हैं ।
हृदय राखि रघुबीर-भाव यह कि कागजीका उपदेश सद्यः
फलीमूत हुआ; रघ॒वीरने कृपा की, गझड्जीके छदयमें आ गये | अथवा
सत्संगका यह फल है कि हृदयमें प्रचण्ड विघाद लेकर आये थे ओर अब
हृदयमें रघुबीरकी रखकर चले । इत्यादि
तब गरुड़ बैकुंठ गयेड-इस समय अभिमानझत्य हैं, इसलिये
खगपति न कहकर गदड़ कहा | जबसे मोह हुआ था; तबसे उसे दूर
इतपस्च चौपाई घ्ट०
करनेके उपाय छंगे थे, विषादीकी वैकुण्ठमें गति नहीं अतः बैकुण्ठ न
जा सके थे, सत्संगकी महिमासे वेकुण्ठ गये ।
मतिथीर-भाव यह कि गरुड़जी विगतविषपाद हुए; रघुवीरकों
दृदयमें रखनेमें समर्थ हुए; अतएवं मतिधीर विशेषण दिया। अथवा
भवसागर पार चले गये इसलिये मतिधीर कहा, यथा--
गे बारिध पार गयउ मतिधीरा ।
दो०-गिरिजा संतसमागम सम न छाम कछु आन।
बिनु हरिकृपा न होइ सो गावहि बेदपुरान ॥
लअर्थ-है गिरिजे | संतसमागमके समान कोई लाभ नहीं
है, (पर ) बिना हरिक्ृपाके चह नहीं होता, ऐसा बेद-पुराण
ऋद्ते हैं ।
गिरिज्ञा-भाव यह कि “गिरिजा? सम्बोधनसे ही इस कथाका
उपक्रम किया था। यथा---
गिरिजा कट्देडें सो सब पतिह/सा । में जेहि समय गयेडे खग पासा ॥
अब सो कथा सुनहु जेंहि हेतू । गयेड काय पद्दि खरकुक केतू ॥
अब उसी सम्बोधनके साथ उपसंहार करते हैं ।
संत्समागम सम न लाभ कछु आन-माव यह कि नरदरीर
पाकर भगवत्-भजन न करनेके बराबर कोई हानि नहीं है, और न संत-
समागमके समान कोई छाम है क्योंकि---
मत्ति कीरति गति भूत्ति भछाई । जब जेहि जतन जहाँ जो पाई ॥
सो जानब सतसंश भ्रभाऊ | छोकहु वेद न जान उपाऊ गा
चिज्च॒ सतसंग विबेक न होईं। रामकृपा विन्नु सुलभ न सोई ४
विश्व दरिकृृपा न होइ सो-भाव यह कि कोई काल या कोई
देदा ऐसा नहीं है, जहाँ संत दुर्लभ हों, यथा---
२८१ परिशिए्ट
सबहिं सुलभ सब्र दिन सत्र देसा | सेवत्त सादर समन कलेसा ॥
पर उनसे भेंट नहीं होती । निकद रहते हुए भी पता नहीं चलता
कि अमुक व्यक्ति संत हैं, मनमें उनके प्रति कुभावना रहती है, इससे
संगतिका लाभ नहीं होता; जब भगवानकी कृपा होती है, तमी उनसे
संग होता है, मनमें पश्चात्ताप होता है, आश्रय होता है कि इतने दिनों-
तक इन्हें क्यों नहीं जाना । अतः जब सत्संग हो तो हरिकृपा समझनी
चाहिये ।
गावदि वेद्पुरान-भाव यह कि वेद-पुराण भगवानकी महिमा-
का गान करनेवाले हूँ, कल्याणका मार्ग दिखानेवाले हैं, वे ही क्रमशः
स्वतः और परतः प्रमाण हैँ, उनका कहना अभ्रान्त सत्य है।
कहेडें परम पुनीत इतिहासा।
सुनत श्रवन छूटे भबपासा ॥
अर्थ-परम पुनीत इतिहास कहा जिसके खुननेसे भवपाध
कूठता है ।
कहेडें-भाव यह कि चरित समाप्त हुआ; भुशझुण्डिजीने भी चरित्त
समाप्त करके यही कहां; यथा--
कहेजोँ त्ात दरिचरित जअनूपा। व्यास समास स्वसति अनुरूपा ॥
शिवजी मी चरित समाप्त करके वही बात कह रहे हैं ।
परम पुनीत इतिद्वासा-“इतिद्ासा? बहुवचनका प्रयोग किया;
क्योंकि इसमें मगवत्-भागवत दोनोंका इतिहास है, अथवां और
अबतारोंके चरित पुराण हैं, राम और कृष्णके चरित रामायण और
महाभारत इतिहास हैं | जिससे पाप कटे सो युनीत, और जिससे भव-
अन्ध कटे सो परम पुनीत है ।
खुनत अचन छूटे भवपासा-सुनत अबन! से साधन-सौक्य॑
दातपश्च चौंपाई २८२५
कट्दा | इससे बढ़कर सुभीता और क्या होगा कि केवल कानसे सुना करें
और फल इतना बड़ा कि भवपाश छूट जाय । भवपाश अर्थात् जगजाल |
जन्मसे लेकर मरणतक जगजाल है, यथा--'जनन मरन जहेँ रूगि जग-
जाल ।? भाव यह कि ज्ञान दोता है और ज्ञान होनेसे जगजाल
छूटता है|
है प्रनत कछूपतरु करुनापुंजा ।
उपजै प्रीति रामपदकंजा ॥८६॥
अर्थ-करुणापुञ्ञ राम कल्पतरु हैं; ( उनके ) चरणकमलॉमें
भीति द्वोती है।
प्रनत कलूपतरु करुना पुंजा-भाव यह कि भ्रीरामचन्द्रका खभाव
कव्पवृक्ष-सा है, नतो वे किसीके सम्मुख हैं. न विमुख हैं; परन्तु ऐसे
कारुणिक हैं कि जो उनकी उपासना करता है, वही शोकरहित हो जाता
है और मॉगनेपर वह अभीष्ट प्रदान करते हैं, पात्रापातवकका विचार नहीं
करते; यथा[---
देव देवतरू सरिस सुमाऊ। सनमुख विमुख न काहुएटिं काऊ ॥
जाए निकट पहिचानि त्तरु) छाँह समन सब सोच |
साँगे अभिमत देत जग, राड रंक भर पोच॥
रामपद्कंजा प्रीति उपजें-भाव यह कि जिस भक्तिकी इतनी
सहिमा गायी गयी है, बह भक्ति इस कथाके श्रवणमात्रसे उत्पन्न हो
जाती है। सत्संगसे हरिकथा-अ्रवण, उससे मोहनाश और मोहनाशसे
श्रीचरणोंमें अनुराग, यही क्रम है, यथा--
विज्चु सतसंग न हरिकथा, तेहि बिचु सोह न भाग ।
भोह सगे विज्ु रामपद, होह न इठ अजुराग ॥
श्८३ परिश्ििष्ट
सन क्रम बचन जनित अघ जाई ।
खुनहिं जे कथा श्रवन मु छाई ॥
जर्थ-भाव यह कि मन-तन-वचनसे किये छुए पाप नष्ट
होते हैं, यदि कथा मन लगाकर खुनी जाय ।
मन क्रम चचन जनित अघ जाई-भाव यह कि पाप तीन ही
प्रकारसे होते हें; मनसे, वचनसे या कर्मसे | दोसे या तीनोसे करनेसे
उसका और भी उत्कर्ष बढ़ जाता है। सो वे सब नष्ट हो जाते हैं ।
भाव यह कि सम्पूर्ण कमंकाण्डका फल भी इसीसे हों जाता है। कर्मकाण्ड
४ पके लिये किया जाता है, सो कथाश्रवणमात्से निरंत्त
होता है !
खुनहिं जे कथा अ्रवन मु लाई-भाष यद्द कि सुननेमें इतना
ही करना है कि मन छगा दे | इन तीन अर्धालियोमें क्रमशः तीनों
काण्डका फछ कहा । 'सुनत श्रवन छूटे भमवपासा? से ज्ञानकाण्डका फल
कहा, 'उपजै प्रीति रामपदकंजाः से उपासनाकाण्डका फल कहा; और
अब 'मन क्रम वचन जनित अघ जाई से कर्मकाण्डका फल कह रहे हैं ।
तीथोटन साधन समुदाई ।
जोग बिराग ज्ञान निपुनाई ॥८ण।
नाना कम धर्म ब्रत दाना।
संजम दम जप तप मख नाना ॥
भूतदया द्विज गुरू सेवकाई।
बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ॥८८॥
शतपञ्च चौपाई २८७
जहँ ऊगि साधन बेद बखानी ।
सबकर फल हरि समगति सवानी ॥
अर्थ-हें भवानी ! तीर्थयात्रा और उसके सब साधन;
योग-चिराग-शानकी निपुणता, संयम दूम। जप, तप और
नाना प्रकारके यज्ञ, भूतदया और गुरु-त्राह्मणकी सेवा, विद्या
विनय और घिवेककी चड़ाई ( संध्षेपत:) जितने साधनोंका
चेदने बखान किया है; उन स्बोक्ा फल हरिभक्ति है।
तीरथांडन साधन सम्ुदाई--जीवकों तारता है, इसीलिये तीथे
कहलाता है ) सब्र छोग तीर्थयात्रा संसार-सागरसे तरनेके लिये करते हैं;
परन्तु तीर्था। फछ सबको नहीं होता; जो तीर्थाचित साधनके साथ
यात्रा करता हे उसीकों तीर्थफू मिलता है संक्षेपमें उन साधनोंका
वर्णन राम-वनयात्रा-प्रकरणमें भरतजीद्वारा दिखत्यया है, यथा--
सहित समाज साज सब सादे । चले राम-चन-अटन पयादे
कौमक चरन चलत बविन्वु पनहीं । ****-“'****"*****“**-- ॥
एहि विधि भरत फिरत बनसाहीं। नेसु पेसु छसि सुनि सकुचादीत
चारु बिचित्न पबित्र बिसेखी। बृक्षतत भरतु दिव्य सब देखी॥
सुनि मन सुदित कहत रिपिराऊ । हेतु नाम गशुच घुन्य प्रभाऊ ॥!
कतहुँ निमजन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ विछोकत सन जमिरासा ॥
कतहु बठि सुनि जायहु पाई । सुसिरत सीयसहित दोड भाई ॥
फिरहिं गये दिन पहर अढ़ाईं। अभ्रु पदकसक बिछोकहिं जाई ॥
कहत झुनत हरिहर सुजस, गयेड दिचस सह साँझ ।
इस भांति तीर्थाटनका फल होता है, नहीं तो नहीं होता ।
जोग विराग ज्ञान निधुनाई--किसी विषय निपुणाई तभी
श्टण परिशिष्ट
होती है, जब उसके विरोधी विषय अच्छे न छरगे;--अति नय निपुन
न भाव अनीती ।? अतः शान-विराग-योगमें चद्दी निषुण है जिसे राग,
चैपम्य और बद्दिमुखता अग्रिय दो ।
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना--नित्य-नैमित्तिक और काम्यके
भेदसे कम तीन प्रकारके होते हूं फिर इनमेंसे एक-एकके अनेक भेद हैं |
घर्म्रे भी चर्ण और आभ्रमानुसार बहुत भेद दूँ । अतके भी
चान्द्रायणादि अनेक भेद हूँ। दाता-प्रतिगद्दीता और देयके भेदसे दानके
अनेक भेद हूँ ।
संज़ञम दम जप तप मख नाना--मनको वशमें करना संयम
और इन्द्रियॉका दमन करना दम टै, उपवासादि शत दूँ, अश्वमेघ, राज-
सूयादि यश्ञ हू ।
भूतदया छिज गुरु सेवकाई-शूतदया अर्थात् प्राणिमात्रपर
दया करना परम धर्म है ओर छिज-गुरुक्की सेवा करना परम कल्याणका
मार्ग है, आपत्तियोंसे न्राण पानेका यही उपाय है; यथा--
दुलि हुल सजदू सकल कएयाना । झस लसींस राउर जग जाना॥ए
विद्या ब्िनय विवेक चड़ाई--विद्यासे ही विनय होता है,
विनयसे पात्रता होती है, पात्रतासे घन होता है, धनसे धर्म और धर्मसे
सुख होता ऐ, विद्यासे ही विवेक होता है | यथा-
विद्या बविधु विधेक उपजाये। श्रम फल पढ़े किये अरु पाये ॥
जहेँ लगि साधन बेद् वखानी-भाव यह कि इतने साधन तो
गिनाये गये; इनके अतिरिक्त और भी जिन साधघनोंका बखान वेदमें
मिले अर्थात् अखिल वेदोक्त साघन ।
सवकर फल हदरिसिगति भवानी-माव यह कि साधन तो
इतने एँ और सिद्धि एक है और वह सिद्धि फलरूपा हरिभक्ति है।
यदि हरिभक्ति हुई तो साधनकों सफल समझिये और यदि नहीं हुई तो
शतपश्च चौपाई श्टदे
अममात्र हाथ छगा। फल-सिद्धि नहीं हुई । कथाश्रवणसे तीनों काण्डकी
>.... 9 च्ु
फूल-सिद्धि कह आये, अब भक्तिमें सब्रका पर्यवसान करते हैं |
सो. रघुनाथमगति श्रुति गाई।
रासकृपा काहू एक पाई ॥ <&॥
अर्थ--उस रघुनाथ-भक्तिका गान वेदने किया है, रामकी
कृपासे किसी एकको मिलती है।
सो रघनाथभगति-माव यह कि वह फलछरूपा भक्ति; जिसके
लोभमें पड़े हुए. भक्तजन म॒क्तिका भी निरादर करते हैं | 'सरघुनाथमक्ति
से सगुण ब्रह्मकी भक्ति अमिप्रेत है
अति गाई-भाव यह कि वेदान्तशास्त्र, उपनिषद आदि उपासनाओं-
से ही भरे पड़े हैं, और वे उपासनाएँ मुख्यतः सगुण ब्रह्मकी ही
मन्व्रभागर्मे भी उपासना-ही-उपासना है ।
रामकृपा काह एक पाई-भाव यह कि--
धघर्मसील बिरक्त अरु छ्ानी । जोवनमुक्त ब्रह्म पर प्रानो ॥
सबते स्रो दुर्लेस सुरराया | रामभगति रत्त गत मद साया ॥
रामभक्ति अति हुल्म है, किसीकों जल्दी नहीं मिलती । रामकी
कंपासे किसी भाग्यवानकों कभी मिल जाती है, साक्षात् दर्शन दोनेपर मी
मगवानसे मक्ति ही महात्माआने माँगी है ।
दो०-सुनिदुरूम हरिसगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास।
जे यह कथा निरंतर सुनहि मानि बिस्वास ॥
अर्थ-झुनिदुेभ हरि-भक्तिकों वे मनुष्य बिना प्रयास पा
जाते हैं जो इस कथाकी विश्वास मानकर निरन्तर खुनते हैं ।
सुनिदुेभ हरिभगति-भाव यह कि मुनियोके लिये कुछ भी
२८७ परिशिष्ठ
दुर्लभ नहीं, इन्द्रपदकों तो वे सखे हाड़की माँति नीरस तथा अपवितन्र
मानते हैं, सं शानके निधान हैं, पर भगवद्धक्ति उनके लिये भी हुर्लम
है । उन्होंने भगवानसे जब माँगो तो भक्ति ही मॉगी; यथा- ४५
सनकादि-
“देहु भगति रघुपति अति पावनि |! 'देहि मगति संस्टति सरि तरनी ॥!
चशिपष्ठजी--
जन्म जन्म अभ्रु पद कमकछ, कबहूुँ घटे जनि नेहु ।
नारदजी--
राका रजनी भगतति तव रास नाम खोह सोम ।
अपर नाम उडुगन सरिस, बसों भक्त-डर-व्योम ॥
अनिज्ञी--
चरन सरोरुद नाथ जनि कवहुँ तजे सति मोर ।
शरभंगजी-
जोग जज्ञ जप तप जत कीन्दा । प्रश्चु कहँ देह भगति बर लीन्द्रा ॥
खुतीधणजी--
अनुज जानकी सहित भप्रश्रु चाप बान घर राम |
सम हिय गगन हंदु हव बसहु सदा यह काम ॥
अगस्त्यज्ञी--
यह बर माँगों कृपानिकेता | वसहु हृदय श्रीअचुज समेत्ता ॥
सखब्िरक भगति बिरति सतसंगा।
नर पाचहिं विनहिं भ्रयाख-भाव यह कि इन उपयुक्त मद्दात्मा-
अने अनेक साधन किये थे, वे ज्ञानादिसे सम्पन्न थे, उन्हें खयं भगवानके
दर्शनतकका सौमाग्य प्राप्त हुआ, फिर भी उन्हें भक्तिके लिये वरदान
मॉगना पड़ा, वह भक्ति मनुष्य बिना प्रयास पा जाता है|
इातपद्च चौपाई रेटट
जे यह कथा निरंतर खुनहिं--भाव यह कि जो मनुष्य इस
रामचरितमानसकी कथा बराबर सुनता रहता है। बात इतनी हो दै
कि कथा सुननेमें भंग न होने पावे; कथाकी प्यास बनी रहे । जिसे
कथाको प्यास नहीं होती, उसे रस नहीं मिला, यथा-
रामचरित जे -सुनत अधाहीं। रस बिसेष जाना तिन नाहीं॥
' झानि थविखासख-भाव यह कि बिना विद्वासके कोई सिद्धि नहीं
होती ) मनमें यह दृढ़ धारणा रहनी चाहिये कि निश्चय इसके अ्रवणसे
राममक्ति होगी । कथाभागमें संशय न करे; विश्वास करके कथा सुने-
करिय न संसय अस जिय जानी । सुनिज् कथा सादर रति मानी ॥
सोइ सबज्ञ गुनी सोइ ज्ञाता।
सोइ महि. मंडित पंडित दाता ॥
अर्थ-बद्दी सर्वेज्ञ है; वही गुणी है, चही ज्ञाता है, वही
पृथ्चीमें खुन्दर पण्डित है, वही दाता है।
' खोद सर्वेक्ष-जों प्रथक-प्थक् सब बातोंकों जाने, भूत-मविष्य-
बर्तमानका जिसे ज्ञान हो, उसे सर्वश्ञ कहते हैं, यथा---
सत्र जानेड सर्वज्ञ' 'सोड सर्वज्ञ यथा त्रिपुरारी
ग्रुनी-जों देव या सानुष शिल्पका जानकार हो, उसे गुणी कहते
है। यथा[--
जोरिय कोड बड़ गुनी छुलाई १
पठए बोलि गुनी दिन नाना । जे बितान बिधि कुसक सुजाना ॥
पूछा गुनिन रेख लिन खाँची। भरत भ्ुआल दोष यद्द खाँची 0
ज्ञाता-जिसे परमार्थका ज्ञान हो उसे ज्ञाता कहते हैं, यथा--“ठुम
पंडित परमारथ ज्ञाता !! अथवा ज्ञेय चार हैं--नीति, प्रीति, परमार्थ
९ कप
आर खार्थ। इनका जिसे ज्ञान हो वह ज्ञाता है; यथा--
२८०९ परिशिष्ट
नीति प्रीत्ति परसारथ सखारथ । कोठ न राम सस जान जथारथ ॥
सोइ महिमंडित पंड्ित-भाव यह कि सार्वभौम शाज्वश, यथा-
भमहाराज तुम पंडित जानी ! यहाँपर ज्ञानीसे ब्रक्षनिष्ठ और
पण्डितसे श्रोत्रिय अमिप्रेत है। 'सोइ महिमंडित पंडित! का अर्थ हुआ कि
पृथ्वीमरम शोमित पण्डित | विद्याकी शोभा विवेकसे होती है; यथा---
धबिद्या वित्ु विवेक उपजाए ।)
दात्ता-महिमंडित! पदका यहाँ भी अनुवर्तन होगा, अर्थात्
सर्वोप्फारी दानवीर । वीर तीन प्रफारके होते ई--युद्धवीर, दयावीर
और दानवीर । उसमें भी उसीकी कीर्तिकी शोभा है, जिससे गड्ञाकी
भाँति सबका हित हो, यथा--
फौरति भनित भूति सलि सोई। सुरसरि सम सबकर हित होई ॥
घर्मपरायन. सोइ. कुलबाता ।
रामचरन जाकर सन राता ॥€ना
अर्थ-चही घर्मपरायण है, चही कुछका रक्षक है, जिसका *
भन रामके चरणोंमें रंग गया है ।
घर्मपरायन सोइ-भाव यह कि घर्माचरणका फल तो यही है कि
भगवानमें प्रीति हो; यदि सगवच्चरणमे अनुराग नहीं हुआ, तो बह
धर्माचरण ब्यर्थ है, और यदि अनुराग हुआ तो वह पापी होनेपर भी
सद्यः धर्मानुरागी हो जायगा; यथा--करों सद्य तेष्टि साधु समाना |?
सोइ कुछत्नाता-भाव यह कि पुत्र होनेसे सन््ततितत्नका विच्छेद
नहीं होता, पुं नाम नरकसे रक्षा होती है, इसीसे पुप्न होनेसे कुछकी रक्षा
कद्दी गयी है | यदि प्रथ्वीका भारभृत पुत्र उत्पन्न हुआ; तो उसकी
उत्पत्ति और उसका जीवन सब व्यर्थ हे वरं उससे तो सबकी हानि है ].
यथा---
नतरूु धाँक्ष भक्ति वादि चिजआानी | रामचिम्रुख सुठत्तें बढि द्वानी ॥
श्ष
शतपश्च चोपाई २००
रामचरन जाकर मन राता-भाव यह कि जिसका मन रामरंगयें
रंग गया वही सर्वज्ञ, गुणी; ज्ञाता, पण्डित, धर्मात्म और कुछरक्षक
है | जिस बातकी उसमें कमी भी है, वह सब पूरी हो जायगी और यदि
वह रामरंगर्म नहीं रेगा है, तो उसके सब गुण व्यर्थ हैं, एक भी गुण
नहीं रह सकेगा; यथा--
राम नाम बिदु गिरा न सोहा | देखु बिचारि त्याग मद सोद्दा ॥
बसन हॉन नहिं सोह खुरारी। सब भूपन भूपषित बर नारी ॥
राम बिझस्रुख संपत्ति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिचचु पाई ॥
सो सब करम धरम जरि जाऊ। जेंद्वि न रामपद॒पंकज भाऊ॥
राममक्त कुलच्ाता कैसे होता है ! इसके लिये एक विशेष कारण
यह है कि नी धन्योंमें उस कुछकी मी गिनती है, जिसमें भक्त जन्म
ग्रहण करता है |
नीतिनिपुन सोइ परम सयाना |
श्रुति सिद्धांत नीक तेहि जाना ॥
अर्थ-चद्दी नीतनिपुण है, चद्दी परम सयाना है, उसीने
श्रुतिखिद्धान्तको भलीमाँति जान पाया है।
नीतिनिपुन-धर्मका किसी प्रकार उल्लंघन न हो; धर्मविरोधी
अर्थ और धममार्थाविरोधी कामका सेवन करते चलना; संक्षेप यही
नीति है; पर ऐसी नीतिका लक्ष्य भगवत्पाप्ति ही है । अतः जिस मार्गसे
भगवद्प्रात्ति हों, उसीका अवरूम्बन करना नीतिकी निपुणता है; यथा--
उपरोहिती कम अति मंदा। चेद पुरान सम्रति कर निंदा ॥
जब न लें मैं तव बिधि मोदी । कहा छाभ आगे सुत तोही
परमातसा जह्ाय नर रूपा । होइद्दि रघुकुछ भूपन भूपा&॥
तब मैं हृदय बिचारा जोग जज्ञ ब्रत दान |
जा कहँ करिआ सो पैंहों धर्म न एड्वि सम जान
२०१ परिशिष्ट
सोह परम सयाना-भाव यह कि जो अपने हिितकों समझ सके
और उसके लिये उद्योग करें, वे ही सयाने हैँ ) परन्त॒ परम सयाने बे हैं,
जो अपने परम दितकों पद्िचानकर उसके लिये प्रयक्ष करें; यथा--
सुनु बायस तें सहज सयाना । काद्दे न मॉगेसि अस बरदाना ॥
सब सुखखानि भगति ते सोगी। नहिं जग तोदहि समान बढ़ भागी ॥
श्रुति सिद्धांत नीक तेद्दि जाना-भाव यह कि श्रुतिमें सइलों
साधनका उपदेश है, पर सबका मन्थन करनेसे यही सिद्धान्त निकलता
है कि सब सुखोंको छोड़कर रामकी भजों; यथा--
श्रुत्ति सिद्धांत इहँ उरगारी | भजिअ राम सब्र काम बिसारी ॥
सोइ कबि कोबिंद सोइ रनधीरा।
जो छल छाँडि भजे रघुबीरा ॥६१॥
अर्थ-धद्दी कवि है; घद्दी विचेको है; वद्दी योद्धा है, जो छलऊू
छोड़कर रामकों भजता दे ।
सोह कवि कोवबिद-भाव यह कि कवि-कोंविद ही हरियशके गान
करनेवाले ठहरे । अतः कवि-कोबिंद जाने या बिना जाने वर्णनके समय
वाणीका स्मरण करते हैं । वाणीकी चार अवस्थाएँ हँ-परा#, पश्यन्ती,
मध्यमा और यैखरी | पराकी शरणमें गये बिना वर्णन करना नितान्त
असम्मव है । इस भाँति स्मरण करनेपर परा याणी पदयन्ती, मध्यमार्मे
अबतरित होती हुई तुरन्त बैखरीरूपमें प्रकट होती है । उस वाणीको हरि-
यशगानमें ही विश्नाम मिलता है, पापमें डूबे हुए जीवॉके चरितका
# है-परा, यथा-भगत तु विधि भवन बिछ्दाई। सुमिरत सारद आवत थाई ॥
२-पद्यन्ती, यथा-चित्त पित्त दीन्द्रेडउ इढ छाना ॥
३-मध्यमा, यथा-मानसत्ते मुख पंकज आई ॥
४-बैखरी, यथा-भा जन्नु गूँगर्दि गिरा अ्सादू ॥
शातपशञ्च चौपाई श्ण्र्
वर्णन उससे करवाना सरखतीकों रुलानेके समान है। अतः वाणीकों
दुःख देनेवाला कवि कोंविदपदके योग्य नहीं है; यथा--
भगत हेतु बिचि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आावत धाई ॥
रामचरितसर बिन्षु अन्हवाएं | सो श्रम जाई न कोटि उपाए॥
कबि कोबिद अस हृदय बिचारी। गाचहिं हरिजस कलिमलहारी॥
कीन्हें भ्राकृत जन गुनगाना। सिर घुनि गिरा लगति पछिताना।
खोद रनथधीरा-भाव यह कि जगह्विजयी रावणादि वीर भी
काम-क्रोधादि शन्रुओंके वशमें ही रहे । विमीपणजीकों समामें पूछने-
पर विनयपूर्वक उचित मन्त्र कहनेके कारण रावणने छात मारी, और
उसी बातको मन्दोदरीने अति कठोर शब्दोंमें चार-चार बार कहा और
रावण एँठकर रह गया; उससे कुछ करते न बना, यथा--
नारि वचन सुनि बिसिख समाना | सभा गयउ उठि होत विहाना॥
सो इन शत्रुआंकों जो जीत छे वही रणधीर है ।
जो छल छाँडि भजै रघुवीरा-भाव यद्द कि स्वार्थ ( भमजनमें )
छल है। भजन निष्कास होना चाहिये। जो निष्काममावसे भगवानका
भजन करता है, वही नीतिनिपुण है, वही परम सयाना है, उसीने
श्रुतिसिद्धान्त जान पाया है, वही कवि-कोविंद है, बही काम-ऋधादि
शन्रुआंकों जीतनेमें समर्थ होगा ।
धन्य देस सो जहँ सुरसरी।
धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी ॥
घनन््य सो भूप नीति जो करई ।
धन्य सो ह्विज निज घरम न टरई ॥६ २॥
२९५३ परिशिष्ट
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी ।
धन्य पुन्यरत सति सोहइ पाकी ॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा |
घनन््य जन्म द्विज भगति अमंगा ॥« श॥
अर्थ-वद् देश धन्य है जदाँ गद्ला हैं, चद स््री धन्य है
जिसने पातित्रवका अनुसरण किया; बह राजा धन्य दे जिसने
नीतिका पालन किया, चह छिज चन्य है जो अपने घर्मसे न
हटा; बह धन धन्य है जिसकी पहिली गति हुई, वह पक्की
मति धन्य दे जो पुण्यमें छगी हुई दे, वह घड़ी घन्य है जो
सत्संगर्म बीते, वह जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण्मं अचर
भक्ति हो ।
घान्य सो देस जहेँ सुरसरी-भाव यह कि गद्जाजी पाप तथा
विविध तापको हरनेवाली ईह, पथ्चीम मानों कव्पवेलि हैं। अतः जिन
देशॉमिंसे होकर बहती हैं, थे देश धन्य हैं ) गज्ञाका सम्पर्क देशके धन्य
दहोनेका कारण है | उन देशोंके निवासियोकों विधिवश्न गद्धा सुलूम हैं,
अतः पापभार नहीं होने पाता ।
धन्य नारि पतित्रत अनुसरी-भावष यह कि केवल पातित्रतसे
स्त्री धन्य है, स्वाभाविक ममतासे ही तरण-तारण हो जाती है, यथा--
सहज अपायनि नारे पति सेदत सुस गति ऊहृहिं
जस गावदिं श्रुत्ति चारि अजहुँ तुलसिका इरिट्टि प्रिय ॥
पत्ित्रता स्रियाँ भगवानको प्रिव हैं, अतः धन्य हैँ | यहाँ ऊ्री-
घर्म कहा ।
धन्य सो भूप नीति जो करई-राजा अन्य किसी साधनसे
शतपश् चौपाई श्९छ
धन्य नहीं होता; वह केवछ नीतिपूवंक आचरण करनेंसे धन्य होता है;
अशोच्य हो जाता है, यथा--
सोचिय न्पति जो नीति न जाना । जेह्ि न प्रजा प्रिय श्रान समाना ॥
तथा--नीति बिरोघ सोहाइ न मोही! | क्षत्रियधर्म कद्दा |
घन्य सो छ्विज् निज चरम न टरई-ब्राह्मणमें तप और श्रुत
दोनों होने चाहिये, विना इन दोनों गु्णोंके उसका ब्राह्मणत्व ही पूरा नहीं
होता | अतः भोत्रिय तथा तपस्वी ब्राह्मण धन्य है, अशोच्य है, यथा---
सोचिय विप्न जो बेद् बिहोना । तज्ि निज घर्म विषय लचलीना ॥
ब्राक्षणघर्म कद्दा |
सो घन घनन्य प्रथम गति ज्ञाकी-धनकी तीन गति होती
है---दान, भोग और नाश । चौथी कोई गति नहीं है, जिस धनका दान
या भोग नहीं होता है, वह नष्ट हों जाता है, उनमें भी प्रथम गति
अर्थात् दान किया हुआ ही धन धन्य है, वथा--जेन केन विधि दीन्हेउ
दान करे कल्यान! । इससे वैश्यधर्म कहा ! हि
चन्य पुन्यरत मति स्ोइ पाकी-पक्की प्रुण्वरत मतिसे भाव
यह कि जिसमें फलाभिकांक्षाकी कचाई न हो । जिसे फलकी इच्छा है,
उसकी मति कचो है, यथा---
जो कछु करे कर्म समन बानी। बासुदेव अरपित नप ज्ञानी ॥
इससे कर्मयोग कहा |
घन्य घरी सोह जब सत्ंगा-माव यह कि सत्संगमे जो
समय बीता घह्दी धन्य है, क्योंकि सत्संग ही सब पुरुषार्थोका समान-
रूपसे साधन है; यथा---
सतखंगति छुलूस संखारा । निमिप दंडसरि एकों बारा॥
इससे काछ कहा; देश पहिले कह आये हैं ।
चन्य जन्म द्विज भगति अभंगा-भाव यह कि ब्राह्मणोमें
स्् परिशिष्ट
अटल भक्ति होनेसे ही जन्म धन्य होता है, क्योंक्रि ब्राह्मणमक्तिमूलक
ही कर्म, उपासना तथा शानकाण्ड हैं; यथा--
प्रथमहिं विम्र चरन अति भीती | निज निज घर्स निरत श्षुति रीती ॥
सापत ताढत परुष कहंता | थिप्र पूज्य अप्त गावदधि संता ॥
इस भाँति अन्य वर्णोके ब्राह्मण पूज्य हैं । यद्यपि प्रधानतः द्विज
शब्दसे क्राएणका भदण द्वोता है, परन्तु क्षतिय और वेदय भी द्विज ईँ।
और झूद्कके लिये विधान है कि जाक्षणकी शिव-घुद्धिसे, क्षत्रियक्री विष्णु-
बुद्धिसे और वेश्यकी ब्रह्मा-चुद्धिसे सेवा करें | अत्त+ यहाँ झाद्गधर्म भी
कहा ।
दो ०-सो कुछ धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
[० 85.
श्रीरघुबीर परायन जहि नर उपज बिनीत ॥
अर्थ-जिस कुलमें भ्रीरशुदीरप्रायण चिनीत पुरुप पैदा
द्वोता है, हे उमा! छुनो बद्दी कुछ घन्य दे, जगत्पूज्य है और
खुपुनीत है ।
सी कुछ घन्य उमा खुनु-कुछ ऊँचा द्ोनेसे पवित्र नहीं होता,
यथा--
अति ऊँचे भूधरत पें भ्रुजगनके अस्थान |
तुझसी नीचे होत हैं, ऊख अज्न अरू पान॥
तुलसी भगत सुपच्र भछो भजे रेन दिल रास ।
ऊँची कुछ केद्धि कामको जहाँ न हरिको नाम ॥
जगत पूज्य ख़ुपुनीत-इस भाँति ऊँचा कुछ न तो जगत्पूज्य
है, न पुनीत ( पवित्र ) है; जगलूज्यता ओर पवित्रता कुछपर निर्भर
नहीं करती, अच्छे और चुरेकी उत्पत्तिसे कुछ पवित्र और अपवित्र हुआ
करता है; यथा---
जझातपश्च चौपाई श्णद्
उपजें जद॒धि पुलस्त्य कुछ पावन असल अनूप ।
तदपि महीसुर साप वस भये सकछ अघ रूप ॥
भश्ीरघुवीर परायन-भाव यह कि रामभक्त ही धर्मपरायण
और कुछचाता है; उसीसे कुछकी रक्षा होती है; यथा--
पितर पार कर प्रभ्ुहिं पुनि झुदित गयड़ के पार ॥
धन्य धन्य तेें धन्य विभीषन | भयउ तात निसिचरकुरूभूपन ॥
“एक रामभक्तके उत्पन्न होनेसे कुछ घन्य हों जाता है ।
जेद्दि नर डपज विनीत-भाव यह कि जो विनीत नहीं है, वह
औरघुवीरपरायण भी नहीं है | रामपरायणताका प्रधान लक्षण विनय
है, यथा--
अइहंकारकी अगिनिर्सें दृहत सकल संसार ॥
चुलसी बाँचे संतजन केवर सांति अधारग॥त
जहाँ सांति सतगुरुकी दई। तहाँ क्रोचकी जरि जरि गई ॥
जिस भांति गज्ञाजीके होनेसे देश घन्य होता है; पातित्रतसे रत्री
घन्य होती है, इसी भाँति श्रीरघुवीर॒परायण विनीत घुरुषके उत्पन्न होने-
से कुछ धन्य होता है । जिस भाँति अपने घर्मपर अटछ रहनेवाछा
ब्राह्मण जगत्-पूज्य होता है, उसी माँति वह कुछ भी जगत्-पूज्य हो
जाता है | जिस माँति दानसे घन, कर्मबोंगसे लुद्धि, सत्सड़्से घड़ी
और द्विज-भक्तिसे झूद्र पुनीत हो जाता है, उसी भाँति भक्तसे॑ वह कुछ
पुनीत हो जाता है। शह्लरभगवानने घन्य-धनन््य कहकर कथा प्रास्म्म
किया था; यथा--
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी । तुम समान नहिं कोउ उपकारी ॥
जब्र भी घन्य-धन्य कहकर कथा समाप्त करते हैं। प्रारम्भमें मी
गज्ञाका उल्लेख था; यथा--
पूछेड रघुपत्ति कथा अखंगरा। सकल छोक जगपावनि गंगा॥।
शण७ परिशिष्ट
अब समाति भी गद्ञाका उछेंख करते हुए. ही हो रही है; वथा--
धन्य देस सो जहँ सुरसरी?
सति अनुरूप कथा में साखी।
जद्यपि प्रथम शुप्त करि राखी ॥
जथ-( अपनी ) बुझधिके अनुखार मेंसे कथा कद्दी, गोकि
पहिले मैंने शुप्त करके रक््खी थी ।
भत्ति अनुरूप कथा में भाखी-भाव यह कि कथाकी इयत्ता
ने होनेफके कारण मति-अनुरूप कही | सब्र वक्ता ऐसा ही कहते हूँ ।
मुशुण्डिजीने क्टा--
कहाँ तात हरि चरित अनुपा | व्यास समास खमति अजुरूपा ॥
याशवल्ययजी कटद्दते हँ--
रघुपति कृप। जथामतति गाया। में यह पावन चरित सुद्दावा ॥
गोौस्वामीजी कहते हँ--
मति अनुरूप अनूप सोहाई ॥
इतिद्वासांशकी समाप्ति पहिछे कह आये हैँ, यथा--कहेडें परम
पुनीत इतिद्दासा!) अब फलभ्रुति कदकर कथाकी समाप्ति कहते हें
जद्यपि प्रथम शुप्र करि राखौ-भाव यह कि इस कथाकी
रचना क्रिये हुए बहुत दिन हुए, परन्तु इसे तुमसे कड्टा नहीं; यथा---
रखि भदेस निज सानस राखा । पाइ सुसमय सिवासन भाखाता
रामभक्तिके भण्डारी शद्गशरभगवान् हैं, इनकी कृपाके बिना न
तो भक्ति ही मिलती है; न भगवश्धरण मिलते हैं; और न मगवत्-कथाकी
प्राप्ति होती है--भमक्ति, यथा--
औरो एक ग़ुपघ सत सबहिं कहा कर जोरि।
संकर सजन बिना नर भगतिे न पाबै सोरि 0
शतपथ्च चौपाई २०.८
भगवशचचरण, यथा--
के हर हृदय कमर महँ योए ॥
घुनि रघुपति परद॒पंकरुह हिय घरि पाष्ट प्रसाद ।
भगवत्-कथा; यथा---
सो सिव कागओुसुंडिद्ि दीन्दहद। ।? 'सेद्दि सन जागबलिक घुनि पाया ।?
राम चरित सर गुप्त सुदावा। संभ्रु प्रसाद तात सें पावा॥।
तब मन प्रीति देखि अधिकाई ।
3
तो मैं रघुपति कथा खुनाई॥«६्श।
अर्थ-तुम्हारे सनमें अधिक प्रीति देखकर, तभी मैंने रछुपति-
की कथा झुनायी ।
तच मन प्रीति देखि अधिकराई-भाव यद्द कि प्रीति तो बराबर
देखता था; परन्तु सुनाया नहीं | जिस समय बह प्रीति बढ़ी, उस समय
मैंने सुनाया । अतः उत्कट जिज्ञासा होनेपर ही यह कथा सुनानी चाहिये।
इसीलिये गोसाइंजी इसे माषामें छन्दोबद्ध करते समय भी सजनको ही
सम्बोधन करते हैं; यथा---
सुनहु सकछ सजन रति सानी ||
तो मेँ रघुपंति कथा खुनाई-भाव यह कि प्रिया होनेपर भी
यदि अधिक प्रीति न देखता तो न सुनाता । अधिक प्रीति न होंनेसे
श्रोताद्वारा कथाका अनादर होता है इससे उसके अकल्याणकी सम्मावना
है और बक्ताका भी मनोमंग होता है; छाम किसीकों नहीं होता |
यह न कहिंआ सठही हठसीलहिं ।
जो सन छाइ न सुन हरिलीलहिं॥
श्ण्प, परिशिएट
अर्थ-इसे कभी कपटी दुशापरह्दीसे न कद्दना, जो कि मन
लगाकर हरिकी लीलाक्नो न छुने।
यह न कहिअआ सठद्ी हठसीलाहिं-उपयुक्त चौपाईतक विपय-
निरूपण हुआ, अब्र अधिकारिनिरूपणमें पहिले अनधिकारीके विषय
कहते हैं, कि शठ ओर हटी अनधिकारी हैं ! अतः उपदेशानन्तर
भंगवतीसे निषेध करते हूं कि यह कथा अनधिकारीसे नहीं कहनी
चाहिये । (मीठी बातें सठ करें करिके मद्य बिगार !? जो हामि पहुँचावे
और मीठी बातें करके अपनी करनी छिपाना चाहे, ऐसे कपटीको छठ
कहते दँ। जो अपनी बातका बड़ा पक्ष छेता है, ऐसे दुराग्रहीकों हृठ-
शील कदते हैं ।
झो न लाइ मन खुन हरिलीलदहिं-शठ और इ्ीसे न कहने-
का कारण यह दे कि वह मन लगाकर हरिकी कथा नहीं सुनेगा, वह
कथा सुननेके समय अपने मनमें अनेक युक्तियाँ कुत्तकक्रे लिये ठीक
करता रहेगा; यथा---
शुद्धि बिथि अमित जुग्ुुति सन गुनेऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ ॥
ऐसे लछोगोंकों सुनानेसे दुःख ही उपजता है, भोता-वक्ता किसीका
कल्याण नहीं होता |
कहिअ न लोमिहिं क्रोधिहि कामिहिं ।
जो न भजे सचराचर खामिहिं ॥६५॥
अर्थ-[ इसे ) छोमी, क्रोची और कामीसे नहीं कहना
चादहिये, जो चराचरके स्ामीकों नहीं भजता ।
कहिभ न लोमिदि क्रोधिद्दि कामिद्धि-छोभमी, क्रोधी और
कामी; परधन, परद्रोह और परदाराका भजन करते हैं, नरक्रपन््थके
पथिक हैं; यथा--“काम क्रोध मद छोम सब नाथ मरकके पंथ |” ये
शतपश्च चौपाई ६००
दूसरे समाजके लोग हैं, इनके इश्देव मोह हैं, ये भी हरिकथा सनसे
नहीं सुनेंगे, और उपद्रव उठावेंगे; यथा--
तेद्टि बहु विधि न्रासहिं देस निकासहिं जो कह बेद घुराना।
जो न भजै सचराचर खामिहि-यहाँपर नाम नहीं दिया । भाव
यह कि नामपर आग्रह नहीं है, चराचरके खामीके मजनपर आग्रह है;
हम सचराचर स्वामीको राम; रघुपतिं, हरि इत्यादि कहते हैं, दूसरे
उनको यदि वासुदेव, महालक्ष्मी; सदाशिव कहते हाँ और भजन करते
हों तो वे मी अधिकारी हैं । जो जीवका भजन करते हैं, वे अधिकारी
नहीं हैं ।
ह्विजद्रोहिहि न सुनाइय कब॒हूँ।
सुरपति सरिस होइ ऋन्ृप जबहूँ॥
अथ-ब्राह्मणद्रोह्ीफी तो कभी न खुनाना, चाहे चद
इन्द्रके समान शाजा (क्यों न) हो ।
छिजद्रोहिहे सन खुनाइय कवहँँ-भाव यह कि हिजद्रोही
भागवतधर्मके प्रतिकूल चलनेवाला है| वह प्रभुकों पसंद्र नहीं है; अतः
उसे सुनानेके लिये अतिनिषेध है; यथा--
सुनु गंध कहौं मैं तोही | मोहि न सोहाय ब्रह्मअलद्रोह्दी ॥
सन क्रम बचन कपट तजि, जो कर भूखुर सेच |
मोहधि समेत बिरंखलि सिर, बस ताके सब देव ॥
सापद ताडत परुष कहंता | बिश्र पूज्य झस गाव संता
पूजिय विप्र सीछ शुन हीना । सूद्ध न गुन॒ गन ज्ञान अबीना ॥
कहि निज धर्म ताहि समझुझावा।
सुरपति सरिस होइ छूप जबहूँ--भावं यह कि उसके अधिकारः
३०१ परिशिष्ट
का भय अथवा कृपाका छोम भ करे | इन्द्रने सो यज्ञ किये । सो उसके
याशिक होनेका भी कोई विचार न करे |
रामकथाके तेइ अधिकारी ।
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी ॥६७॥
अर्थ-रामकथाके वे दी अधिकारी है, जिन्हें सत्संगति
अत्यन्त प्यारी हो ।
राम कथाके तेइ अश्विकरारी-माव यह कि तीन प्रकारके
अनधिकारी कहकर, अब्र तीन ही प्रकारके अधिकारो कहेंगे । अधिकारीके
लिये द्वी विषयरनिरूपण होता है, परन्तु ग्रन्थका निर्माण होनेपर तो बह
अधिकरारी-अनधिकारी सत्रके हाथ पड़ता है। तथापि लाभ उससे
अधिकारी हीं उठा सकते हैं, अनधिकारी उससे छाभ उठानेमें सर्वथा
असमर्थ रहते हैं; बधा--
प्रशुपद प्रीति न सामुझि नीकी । तिनहिं कथा खुनि लागिहि फीकी ॥
कवितरसिक न रामपद नेहू | तिनकहें सुखद दासरस एड ॥ा
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी-जिसे सत्संगति अति प्यारी
है, बद तो खाभाविक ही रामकथाका प्रेमी होगा; यथा---
बिच्ु सतसंग न हरिकथा तेद्दि बिनु मोह न भाग ॥
४७५. न
जिसे सत्संगति अति प्यारी हे वह यदि अनधिकारी मी हो तो
अधिकारी हो जायगा; यथा--
सठ सुधरहिं सतसंग्रति पाये। पारस परस कुघातु सोहाये ॥
गुरुपद प्रीति नीतिरत जेई।
द्विजगसेवक अधिकारी तेइई॥
शतपश्च चौपाई ओझले०र
अर्थ-जलिन्दें गुरुचरणोंमें भीति है, जो नीतिरत हैं, द्विज-
सेवक हैं, वे ही अधिकारी हैं ।
शुरुपद् भीति नीतिरत जेई--माव यह कि गुरुचरणका प्रेमी
परमार्थपथका पथिक है। बिना गुरुके संसारसागरकों पार नहीं किया
जा सकता | बक्षाके कोपसे भी गुरु रक्षा कर सकता है! गुरुके कोपसे
कोई रक्षा करनेवाला नहीं है | गुरुमें जिसे ईश्वर-बुद्धि है, वह प्मुका
प्यारा है; यथा--
हमते अधिक गुरुह्चिं जिय जानी | सकल भांति सेवे सनमानी ॥
। आई + आप
जो नीतिरत है वह भी प्रभुका प्यारा है, यथा--“नीतित्रिरोध
सोहाय न मोद्दी ॥? जो नीतिरत होगा वह शुरूमक्त भी होगा, फिर भी
दोनोंको प्रथक्-परथक् गिननेका कारण गुणविश्येषका प्राधान्य है; एकमें
शुरुमक्तिकी प्रधानता है, दूसरेमें नीतिनियुणताकी प्रधानता है |
हिजसेवक अधिकारी तेई-भाव यह कि ब्राह्मणका द्रोही
अनधिकारी, और सेवक अधिकारी है। परमार्थ पथके पथिक्रकों छोंडकर
दूसरा द्विजसेवक नहीं हो सकता | अमिमानी कभी दरिद्र दीन ब्राह्मणकों
बड़ा नहीं मान सकता; ऐसा करनेपर उसे ईश्वरके न्याय तथा समदर्शिता-
में दोष दिखायी पड़ने छगेया | जो अभिमानरहित नहीं है, वद्द शापत;
ताड़त, परुषवक्ता ब्राह्मणको पूज्य कैसे मानेगा ? जो ईश्वरकों कर्मफलका
दाता नहीं मानता, वह झीलग॒ुणहीन ब्राह्मणपर पूज्यदष्टि केसे रख
सकेगा ! अतः ह्विजसेयक ही इस कथाका अधिकारी है। छिजसेवक
रामभक्त होगा और ब्राह्मणद्रोहीके घर रावणकी डायरी निकलेगी |
वह रावणके गुर्णोपर मुग्घ होगा, रावणके गुण प्रसिद्ध करनेमें कोई बात
उठा नहीं रक्खेगा |
ताकहँ यह बिसेषि खुखदाई ।
जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥६७॥
पे परिशिष्ठ
अर्थ-जिसे औरघुराई प्राणप्रिय हैं; उसे यह विशेष
खुखदायी है ।
ताकहँ यह विलेषि सुखदाई-भाव यह कि हरिकया हवास्यरूपसे
तो खलकों मी सुख देंनेवाली है, पर यथार्थरूपसे सन्ननोंकों ही छुख
देती है, यथा--
इरि हर पर रति मत्ति न कुवरक्की | तिन कहूँ मधुर कथा रघुबरकी ॥
और जिसे राम प्राणप्रिय हैं, उसे उनकी लीला भी विशेष सुख
देती है, यथा---
अ्रवनास्त जेंद्वि कथा सोहाई । कही सो प्रगट होत किन भाई ॥
जादि प्रानश्रिय श्रीरघुराई-जिसे प्रभुके सरूपका शान है;
उसीको वे प्राणप्रिय हैं। राम सबके आत्मा हैं, अतः सबकों प्रिय हैं,
/ अपनी आत्मा करिसीकों अप्रिय नहीं होती । जो रामकों अपनी आत्मा
नहीं जानता, उसीको थे अप्रिय मादूम हो सकते हैं, यथा--
जीव जंतु अस को जय साहीं । जेंहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ॥
भे अति अद्वित राम सोड तोही ! को तू जहसि सत्य कहु मोही ॥
अतः रामको प्राणप्रिय जाननेवाले आत्मश इसके परम अधिकारी हैं|
दो०-रामचरनरति जो चह, अथवा पद निबॉन।
भावसहित सो यह कथा, करो श्रवनपुट पान॥
भर्थ-ज्ों रामचरणमें रति चाहता दो या निर्धाणपदकों
चाहता ही वह मन छगाकर हस कथाको कानके प्यालेस पीचे।
रामचरनरति जो चह-भाव यह कि परम पुख्षार्थ दो हैं,
एक पराभक्ति और दूसरी कैवल्य मुक्ति (निर्वाणपद )। पररामक्तिमें
मुक्तिसुख बरावर रहता है, पर भक्त मुक्त नहीं होता, उसे भजन ही
शतपश्ल चौपाई च्च०४
पसंद है; मुक्ति नहीं, और कैचल्य मुक्तिमें साधक “ब्रह्म! द्वी हो जाता है;
विन्दु सिन्धु हो जाता है। इनमेंसे जो 'पराभक्ति! चाहता है, वही
इस पदसे अभिप्रेत है।
अधवा पद निर्वान-भाव यह कि जो वही दो जाना चाहता है।
यहाँपर मोसाइईजीने प्रयोजन और सम्बन्ध कद्दा । रामकथाके ये ही दो
प्रयोजन हैं, या तो परामक्ति या कैवल्य मुक्ति । विधय और प्रयोजनसे
साधकसाध्यभाव सम्बन्ध है। साध्य है भक्ति और मुक्ति तथा इन
दोनोंका साधक रामकथा हैं |
भावसदहित सो यह कथा-अर्थात् मन छगाकर इस कथाकों
सुने, जिसमें इस कथाकी छाप मनपर पड़े । छाप पड़नेसे ही प्रयोजनकी
सिद्धि होंगी, नहीं तो कथाश्रवणजन्य पुण्यमात्र होगा | दोनों प्रथो जनो-
मेंसे किसीकी सिद्धि नहीं होगी ।
करे थ्रवनपुट पान-भाव यह कि कथा बड़ी है, एक पूँटमें
नहीं पी जा सकेगी, इसलिये कानके दोने ( प्याले ) बनाकर स्वाद ले-
लेकर कथाम्तका पान करो । पान करनेसे भगवच्चरणोंमें भक्ति (साधन )
होगी, आर भक्तिसे मुक्ति भी हो सकती है और परामक्ति भी मिरछ
सकती है ।
रामकथा गिरिजा में बरनो।
कलिमलूसमनि मनोसलरूहरनी ॥
अर्थ-द्टे गिरिजे | मैंने कलिमलछकी नाश करनेवाली, मनो-
मछको दूर करनेवाली रामकथाका घर्णन किया।
रामकथा भिरिजा में बरनी-माव यह कि जबतक विपयका
निरूपण भर करना था तबतक तो इतिहास था, यथा---
यह इतिद्याल पुनीत अति उमहिं कल्लौ इपकेठ ।
चड्र्ण्ण् परिशिष्ट
यह इतिहास सकछ जग जाना !
उम्ता कहौ सो सब एतिद्ासा। में जेद्दि माति गयडें खग पासा ॥
इत्यादि । चद्दी इतिहास जब फलशुति, प्रयोजन, अधिकारी तथा
सम्बन्धवर्णनसे संयुक्त हुआ तब उसकी संशा 'कथा? हों गई, यथा--राम
कथा मिरिजा में बरनी? | प्रश्न हुआ था--बरनहु रघुबर ब्रिसद जस
श्रुतिसिद्धांत निचोरिः' उत्तर हो रहा हैं कि 'राम कथा गिरिजा में बरनी ।
कलिमलूसमनि मनोमलूदरनी-समयक्र्त दोप, जिसका
प्रभाव सबपर पड़ता दे; उसे कलिमल शब्दसे उपलक्षित किया; और
व्यक्तिगत अन्तःकरणके मछकों मनोमल कहा। इस रामचरितमानसः
नामी भक्तिश्षात्रका हृदय अयोध्याकाण्ड अर्थात् द्वितीय प्रबन्ध है |
इसीमें भक्तोके चौदद् लक्षण वास्मीकिजीने कह्दे हैं, जिनमें सम्पूर्ण
रामायण अनुस्यूत है। अतः सम्पूर्ण रामचरितकी फलश्रुति शिवजी
अयोध्याकाण्डकी फल्श्रुतिके अनुकूछ ही कह रहे हे, यथा--
कलिमलसमन दसन सन रामसुजस सुखमूछ |
सादर सुनहिं जे तिनपर राम रहहि अनुछूछ॥
संसत, रोग सजीवन मूरी।
6
रामकथा गावहिं श्रुति सूरी ॥&८॥
अर्थ-संसार-रोगके लिये संजीवनी बूटी रामकथा है,
( इसे ) वेद और पण्डित गाते हैं ।
संखत रोग सजीचन मूरी-भाव यह कि संसाररूपी रोगके
लिये तीन प्रकारकी दवाएँ श्रीरामचरितमानसमें छिखी हैं--( १ )
चूर्ण, ( ९ ) गोली # और (३ ) अर्क| चूर्ण, यथा--
ह %# अनुपानकी आवश्यकता है, इसलिये गोली माना, चूर्ण और अव॑में
अनुपान नहीं होता ।
अकन (पस्ल की»... का. 3 न अभी 8. मम 42.६
हातपञ्चल चौपाई झ०दि
अमिअ मूरिसय चूरन चार । समन सकल सवरुज़-परिवारू #
गोली, यथा---
रघुपति भगति सजीवन मूरी | अनूपान श्रद्धा जति रूरी ॥
अर्क, यथा--
संसुत रोग सजीवन मुरी ।
भसावसद्दित जो यद्द कथा करे अवनपुट पान॥
कथामृतपानसे संसार-रोग जाता है; अतः सुखमूल है।
रामकथा गावहि शुति खरी-भाव यह कि वेदमें जो कुछ
कह्दा गया है, उसका साक्षात् या परम्परागत रामसे सम्बन्ध है | अतः
बेंदमें'रामकथा ही है; यथा--
जिनहिं न सपनेट्ठु खेद वरनत रघुबर विसद जस ॥
--और परमार्थज्ञाता पण्डित छोग भी रामकथा ही कहा करते
हैं, यथा--
कबि कोबिद अस हृदय बिचारी । गावहिं., हरिजस कलिमछहारी॥
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना |
रघुपति भगति केर पंथाना॥
अर्थ-इसमें सुन्दर सात खोपान हैं, (ये सब) रामभक्ति-
के रास्ते हैं ।
पद्दि महँ रुचिर सप्त सोपाना-भाव यह कि सातों प्रबन्ध ही
सात सीढ़ियाँ हैं, यथा--सत्त अबंध सुमग सोपाना! । गोखामीजीने
शमचरितमानसकों वाल्मीकीय रामायणकी भांति काण्डोंमें विभक्त
न॒ करके सोपानमिं विभक्त किवा। बाल, अयोध्यादि नाम, मालूम
होता है, छोगोंने पीछेसे रख लिया । संख्यामें सात होनेंसे 'सोपाना?
“पंथाना” बहुबचनका प्रयोग किया ।
३०७ . परिशिष्ठ
रघुपति भगति केर पंधाना-माव यह कि सब सोपान;
प्थक्-एथक भक्तिमार्ग हैं । यह अद्भुत सरोवर है, जिसमें अत्येक सोपानसे
जलकी प्राप्ति द्वोती है; और प्रत्येक सोपानके जलके पएथक्-प्रथक गुण हैं,
उसीकों फलश्रुति कहते हैं, यथा--
प्रथम सोपानके जलके गुण--
सिय रघुयीर ग्रियाह् जें सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिनकदँ. सदा उछाह संगठायतन शासजस॥
द्वितीय सोपान---
क्रलिमलससमन दमन मन रामसुमस सुखसूल |
सादर सुनहिं जे तिनपर राम रहहिं अनुकूछ॥
तृतीय सोपान--
रायनारि-जस पावन गाव सुनहिं जे छोग।
राम भगति दृढ़ पाव६ह्ध बिन्चु बिराग जप जोग॥
चत॒र्थ सोपान--
मवमेपज रघुनाथजस सुनहि जें नर अरू नारि।
तिनके सकलछ भनोरथ सिद्ध करदि ब्रिसिरारि ॥
पश्चम सोपान-+
सकछ सुमंगछ दायक रघुनायक गुनग्राम ।
सादर सुनदठधि ते तरहिं भवर्सिषु बिना जरूजान॥
पष्ठ सोपान--
समर विजय रघुवीरके चरित जे सुनदिं सुजान |
बिजय विवेक ब्रिभूति नित लिनहिं देहि भगवान
सप्तम सोपान--
बिसल कथा इरिपद दायिनी | भगति होह सुनि अनपायनी ॥
शआतपश्च चौपाई ड्रे०८
अति हरिकृपा जाहि पर होई।
पाँव देव एहि मारग सोई ॥«थ॥
अर्थ-अत्यन्त हरिक्रपा जिसपर द्वोती है, चद्द इस रास्तेमें
पैर देता है ।
अति दरिक्षपा जादि पर होई-भाव यह कि भक्तिशाह्नर्म
सत्र कुछ हरिकृपापर दी अवलम्बित है; हरिकरुणासे नरशरीर मिलता
है, मरशरीरसे भजन होता है, भजमसे हरिकृपा होती है, उससे
सत्संग मिलता है, सत्संगते हरिकथा मिल्ती है, उससे मोह भागता
है, तब रामचरणमें अनुराग होता है, अनुरागसे रघुपतिकी प्राप्ति होती
है | दरिकी कृपासे नरद्रीर मिला; विश्येष्र कृपासे सत्संग मिला, राम-
कथा सुनी, पर उस कथामें जो सात रास्ते हैं, उन रास्तोंमें पाँव रखना
हरिकी अति इपासे ही सम्भव है |
पाँव देइ एडि मारण खोई-भाव यह कि कथा सुन लेना दूसरी
बात है, परन्तु तदनुसार वर्तना महा दुष्कर है। बर्तनेकी ओर प्जत्ति ही
किसीकी नहीं होती, जिसपर भगवानकी अति कृपा होती है वही इस
ओर पैर उठाता है; यथा--
जौ एट्टि पंथ चले मन छाईं। तौ दरि काहे न होहि सहाई ॥
जो मारग श्रुति साधु बतावै। लेहि पथ चकूत सबै सुख पावै॥
सनकामना सिंड नर पावा |
जो यह कथा कपट तजि गाबा॥
अर्थ-जिसने इस कथाको कपट छोड़कर गाया, (उसकी)
-. मनोकामना सिद्ध हो गयी।
सनकामसना सिद्ध चर पावा-भाव यह कि सनोकामनाकी
६०९, परिशिष्ट
सिद्धिके लिये छोग अनुष्ठान करते है, अनुष्ठान प्रारम्म करनेके पहिले ही
सह्ठुल्प करते हे कि अमुक कामनाकी सिद्धिके लिये में यह अनुष्ठान
करूँगा । सह्लृत्प नहीं करमेसे अनुष्ठानका यथावत् फल नहीं होता ।
यहाँ दूसरी बात है । किसी फलकी आकांक्षा न रखकर इस कथाका गान
करे, तो मनोकामना आप-से-आप सिद्ध हो जाती है; यथा--
तिनके सकल मनोरथ सिदछ करहिं तब्रिसिरारि॥
जो यद्द कथा कपट तज्ञि गावा-भाव यदद कि अनुष्ठानके लिये
अधिकारी चाहिये, खय॑ अधिकारी न होनेपर दूसरे अधिकारीसे करवाया
जाता है, अनुष्ठानके असंख्य कठिन नियम हू । यहाँ कोई नियम नहीं ।
कामना तथा फलामिसन्धिक्रा त्याग करके आनन्दर्म विभोर होकर गान
करना; बस यही एक गुण अपेक्षित है ।
कहहि सुनहिं अनुमोदन करहीं।
ते गोपद इव सवनिधि तरहीं ॥१००॥
अर्थ-जो कहते, खुनते या अनुमोदन करते हैं, थे
भवसागरको गोपद्की भाँति तर जाते हैं ।
कहद्दहि झुनद्वि अनुमोदन करद्दी-रामायणप्रतिपादित रामकों
ब्रक्त जानकर उनकी कथा कहना, सुनना या कहने-छुननेमें सहायता
करनेका यह फल है कि अनायास छोंग भवसागर पार कर जाते हैं,
और जो ब्रह्मसे मिन्न मानकर कहते-सुनते हैँ, वे अधम# हैँ, यथा--
कटदृद्टि सुनह्िं अस अघम नर असे जो मोहपिस्ताच ।
पापंडी दरिपद बिसुख जानहिं झूठ न साँच॥
ते गोपद इच भवनिधि तरहीं-भाव यह कि सत्ययुगर्मे ध्यान
# छोटेकी स्तुति बढ़ाकर की जा सकती है, पर वड़ेकी स्तुति घटकर
नहीं की जा सकती ।
शतपश्च चौपाई ३१०
करके; भैतामें यश्ञ करके और द्वापरमें पूजा करके लोग संसारसागरसे
तरते हैं। इन छोगोंको बड़ा प्रयास करना पढ़ता है, इसलिये तरना
कहा | परन्तु कलिमें हरिगुण-गानसे संसारका थाह मिल जाता है ) यहाँ
शझ्आ उठती है कि फिर भी सूखे समुद्रकों पार करना भी कुछ साधारण
व्यापार नहीं है, इसीलिये कहते दँ कि ग्रोपदकी भाँति तर जाता है)
अर्थात् अनायास पार होता है, यथथा--
कृतछुग सब छानी विज्ञानी | करि हरि ध्यान त्तरह्धिं सथ पानी ॥
त्रैता विविध जज्ष नर करहीं । प्रशुद्दि समर्पि कर्म भव त्तरद्वी ॥
द्वापर करि रघुपतति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय मन दूजा॥
कलिज्॒ग केवल हरिगुन गाहय। गादत नर पावदिं भव थाहा ॥
नास छेत सवसिधु सुखाददी |
स॒ुनि सब कथा हृदय अति भाई ।
गिरिजा बोली गिरा सोहाई ॥
अर्थ-यह कथा झुननेपर हृदयमें चहुत अच्छी छगी; तब
गिरिजाजी झुन्द्र वाणी वोलों ।
छुनि सव कथा हृदय अति भाई-भाव यद्द कि 'गोपद इच
तरहीं? कहकर शक्लरभगवान् मौन द्वो गये; कथा समाप्त हुई। अब
श्ताकी ओरसे कृतशता प्रकट करना शेष रहा । गिरिजाके प्रदन शड्रकों
अच्छे लछगे---
अक्ष उमके सहज सुदद।ए। छलविद्वीन खुनि सिच सन भाए॥।
इसी भाँति शक्लुस्के उत्तर गिरिजाको पसंद आये; यथा--'सुनि
_-. सब कथा छदय अति भाई ।? पहिले नहीं अच्छे छंगे थे, सुना ही नहीं,
>>रछ शिवजी सुनते रहे, यथा--
रासकथा झुनिबर्ज बखानी | सुनी महेस परम सुख मानी ॥
रे११ : परिश्िष्ट
गिरिजा बोली गिरा सोहाई-“सोहाई गिरा! वही कहलाती है;
जो श्रोताकी अच्छी छगे, अतः 'सोहाई! और (माई! का साथ रहता
है, यथा--
जामबंतके बचन सोहापु। सुनि इलुमान हृदय लति भाएु॥
आश्रम एक पुनीत सोद्दावा। देखि देवरिषि सन जतति सावा ॥
ताछु कनकमय सिखर सोहापु । चारि चारु सेरे मन भाए॥
इत्यादि |
नाथकृपा गत मम संदेहा।
रामचरन उपजेउ नब नेहा ॥१#व्श।
जर्थ-ताथकी कृपाले मेरा सन्देद् दूर हो गया, और
रामचरणमें अपूर्य प्रेम उत्पन्न हुआ ।
नाथक्ृपा गत मम संदेद्दा-भाव यह कि सन्देह अविद्या है,
सन्देहका जाना; अविद्याका दूर होना है। सन्देह यह था कि--
जौ नृपतनय तो मदा किसि नारिथिरदद मत्ति भोरि।
देखि चरित सह्दिसा सुनत अ्रमत बुद्धि अति मोरि ॥
वह सन्देह चला गया; यथा
तुग्दरी कृपा कुंपाजतन अब कृत्तकृत्य न सोह।
जानेडेँ रामप्रताप प्रभु चिदानंदसंदोह ॥
शामचरन उपजेड नव नेहा-भाव यह कि पहिले भी नेह था)
यथा--
तब कर अस विसोह अब नाद्दी | रामकथापर रुचि मन माहीं ॥
पर अब जो नेह है वह दूसरा है, इसीलिये “नव कहा। “नव!
और “पूर्व” समानार्थक शब्द हैं, यथा--
शातपश् चौपाई ३१२
ये दारिका परिचारिका करि पाछबत्री करुना नई।
बविगरी सुधारे कृपानिधिकी कृपा नई ॥
पभुमे नव नेह कहकर अस्मिताका दूर होना कट्दा ।
यथा--
द्वित हमार सियपति सेवकाई ।
दो*-मैं कृतकृत्य भइउँ अब तब प्रसाद बिस्वेस ।
रामभगति इढ़ ऊपजी, बीते सकछ कलेस ॥
अर्थ-हे विच्वेश्वर | में अब तुम्हारी कृपासे कृतकृत्य हो
गयी, इृढ़ रामभक्ति उपजी और सब क्लेश दूर हो गये ।
मैं कतकृत्य भइजँ-भाव यह कि जबतक कोई कृत्य दोष रहता
है, तवतक कोई कृतकृत्य नहीं होता, और जब्तक रागद्वेष है, तबतक
कृत्य भी निःशेष नहीं होता। अतः जगतकों राममय देखनेसे ही
रागद्वेषकी सम्यक् प्रकारसे हानि होती है, यथा---
निजञ्ञ प्रशुमय देखहिं जगत का सन करहि विरोध ॥
अतः कृतकृत्य कहकर “रागद्वेष' की हानि कहा |
तब प्रखाद् विस्वेस-भाव यह कि ईश्वर इच्छामात्रसे जगत्का
उद्धार करनेमें समर्थ हैं, उसकी कृपासे ही उद्धार होता है। प्रश्न किया
था कि--
जौ मोपर असन्न सुखरासी। जानिय सत्य सोद्दि निज दासी ॥
तौ प्रश्ध हरहु मोर अज्ञाना | कहि रघुनाथ कथा विधि नाना ॥
अतः समाधान सुनकर कहती हैं कि--
मैं कृतकुत्य भ्टय जब तब असाद बिस्वेप्त ।
रामभगति इढ़ ऊपजजी-भाव यह कि संशयका नाश होनेपर
३१३ परिशिष्ट
भक्तिमें दृढ़ता आयी, और उस हृढ़ भक्तिवाछेक्ो देहकी ममता नहीं रह
जाती; वथा--
चुरुूसी मंगल मरन तर रामप्रेस पय सींचु ।
श्ससे अभिनिवेशका नाश कट्दा |
यवीते सकल फ़लेख-भाव यह कि अविया, असिता, राग, द्देष
भर अभिनिवेशको बछेश* कहते हद, सो पाँचों, जेसा ऊपर कहा जा
घुका है, दूर दो गये |
यह सुभ संभु उमा संबादा।
सुख संपादन समन बिषादा॥
अर्थ-यह शुभ शम्भु-उमा-संचाद; खुखका सम्पादन और
विपादोंका शमन करनेवाला दै।
यह खुभ संभु उम्रा संबादा-भाव यह कि पश्चिमघाद समाप्त
हुआ |
रायउ' गरढ़ चकुंठ तव छदय राखि रघुवीर ॥
कट्ककर उत्तरघाद समाप्त किया था; वहाँ गरुड़ दूसरी जगहसे
कथा सुनने आये थे, इससे उनका जाना कद्दा, और यहाँ श्रोता-वक्ताको
कहीं आना-जाना नहीं है, इसलिये “यह सुभ संझ्ु उम्रा संबादा? कहकर
पश्रिमघाट समास्त कर रहे हैं। भुग्युण्डि-गरुड-संचाद समाप्त होनेपर
शह्नरमगवान् कथा कहने छग गये; यथा--
गिरिजा संत समागम सम न छाभ कछु जान।
और यहाँ शम्भु-उमा-संवाद समाप्त द्ोते ही याज्वल्क्य भगवान्
बोछ उठे, कथा तो सत्र साथ ही समाप्त हुई, फलस्तुतिमात्र झेप थी;
अतः कहते हैं---
# अवियासितारागदरेपामिनिषेशाः बलेशा३ । (चो० चू० )
शतपश्च चौपाई इ्१छ
खुख संपादन समन वियपादा-भाव यह कि विधाद-योग
होनेपर ही हमारे यहाँ उपदेशकी विधि हे। भगवरद्गीतामें पहिले ही
अजुनविषादयोगों नाम प्रथमोड्ष्याय:” चछता है। यहाँ पहिले उमाको
विधाद हुआ; यथा--
, अस संसय सन भयज्ञ अपारा | होह न छुदय अ््ोध श्रचारा ॥
और संशयमें ही तकसे विषाद होता है, यथा--
संसय सर्प असन उरगादा | समन झुककंस तके बिपादा ॥
फिर गझड़को विषाद हुआ, यथा--
वंघन कांटि गयो उरगादा | उपजा द्वृदय प्रचण्ड बिषादा ॥
तत्पश्रात् भरद्याजजीकों विधाद हुआ, यथा--
कहते सो सति भजुद्दार अब उस संभु संवाद |
भयड समय जेह्ठि देतु जेंद्ि सूद मुनि मिट॒ट्टि बिपाद ॥
सो यह श्रीरामचरित तो विषाद मिटानेक्नी ओषधि दी है; अतः
कहते हैं कि समन बिपादा? | इसमें केवल विधादाभावसात्र
( अभावात्मक ) सुख ही नहीं है, बल्कि भावात्मक सुख भी है, यथा--
, मोह जलधि बोहित तुम भये। सो कहूँ नाथ वियिध सुख दये ॥
संसारइक्षके दो ही फछ हैं--सुख और दुःख; यथा--
फछ जुगल विधि कह मधुर, बेकि भकेकि जेहि आामित रहे ।
और “दुःखका नाझ तथा परमानन्दकी प्राप्ति इतना ही पुरुषार्थ
है, सो उमा-शम्शु-संबादसे दोनों होता है।
भव भंजन गंजन संदेहा।
जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥१०२॥
अर्थे-( यद्ध संवाद) भवका भञ्ञन, सन्देहोंका नाहा,
भक्तोंका रखन करनेवाला और सज्वनॉको प्रिय है।
३१५ परिशिष्ट
भव भंजन गंजन संदेहा-भाव यह कि उमा-आम्भु-संवादके
सुननेसे संसारका मझन हों जाता है, यद इस संवादकी विशेषता है;
भक्ति-लाभ भुशुण्डि-गझड़-संचादकी विशेषता है; यथा--
मनिदुर्लस दरिभगति नर पायहिं बिनहिं अयास।
और फल भी चद्दी हुआ, यथा--
रामभगरत्ति रृ़ ऊपजों, थोते सकर कलेस्त ॥
सम्देहोंका नाश होना तो सब संवादौर्म समान है ।
जन रंजन सज्जन प्रिय एहा-भाव यद् कि भक्तोंके छुदयकों
शमरंगमें रेंग देता है, और सजनोंकों प्रिय है, यथा--
सुनि गुनगान समाधि बिसारी । सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥
अतः ये दोनों गुण भी भुग्ुण्डिनगरुड़ तथा उमा-शब्भु-संवादमें
समान हैं |
राम उपासक जे जगमाहीं।
किक
एहि सम प्रिय तिनके कछु नाहीं ॥
अर्थ-संसारमें जितने राम-उपासक हैं, उन्हें इसके समान
कुछ भी प्रिय नहीं दे ।
शामउपासक जे जगमाही-भाव यह कि सजन और भक्तोंके
लिये तो कद चुके, अब सम्परदायविश्लेपक्ों लक्ष्य करके कद्दते हैं, कि
संसारमें जितने राम-उपासक हैँ । जिनके इष्टदेव श्रीरामचन्द्र हैं, जिन्होंने
राममन्त्र प्रहण किया है; जो सुतीएणकी भोँति भूषरूपपर आसक्त हैं;
चतुर्भन रूप भी छदयमें आनेपर जिनका ध्यान भज्ञ होता है, वे
शामोपासक हूँ ।
घहि सम प्रिय तिनके कछु नाहीं-भाव यद्द कि देंह-प्राणसे
बढ़कर प्यारा है, क्योंकि--
शतपञ् चौपाई ३१६
देह प्रान सम प्रिय कछु नाहीं। सोड मुनि देडें निम्मिप एक माही ॥
पर रामसे प्यारा कोई नहीं, यथा-- राम देत नहिं बने गोसाई ॥?
सो यह कथा यम-सी प्यारी है। यह कथा सबको सुखदायी है, पर राम-
उपासकोको विशेष सुख देनेवाली है, यथा---
ताकहँ यह चिसेंप झुखदाई। जाहधि प्रानप्रिय श्रीरधुराई ॥
और जो जितना ही सुखदायी है, वह उतना ही विशेष प्रिय है ।
रघुपति कृपा जथामति गावा।
में यह पावन चरित सुहावा ॥१०३॥
अथ-मैने इस पवित्र सुन्दर चरितकों रघुपतिक्नी कृपासे
यथामति गाया है ।
मैं यद् पावन चरित खुहाबा-भाव यह कि जिस बातकों
लेकर उपक्रम किया था; वही कहते हुए; उपसंहार करते हैं । उपक्रमर्से
भी रामचरितकों पावन और सुद्दावा कह्य था| पावन, यथा--
महामीह महिपेस बिसाका । रासकथा काछिका कराछा ॥
सुद्वा, यथा---
रामकथा ससि किरिन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना ॥
अब भी पावन और सुद्वावा कहकर उपसंहार करते हैं । एक ही
कथाके प्रतिसंचादकी फलश्रुतिमें भेद होनेका कारण यह है कि अतिसंवाद-
में सगवत्-चरित वही होनेपर भी भागवत चरितोंमें न्यूनाधिक्य है ।
यथा, उमा-शम्भु-संबादर्म गरडजीकी कथा अधिक है, भरद्दाज-
याश्षवल्कक््य-संवादम उमा-शम्भु-चरित अधिक है; तुल्सीकृतमें मरद्ाज-
कया अधिक है ।
रघुपति कृपा जथामति गाव-भाव यह कि जैसी बात मनमें
रहती है; ठीक बैसी ही कह डालना साधारण बात नहीं है, मगवानकी
३१७ परिशिष्ठ
कपासे ही यथामति कहना सम्भव है। यहाँ गावा कहकर विस्तारसे
कहना कद्दा; अर्थात् जान-बूझकर कुछ छिपाया नहीं | इस भाँति दक्षिण-
घाथकी समाप्ति कही । याश्वल्क्थका जाना नहीं कहा; क्योंकि वे वहीं
रह गये, यथा--“भरद्वाज राखे पद टेकी!; नहीं जाने दिया । थद्टॉपर
भरद्वाजजीका कृतशता-प्रकाश भी नहीं लिखा, क्योंकि थे ऐसे प्रेममें मम हों
गये थे कि उनके मुखसे वाणी ही नहीं निकली । शद्भुरचरित सुनकर ही
उनकी यह अवस्था हुई कि 'प्रेम विवस मुख आब न बानी |? तबसे
फिर बोले ही नहीं, कथा पूरी हो गयी पर बीचर्मे एक प्रश्न मी नहीं
किया । बीच-बीचमे मुनि ( याशवल्क्य ) जी सावधान बराबर करते रहे,
पर वे कथामें ऐसे डूबे कि भगवान् याशवल्कयने भी “काल पाय मुनि
सुनु सोइ राजा! कहनेके वाद सम्बोधन करना भी बन्द कर दिया |
भरद्वाजजीकी समाहित अबस्था बढ़ती ही गयी, अतः कृतशता-प्रकाश न
कर सके | दर्क्षणघाठ समाप्त हुआ । अब केवल गोखामीजी बोल रहे हैं।
एहि कलिकालू न साधन दूजा |
जोग जज्ञ जप तप ब्रत पूजा ॥
अर्थ-इस कलिकालमें दूसरा साधन, योग, यज्ञ, जप)
तप; अत; पूजा कुछ भी नहीं है ।
पद्दि कलिकाल न साधन दूजा-भाव यह कि काल-प्रमाव-
को अन्यथा करनेमें कोई समर्थ नहीं है, किसीकी शक्ति नहीं कि प्रीष्म
पछ्तुमें गर्मी न पढ़ने दे, पर खसकी टट्टी, पंखा आदिसे अपनी रक्षा कर
सकता है | सो गोखामीजी अपने मनसे कह रहे हैँ 'कि इस समय घोर
कलिकाल तप रहा है, यथा--
सो कलिकाऊ कटिन उरगारी | पाप परायन सच नरनारी 8
७+$७००००५१०१०३०३१ ७०७३७ ० ०००७७५+४०००४७०००० ००७ »०००५०००० ||
सुत्र॒ व्यालादि कराल कलि मल अवग्ुुन आगार।
शतपश्च चौथाई शेश्८
खलमण्डलीमें धर्म नहीं निबहने पाता; और जहाँ संसार-का-संसार
पापी हो गया, वहाँ धर्म केसे निबददेगा ! यथा---
खलमंडली बसु दिनिराती | सखा घर्स निवहै केद्दि भाँती ॥
जोग जज जप तप ब्त पूजा-भाव यह कि योंग सत्ययुगका
धर्म है| सत्ययुगमें शुद्ध सत्वका प्रवाह रहता है; अतः समता, विशान;
मनकी प्रसन्नता समीको होती है, तब ध्यान होता था । ज्ेतार्म सत्तगगुण-
का प्रभाव अधिक और न्यून रजोगुण रतिकर्ममें रहता था, इससे सल्लीक
होकर यज्ञ, जप, तप, व्रत करते थे । द्वापरमें रजोगुण बहुत बढ़ जाता
है और थोड़ा सत्त और तम भी रहता है। उस समय बड़े-बड़े यश
करनेमें छोग असमर्थ हो जाते हैं | अतः उस युगके लिये पूजा घ॒र्म था।
कलयुग तामस बहुत रजोगुण थोड़ा है, पापपयोनिधिके जीव मीन हों
रहे हैं, उनसे पूजाज्ञ, आसनश्ुद्धि, भूतझद्धि आदि कहाँसे हो, अतः
कल्युगर्मे पूजा भी नहीं हो सकती |
रामहि सुमिरिअआ गाइअ रामहिं।
संतत सुनिअआ रामगुनभ्रामहिं ॥१०४॥
शआर्थ-रामका झुमिर्न करमा चाहिये, रामकों गाना
चाहिये, रामके गुणआमकों खुनना चाहिये।
रामईि खुमिरिआ् गाइल रामई-मभाव यह कि राम-नामका
सारण करना चाहिये, मुखसे बोलना चाहिये, केवल मानसिक जप इस
कालमें पर्यात्र नहीं है, यथा---
रासनास सिव सुमिरन छागे । आनेड सती जगतपति जागें ॥
उससे मन थक्रे तो रामगुणगान करना चाहिये, यथा--
राम सुसिर्त सव बविधिहीकों रशाजु रे।
रामको विसारियो निषेध सिरताजु रे॥
३१९, परिशिष्ट
यही एकमात्र इस युगके लिये साधन है ।
संतत्त सुनिञ रामग़ुनप्रामद्धि-भाव यह कि जब सुमिरन
करते और गाते थक्र जाय तब गुणग्राम सुने, अथवा सदा शुणप्राम
सुना करे, यदि वक्ता न मिलें, भोता मिर्ले तो रामगुणश्रामकों उन्हें
सुनावे, जब्र वक्ता-भ्रोता कोई न मिले तो बैठकर सुमिरन करे |
जासु पतितपावन बड़ बाना।
गावहि कबि श्रुति संत पुराना ॥
शर्थ-जिसका वड़ा विरद् पतितपावन है, कवि, वेद,
संत, पुराण सब यही गाते हैं ।
जाखु पतितपावन बड़ बाना-भाव यद्द कि राजा रामचन्द्रके
बहुत-से विरद हूँ; यथा--
पधिरद गरीबनेबाज रामको !!
'द्रीनप्टित (बिरद पुराननि गायो ) ।! 'गई बद्दोर बिरद (सदई है)॥?
'पत्तितपावन बिरद् ( बेंद् गायो )!!
इनमेंसे पतितपावन विरद बड़ा है । इस दरबारसे कितने पतित्त तरे,
उनकी गिनती नहीं । यहाँपर रामका सुमिर्न करने, गाने और गुण-
अथणका कारण देते हैं कि इस युगमें पापसमुद्र#की हमलोग मछली हों
रहे हैँ ओर उनका पतितपावन वाना है; सो ऐसे ही विरदवालेकों
भजना चादिये |
# विपय वारि मन सीस भिन्न नहिं होत कबएँ छन एक ।
ताते सद्दिय विपत्ति अति दारुन जनमत्र जोनि अनेक ॥
कण डोरि बंसी पद अंकुस परम प्रेम मृदु चारों)
एहि विधि वेधि हरि मेरों दुख कौतुक नाथ तुम्दारो ॥
(विनय ० )
शतपशञ्ल चौपाई ३२०
गाचद्दि कवि श्रुति संत पुराना-बहोँ कवि और संत आम्त
हैं और वेद-प्राण आसवाक्य देँ | अतः दाब्दप्रमाणसे सिद्ध हुआ कि
श्रीरामचन्द्रका बड़ा विरद पतितपावन हैँ । वेद-पुराण प्रभुके यश्गान
करनेयाले बन्दी हूँ, अतः उन्द्रोने विरद क॒द्दा हें । यहाँ कविफे साथ
श्रुति और संतके साथ पुराण शब्द रखनेका भाव यद्ष है कि वेंदके कहे
हुए अर्थका ही पुराण उपबृंद्वण करते# हैँ, और कविक्ती कविताकी
व्याख्या संतलोग किया करते हैं; यथा--
सादर कहहद्धिं सुनहिं चुध ताही । सधुकर सरिस संत गुनआाहो ॥
ताहि भजिभ मन तजि कुटिलाई ।
राम्न भर्जे गति केहि नहिं पाई ॥१०५॥
अर्थ-द्वे मन ! उसे तू छुटि््ताओंकों छोड़कर भज्ञ, क्योंकि
रामको भजनेसे किसे गति नहीं मिली ?
ताहि भजिज मन तजि कुटिछाई-तीनों घार्टोके वक्ताओंने
अपने-अपने ओताअंसे कथा कही | गोसाईजी अपने मनसे कथा कह
रहे हैं, वही इनका प्रधान भोता है, क्योंकि उसीके सुखके लिये इन्होंने
कथा कही ग्रथा--
स्वान्तःसुखाय तुछसी रघुनाथगाया साधानिवन्धसतिमजुरूमातनोत्ति ॥
और वही कृतकृत्य हुआ, यथा--
जाकी कृपा छवछेसतें मतिमंद तुूसीदासहू ।
पाएउ परम विश्राम रास समान प्रभु चाही कहूँ ॥
शाम भजे गति केहि नहिं पाई-भाव यह कि दरबारसे कोई
निराश न हों; कुटिछाई छोड़कर चला आवे, अथांत् भजन करे
इतना ही उसका काम है; बाकी सब प्रश्न स्वयं कर छेते हैं। कैसा मी
# पोषणा
३२१ परिशिष्ट
पापी हो; अधम हो, चराचरद्रोद्दी हो, ब्रत्मघाती हो, यहाँ कपठ छोड़ देने-
पर सबका गशुजारा है। एक कपदौके लिये खान नहीं है, कपट छोड़कर
वह भी चला आवे |
छंद-पाई न केहि गति पतितपावन
राम भजि सुनु सठ मना#।
गनिका अजामिल व्याध गीघ
गजादि खल। तारे घना ॥
अर्थ-दहे शाठ मन | छुन, पतितपावन रामकों भजकर
किसने गति नहीं पायी; गणिका, अजामिलछ, व्याध, गीघच,
गज आदि बहुतेरे पापी तर गये ।
पतितपावन राम भजि-भाव यह कि राम पतितपावन हैं,
जैसे ही जीव भजनके लिये उनके सम्मुख होता है, तैसे ही वे उसके
करोड़ों जन्मके पापोंका नाश कर देते हैं, और जहाँ मद, मोह, कपट
आदि छोड़कर शरणमें आया तहाँ उसे तुरन्त साधुके समान बना लेते
हैं; भजन करनेके कारण कृपा बनाये रखते हैं । है
खुलु सठ मना पाई न केहि गति-भाव यह कि 'पुरइन सघन
चार चौपाई [--
छंद सोरठा सुंदर दोहा । सो बहु भाँति कमल कुछ सोहा ॥
चौपाइयाँ गुरइन हैं। और छंद-सोरठा-दोहा कमल हैं। सो
पुरइनमें कली लगती है, पीछेसे वही कली विकसित होकर फूल हो ,
जाती है | यहाँ--
# गोसाईजीका मुख्य ओता तो उनका मन है, उसीको सुखी करनेके
लिये कथा छुना रहे हें, अतः विदाई नहीं कद्दी जा सकती ।
रर्
छातपश्च चौंपाई रेश्य
ताहि भजिज मन तजि कुटिलाई। राम भजे गति के नहिं पाई #
इस पुरइनमें कली छगी है, इसीका विकसित रूप छन्द है।
“मन | राम भजे गति के नहिं पाई! यह कलीका रूप है | मनकों 'सठ'
कहते हैं, क्योंकि यह एक अनुनय-विनय नहीं सुनता । उसीसे पूछते हैं
कि तू किसी अधमका नाम वतलछा, जो भजन करनेपर भी परमपदका
भागी न हुआ हो १ अर्थात् सभी हुए ।
श्रीगोखामीजी दीनघाट (पूर्वघाट ) के वक्ता हैं; अतः कथामें जहाँ
दैन्यका प्राधान्य है, वहाँ ये ही बोलते हैं, यथा--
तुलसी न समरथ कोठ जो तरि सके सरित सनेद्दकी ।
सतुलसी देखि सुबेप मूऊूहिं सूढ़!
इत्यादि यहाँ भी दैन्यका प्राधान्य है; अतः अपने भोता मनको
सम्बोधन करते हैं । इसी भाँति ज्ञानप्रधान अवसरपर ज्ञानघाट
(पश्चिम ) के वक्ता शझक्करजी बोल उठते हैं, यथा--
उमा कहों सैं सजुभव अपना । सत हरिभमजन जगत सत्र सपना ॥
इत्यादि ।
जहाँ भक्तिका प्राधान्य आता है, वहाँ मुश्चण्डिजी बोलते हैं, यथा--
सात झत्यु पितु समन समाना | सुधा होइ बिप सुनु हरिजाना ॥
जहाँ कर्मकी प्रधानता रहती है, वहाँ ( दक्षिणघाट ) कर्मघाटठके
वक्ता याशवल्क्यजी बोलते हैं, यथा--“मरद्दाज सुनु जाहि जब होत
बिघाता बास !? इत्यादि ।
गनिका अजामिर - 'घना-भाव यह कि पाँच खलोंकी नजीर
( उदाहरण ) दी जाती है; जो भजन करनेसे त्तर गये | गणिकाके
अज्ञानकी कौन सीमा; जिसने क्षणिक सुखके छिये शतकोंटि कब्पके
दुशखपर ध्यान नहीं दिया; अजामिलक्ी अस्मिताका क्या अन्त, जिसने
जन्मभर पाप ही, कमाया; और घोर सह्ृटके समय भी परमेश्वरकों न
३२३ परिशिष्ट
पुकारकर अपने छड़फेको पुकारा | व्याधके रागका क्या ठिकाना जो
कुठ्म्बके रागमें पड़ा हुआ हिंसा ही करता रहा, और गीघकी द्वेषयुक्त
जीविका द्वी थी, यथा--गीघ अधम खग आमिष भोंगी?। गजने
अभिनिवैशक्रे वश होकर ही भगवानकों पुकारा, अतः इन पॉचॉमें
प्रधानतः अविद्या; अस्मिता; राग, देप और अभिनिवेशका आपिक्य था+
इसीलिये पॉच उदाहरण दिये गये । भजनसे ये सब तर गये |
आभीर जमन किरात खस
सख्पचादि अति अघरूप जे |
कहि नाम बारक तेपि पावन
होहि राम नमामि ते# ॥
अर्थ-आभीर, यवन, किशत, खदा, चाण्डाल जादि जो
पापरूप हैं, वे भी एक वार जिसके नाम लेनेसे पविच्न होते हैं,
ऐसे रामको में त्मस्कार करता हैँ ।
आभीर “रूप जे-भाव यह कि ये जातियाँ अघरूप हैं, छोक
और बेद सब माँतिसे नीच हैं, थथा--
छोक वेद सब भाँतिद्दि नीचा | जासु छोँह छुप्ट लेहआ सींचा ॥
हम जढ जोव जीवगन घाती | कपटी कायर कुमति कुजाती ॥
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई । छेह्टिं न धासन बसन चोराईं ॥
इन योनिर्योम जन्म होना पूर्व पापका परिणाम है । सो इन योनियॉमे
भी जन्म लेकर जो एक बार भगवानको भजता है, वह पवित्र हो जाता है।
कह्ठि नाम वारक'“'नमामि ते-भाव यह कि नाममें ऐसी
पापदाहिका शक्ति है कि उनके पापकों भी भस्म कर देती है, यथा--
# कहाँ कथा हरिपद थरिं सीसा! से उपक्रम और 'राम नमामि ते” से
उपसंदार हुम[। -४
झातपशञश्च चौपाई ३२४
विवसहु जासु नाम नर कहहीं। जनस जनेक रचित अघ दद्दद्ठी ॥
सादर सुमिरन जे नर करदही | सवसागर ग्रोपद हव त्तरहीं॥
पतित दो प्रकारके हुए, एक जातिसे पतित और एक कर्मसे पतिता।
सो दोनों प्रकारके पतिताँका उद्धार भगवत्-भजनसे होता है, यथा---
घुझलती भगत स्वपंच भलो भजे रैम दिन रास ।
ऊँचो कुछ केहि कामको जहाँ न हरिको नाम ॥
(बै० सं०
सो ऐसे पतितपावनकों गोखामीजी मद्गलार्थ अणाम करते हैं ।
रघुबंस भूषन चरित जे नर
नारि सुनहिं जे गावहीं |
कलि मर मनोमल धोइ बिचु
सत्रस राम धाम सिधावहीं ॥
अर्थ-रघुवंशभूषणके# चरित्रकोग॑ जो स््ी-पुरुष गातें-
खुनते है, ने कलिके मछ तथा मनके मलको चघोकर
अनायास रामचामको जाते हैं ।
शघ॒ुरवंस भूषण" 'गावद्धी-भाव यह कि रामचरितगानमें
अधिकारीका बखेड़ा नहीं है। इस चरितके गान करनेका अधिकार
सब जातिके ज्री-पुरुषकों है; और इससे सबको समान फल होता है ।
कलि मर मनोमर'''सिधावदही-भाव यह कि एक तो यह
युग मलिन; तिसपर सन मल्ति; फिर सुगतिकी कौन-सी आशा है ! पर
भगवानके चरितगानसे दोनों मल छूट जाते हैं, और जीच रामघामकी
लीन पद 6 डोर डड33 सतत -+नल++कबकन+पक ५७७७ कक७+ ५»... धन >3+५2०>५७५७०-७७०-५८/०५-५००००ाे
# परमातमा शअह्म नर रूपा । दोइहिं रघुकुल भूषन भूपा ॥
+ जेहि सुनत ग्रावत कदहत समुझत्त परम पद नर पावई।
रघुबीर चरित युनीत निसिदिन दास छुछृत्ती गावई॥ा
्शण परिशिष्ट
प्रातिका अधिकारी द्वोता है; जहाँसे पुनरा्रत्ति नहीं होती। अन्य
साधनोमें बढ़ा आयास है, पर यह साधन ऐसा है कि गाते-बजाते
रामधाम चले जादये ।
सतपंच चोपाई मनोहर
जानि जे नर उर घरें।
दारुन अविया पंच जनित
बिकार श्रीरघुबर हरे ॥
अर्थ-एक सौ पाँच चौपाइयोंकोी जो कोई जानकर
हृदयमें धारण करता है, उसके दारुण अविद्याओँसे उत्पन्न
पॉँलों विकारका श्रीरामजी दरण करते है |
खतपंच-'“उर घरें-भाव यह कि अन्तिम एक सौ पाँच
चौपाशइ्योंको धारण करनेकी प्थक् फलश्रति है | सम्पूर्ण ग्रम्थकों
धारण करनेमें जो असमर्थ हैँ उनके लिये इसका विधान है। चौपाइयाँ
भी मनोहर हैँ, धारण करनेमें कोई असुविधा भी नहीं है। वात इतनी ही
है कि तोतेकी तरह धारण न करे, जानकर (समझकर ) धारण करनेसे
ही कथित फल होगा ।
दारुन अविद्या' ' 'दहर-भाव यह कि इन १०५ च्ोपाइयोको जान-
कर केवल धारण कर छेना साधकका काम है, उसकी पश्चपर्वों अविद्ाका
हरण स्य॑ रघुवर करेंगे। पूरे ग्रस्थका गान करनेका फल रामधामश्राप्ति,
और शतपञ्च चौपाई ग्रन्थकों घारण करनेका फल अविद्याका माश है;
और अविद्यानिद्याका नाश तथा रामप्रतापसूर्यका उदय दो बस्तुएँ
नहीं है । निशा समाप्त ही नहीं होती, जबतक सूर्योदय नहीं होता और
जबतक मिशा समाप्त न हो तबतक सूर्योदय भी नहीं होता । फलतः
शतपश्च दौपाई ग्न्यकों दृदयर्मे घारण करनेसे अविद्या-निशा नष्ट होती
है, और रामप्रतापरूपी सूर्यक्रा उदय होता है। रामधामकी प्राप्ति तो
शतपञ्च चौपाई रेशदे
मरनेके वाद होगी, और जीते ही रामप्रतापरूपी दिनेशका उदय दोनेसे
रामराज्यका सुख करतलूगत हो जाता है, यथा--
जब ते राम प्रताप खगेसा | उद्धित भयठ ज्त्ति प्रवछ दिनेसा ॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहु छीका । बहुतेन्द्र सुख बहुतेन्ह मन सोका ॥
जिनद्धि सोक ते कट्टों बखानी । प्रथम जविद्या निसा नसानी 5
अघ उलक जहें तहाँ छुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥
विविध करे गुन काल सुभाऊ | ए चकोर सुख लहैं न काऊ ॥
सत्सर सान सोह् सद चोरा | इनकर हुनर न कवनेउ सोरा ॥
धरम तडाग ग्यान विग्याना | ए पंकज्ञ बिकसे विधि नाना ॥
सुख संतोप बिराग विवेका | बिगत सोक ए कोक अनेका ॥
यह प्रताप रबि जाके उर जब करें श्रकास |
पिछले बादृहि प्रथम जे कहे ते पावद्धिं नास ॥
सुंदर सुजान कृपानिधान अनाथपर कर भौात्ति जो ।
सो एक रास अकासहित निवौनप्रद सम आनको ॥
, जाकी कृपा ऊवलेस ते मतिसंद तुलसी दासहू।
पायो परम बिश्रामु& रास समान प्रश्चु नाहीं कहूँ ॥
मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुबीर ।
ऊख बिचारि रघुबंस सनि हरहु विपम भव भौीर ॥
कासिहि नारि पियारि जिसि छोशिहि प्रिय जिसि दास ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय छागहु सोहि राम ॥
शति ओऔरामचरितमानसे सकलकलिकलुपविध्वंसने
शतपश्चचौपाई समाप्ता |
-न्कुक्त थे
# पूर्घाटका ओता गोखामीजीका मन भी ऋत्कृत्थ हुआ ।
ु भजनोंकी ४.४
कविता ओर ! पुस्तकें
बिनय-पतन्निका-भोठुलूसीदासजोकृद, मूठ भजन और
हिन्दी-भावार्थंसहित, ६ चित्र, मुझय १) स० १)
शोीतावली-भरोतुझ्सी दासजोकृत सातों काण्ड, मल
सजन और अर्थसद्दित, < चित्र, मुख्य १)
सजिहद «2 न्नन दे )
श्रोक्ृष्ण-विज्ञान---भ्रो मद्भगवद्धीत्ताका मूलसह्दित
हिन्दी-पयाजुवाद ( सचित्र ) मू० ॥) स०_ १)
श्रुतिकों टेर ( सचित्र ) सृह्य *** 9)
वेदान्त-छन्दावली ( सचित्न ) *** "* मय
भजन-संग्रह प्रथम भाग हड० "न #)
७». द्वितीय भाग. *** *०* #)
४... उतोय भाग आर हा ०० (8)
».. चतुर्थ भाग हह्ड *०* #)
४»... पश्चस भाग ( पन्न-घुष्प ) *** ४)
श्रीहजुमानवाहुक-सचिचत्र, सटीक, मूल्य. *** “)॥
मूछ गोसाईँ-चरित-पथमें तुलढसीदासजीकी सचित्र
जोचनी, सू० ७०% न »)।
हरेरामभजन दो साला 5९ *..
सीतारामभजन हडर न
श्रीह्टरि-संकीतन-घुन 5०७ "5 ओ।
कल्याण-सावना ९ हे
गजलछगीता घ आधा पैसा
गद्य-पद्यमय पुस्तकें
प्रेम-योग-छे ०-अ्रीवियोगी हरिजी सू० $।) सजिल्द १॥)
गीतामें भक्ति-योग |
मनन-साछा-ले०-भ्रीज्वालासिहजी
शोपी-प्रेम-लछे ०-क्ो हजुमानभलादजी पोद्दार ** “»।
सिछमेका पता-गीताप्रेंस, गोरखपुर ।
भागवतरल्न प्रह्माद-८ चिन्;
मू० १) सजिल्द १)
देंवर्षि नारद-५ चित्र,
मूल्य ॥।) सजिल्द १)
श्रीतुकाराम-चरिच-मूल्य.. १४)
सजिह्द १॥)
ओऔज्ञानेश्वर-चरिच-१ चित्र)
मूल्य ॥>2
ओएकना थ-चरित्र, सू० ॥)
ओरामकृपष्ण परमहंस-३े चित्त;
मूल्य ००० ]
ओशभीचैतन्य-चरितावली
खण्ड १-६ चित्र, प्रष्ठ ३६०,
मूल्य ॥>) सजिल्द १८)
ओऔभ्रीचेतन्य-चरितावली
खण्ड २-९ चित्र, पृष्ठ ४५०;
मूल्य १०), स्जिल्द १२)
श्रीक्रीचैतन्य-चरितावली
खण्ड २-प्रष्ट २८४; चिचर
११, मूल्य १) सजिल्द १।)
न्न्य-चरितावली खण्ड ४
२२४, चित्र १४, मू० ॥”)
॥-)
श्रीक्ष +नन्य-चरितावली खण्ड ५
पृष्ठ “०; चित्र १० मूल्य ॥)
सब
सजिल्+ हा 4 )
भक्त बालक- ६ चित्र, मू०._ ।-)
शा; ६चिद्) मू०._ |“)
भक्त पश्मरत्-५ चित्र, मू० 2
आदर्श भक्त-७ चित्र; मू०. ।-)
भक्त-चन्द्रिका-७ चित्र; मू० 2)
भक्त-सप्तरक्ष-७ चिच; मू०.. |)
भक्त-कुसुम-६ चित्र; मू०.._ ।“)
प्रेमी भक्त-६ चित्र, सू०..._ ४2
यूरोपकी भक्त ल्लिया-रे चित,
मूल्य न्न्न )
“2
एक संतका अनुभव--मू ०
-ण्वड::->७ बी ००थफ पीर ए८:००७०-
विशेष जानकारीके लिये बड़ा सूचीपत्न मुफ्त सैंगाइये ।
पता-गीताग्रेंस, भीरखपुर ।